अश्वगंधा  

अश्वगंधा
अश्वगंधा
जगत पादप (Plantae)
उपजगत ट्रैकेयोनायोंटा (Traikeyonayonta)
वर्ग मैग्नोलियोप्सीडा (Maignoliyopseeda)
उप-वर्ग ऐस्टेरिडी (Asteridae)
गण सोलनेलेस (Solanales)
कुल सोलनेसी (Solanaceae)
जाति विथानिआ सोमनीफ़ेरा (W. somnifera)
प्रजाति विथानिआ (Withania)
द्विपद नाम विथानिआ सोमनीफ़ेरा (Withania somnifera)
अन्य जानकारी अश्वगंधा का प्रयोग भारत में प्राचीन समय से ही कारगर औषधि के रूप में होता है। औषधि के रूप में इसका उपयोग करके कई रोगों को दूर किया जा सकता है।

अश्वगंधा (वानस्पतिक नाम: 'विथानिआ सोमनीफ़ेरा' - Withania somnifera) एक झाड़ीदार रोमयुक्त पौधा है। कहने को तो अश्वगंधा एक पौधा है, लेकिन यह बहुवर्षीय पौधा पौष्टिक जड़ों से युक्त है। अश्वगंधा के बीज, फल एवं छाल का विभिन्न रोगों के उपचार में प्रयोग किया जाता है। इसे 'असंगध' एवं 'बाराहरकर्णी' भी कहते हैं। अश्वगंधा की कच्ची जड़ से अश्व जैसी गंध आती है, इसीलिए भी इसे 'अश्वगंधा' या 'वाजिगंधा' कहा जाता है। इसका सेवन करते रहने से अश्व जैसा उत्साह उत्पन्न होता है, अतः इसका नाम सार्थक है। सूख जाने पर अश्वगंधा की गंध कम हो जाती है।

प्राप्ति स्थान

अश्वगंधा सारे भारत में पश्चिमोत्तर भाग, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब तथा हिमाचल प्रदेश में 5000 फीट की ऊँचाई तक पाई जाती है। मध्य प्रदेश के पश्चिमोत्तर ज़िले मंदसौर की मनासा तहसील में इसकी बड़े पैमाने पर खेती की जाती है तथा सारे भारत की व्यावसायिक पूर्ति इसी स्थान से होती है। पहले यह नागौर (राजस्थान) में बहुत होता था और वहीं से सर्वत्र भेजा जाता था। अतः इसे 'नागौरी असंगध' भी कहा जाता था। यह नाम अभी भी प्रसिद्ध है।

आकृति

इसका क्षुप झाड़ीदार होता है, जो एक से चार फुट ऊँचा तथा बहुशाखीय होता है। अश्वगंधा की शाखाएँ गोलाकार रूप में चारों ओर फैली रहती हैं। कहीं-कहीं बड़े-बड़े वृक्षों के नीचे जलाशयों के समीप यह बारहों माह हरी-भरी स्थिति में पाया जाता है। आकार में यह छोटी कंटेरा जैसा परन्तु कण्टक रहित होता है।

पत्तियाँ

अश्वगंधा के पत्र जोड़े में अखण्डित अण्डाकार पाँच से दस सेण्टीमीटर लंबे तथा तीन से पाँच सेण्टीमीटर चौड़े होते हैं। ये आकार में लंबे, बीज छोटे लटवाकार से लेकर कहीं-कहीं पलाश के पत्ते सदृश बड़े होते हैं। डण्ठल बहुत ही छोटा होता है।

फूल

अश्वगंधा के फूल छोटे-छोटे कुछ लंबे, कुछ पीलाहरापन लिए चिलम के आकार के होते हैं। ये फूल शाखाओं के अग्र भाग पर खिलते हैं। इन पर भी डण्ठल के समान सफ़ेद रंग के छोटे-छोटे रोम होते हैं। फल छोटे-छोटे, गोल मटर या मकोय के फल के समान पहले हरे, फिर कार्तिक मास में पकने पर लाल रंग के हो जाते हैं। ये रसभरी के फलों के समान दिखते हैं। अश्वगंधा के फल के अन्दर लोआव तथा कटेरी के बीजों के समान श्वेत असंख्यों बीज होते हैं। इन्हें यदि दूध में डाल दिया जाए तो वे उसे जमा भी देते हैं। शरद ऋतु में फूल आते हैं तथा कार्तिक मार्गशीर्ष में पकते हैं।

