पर्यावरण और संविधान  

भारतीय संविधान की उद्देशिका के यद्यपि प्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है तथापित जिस समाजवादी राज्य की परिकल्पना की गई है वह तभी सम्भव है जब सभी का जीवन स्तर ऊंचा हो। यह सत्य है कि सभी का जीवन स्तर केवल स्वच्छ पर्यावरण अर्थात् प्रदूषण रहित पर्यावरण में ही सम्भव है। मूलाधिकारों में प्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण के बारे में कोई प्रावधान नहीं है लेकिन कुछ मूलाधिकारों में पर्यावरण को अप्रत्यक्ष रूप से समाहित किया गया है। 42वें संविधान संशोधन के पूर्व भारतीय संविधान में अनुच्छेद 47 एक मात्र ऐसा अनुच्छेद था, जो पर्यावरण के बारे में प्रविधान करता था।

अनुच्छेद 47 के अनुसार

राज्य अपने स्तर को पोषाहार और जीवन स्तर को ऊंचा करने और लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में मानेगा और राज्य विशिष्टता, मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकर औषधियों के औषधीय प्रयोजनों से भिन्न, उपयोग का प्रतिषद करने का प्रयास करेगा। पर्यावरण संरक्षण तथा सुधार के लिए भारतीय संविधान में 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 48-क से जोड़ा गया जो निम्न उपबंध करता है।

"राज्य देश के पर्यावरण के संरक्षण तथा उसमें संवद्धन और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा के लिए प्रयास करेंगा।"

42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान में एक नया भाग 4-क भी जोड़ा गया। इस भाग के अनुच्छेद 51-क में नागरिकों के 10 मूल कर्तव्यों का समाविष्ट किया गया है। अनुच्छेद 51- क खण्ड (छ) स्पष्ट रूप से पर्यावरण संरक्षण का उपबन्ध करता है। इसके अनुसार -

"भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अन्तर्गत वन, नदी ओर वन्य जीव हैं, रक्षा और उसका संवर्धन करें तथा प्राणि मात्र के प्रति दया भाव रखे।"

पर्यावरण संरक्षण संबंधी राष्ट्रीय प्रावधान

भारतीय दण्ड संहिता की विभिन्न धाराएं, यथा 268, 269,272, 277, 278, 284, 290 तथा 426 में प्रदूषण के लिए दण्डात्मक प्रावधान किये गये हैं। इसी प्रकार भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 133 में प्रदूषण को रोकने के व्यापक प्रावधान है। इण्डियन फॉरेस्ट एक्ट, 1927 के तहत वनों की सुरक्षा के लिए प्रभावी नियम बनाये गये हैं। इस अधिनियम में वनों को तीन वर्गो में रखा गया है -

  1. आरक्षित वन
  2. सुरक्षित वन
  3. पंचायती वन

वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 में जीवों के संरक्षण संबंधी प्रावधान किये गये हैं।

उच्चतम न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला

वर्ष 1995 में सुप्रसिद्ध वकील एम.सी. मेहता द्वारा दायर जनहित याचिका पर 29 अप्रैल 1999 को फैसला सुनाते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि 1 जून, 1999 से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में केवल उन्हीं गैर व्यावसायिक मोटर वाहनों का पंजीकरण होगा जो प्रदूषण उत्सर्जन के यूरो-1 मानक की कसौटी पर खरें उतरते हैं। साथ ही पंजीकरण की सीमा 1500 वाहन प्रतिमाह निर्धारित की गई जिसे बाद में खत्म कर दिया गया। न्यायालय के फैसले के अनुसार अप्रैल, 2000 से केवल उन्हीं वाहनों का पंजीकरण होना था जो यूरो- 2 मानक की कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरते। इसके पूर्व स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने यूरा-1 मानक के लिए अप्रैल 200 तथा यूरो-2 के लिए अप्रैल 2005 की सीमा निर्धारित की थी।

उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय से भारतीय कार उद्योग सकते में आ गया। उस समय भारत में बिक रही कारों में सिर्फ डेबू की माटिज, सिएलो व नेविसया तथा मर्सिडीज बेंज ही मानकों को पूरा कर रही थीं। हिन्दुस्तान मोटर्स और प्रीमियर आटोमोबाइल लिमिटेड की कोई भी कार यूरों मानकों के अनुरूप नहीं थी। मारुति ने न्यायालय के आदेश के तुरन्त बाद मारुति जेन तथा मारुति 800 को यूरो -2 के अनुरूप बनाया।

