राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस  

राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस
राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस
विवरण 'राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस' मानव का भगवान कहे जाने वाले चिकित्सकों को समर्पित है। भारत में इस दिन स्वतंत्रता सेनानी और चिकित्सक बिधान चन्द्र राय को भी याद किया जाता है।
भारत में शुरुआत 1991 से
मनाने की तिथि 1 जुलाई
महत्त्व 'चिकित्सक दिवस' मनाने का महत्त्व यह है कि सभी चिकित्सक अपनी ज़िम्मेदारियों को समझें और लोगों के स्वास्थ्य से सम्बन्धित दु:ख, तकलीफ और रोग आदि के प्रति सजग रहें।
स्मृति बिधान चन्द्र राय
अन्य जानकारी 'राष्ट्रीय चिकित्सा दिवस' अलग-अलग देशों में भिन्न-भिन्न तिथियों पर मनाया जाता है। भारत में यह दिवस डॉक्टर बिधान चन्द्र राय की स्मृति में प्रतिवर्ष 1 जुलाई को मनाया जाता है।

राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस (अंग्रेज़ी: National Doctor's Day) पृथ्वी पर मानवों का भगवान कहे जाने वाले चिकित्सकों को समर्पित है। अलग-अलग देशों में यह दिवस भिन्न-भिन्न तिथियों पर मनाया जाता है। भारत में 'चिकित्सक दिवस' प्रतिवर्ष 1 जुलाई को मनाया जाता है। इस ख़ास दिन पर पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री बिधान चन्द्र राय को भी याद किया जाता है। बिधान चन्द्र राय देश के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ एक चिकित्सक भी थे। आज़ादी के बाद उन्होंने अपना सारा जीवन लोगों के लिए चिकित्सा सेवा को समर्पित कर दिया। बिधान चन्द्र राय की स्मृति में ही 'राष्ट्रीय चिकित्सा दिवस' भारत में 1 जुलाई को मनाया जाता है।

शुरुआत

चिकित्सकों का महत्त्व रेखांकित करने की आवश्यकता अमेरिका के जॉर्जिया निवासी डॉ. चार्ल्स बी आल्मोंद की पत्नी यूदोरा ब्राउन आल्मोंद ने महसूस की थी। उनके प्रयासों से ही पहली बार 30 मार्च, 1930 को अमेरिका में 'डॉक्टर्स डे' (चिकित्सक दिवस) मनाया गया। इस दिन को मनाने के पीछे चिकित्सकों का दैनिक जीवन में महत्त्व बताने की भावना प्रमुख थी। इसके लिए 30 मार्च की तारीख़ इसलिए चुनी गई थी, क्योंकि जॉर्जिया में इसी दिन डॉ. क्राफोर्ड डब्ल्यू लोंग ने पहली बार ऑपरेशन के लिए एनेस्थीसिया का इस्तेमाल किया था। इसीलिए तब से 'चिकित्सक दिवस' मनाने का चलन शुरू हो गया।[1]

भारत में चिकित्सक दिवस

अलग-अलग देशों में 'चिकित्सक दिवस' अलग-अलग तिथि को मनाया जाता है। भारत में 1 जुलाई का दिन चिकित्सकों के लिए समर्पित है। वर्ष 1991 से भारत में इस दिन को 'राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस' के रूप में मनाने की शुरूआत हुई थी। 1 जुलाई को देश के प्रख्यात चिकित्सक, स्वतंत्रता सेनानी और समाज सेवी डॉ. बिधान चन्द्र राय का जन्मदिन और पुण्य तिथि दोनों ही हैं। 1 जुलाई, 1882 को बिहार में जन्मे बिधान चन्द्र राय 'भारतीय स्वतंत्रता संग्राम' के एक अहम सिपाही रहे थे। आज़ादी के बाद उन्होंने अपना सारा जीवन अपने व्यवसाय यानि चिकित्सा सेवा को समर्पित कर दिया। पश्चिम बंगाल में अपने मुख्यमंत्री काल के दौरान उन्होंने कई अहम विकास कार्य किए। अपने अथक प्रयासों और समाज कल्याण के कार्यों के लिए उन्हें 1961 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से भी सम्मानित किया गया था। 1 जुलाई, 1962 को उनका निधन हुआ।