जड़

अश्वगंधा का फल
अश्वगंधा की जड़

इस औषधीय पौधे की मूल चार से आठ इंच लंबी, ऊपर से मटमैली, अन्दर से सफ़ेद और शंकु के आकार की होती है। यह नीचे से मोटी ऊपर से पतली, गोल व चिकनी होती है। गीली ताजी जड़ से घोड़े के मूत्र के समान तीव्र गंध आती है, जिसका स्वाद बहुत तीखा होता है। बरसात में इसके बीज बोये जाते हैं तथा जाड़े में फ़सल निकाली जाती है।

रोपण

अश्वगंधा उन स्थानों पर भी उग आता है, जहाँ अन्य वनौषधियाँ नहीं लग पातीं। पाँच किलोग्राम बीज लगभग एक हैक्टेयर भूमि में बोने के लिए पर्याप्त होते हैं। इन बीजों को पहले नर्सरी में उगाया जाता है और फिर उन्हें आधा-आधा मीटर की दूरी पर खेत में फैला देते हैं। अश्वगंधा की फ़सल को सिंचाई की आवश्यकता अधिक नहीं पड़ती। इस औषधीय पौधे को देखरेख एवं खाद आदि की इतनी ज़रूरत नहीं होती है, लेकिन अधिक वर्षा इसकी फ़सल के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है। दिसम्बर में फूल-फल आने के बाद मार्च में अश्वगंधा की समूल फ़सल काट ली जाती है। जड़ों को कूट कर मिट्टी हटा देते हैं और पतली जड़ों को अलग कर मोटी जड़ों को औषधि प्रयोजन हेतु चुन लिया जाता है।

शुद्धता परखना

बाज़ारों में मिलने वाली अश्वगंधा की शुष्क जड़ 10 से 20 सेण्टीमीटर लंबी, छोटे-बड़े टुकड़ों के रूप में होती है। यह प्रायः खेती किए हुए पौधे की जड़ होती है। जंगली पौधों की अपेक्षा उसमें स्टार्च आदि अधिक होता है। आन्तरिक प्रयोग के लिए खेती वाले पौधे की जड़ तथा लेप आदि प्रयोग के लिए जंगली पौधे की जड़ ठीक बैठती है। असगंध दो प्रकार की होती है- छोटी तथा बड़ी। छोटी असगंध का क्षुप छोटा, परन्तु मूल बड़ा होता है। पूर्व में 'नागौरी असगंध' को 'देशी' भी कहते हैं। इसका क्षुप बड़ा तथा जड़ें छोटी व पतली होती हैं। बाज़ारों में असगंध की जाति के ही एक अन्य भेद 'फाकनज' की जड़ें भी मिला दी जाती हैं। कुछ व्यक्ति 'कन्वाव्ध्ययन असगंधा' को अश्वगंधा मान बैठते हैं, जबकि वह विषैली होती है और उसका आन्तरिक प्रयोग नहीं किया जाता है।

