वास्को द गामा  

(वास्कोडिगामा से पुनर्निर्देशित)
वास्को द गामा

वास्को द गामा (अंग्रेज़ी:Vasco Da Gama) एक पुर्तग़ाली नाविक थे। वास्को द गामा के द्वारा की गई भारत यात्राओं ने पश्चिमी यूरोप से केप ऑफ़ गुड होप होकर पूर्व के लिए समुद्री मार्ग खोल दिए थे। इन्होंने विश्व इतिहास के एक नए युग की शुरुआत की थी। यह यूरोपीय खोज युग के सबसे सफल खोजकर्ताओं में से एक, और यूरोप से भारत सीधी यात्रा करने वाले जहाज़ों का कमांडर थे। वास्को द गामा ने पुर्तग़ाल को एक विश्व शक्ति बनाने में भी मदद की थी।

जीवन

वास्को का जन्म 1460 में दक्षिण-पश्चिम पुर्तग़ाल के अलेंटेजो प्रान्त के समुद्री तट पर स्थित साइनेस के क़िले के कमांडर व कुलीन घराने के एस्टावोडिगामा के तीसरे पुत्र के रूप में हुआ। उनके आरम्भिक जीवन के बारे में बहुत कम जानकारी है। संभवत: उन्होंने एवोरा के नगर में अध्ययन किया होगा, जहाँ उन्होंने गणित और नौ-परिवहन विज्ञान सीखा था। 1492 में पुर्तग़ाल के किंग जॉन द्वितीय ने उन्हें लिस्बन के दक्षिण में स्थित सेटुबल के बंदरगाह और पुर्तग़ाल के दक्षिणतम प्रान्त अल्गार्वे भेजा था। उनका उद्देश्य शान्तिकाल में पुर्तग़ाल पर हुए फ्रांसीसी हमले के जवाब के रूप में फ्रांसीसी जहाज़ों पर क़ब्ज़ा करना था। वास्को ने इस कार्य को तेज़ी से और सही ढंग से पूरा किया गया था। नाविक राजकुमार हेनरी की नीति का अनुसरण करते हुए किंग जॉन ने एक पुर्तग़ाली बेड़े को भारत भेजने की योजना बनाई, ताकि एशिया के लिए समुद्री मार्ग खुल सके। उनकी योजना मुसलमानों को पछाड़ने की थी, जिनका उस समय भारत और अन्य पूर्वी देशों के साथ व्यापार पर एकाधिकार था। एस्टावोडिगामा को इस अभियान के नेतृत्व के लिए चुना गया, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद वास्को द गामा ने उनका स्थान लिया। उनकी नियुक्ति के बारे में विवरणों में मतभेद हैं कि उन्हें किंग जॉन द्वारा चुना गया और इस नियुक्ति को 1495 में सत्तासीन हुए किंग मैनुअल से स्वीकृति मिली या वह किंग मेनुअल थे, जिन्होंने उन्हें पहले चुना, यह अभी तक अस्पष्ट है। एक विवरण के अनुसार, इस नियुक्ति का सबसे पहला अवसर उनके बड़े भाई पॉउलों को दिया गया था, जिन्होंने ख़राब स्वास्थ्य के कारण इंकार कर दिया।

प्रथम समुद्र यात्रा

8 जुलाई 1497 को वास्को द गामा चार जहाज़ों के एक बेड़े के साथ लिस्बन से निकले थे। उनके पास दो मध्यम आकार के तीन मस्तूलों वाले जहाज़ थे। प्रत्येक का वज़न लगभग 120 टन और नाम सॉओ गैब्रिएल तथा सॉओ रैफ़ेल था। इनके साथ 50 टन का बैरिओ नामक कैरावेल (छोटा, हल्का और तेज़ जहाज़) और एक 200 टन का सामान रखने वाला जहाज़ था। केप वर्डे द्वीप तक उनके साथ बार्तोलोम्यू डिआस के नेतृत्व में एक और जहाज़ भी गया था। बार्तोलोम्यू एक पुर्तग़ाली नाविक थे, जिन्होंने कुछ वर्ष पहले केप ऑफ़ गुड होप को खोजा था और वह गोल्ड कोस्ट (वर्तमान घाना) पर सॉओ ज़ोर्गे डा मीना के पश्चिम अफ़्रीकी क़िले की यात्रा कर रहे थे। वास्को द गामा के बेड़े के साथ तीन दुभाषिए भी थे दो अरबी बोलने वाले और एक कई बंटू बोलियों का जानकार था। बेड़े अपनी खोज और जीते गए ज़मीनों को चिह्नित करने के लिए अपने साथ पेड्राओ[1] भी ले गए थे।

