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माधवराव सिंधिया  

माधवराव सिंधिया
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पूरा नाम माधवराव सिंधिया
जन्म 10 मार्च, 1945 ई.
जन्म भूमि ग्वालियर, मध्य प्रदेश
मृत्यु 30 सितंबर, 2001 ई.
मृत्यु स्थान मैनपुरी, उत्तर प्रदेश
मृत्यु कारण विमान दुर्घटना
अभिभावक जीवाजी राव सिंधिया, विजयाराजे सिंधिया
पति/पत्नी माधवीराजे सिंधिया
संतान ज्योतिरादित्य सिंधिया, चित्रांगदा राजे
नागरिकता भारतीय
पार्टी कांग्रेस
पद पूर्व केन्द्रीय मंत्री- रेल, मानव संसाधन, सूचना प्रसारण
कार्य काल सन 1971 से 2001 ई.
शिक्षा एम. ए. (आक्सन), विनचेस्टर कॉलेज, इंग्लैंण्ड
विद्यालय सिंधिया स्कूल, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी ब्रिटेन
भाषा हिन्दी, अंग्रेज़ी
अन्य जानकारी माधवराव सिंधिया ने कई देशों की यात्रा की, सितम्बर, 1989 में रवाना में हुई इंटर पार्लियामेंट यूनियन कांफ़्रेस तथा जून 1984 में बॉन में आयोजित इंडो-जर्मन सेमिनार में प्रतिनिधि के रूप में गए।

माधवराव सिंधिया (अंग्रेज़ी: Madhavrao Scindia, जन्म: 10 मार्च, 1945 - मृत्यु: 30 सितंबर, 2001) कांग्रेस के प्रसिद्ध नेता थे। माधवराव सिंधिया का राजनीतिक सफ़र सन् 1971 से 2001 तक रहा।

जीवन परिचय

माधवराव सिंधिया का जन्म 10 मार्च, 1945 ई. को ग्वालियर के सिंधिया परिवार में हुआ था। माधवराव सिंधिया ग्वालियर राजघराने की राजमाता विजयाराजे सिंधिया और जीवाजी राव सिंधिया के पुत्र थे। माधवराव सिंधिया ने अपनी शिक्षा सिंधिया स्कूल से की थी। सिंधिया स्कूल का निर्माण इनके परिवार द्वारा ग्वालियर में कराया गया था। उसके बाद माधवराव सिंधिया ने ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से अपनी शिक्षा प्राप्त की। माधवराव सिंधिया का विवाह माधवीराजे सिंधिया से हुआ था। माधवराव सिंधिया के पुत्र ज्योतिरादित्य व पुत्री चित्रांगदा राजे हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया भी राजनीति में हैं। माधवराव सिंधिया का नाम मध्यप्रदेश के चुनिंदा राष्ट्रीय राजनीतिज्ञों में काफ़ी ऊपर है। माधवराव सिंधिया राजनीति के लिए ही नहीं बल्कि कई अन्य रुचियों के लिए भी विख्यात रहे हैं। क्रिकेट, गोल्फ, घुड़सवारी और हर चीज़ के शौक़ीन होते हुए भी माधवराव सिंधिया ने सामान्य व्यक्ति जैसा जीवन व्यतीत किया था।

राजनीतिक सफ़र

रियासतों का वज़ूद देश में भले ही खत्म हो गया हो, राजा आम लोगों के निशाने पर रहे हों लेकिन मध्य प्रदेश की ग्वालियर रियासत एक ऐसी रियासत है जिसके लोग आज भी सिंधिया राज परिवार के साथ खड़े दिखाई देते हैं। चुनाव चाहे लोकसभा का हो या विधानसभा का हो। यदि प्रत्याशी सिंधिया परिवार का है तो उसकी जीत लगभग तय रहती है। हालांकि चुनावी मुक़ाबले कड़े होते हैं, पर पार्टी लाइन से हटकर लोग सिंधिया परिवार को ही समर्थन देते हैं। सिंधिया राज परिवार का समर्थन जिस प्रत्याशी को रहा है वह चाहे जिस भी दल में हो उसे लोगों ने जिताया है। 1952 से यही परंपरा चली आ रही है।

