भारतीय संस्कृति का प्रसार  

भारतीय संस्कृति के विदेशों व एशिया के भाग तथा सुदूर पूर्व के देशों में प्रसार के कारणों का उल्लेख निम्न प्रकार से किया जा सकता है-

भारत की महत्त्वपूर्ण सामरिक स्थिति

प्राचीनकाल के सभ्य संसार में भारत की स्थिति अत्यधिक महत्त्वपूर्ण थी। हिन्द महासागर के तट पर स्थित होने के कारण भारत की केन्द्रीय स्थिति थी। वह तत्कालीन सभ्य एवं सुसंस्कृत देशों के समुद्री भागों के मध्य में स्थित होने से उन देशों में फैली हुई सभ्यताओं के सम्पर्क में आता रहता था। सुमात्रा, जावा, बाली, बोर्नियो, स्याम, हिन्दचीन, बर्मा (वर्तमान म्यांमार) और मलाया आदि देश इसी प्रकार से भारतीय संस्कृति के सम्पर्क में आकर सभ्य बने।

व्यापार की वृत्ति

संस्कृति और सभ्यता का प्रसार विजय और व्यापार के साथ होता है। भारतीय संस्कृति के प्रसार में भारतवासियों की व्यापार यात्राओं ने अनुपम सहयोग प्रदान किया। उस काल के भारतीयों को ज्ञान था कि पूर्वी द्वीप-समूह मसालों और स्वर्ण के खानों से भरपूर हैं, अत: भारतीय नाविक और व्यापारी उन देशों की अत्यधिक यात्रा करते थे, जिनके कारण वहाँ की जातियाँ उनके सम्पर्क में आने लगीं और भारतीय संस्कृति से प्रभावित होने लगीं।

धर्म प्रचार का उत्साह

प्राचीन हिन्दू मनीषियों, ऋषि-मुनियों और बौद्ध धर्म के प्रचारकों में धार्मिक प्रचार का उत्साह अत्यधिक था, अत: वे भी व्यापारियों के साथ-साथ धर्म प्रचार के लिए विदेशों में जाते रहते थे। इनका जीवन त्याग एवं तपस्या के तेज़ से आलोकित रहता था। ये लोग भीषण बाधाओं का सामना करते और नि:शंक होकर असभ्य जातियों को धर्मोपदेश देकर अपने धर्म में दीक्षित करते थे। इनका परम लक्ष्य सत्य का अन्वेषण और उसका विश्व में प्रसार था।

औपनिवेशिक प्रसार की लालसा

भारतीय संस्कृति के प्रचार और प्रसार का सर्वाधिक श्रेय उन साहसी और उत्साही भारतवासियों को प्राप्त है, जिन्होंने विदेश गमन करके विभिन्न देशों में भारतीय उपनिवेशों की स्थायी रूप से स्थापना की। इन उपनिवेशों ने भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रधान केन्द्रों के रूप में विशेष सफलता प्राप्त की तथा अपने सम्पर्क में आने वाली जातियों को भारतीय संस्कृति, सभ्यता और धर्म ने पूर्णतया प्रभावित किया।

भारतीय सभ्यता और संस्कृति का प्रसार

भारतीय सभ्यता और संस्कृति के प्रसार का अवलोकन निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है-

मध्य एशिया

यह विभिन्न जातियों के निवास और उनकी संस्कृतियों के अवशिष्ट अवशेषों के लिए प्रसिद्ध है। मौर्य साम्राज्य के विस्तार, सम्राट अशोक के धर्म प्रचार तथा कुषाण शासकों के इस भाग पर अधिकार के कारण भी भारत का मध्य एशिया के साथ घनिष्ठ सम्पर्क स्थापित हो गया था। वर्तमान काल में मध्य एशिया स्थित विशाल 'गोबी के मरुस्थल' में उस समय सुख-समृद्धि से परिपूर्ण विशाल उपनिवेश स्थापित किये गए।

चीनी यात्री फाह्यान

चीनी यात्री फाह्यान के अनुसार ईसवी सन् की प्रथम शताब्दी तक मध्य एशिया का भारतीयकरण किया जा चुका था। वहाँ की 'लीबनार झील' के पश्चिम की ओर बसी समस्त जातियों ने भारतीय धर्म और भाषा ग्रहण कर ली थी। वहाँ पाये गए अवशेषों से सिद्ध हो चुका है कि वहाँ अब से लगभग दो सहस्र वर्ष पूर्व अनेक ऐसे नगर थे, जिनमें भारतीय निवास करते थे। वहाँ पर किये गए उत्खनन में अनेक स्थानों पर महात्मा बुद्ध, गणेश, कुबेर एवं अन्य देवी - देवताओं की मूर्तियाँ तथा बौद्ध स्तूप, विहार, चित्र, हस्तलिखित ग्रन्थ, भारतीय सिक्के तथा भारतीय लिपि में लिखे छोटे-छोटे अभिलेखों की उपलब्धि हुई। इनसे स्पष्ट है कि वहाँ बौद्ध धर्म और हिन्दू धर्म का व्यापक प्रसार था, संस्कृत भाषा का प्रयोग किया जाता था तथा 'गान्धार शैली' एवं भारतीय तक्षण-कला का प्रभाव था। 'अजन्ता कला' के अवशेष भी वहाँ प्राप्त हुए हैं।