यूरोप में काफ़ी पहले यूरा मानक लागू कर दिये गये थे। यूरोप में यूरा-1 मानक 1992 में तथा यूरो-2 मानक जनवरी, 1996 में लागू कर दिया गया था। यूरा-1 के मानक के अनुसार पेट्रोल व डीजल चालित कारों से प्रति किमी निकलने वाले कार्बन मोना ऑक्साइड की मात्रा 3.6 ग्राम से अधिक नहीं होनी चाहिए जबकि यूरो-2 के अनुसार यह सीमा पेट्रोल चालित कार के लिए 2.2 ग्राम प्रति किमी व डीजल के लिए 10 ग्राम प्रति किमी निर्धारित की गयी थी। यूरो-1 मानक के अनुसार डीजल व पेट्रोल चालित कारों के लिए हाइड्रोकार्बन तथा नाइट्रस ऑक्साइड की मात्रा 1.19 ग्राम प्रति किमी निर्धारित की गई थी जबकि यूरो-2 के अनुसार डीजल के लिए यह मात्रा 0.7 से 0.9 ग्राम प्रति किमी तथा पेट्रोल के लिए 0.5 से 1.0 ग्राम प्रति किमी निर्धारित थी। अवलंबित कणों के लिए यूरो मानकों की सीमा 0.08 से 0.1 ग्राम प्रति किमी निर्धारित की गई।

मोटर वाहनों से उत्सर्जित प्रदूषणों की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए भारत में पहली बार 1991 में माथुर कमेटी गठित की गई जिसने वाहनों के लिए उत्सर्जन के मानदण्ड निर्धारित किये। इन मानदण्डों को 1992 में लागू किया गया। 1996 में इन मानदण्डों की समीक्षा के बाद इन्हें समायानुकूल अधिक सख्त बनाया गया। माथुर कमेटी की अनुशंसओं के आधार पर ही सर्वोच्च न्यायालय ने यूरो मानकों को लागू करने की तिथि निर्धारित की।

हाइड्रोजन ईंधन

यूरोप सर्वाधिक ठण्डे देश आइसलैण्ड में भविष्य की ऊर्जा क्रांति की नींव रखी जा रही हे। वह देश अगले 20 वर्षो में जीवाश्म ईंधन का प्रयोग पूर्णतया समाप्त कर हाइड्रोजन पर आधारित अर्थव्यस्था की स्थापना करेगा, हालांकि आइसलैण्ड ने अभी से ही जीवाश्म ईंधन को घटाना शुरु कर दिया है। इस समय वहाँ मुख्यतः पन बिजली का उत्पादन होता है तथा इमारतों को गर्म करने के लिए ज्वालामुखीय पत्थरों से उत्पादित भू-तापीय ऊर्जा का प्रयोग किया जाता हैं। परिवहन व्यवस्था में भी पेट्रोलियम का उपयोग कम किया जा रहा है। हाइड्रोजन ईंधन का उत्पादन जल अणुओं के विखण्डन द्वारा किये जाने की योजना है। इससे प्राप्त हाइड्रोजन को द्रवित कर ईंधन सेलों में डाला जायेगा जो विद्युत चालित बसों, ट्रकों, कारो आदि को ऊर्जा प्रदान करेंगें।

1839 में भौतिक विद् विलियम ग्रोव ने प्रमाणित किया था कि किसी सेल में प्लेटिनम इलेक्ट्रोडों की सहायता से ऑक्सीजन और हाडड्रोजन का संयोजन करके बिजली का उत्पादन किया जा सकता है। ईंधन सेल में प्लेटिनम इलेक्ट्रोड हाइड्रोजन से इलेक्ट्रान खींच लेता है तथा हाइड्रोजन आयन विद्युत अपघट्य द्वारा विपरीत इलेक्ट्रोड में प्रवेश करता हे। इलेक्ट्रानों को बाह्म परिपथ में पकड़ा जाता है तथा हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन आयनों को संयुक्त कर दिया जाता है जिससे जल ओर विद्युत का उत्पादन किया जाता है।

ईधन सेल चालित वाहन न तो ध्वनि और न वायु प्रदूषण ही पैदा करते हैं। वाहन के एकजास्ट पाइप से मात्र जलवाष्प निकलती है। इसमें यह दिक्कत है कि वाहनों में हाइड्रोजन का भण्डारण अत्यन्त दुरूह कार्य हैं हाइड्रोजन प्राप्त करने के लिए मीथेन विखण्डन किया जा सकता हे। हाइड्रोजन ईधन से बिजली घर भी चलाये जा सकते हैं।

प्लास्टिक की थैलियों पर प्रतिबन्ध

भारत के कुछ राज्यों में पॉलीथन की थैलियों पर प्रतिबन्ध पर लगाया गया हे। इसमें जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश अग्रणी हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने 1 अप्रैल 1999 से गाज़ियाबाद ज़िले में पॉलीथन की थैलियों के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगा दिया। पॉलीथीन की विशेषता यह है कि वह 500 साल से पहले नष्ट नहीं होती। साथ ही यह धरती की उर्वरा शक्ति को नष्ट कर देती हैं।