इन्हें भी देखें: बिधान चंद्र राय

चिकित्सक का महत्त्व

चिकित्सक धरती पर भगवान का दूसरा रुप होता है। भगवान तो एक बार जीवन देता है, किंतु डॉक्टर हमारी अमूल्य जान को बार-बार बचाता है। दुनिया में ऐसे कई उदाहरण हैं, जहाँ डॉक्टरों ने भगवान से भी बढ़कर काम किया है। बच्चे को जन्म देना हो या किसी वृद्ध को बचाना हो, चिकित्सक की मदद हमेशा मुसीबतों से मानव को बचाती है। यही एक ऐसा पेशा है, जहाँ दवा और दुआ का अनोखा संगम देखने को मिलता है, इंसान को भगवान भी यहीं बनाया जाता है। चिकित्सकों ने मानव जाति के लिए बहुत समर्पण किया है। यदि भारत की बात की जाए तो देखेंगे कि यहाँ आज भी चिकित्सकों और वैद्यों का विशेष आदर-सत्कार किया जाता है। आधुनिक युग में तो चिकित्सकों की मांग और भी बढ़ गई है। चिकित्सक के इसी समर्पण और त्याग को याद करते हुए 1 जुलाई का दिन भारत में 'राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस' के रूप में मनाया जाता है। चिकित्सक दिवस मनाने का सबसे बड़ा महत्त्व यह है कि सभी चिकित्सक अपनी ज़िम्मेदारियों को समझें और लोगों के स्वास्थ्य से सम्बन्धित दु:ख, तकलीफ और रोग आदि के प्रति सजग रहें।

डॉ. बिधान चंद्र राय के सम्मान में जारी डाक टिकट

जनता के विश्वास की डोर

वर्तमान में चिकित्सा ही एक ऐसा व्यवसाय है, जिस पर लोग विश्वास करते हैं। इसे बनाए रखने की जिम्मेदारी सभी चिकित्सकों पर है। 'चिकित्सा दिवस' स्वयं चिकित्सकों के लिए एक महत्त्वपूर्ण दिन है, क्योंकि यह उन्हें अपने चिकित्सकीय प्रशिक्षण को पुनर्जीवित करने का अवसर प्रदान करता है। सारे चिकित्सक जब अपने चिकित्सकीय जीवन की शुरुआत करते हैं तो उनके मन में नैतिकता और ज़रूरतमंदों की मदद का जज्बा होता है, जिसकी वे कसम भी खाते हैं। इसके बाद भी कुछ लोग इस विचार से पथ भ्रमित होकर अनैतिकता की राह पर चल पड़ते हैं। 'चिकित्सक दिवस' के दिन डॉक्टरों को यह मौका मिलता है कि वे अपने अंतर्मन में झाँके, अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को समझें और चिकित्सा को पैसा कमाने का पेशा न बनाकर, मानवीय सेवा का पेशा बनाएँ, तभी हमारा यह 'चिकित्सा दिवस' मनाना सही और सार्थक सिद्ध होगा।[2]