रासायनिक संगठन

अश्वगंधा की जड़ में कई एल्केलाइड्स पाए गए हैं। इनकी कुल मात्रा 0.13 से 0.31 प्रतिशत तक होती है। 'वेल्थ ऑफ़ इण्डिया' के मतानुसार तेरह एल्केलाइड क्रोमेटोग्राफ़ी की विधि से अलग किए जा चुके हैं।
अश्वगंधा की शाखा
इनमें प्रमुख हैं- कुस्कोहाइग्रीन, एनाहाइग्रीन, ट्रोपीन, स्युडोट्रोपीन, ऐनाफेरीन, आईसोपेलीन, टोरीन और तीन प्रकार के ट्रोपिलीटग्लोएट। जर्मन व रूसी वैज्ञानिकों ने असगंध की जड़ में अन्य एल्केलाइड होने का भी दावा किया है, जिसमें प्रमुख हैं- विदासोमिन एवं विसामिन एल्केलाइडों के अलावा इस क्षुप की जड़ में स्टार्च, शर्करा, ग्लाइकोमाइड्स-हेण्टि्रयाकाल्टेन तथा अलसिटॉल, विदनाल पाए गए हैं। इसमें बहुत से अमीनो अम्ल मुक्तावस्था में होते हैं, यथा- एस्पार्टिक अम्ल, ग्लाइसिन आयरोसिन, एलेनिन, प्रोलीन, टि्रप्योफैन, ग्लूटेमिक अम्ल एवं सिस्टीन। अश्वगंधा की पत्तियों में विदानोलाइड परिवार के पदार्थ पाए जाते हैं, जो बदलते रहते हैं। इसकी पत्तियों का स्वरूप एक-सा रहने पर भी रासायनिक दृष्टि से अंतर पाया गया है। बारह प्रकार के विदानोलाइड अलग-अलग पौधों से प्राप्त किए गए हैं, जो एक ही क्यारी में एक साथ रोपे गए थे। इसके अलावा पत्तियों में एल्केलाइड्स, ग्लाकोसाइड्स, ग्लूकोस एवं मुक्त अमीनो अम्ल भी पाए गए हैं। असगंध के तने में प्रोटीन बहुतायत से पाए गए हैं। इनमें रेशा बहुत कम तथा कैल्शियमफ़ॉस्फ़ोरस प्रचुर मात्रा में होते हैं। कई अमीनो अम्ल भी मुक्तावस्था में पाए गए हैं। जड़, तने तथा फल में टैनिन एवं फ्लेविनाइड भी होते हैं। इसके फलों में प्रोटीनों को पचाने वाला एक एन्जाइम 'कैमेस' भी उपस्थित होता है।

प्रयोग

'चक्रदत्त संहिता' में विद्वान् चिकित्सक लिखते हैं-

पीताश्वगंधा पयसार्धमासं घृतेन तैलेन सुखाम्बुना वा।
कृशस्य पुस्टि वपुषो विधत्ते बालस्य सस्यस्य यथाम्बुवृष्टिः॥

मूलतः अश्वगंधा कृशकाय रोगियों, सूखा रोग से ग्रस्त बच्चों व व्याधि उपरांत कमज़ोरी में, शारीरिक, मानसिक थकान में पुष्टि कारक बलवर्धक के नाते प्रयुक्त होती रही है। यकृत में वसा कोशिकाओं के अनाधिकार विस्तार[1] से होने वाले कुपोषण, बुढ़ापे की कमज़ोरी, मांसपेशियों की कमज़ोरी व थकान, रोगों के बाद की कृशता आदि में असगंध मूल चूर्ण आतिशा घृत या पाक निर्धारित मात्रा में सेवन करना चाहिए। मूल चूर्ण को दूध के अनुपात के साथ देना चाहिए। क्षय रोग में अन्य जीवाणुनाशी औषधियों के साथ बल्य रूप में मूलचूर्ण को गोघृत या मिश्री के साथ प्रयोग करना चाहिए। गर्भवती महिलाओं में तीन माह बल संवर्धन हेतु मूल चूर्ण में चौगुनी घृत मिलाकर पाक बनाकर सेवन कराया जाता है। अश्वगंधा के लगातार एक वर्ष तक सेवन करने से शरीर से सारे विकार बाहर निकल जाते हैं। शरीर का समग्र शोधन होता है और दुर्बलता दूर हो जाती है व जीवनीशक्ति बढ़ती है। यह औषधि काया कल्प योग की एक प्रमुख औषधि मानी जाती है। इसका कल्प भी करते हैं व ऐसा माना जाता है कि इसका निरंतर उपयोग अमृता की तरह जरा को कभी समीप नहीं आने देता। अगहन पूष माह में इसका सेवन विशेष लाभकारी माना गया है।