पॉलीथीन में सबसे हानिकारक पदार्थ पॉली विनायल क्लोराइड (पी.वी.सी.) है, जिसके जलने पर डायोक्सिन नाम की खतरनाक गैस निकलती है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक है। इससे फेफड़ों के कैंसर से लेकर मस्तिष्क के विभिन्न रोग हो जाते हैं। रंगीन पॉलीथीन थैलियों में और भी विषैले रसायन होते हैं।

राज्य सरकारों द्वारा उठायें गये कदमों के दृष्टिगत केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने पुनः चक्रित थैलियों को खाद्य पदार्थो के उपयोग के लिए प्रतिबन्धित कर दिया है। इस प्रतिबन्धात्मक अधिनियम के तहत कोई भी पुनः चक्रित प्लास्टिक से बने कैरी बैग या पात्र का उपभोग तभी कर सकता है जब वह रंगीन न हो तथा उसकी न्यूनतम मोटाई 25 माइक्रान से कम न हो। अधिनियम के अनुसार मूल प्लास्टिक से बने कैरी बेग की न्यूनतम मोटाई 20 माइक्रान से कम नहीं होनी चाहिए।

पॉलीथीन थैलियों के उपयोग को कम करने के लिए सरकार इको बैग के इस्तेमाल को प्रोत्साहित कर रही हैं, जिसकी तकनीक केरल स्थित सेन्ट्रल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट ने विकसित की है। प्लास्टिक के निर्माण में पॉली ऑलेफिन्स, पॉलिएस्टर और पॉली यूरेथीन जैसे रासायनिक यौगिकों का प्रयोग किया जाता है, जो पेट्रोलियम आधारित है और न नष्ट होने वाले हैं। दुनिया भर में प्रतिवर्ष लगभग 2.5 करोड़ टन प्लास्टिक कचरे के रूप में इकट्ठा हो जाता है। प्लास्टिक कचरे को नष्ट करने के लिए विश्व द्वारा 1994 में मेरी टाइम पॉल्यूजन ट्रीटी नामक समझौते पर हस्ताक्षर किये गये जिसके अन्तर्गत कोई भी प्लास्टिक कचरे को समुद्र में नहीं डाल सकता है। पर्यावरण सम्बन्धी इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए प्लास्टिक पॉलीथीन के निर्माण की मांग उठ रही है, जिसको एंजाइमों द्वारा नष्ट किया जा सके। इसके लिए ऐसे पॉलीथीन का विकास किया गया है, जो सूर्य की अल्ट्रा वॉयलेट किरणों के सम्पर्क में आकर नष्ट हो जाते हैं।

अलनीनो तथा ला नीना

अलनीनो एक गर्म जलधारा है जो प्रशान्त महासागर में पेरू तट के सहारे प्रत्येक 2 से 7 साल बाद बहना प्रारम्भ कर देती है। अलनीनो के कारण विश्व की प्रकृति एवं मौसम में असामान्य बदलाव आता है। अलनीनो की समाप्ति के बाद प्रशान्त महासागर के उसी स्थल से ठंडे पानी की धारा प्रवाहित होने लगती है, जिसे 'ला नीना' कहा जाता है। अलनीनो की भांति ला नीना भी प्रकृति एवं मौसम में बदलाव लाती है। ला नीना की उत्पत्ति पूर्णतया अलनिनों पर निर्भर है। अलनीनो से उत्पन्न अतिरिक्त उष्मा को सन्तुलित करने के लिए प्रकृति ला नीना का सहारा लेती है। पिछले 15 वर्षो में तीन बार अलनीनो के बाद ला नीना का सहारा लेती है। पिछले 15 वर्षो में तीन बार अलनीनो के बाद ला लीना का प्रभाव विश्व पर पड़ा किन्तु मई 1998 से लाल नीना का प्रभाव विश्वस्तर पर दृष्टिगोचर होने लगा। आई.एस.ओ. 1400 - भारतीय मानक ब्यूरो ने औद्योगिक विकास को पर्यावरण के अनुकूल बनाने और अन्तर्राष्ट्रीय दवाब का प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए आई.एस.ओ - 1400 शृंखला के अनुरूप प्रतिष्ठित पर्यावरण प्रबन्ध पद्धति प्रमाणन को देश में शुरू किया है।

लुप्त होता द्वीप समूह

बंगाल की खाड़ी में 31 छोटी-छोटी द्विपिकाओं का समूह 'सागर द्वीप समूह' भू-क्षरण व अन्य प्राकृतिक आपदाओं के कारण लुप्त होने के कगार पर है। 1947 तक इसमें पांच बड़े तथा 18 छोटे द्वीप थे, लेकिन 1990 तक इसके तीन द्वीप लउहोरा, सुपारी दंगा और अजुगमानी बंगाल की खाड़ी में ज्वार-भाटे के कारण पूर्णतया विलुप्त हो गये थे। वर्तमान में इस द्वीप में दो बड़े द्वीप सागर व छोरा मारा तथा नौ अन्य छोटे द्वीप हैं। इन दो द्वीपों की कुल जनसंख्या 11800 है।


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