मखाना  

मखाना (अंग्रेज़ी: Fox Nut, वानस्पतिक नाम: यूरेल फ़रोक्स Euryale ferox) को प्रिकली लिली याने कांटे युक्त लिली कहते हैं क्योंकि इसमें पत्ती के डंठल एवं फलों तक पर छोटे-छोटे कांटे लगे होते हैं। यह कमल कुल का एक बहुवर्षीय पौधा हैं। वनस्पति शास्त्र में इसे यूरेल फ़रोक्स कहते हैं। इसमें जड़कंद होता है। बड़ी-बड़ी गोल पत्तियां पानी की सतह पर हरी प्लेटों की तरह तैरती रहती हैं। इसमें सुन्दर नीले, जामुनी या लाल कमल जैसे फूल खिलते हैं। जिन्हें नीलकमल कहते हैं। परंपरा के मुताबिक कमल का फूल धन की देवी लक्ष्मी को विशेष रूप से प्रिय है। लिहाज़ा, कमल और मखाना दोनों का पूजा में बड़ा महत्व है। मखाना की खेती भारत के अलावा चीन, जापान, कोरिया और रूस में भी की जाती है। इसका फल स्पंजी होता है। फल को बेरी कहते हैं। फल और बीज दोनों खाए जाते हैं फल में 8-20 तक बीज लगते हैं। बीज मटर के दाने के बराबर आकार के होते हैं और इनका कवच कठोर होता है। लगभग 65 प्रतिशत मखाना बिहार में उगाया जाता है।

क्या है मखाना

मखाना वस्तुत: फाक्सनट के बीजों की लाई है। वैसे ही जैसे पापकार्न मक्का की लाई है। इसमें लगभग 12 प्रतिशत प्रोटीन होता है। मखाना बनाने के लिए इसके बीजों को फल से अलग कर धूप में सुखाते हैं। संग्रहण के दौरान नम बनाए रखने के लिए इन पर पानी छींटा जाता है। इसकी लाई की गुणवत्ता बीजों में उपस्थित नमी पर निर्भर करती है। धूप में सुखाने पर उनमें 25 प्रतिशत तक नमी बची रहती है। सूखे नट्स को लकड़ी के हथोड़ों से पीटा जाता है इस तरह गरी अलग होने पर बीज अच्छी तरह से सूखते हैं। सूखे बीजों को अलग-अलग श्रेणी में बांटने के लिए उन्हें चलनियों से छाना जाता है। बीज एक समान आकार के हों तो भूनते समय आसानी होती है। बड़े बीज अच्छी क्वालिटी के माने जाते हैं।

बीज बने लाई

बीजों को बड़े-बड़े लोहे के कढ़ावों में सेंका जाता है। फिर इन्हें टेम्परिंग के लिए 45-72 घण्टों के लिए टोकनियों में रखा जाता है। इस तरह इनका कठोर छिलका ढीला हो जाता है। बीजों को लाई में बदलना एक श्रमसाध्य कार्य है। कढ़ाव में सिंक रहे बीजों को 5-7 की संख्या में हाथ से उठाकर ठोस जगह पर रखकर लकड़ी के हथोड़ों से पीटा जाता है। इस तरह गर्म बीजों का कड़क खोल तेजी से फटता है और बीज फटकर लाई (मखाना) बन जाता है। बीजों के अंदर अत्यधिक गर्म वाष्प बनने और तेज दबाव से छिलका हटने से ऐसा होता है। जितने बीजों को सेका जाता है उनमें से केवल एक तिहाई ही मखाना बनते हैं।