वास्को द गामा

15 जुलाई को केनेरी द्वीप से गुज़रते हुए यह बेड़ा 26 जुलाई को केप वर्डे द्वीप के सॉओ टियागो पर पहुँचा और 3 अगस्त तक वहीं रुका रहा। इसके बाद गुयाना की खाड़ी की तेज़ जलधाराओं से बचने के लिए वास्को द गामा ने केप ऑफ़ गुड होप के दक्षिणी अटलांटिक से होते हुए एक घुमावदार रास्ता अपनाया और 7 नवम्बर को सांता हैलेना खाड़ी (आधुनिक दक्षिण अफ़्रीका में) पहुँचे थे। अभियान दल 16 नवम्बर को वहाँ से निकला, लेकिन प्रतिकूल हवाओं ने केप ऑफ़ गुड होप से मुड़ने की यात्रा को नवम्बर तक विलंबित कर दिया। तीन दिन बाद वास्को द गामा ने मोस्सेल की खाड़ी में लंगर डाला, वहाँ एक द्वीप पर पेड्राओ गाड़ा और सामान रखने वाले जहाज़ को अलग होने का आदेश दिया था। 8 दिसम्बर को पुन: निकलकर बेड़ा क्रिसमस के दिन नटाल के तट पर पहुँचा। 11 जनवरी 1498 को नटाल और मोज़ांबिक के बीच स्थित एक छोटी सी नदी के मुहाने के पास लंगर डाला, जिसे उन्होंने 'रियो दो कोबर'[2] नाम दिया। 25 जनवरी को वर्तमान मोज़ांबिक में क्वेलीमेन नदी पर पहुँचे, जिसे उन्होंने 'रियो डोस बोन्स सिनाइस' [3] कहा और एक अन्य पेड्राओ गाड़ा। इस समय तक नाविक दल के कई सदस्य स्कर्वी से पीड़ित हो गए, इसलिए अभियान दल ने एक महीने का विश्राम किया और जहाज़ों की मरम्मत की गई।

2 मार्च को बेड़ा मोज़ांबिक द्वीप पर पहुँचा। वहाँ के निवासियों ने पुर्तग़ालियों को अपने जैसा मुसलमान समझा। वास्को द गामा को उनके साथ अरब के सौदाग़रों के साथ होने वाले व्यापार का पता चला और सोने, जवाहरात, चाँदी व मसालों से भरे चार अरबी जहाज़ बंदरगाह में खड़े हुए थे। उन्हें यह भी पता चला कि ईसाई शासक 'प्रेस्टर जॉन' अंदरूनी इलाके में रहते हैं और कई तटीय शहरों पर उनका क़ब्ज़ा है। मोज़ांबिक के सुल्तान ने उन्हें दो पोत चालक मुहैया कराए, जिनमें से एक उस समय छोड़कर चला गया जब उसे पता चला कि पुर्तग़ाली वास्तव में ईसाई हैं। अभियान दल 7 अप्रैल को मोंबासा [4] पहुँचा और 14 अप्रैल को मालिंदी[5] में लंगर डाला। वहाँ पर भारत के दक्षिण-पश्चिम तट पर स्थित कालीकट[6] का मार्ग जानने वाले एक चालक को साथ ले लिया गया। हिन्द महासागर में 23 दिन की यात्रा के बाद भारत के पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ नज़र आईं और 20 मई को दल कालीकट पहुँचा। वहाँ पर वास्को द गामा ने एक पेड्राओ को अपने भारत पहुँचने के प्रमाण के रूप में स्थापित किया। वहाँ उस समय के दक्षिणी भारत के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व्यापार केन्द्र कालीकट के हिन्दू शासक 'जमोरीं' ने उनका स्वागत किया। हालांकि वह उनसे किसी भी प्रकार की संधि करने में असफल रहे, ऐसा कुछ हद तक मुसलमान व्यापारियों की शत्रुता और कुछ हद तक उनके द्वारा दिए गए बेकार तोहफ़े और साथ लाए सस्ते व्यापारिक माल के कारण हुआ। यह व्यापारिक माल पश्चिमी अफ़्रीका के साथ व्यापार के लिए तो उपयुक्त था, लेकिन भारत में उसकी माँग नहीं थी।