अन्य उपयोग

अश्वगंधा की पत्तियाँ व फल

कफ, वात शामक तथा वेदना संशामक होने के कारण अश्वगंधा वात नाड़ी संस्थान के रोगों में भी प्रयुक्त होती है। इसकी जड़ से सिद्ध तैल वात व्याधि में जोड़ों पर तथा थायराइड या ग्रंथियों की वृद्धि में पत्तों को लेप करने से भी लाभ होता है। यह नींद लाने वाला एक श्रेष्ठ हिप्नोटिक है। रक्तचाप व शोथ को कम करता है। श्वांस रोग में भी असगंध क्षार अथवा चूर्ण को मधु एवं घृत के साथ देने का प्रावधान है। शुक्र दौर्बल्य प्रदर, योनि शूल में उपयोगी है। वाल शोष, क्षय रोग, जीर्ण व्याधि, यथा- कैंसर से सामान्य दुर्बलता निवारण तथा वेदना दूर करने के लिए इसे देते हैं। जीव कोशों पर अपने प्रभाव के कारण यह वर्ण विकारों तथा कुष्ठ रोगों पर भी कुछ प्रभाव रखता है, ऐसा मत है। मूलतः यह औषधि रसायन-बल्य है। इसका प्रयोग कर निश्चित ही दीर्घायु को प्राप्त कर सकना संभव है।

औषधीय गुण

अश्वगंधा का प्रयोग भारत में प्राचीन समय से ही कारगर औषधि के रूप में होता है। औषधि के रूप में इसका उपयोग करके कई रोगों को दूर किया जा सकता है। इसके कुछ मुख्य औषधीय गुण निम्नलिखित हैं-

  1. इसके पौधे की पत्तियाँ त्वचा रोग, शरीर की सूजन एवं शरीर पर पड़े घाव और जख्म भरने जैसी समस्या से लेकर बहुत-सी बीमारियों में भी बहुत उपयोगी है।
  2. अश्वगंधा के पौधे को पीसकर लेप बनाकर लगाने से शरीर की सूजन, शरीर की किसी विकृत ग्रंथि और किसी भी तरह के फुंसी-फोड़े को हटाने में काम आती है।
  3. पोधे की पत्तियों को घी, शहद, पीपल इत्यादि के साथ मिलाकर सेवन करने से शरीर निरोग रहता है।
  4. यदि किसी को चर्म रोग है तो उसके लिए भी अश्वगंधा जड़ी-बूटी बहुत लाभकरी है। इसका चूर्ण बनाकर तेल से साथ लगाने से चर्म रोग से निजात पाई जा सकती है।
  5. उच्च रक्तचाप की समस्या से पीडि़त लोग यदि अश्वगंधा के चूर्ण का दूध के साथ नियमित सेवन करेंगे तो निश्चित तौर पर उनका रक्तचाप सामान्य‍ हो जाएगा।
  6. शरीर में कमज़ोरी या दुर्बलता को भी अश्वगंधा तेल से मालिश कर दूर किया जा सकता है, इतना ही नहीं गैस संबंधी समस्या में भी ये पौधा अत्यंत लाभदायक होता है।
  7. साँस संबंधी रोगों से निजात पाने के लिए अश्वगंधा के क्षार को शहद और घी के साथ मिलाकर सेवन करने से बहुत लाभ मिलता है।
  8. वृद्धावस्था में होने वाली बीमारियों को दूर करने, तरोताजा रहने और ऊर्जावान बने रहने के लिए अश्वगंघा चूर्ण को प्रतिदिन दूध के साथ लेना चाहिए। इससे मस्तिष्क भी तेज होता है।
  9. इसके अतिरिक्त अश्वगंधा पौधे के और भी लाभ हैं। यह खाँसी, क्षयरोग तथा गठिया में भी बहुत लाभदायक है।
  10. अश्वगंधा पौधे की जड़ पौष्टिक होने के साथ ही पाचक अम्ल और प्लेग जैसी महामारियों से निजात दिलाती है।


पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध

सम्बंधित लेख

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. फैटीइन्फिल्ट्रेशन

बाहरी कड़ियाँ

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"https://bharatdiscovery.org/bharatkosh/w/index.php?title=अश्वगंधा&oldid=617241" से लिया गया