मखानों की पालिश

लाई बनने पर उनकी पॉलिश और छंटाई की जाती है। इस हेतु इन्हें बांस की टोकनियों में रखकर रगड़ा जाता है। इस प्रकार इनके ऊपर लगा कत्थई-लाल रंग का छिलका हट जाता है। यही पॉलिशिंग चावल को भी सफेद बनाने के लिए मशीनों से उन्हें पालिश करते हैं। हालांकि ऐसा करने से उसके कई पोषक तत्व हट जाते हैं। पॉलिश करने पर मिले सफेद मखानों को उनके आकार के अनुसार दो-तीन श्रेणियों में छांट लिया जाता है। फिर उन्हें पोलीथीन की पर्त लगे गनी बैग में भर दिया जाता है। ये इतने हल्के होते हैं कि एक बोरे में मात्र 8-9 किलो मखाने समाते हैं।

मखाना व्यंजन

यह एक सुस्वाद पाचक भोय पदार्थ है। इसे सादा या फिर मसाले के साथ घी में भूनकर स्वादिष्ट बनाते हैं। कुछ लोग इसे मेवों के साथ भी प्रयोग में लाते हैं। यह इतना स्वादिष्ट होता है कि इसकी मदद से बच्चों को जंक फूड से बचाया जा सकता है। इससे बनी मखाना खीर, मखाना रायता, मखाना सेवई की तो बात ही निराली होती है। मणिपुर के कुछ इलाकों में इसके जड़कन्द और पत्ती के डंठल की सब्ज़ी भी बनाते है। इससे अरारोट भी बनता है।

उत्पादन क्षेत्र

दरभंगा स्थित राष्ट्रीय मखाना शोध संस्थान के अनुसार भारत में लगभग 13,000 हैक्टर नमभूमि में मखानों की खेती होती है। यहां लगभग नब्बे हजार टन बीज पैदा होता है। देश का 80 प्रतिशत मखाना बिहार की नमभूमि से आता है। इसके अलावा इसकी छिटपुट खेती अलवर, पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर और मध्य प्रदेश में भी की जाती है। परन्तु देश में तेजी से खत्म हो रही नमभूमि ने इसकी खेती और भविष्य में उपलब्धता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि स्वादिष्ट स्वास्थ्यवर्धक मखाना खाते रहना है तो देश की नमभूमियों को भी बचाना होगा। नमभूमियों को प्रकृति के गुर्दे भी कहते हैं और पता चलता है कि यहां उगा मखाना हमारी किडनियों की भी रक्षा करता है।

विशेष महत्त्व

मखाना को देवताओं का भोजन कहा गया है। उपवास में इसका विशेष रूप से उपयोग होता है। पूजा एवं हवन में भी यह काम आता है। इसे आर्गेनिक हर्बल भी कहते हैं। क्योंकि यह बिना किसी रासायनिक खाद या कीटनाशी के उपयोग के उगाया जाता है। आचार्य भावमिश्र (1500-1600) द्वारा रचित भाव प्रकाश निघंटु में इसे पद्मबीजाभ एवं पानीय फल कहा गया है। इसके अनुसार मखाना बल, वाजीकर एवं ग्राही है। इसे प्रसव पूर्व एवं पश्चात् आई कमज़ोरी दूर करने के लिए दूध में पकाकर खिलाते हैं। यह सुपाच्य है तथा आहार के रूप में इसका उपयोग किया जाता है। इसके औषधीय गुणों के चलते अमरीकन हर्बल फूड प्रोडक्ट एसोसिएशन द्वारा इसे क्लास वन फूड का दर्जा दिया गया है। यह जीर्ण अतिसार, ल्यूकोरिया, शुक्राणुओं की कमी आदि में उपयोगी है। इसमें एन्टी-ऑक्सीडेंट होने से यह श्वसन तंत्र, मूत्र-जननतंत्र में लाभप्रद है। यह ब्लड प्रेशर एवं कमर तथा घुटनों के दर्द को नियंत्रित करता है। इसके बीजों में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, कैल्शियम एवं फास्फोरस के अतिरिक्त केरोटीन, लौह, निकोटिनिक अम्ल एवं विटामिन बी-1 भी पाया जाता है।


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