वास्को द गामा के अभियान दल और जमोरीं के बीच तनाव बढ़ जाने के कारण वास्को द गामा को अगस्त के आख़िर में निकलना पड़ा। वह अपने साथ पाँच-छह हिन्दुओं को ले गए। ताकि किंग मैनुअल उनके रीति-रिवाजों के बारे में जान सकें। वह मालिंदी के लिए निकलने से पूर्व अंजिदीव द्वीप[7]में रुके, जहाँ वह 8 जनवरी 1499 पहुँचे। प्रतिकूल हवाओं के कारण अरब सागर को पार करने में लगभग तीन महीने लग गए और नाविक दल के कई सदस्यों की स्कर्वी के कारण मृत्यु हो गई। मालिंदी पहुँचने पर दल की संख्या बहुत कम रह जाने के कारण डॉ. गामा ने सॉओ रैफ़ेल को जला देने का आदेश दिया। उन्होंने वहाँ पर भी एक पेड्राओ गाड़ा। उन्होंने अंतिम पेड्राओ मोज़ांबिक में स्थापित किया, जहाँ वह 1 फ़रवरी को पहुँचे। 20 मार्च को सॉओ गैब्रिएल और बेरिओ ने एक साथ केप का चक्कर लगाया, लेकिन एक महीने के बाद एक तूफ़ान में दोनों अलग हो गए। बेरिओ 10 जुलाई को पुर्तग़ाल के टैगॉस नदी में पहुँचा।

सॉओ गैब्रिएल में डॉ. गामा ने एज़ोर्स के टर्सीरा द्वीप के लिए अपनी यात्रा को जारी रखा। जहाँ से कहा जाता है कि उन्होंने लिस्बन के लिए ध्वजपोत को रवाना किया। वह स्वयं 9 सितंबर को लिस्बन पहुँचे और 9 दिनों के बाद अपना विजय-प्रवेश किया। इस बीच का अन्तराल उन्होंने अपने भाई पॉउलो की मृत्यु के शोक में बिताया, जिसकी मृत्यु टर्सीरा में हो गई थी। मैनुअल प्रथम ने वास्को को डॉम [8] की उपाधि और 1,000 क्रुज़ेडो की वार्षिक पेंशन और जागीर प्रदान की।

द्वितीय समुद्र यात्रा

पुर्तग़ाल छोड़ते हुए वास्को द गामा

वास्को द गामा की उपलब्धियों को आगे बढ़ाने के लिए मैनुअल प्रथम ने पुर्तग़ाली नाविक पेड्रो अलवारेज़ कबराल को 13 जहाज़ों के एक बेड़े के साथ कालीकट के लिए रवाना किया। बाद में मुसलमानों द्वारा भड़काए जाने पर हिन्दुओं ने हथियार उठा लिए और कबराल द्वारा छोड़े गए पुर्तग़ालियों को जान से मार डाला। कालीकट के ख़िलाफ़ इस कृत्य का बदला लेने के लिए और हिन्द महासागर में वर्चस्व स्थापित करने के लिए लिस्बन से एक नया बेड़ा तैयार करके रवाना किया गया। पहले इस बेड़े का नेतृत्व कबराल को दिया गया, लेकिन बाद में कमान वास्को द गामा को सौंप दी गई। उन्हें जनवरी 1502 में एडमिरल का ओहदा दिया गया। उन्होंने 10 जहाज़ों का नेतृत्व किया, जिनमें प्रत्येक की सहायता के लिए पाँच जहाज़ों के दो नौ बेड़े थे और प्रत्येक नौ बेड़े की कमान उनके किसी न किसी सम्बन्धी के पास थी। फ़रवरी 1502 को निकाला यह बेड़ा केप वर्डेस पहुँचा और 14 जून को पूर्वी अफ़्रीका के सोफ़ला बंदरगाह पर पहुँचा। मोज़ांबिक के एक संक्षिप्त दौरे के बाद पुर्तग़ाली बेड़ा किलवा [9] के लिए निकला। किलवा के शासक अमीर इब्राहीम कबराल के प्रति असहिष्णु थे। जब वास्को द गामा ने अमीर को धमकी दी कि अगर उन्होंने पुर्तग़ालियों के सामने समर्पण नहीं किया, तो वह किलवा को जलाकर राख कर देगें तब अमीर ने मेनुअल प्रति वफ़ादारी का शपथ लेकर आत्मसमर्पण कर दिया।