माधवराव सिंधिया अपनी ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी करके वापस आने के बाद ज़्यादातर समय मुंबई में ही व्यतीत करते थे। राजमाता विजया राजे सिंधिया उन्हें जनसंघ में लाना चाहती थीं। हिंदूवादी नेता 'सरदार आंग्रे' का राजमाता पर गज़ब का प्रभाव था। उन्हीं के चलते माधवराव भी जनसंघ में गए। 1971 में विजयाराजे सिंधिया के पुत्र माधवराव सिंधिया ने अपनी माँ की छत्रछाया में राजनीति का ककहरा पढ़ना शुरू किया और उन्होंने तब पहला चुनाव जनसंघ से लड़ा।[1] 1971 के इस चुनाव में माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस के 'डी. के. जाधव' को एक लाख 41 हज़ार 90 मतों से पराजित किया। 1977 में सिंधिया स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे और उन्होंने बारह कोणीय संघर्ष में लोकदल के 'जी. एस. ढिल्लन' को 76 हज़ार 451 मतों से पराजित किया।

1980 में माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस का दामन थामा और उन्होंने तब जनता पार्टी के प्रत्याशी 'नरेश जौहरी' को एक लाख से अधिक मतों से शिकस्त दी। 1984 में सिंधिया ने ग्वालियर से चुनाव लड़ने का मन बनाया और उन्होंने अपने ही विश्वस्त 'महेंद्र सिंह कालूखेड़ा' को कांग्रेस से इस क्षेत्र की उम्मीदवारी का भार सौंपा और उन्होंने भाजपा के 'उधव सिंह रघुवंशी' को एक लाख 40 हज़ार 480 वोटों से हरा दिया। माधवराव सिंधिया के कांग्रेस में जाने के बाद ग्वालियर उस समय चर्चा में आया था जब 1984 के आम चुनाव में उन्होंने बीजेपी के दिग्गज नेता अटलबिहारी वाजपेयी को हराया था। वह चुनाव चर्चा का विषय इसलिए बना था कि जनसंघ और बीजेपी का गढ़ माने जाने वाला ग्वालियर सिंधिया के गढ़ के रूप में सामने आया था।[2]

माधवराव सिंधिया ने 1984 के बाद 1998 तक सभी चुनाव ग्वालियर से ही लड़े और जीत भी हासिल की। 1996 में तो कांग्रेस से अलग होकर भी वह भारी बहुमत से जीते थे। 1999 के चुनाव में अस्वस्थ राजमाता ने अपने पुत्र माधवराव सिंधिया को यह आसंदी छोड़ दी और 1999 में माधवराव सिंधिया ने पाँच उम्मीदवारों की मौज़ूदगी में अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी के देशराज सिंह को दो लाख 14 हज़ार 428 मतों से कीर्तिमान शिकस्त दी। इस प्रकार चौदह में से दस चुनावों में महल ने अपना परचम कभी माँ तो कभी बेटे के जरिए फहराया। ग्यारहवीं दफ़ा भी महल ही परोक्ष रूप से इस सीट पर 'महेंद्र सिंह' के रूप में क़ाबिज रहा।

माधवराव सिंधिया का राजनीतिक सफ़र
दिनांक / वर्ष पद
1971 लोकसभा (पाँचवी) के लिए निर्वाचित
अगस्त, 1977 से दिसम्बर, 1979 तक सदस्य, परामर्शदाता समिति, रक्षा मंत्रालय
1977 लोकसभा (छठी) के लिए पुन: निर्वाचित
1980 लोकसभा (सातवीं) के लिए तीसरी बार निर्वाचित
अप्रैल, 1980 से जुलाई, 1983 तक सदस्य, परामर्शदात्री समिति, विदेश मंत्रालय
अगस्त, 1983 से अक्टूबर, 1984 तक सदस्य, परामर्शदात्री समिति, रक्षा मंत्रालय
1984 लोकसभा (आठवीं) के लिए चौथी बार निर्वाचित
1984 से दिसम्बर, 1989 तक रेल राज्य मंत्री
1987 से 29 जनवरी, 1990 तक सदस्य, पंजाब विधान सभा (शक्तियों का प्रत्यायोजन) अधिनियम,