चीनी यात्री ह्वेनसांग

सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इस बात की पुष्टि की है कि उस काल के मध्य एशिया में भारतीय संस्कृति और सभ्यता तथा बौद्ध धर्म का पूर्णरूपेण प्रसार था। उस समय मध्य एशिया में स्थित कुछ प्रसिद्ध भारतीय राज्य काशगर, कूचा, तुर्कान और खोतान आदि थे। भारतीय संस्कृति के इन मुख्य केन्द्रों से भारतीय धर्म प्रचारकों ने आगे बढ़कर चीन, मंगोलिया, कोरिया और जापान आदि एशिया के दूरस्थ भागों में बौद्ध धर्म और भारतीय संस्कृति की विजय पताका फहराई।

चीन, जापान, फ़िलिपाइन द्वीप आदि में भारतीय संस्कृति

मध्य एशिया से भारतीय संस्कृति और धर्म प्रसार चीन, जापान, मंगोलिया, कोरिया और फ़िलिपाइन द्वीप समूह आदि में किया गया। ईसवी सन् की प्रथम शताब्दी में कश्यप, मातंग, धर्मरत्न आदि धर्म प्रचारक, बौद्ध धर्म और भारतीय संस्कृति का सन्देश लेकर खोतान से चीन में प्रविष्ट हुए। तीसरी शताब्दी से छठी शताब्दी के समय में सम्पूर्ण चीन देश में बौद्ध धर्म फैल गया। चीन के सम्राटों ने राजधर्म को उच्च स्थान प्रदान किया। वहाँ पर बौद्ध विहारों का निर्माण कराया गया। इसके पश्चात् चीन में तांग वंश के शासन का आरम्भ हो गया, जो 698 ई. से 907 ई. तक रहा। यह चीन के इतिहास में बौद्ध धर्म का स्वर्ण युग माना जाता है। अनेक चीनी यात्री महात्मा बुद्ध की पवित्र भूमि का दर्शन करने तथा बौद्ध धर्म ग्रन्थों को प्राप्त करने भारत आये। उन्होंने पालीसंस्कृत भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया तथा बौद्ध ग्रन्थों का चीनी भाषा में अनुवाद किया। उन्होंने भारतीय संस्कृति का चीन में प्रचार किया। वहाँ की कला पर गान्धार कला और 'गुप्त कला' का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है।

ईसवी सन् की चौथी शताब्दी में बौद्ध धर्म का प्रसार चीन से कोरिया प्राय:द्वीप में होने लगा। कोरिया से छठी शताब्दी में इस धर्म का प्रसार जापान द्वीपसमूह में हुआ। भारतीय संस्कृति और सभ्यता ने जापान की संस्कृति को विभिन्न क्षेत्रों में अत्यधिक मात्रा में प्रभावित किया। मंगोल सम्राटों द्वारा 13वीं शताब्दी में बौद्ध धर्म अंगीकार किया गया। इस धर्म का प्रसार मंगोलिया में मंचूरिया और साइबेरिया में भी हुआ। आधुनिक अन्वेषणों से सिद्ध हो चुका है कि फ़िलिपाइन द्वीपसमूह में भी दक्षिण भारत के निवासियों द्वारा उपनिवेशों की स्थापना की गई थी। उनके दैनिक जीवन के सभी क्षेत्रों को भारतीय संस्कृति ने पूर्णत: प्रभावित किया था।

अफ़ग़ानिस्तान

उस काल में अफ़ग़ानिस्तान में संस्कृत भाषा को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। वर्तमान काल में भी अनेक अफ़ग़ान युवक संस्कृत भाषा का अध्ययन करते हैं। अफ़ग़ानिस्तान के समान ही ईरान, सीरिया, खुरासान और इराक आदि देशों में भी इस्लाम के पूर्व बौद्ध धर्म प्रचलित था।

तिब्बत

सातवीं शताब्दी के कई भारतीय विद्वानों ने तिब्बत की यात्रा की और वहाँ बौद्ध धर्म का प्रचार किया। इसके उपरान्त 747 ई. में कश्मीर से आचार्य पद्मसम्भव तिब्बत पहुँचे। वहाँ उन्होंने तन्त्रवाद से युक्त बौद्ध धर्म की महायान शाखा का प्रचार किया। महायान के आधार पर ही आगे चलकर तिब्बत में लामा मत का विकास हुआ। तिब्बत के बौद्ध शासक द्वारा आमन्त्रित किए जाने पर ‘नालन्दा विश्वविद्यालय’ के आचार्य शान्तरक्षित भी वहाँ गए। उन्होंने वहाँ ‘समूये’ नामक प्रथम बौद्ध विहार का निर्माण कराया, बौद्ध मत के ग्रन्थों का अनुवाद किया गया, तथा तिब्बत के निवासियों में से अनेकों को बौद्ध भिक्षु बनाया गया। ग्यारहवीं शताब्दी में बंगाल के पाल नरेशों ने तिब्बत में बौद्ध धर्म के प्रचार और सुधार में सहयोग प्रदान किया। 1028 ई. में बंगाल के प्रख्यात आचार्य दीपशंकर श्रीज्ञान ने तिब्बत में वज्रयान का प्रचार किया, जिसमें देवी शक्तियों की प्राप्ति के लिए तन्त्र-मन्त्र और जादू-टोनों का सहारा लिया जाता है। धर्म के साथ-साथ तिब्बत की कला को भी भारतीय कला ने प्रभावित किया।  


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