मान-सम्मान

भारत में बिधान चन्द्र राय के जन्म दिन पर हर वर्ष 'राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस' 1 जुलाई को मनाया जाता है, लेकिन इस परंपरा से परे अब चिकित्सा पेशे का वह पहले जैसा सम्मान नहीं रह गया है, साथ ही यह भी कहना होगा कि दूसरे पेशों का सम्मान भी समाज और देश में बढ़ते भ्रष्टाचार और मूल्यों में गिरावट के चलते कम हुआ है। चूँकि डॉक्टरी को लोग एक पेशे से परे ईश्वर की तरह का दर्ज़ा देते थे, इसलिए उससे अधिक निराशा होना भी स्वाभाविक था और उसकी बदनामी भी अधिक होनी थी। एक तरफ़ चिकित्सा के काम में नई तकनीक, उद्योग और बाज़ार के तौर-तरीक़ों के मुताबिक बड़ा पूंजीनिवेश और महंगा इलाज़, इन सबका आना और पैर जमाना हुआ, तो दूसरी तरफ़ इस पेशे से चिकित्सक और मरीज़ के इंसानी संबंध कुछ कमज़ोर हो गए। जब भी कोई पेशा कारोबार में तब्दील होता है तो उसके तरीक़े भी बदल जाते हैं। एक वक़्त आज़ादी की लड़ाई में बहुत छोटी-छोटी सी मशीनों पर मालिक-संपादक अख़बार निकालते थे और जेल जाते थे। वे लौटकर आते थे और फिर सरकार के ख़िलाफ़ लड़ते थे और फिर जेल जाते थे। लेकिन अब अख़बार मीडिया हो गए, बड़े-बड़े कारोबार हो गए, और उनके नीति-सिद्धांत कमज़ोर हो गए। अब किसी बहुत बड़े और ताक़तवर के ख़िलाफ़ छपने की गुंजाइश कम रह गई है। यही हाल राजनीति और चुनाव के महँगे होते चले जाने से नेताओं का हो गया, इसलिए सिर्फ़ चिकित्सको को कोसने से बात न्यायसंगत नहीं कही जा सकती।[3]

गरीबों का इलाज

वर्तमान में भारत में ग़रीबों के इलाज़ की हालत बहुत ख़राब है। पढ़े-लिखे चिकित्सक दूर-दराज के गाँवों तक जाना नहीं चाहते और जिस सरकारी नौकरी के लिए एक वक़्त हिन्दुस्तानी जनता पूजा-पाठ करती थी, वैसे सरकारी चिकित्सकों की कुर्सियाँ छोटे से छत्तीसगढ़ में सैकड़ों की संख्या में ख़ाली पड़ी हुई हैं। भारत में चिकित्सकों के संगठन और चिकित्सा-शिक्षा के लिए बनाई गई सरकारी संस्था, इन दोनों ने छत्तीसगढ़ में तीन साल की चिकित्सा-शिक्षा का घोर विरोध किया था और अदालत तक दौड़ लगाकर उस कोर्स को ख़ारिज़ करवाकर दम लिया था। लेकिन आज सरकारी चिकित्सा कॉलेजों की गिनी-चुनी सीटों के अलावा निजी मेडिकल कॉलेजों में दस-दस, बीस-बीस लाख रुपए का कालाधन देकर एक-एक बच्चे का दाख़िला होता है और लाखों रुपए साल की फ़ीस के दस बरसों बाद कोई पोस्ट ग्रेजुएट बनकर निकलता है। ऐसे चिकित्सक किस तरह गाँवों में या ग़रीबों के बीच जाकर काम कर सकते हैं? न तो उनके वक़्त की और न ही उनकी पूंजी की लागत निकलेगी। ऐसे में छत्तीसगढ़ में लगभग अशिक्षित या अल्पशिक्षित महिलाओं को 'मितानिन' बनाकर कुल डेढ़ दर्जन दवाओं से रोज़मर्रा की तकलीफों का इलाज़ शुरू करवाकर इस राज्य ने गाँव-गाँव की तस्वीर बदल दी है। यहाँ के गाँवों में शिशु-मृत्यु दर इतनी गिर गई कि पूरी दुनिया ने इस मॉडल की तरफ़ उम्मीद की नजरों से देखना शुरू किया। ऐसे में चिकित्सा को सिर्फ़ एम.बी.बी.एस. चिकित्सकों का ही एकाधिकार बनाकर रखना ठीक नहीं है। लोकप्रिय हो गई एलोपैथिक पद्धति में तीन बरस का कोर्स दुबारा शुरू करना चाहिए, जो कि गाँव और ग़रीब के काम का रहेगा। एम.बी.बी.एस. चिकित्सकों को अपनी शहरी-संपन्न और कुलीन सोच को छोडक़र ग़रीबी की हक़ीक़त को देखना चाहिए।[3]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. चिकित्सक की पहली प्राथमिकता होता है मरीज (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 01 जुलाई, 2013।
  2. जिन्दा है सेवा भाव (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 01 जुलाई, 2013।
  3. 3.0 3.1 डॉक्टरों के आत्ममंथन का दिन (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 01 जुलाई, 2013।

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