1987 के अंतर्गत गठित परामर्शदाता समिति।

1989 लोकसभा (नौवीं) के लिए पाँचवी बार चुने गए।
1990 सदस्य, परामर्शदात्री समिति, रक्षा मंत्रालय।
7 जून, 1990 सदस्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी सम्बन्धी विषय समिति
1991 लोकसभा (दसवीं) के लिए छठी बार निर्वाचित
23 जून, 1991 केन्द्रीय नागर विमानन और पर्यटन मंत्री
1991 सदस्य, सामान्य प्रयोजन समिति

मध्यावधि चुनाव की सन् 1999 में फिर से शुरुआत हुई। यह तीन साल की अवधि में दूसरा मध्यावधि चुनाव था। माधवराव सिंधिया एक बार फिर गुना से मैदान में थे। सिंधिया को वहाँ की जनता ने सिर आँखों पर बिठा लिया। विकास कार्यों की बदौलत उनकी छवि विकास के मसीहा की थी, और यह छवि लोगों के सिर चढ़कर बोल रही थी। देशराज सिंह को भाजपा ने उम्मीदवार बनाया, लेकिन वे सिंधिया के समक्ष कमज़ोर प्रत्याशी साबित हुए थे। चुनाव-प्रचार से लेकर परिणाम तक सिंधिया ने जो बढ़त बनाई, वो उनके करिश्मे को साबित करने वाली थी। वे क़रीब ढाई लाख वोटों से जीते। शिवपुरी ज़िले की चारों विधानसभा सीटों पर उनकी बढ़त 141000 से ज़्यादा रही। गुना ज़िले की चार विधान सभा सीटों पर भी उन्हें अधिक वोट मिले। यह सिंधिया की लगातार नवीं जीत थी।[3] 30 सितंबर 2001 को माधवराव सिंधिया की असमय मौत के कारण रिक्त हुई इस सीट पर उपचुनाव में उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया ने चार लाख से अधिक मतों से बाज़ी मारी। उन्होंने भाजपा के 'राव देशराज सिंह' को हराया और 2004 के चुनाव में सिंधिया भाजपा प्रत्याशी 'हरिवल्लभ शुक्ला' से 85 हज़ार मतों से विजयी रहे।

संसदीय दल के उपनेता

माधवराव सिंधिया ने लगातार नौ बार लोकसभा चुनाव जीतकर कीर्तिमान क़ायम किया। वे लोकसभा में माधवराव सिंधिया कांग्रेस संसदीय दल के उपनेता बनाए गए थे। इस समय श्री सिंधिया कांग्रेस की सर्वेसर्वा श्रीमती सोनिया गाँधी के सबसे विश्वसनीय सहयोगी बन चुके थे तभी 30 सितंबर 2001 को एक विमान दुर्घटना में माधवराव सिंधिया का निधन हो गया। माधवराव सिंधिया जीवित रहते तो आज प्रधानमंत्री होते। 'संघवी' ने 'माधवराव सिंधिया ए लाइफ' में एक जगह यह भी लिखा है कि यदि वे जनसंघ (भाजपा) में रहते तब भी शायद प्रधानमंत्री बनते।[1]

प्रशिक्षण संस्थान

सांसद श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने संस्थान के समारोह को सम्बोधित करते हुये कहा कि इस संस्था की स्थापना में जहाँ जीवाजीराव सिंधिया ने सहयोग दिया वहीं माधवराव सिंधिया ने इस संस्था को राष्ट्रीय स्तर के विश्वविद्यालय का दर्जा दिलाया। इस संस्था ने देश में ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी खेलों के क्षेत्रों में अनेकों प्रतिभाऐं दी हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि इस संस्था में अधोसंरचना एवं विकास के साथ-साथ परम्परा एवं आधुनिकता के समन्वय की भी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक प्रशिक्षण संस्थान ग्वालियर शारीरिक शिक्षा की दिशा में उल्लेखनीय योगदान देने के साथ-साथ अंचल का नाम रोशन करेगा।[4]

'माधवराव सिंधिया ए लाइफ'

माधवराव सिंधिया के सम्मान में भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट

यह किताब माधवराव सिंधिया के जीवन पर आधारित है। ये किताब पत्रकार वीर संघवी व नमिता भंडारे ने लिखी है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत में सबसे ज़्यादा मदद पूर्व केंद्रीय मंत्री दिवंगत माधवराव सिंधिया से मिली थी। सिंधिया के जीवन पर आधारित किताब 'माधवराव सिंधिया ए लाइफ' के विमोचन के मौके पर सोनिया गांधी ने उन दिनों की यादों को ताज़ा किया।[5] सोनिया ने कहा कि उन्हें हमेशा इस बात का मलाल रहेगा कि 13 मई, 2004 को जब केंद्र में संप्रग की सरकार बनी तो माधवराव उस खुशी में शामिल होने के लिए वहाँ नहीं थे। सोनिया ने दिवंगत कांग्रेसी नेता माधवराव की सहृदयता और ज़ोश को याद करते हुए कहा कि एक सहकर्मी के तौर पर वे बिल्कुल स्पष्ट बात करते थे, सही सलाह देते थे। उनके बारे में कभी ये नहीं सोचना पड़ता था कि उनकी बातों का कोई 'गुप्त अर्थ' तो नहीं। सोनिया गांधी ने कहा, 'मैं पहली बार 1999 में लोकसभा पहुँची थी। मुझ पर नेता प्रतिपक्ष की ज़िम्मेदारी थी। यह मेरे लिए नया और कठिन अनुभव था।' सोनिया ने कहा कि प्रतिपक्ष के उपनेता के तौर पर सिंधिया ने उनकी काफ़ी मदद की और कई ज़िम्मेदारियाँ उठाई। सोनिया गांधी ने बताया कि राजनीतिक जीवन शुरू होने से पहले वे सिंधिया को थोड़ा-बहुत ही जानती थीं। सिंधिया उनके पति राजीव गांधी के काफ़ी क़रीबी थे। सोनिया ने कहा कि वे उन्हें एक ऐसे मंत्री के रूप में जानती थीं जिनका विभाग पाँच साल में एक बार भी नहीं बदला। माधवराव सिंधिया से उनका परिचय राजनीतिक जीवन शुरू होने के बाद ही हुआ। वो कांग्रेस के लिए मुश्किल वक़्त था, लेकिन माधवराव सिंधिया जानते थे पार्टी के समक्ष हारने का विकल्प ही नहीं था।[5]

समाज सेवा

माधवराव सिंधिया की समाज सेवा, शिक्षा को प्रोत्साहन, वन्य जीवन संरक्षण में विशेष रुचि थी। इसके अलावा वह आमोद-प्रमोद एवं मनोरंजन – क्रिकेट, तैराकी आदि के शौक़ीन थे। माधवराव सिंधिया जनसेवा के लिए प्रेरणा स्रोत थे। उन्होंने जीवन भर ग़रीबों की मदद की है। सिंधिया विचारमंच के प्रदेश अध्यक्ष डा. अनिल मिश्रा ने सिंधिया जी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि देश के विकास के लिए माधवराव सिंधिया ने कई कार्य किए हैं। उन्हें भुलाया नहीं जा सकता है।[6]

मृत्यु

माधवराव सिंधिया का निधन 30 सितंबर 2001 में उत्तर प्रदेश के मैनपुरी ज़िले में विमान दुर्घटना में हुआ था। माधवराव सिंधिया की यात्रा भी शायद टल जाती, यदि वे आख़िरी वक़्त पर अपना गुना का कार्यक्रम नहीं बदलते।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 राजघराने में बंद दास्तानें (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) दैनिक भास्कर। अभिगमन तिथि: 25 सितंबर, 2010
  2. सिंधिया का क़िला फ़तह करना आसान नहीं (हिन्दी) नवभारत टाइम्स। अभिगमन तिथि: 25 सितंबर, 2010
  3. अजेय' सिंधिया की रिकॉर्ड जीत (हिन्दी) (एच.टी.एम) वेबदुनिया। अभिगमन तिथि: 25 सितंबर, 2010
  4. माधवराव सिंधिया की आदमक़द प्रतिमा का अनावरण (हिन्दी) चंबल की आवाज़। अभिगमन तिथि: 25 सितंबर, 2010
  5. 5.0 5.1 याद कर भावुक हो उठीं सोनिया (हिन्दी) प्रेसनोट डॉट इन। अभिगमन तिथि: 25 सितंबर, 2010
  6. माधवराव सिंधिया की स्मृति में बनेगा पार्क (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) दैनिक भास्कर। अभिगमन तिथि: 25 सितंबर, 2010

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