दक्षिणी अरब तट का चक्कर लगाते हुए वास्को द गामा गोवा [10] पहुँचे। इसके बाद वह दक्षिण-पश्चिम भारत में कालीकट के उत्तर में स्थित बंदरगाह कन्नानोर की ओर बढ़े, जहाँ पर वह अरबी जहाज़ों के इंतज़ार में रुके रहे। कई दिनों के बाद औरतों और बच्चों सहित 200 से 400 यात्रियों के साथ माल से लदा एक अरबी जहाज़ पहुँचा। माल को ज़ब्त करने के बाद वास्को द गामा ने क़ब्ज़े किए हुए जहाज़ पर सभी यात्रियों को बंदी बनाकर जहाज़ को आग लगा दी और उस पर सवार सभी बंदी जलकर मर गए। यह उनके पेशेवर जीवन का सर्वाधिक नृशंस कृत्य था। जमोरीं के शत्रु कन्नानोर के शासक के साथ एक सन्धि के बाद वास्को द गामा का बेड़ा कालीकट के लिए रवाना हुआ। जमोरीं ने मित्रता की पेशकश की, लेकिन उन्होंने इस पेशकश को ठुकरा दिया और बंदरगाह से मुसलमानों को निर्वासित करने की चेतावनी दी। यह दिखाने के लिए कि वह अपनी धमकी पर खरे उतरते हैं वास्को द गामा ने बंदरगाह पर बमबारी की। उन्होंने जहाज़ पर अपना सामान बेचने आए 38 हिन्दू मछुआरों को पकड़कर मौत के घाट उतार दिया। उनके शरीर को समुद्र में फेंक दिया। ताकि वे किनारे तक पहुँच जाएँ। इसके बाद पुर्तग़ाली दक्षिण की ओर कोचीन के बंदरगाह पर पहुँचे, जिसके शासक (यह भी जमोरीं के शत्रु) के साथ उन्होंने एक सन्धि की। वास्को द गामा को जमोरीं के एक आमंत्रण के बाद, जो उन्हें फंसाने की एक चाल साबित हुई, पुर्तग़ालियों का कालीकट के समीप अरबी जहाज़ों से संक्षिप्त युद्ध हुआ, जहाँ से उन्हें पूरी तरह से भागने पर मजबूर कर दिया गया। वापसी यात्रा के पहले चरण में 20 फ़रवरी 1503 को बेड़ा कन्नानोर से मोज़ांबिक के लिए रवाना हुआ।

तृतीय समुद्रयात्रा

वापसी पर किंग मैनुअल द्वारा वास्को द गामा के स्वागत के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है, ऐसा प्रतीत होता है कि वास्को द गामा को लगा कि उनके द्वारा उठाए गए कष्टों का उचित मुआवज़ा नहीं मिला। साइनेस नगर के स्वामित्व को लेकर एडमिरल और ऑर्डर ऑफ़ सॉओ टियागो [11] के बीच विवाद खड़ा हो गया। ऐसा एडमिरल को नगर सौंपे जाने के वादे के कारण हुआ, लेकिन ऑर्डर ने इसे उनके हवाले करने से इंकार कर दिया था। वास्को द गामा ने 1500 के आसपास अपने पहले अभियान से वापसी के बाद एक कुलीन घराने की महिला, 'केटरिना डे एटैडे' से विवाह किया था, जिनसे छह बेटे हुए। ऐसा माना जाता है कि वह एवोरा नगर में सेवानिवृत्त हुए। बाद में उन्हें कई अतिरिक्त सुविधाएँ और राजस्व प्रदान किए गए। 1505 तक वह राजा को भारतीय मामलों में सलाह देते और 1519 में उन्हें विडिगुएरा का काउंट बनाया गया। किंग मैनुअल की मृत्यु के बाद ही उन्हें फिर से समुद्री यात्रा पर भेजा गया। किंग जॉन तृतीय ने 1524 में उन्हें भारत का पुर्तग़ाली वाइसरॉय नियुक्त किया। सितंबर में गोवा पहुँचने के बाद वास्को द गामा ने शीघ्र ही पूर्ववर्ती प्रशासकों के अन्तर्गत स्थापित कई प्रशासनिक कुप्रथाओं को सुधारा। बहुत मेहनत या अन्य कारणों से वह जल्द ही बीमार पड़ गए और दिसम्बर में कोचीन[12] में उनकी मृत्यु हो गई। 1538 में उनके शरीर को वापस पुर्तग़ाल ले जाया गया।


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शोध

टीका टिप्पणी

  1. पाषाण स्तंभ
  2. कॉपर नदी
  3. अच्छे शकुनों वाली नदी
  4. वर्तमान केन्या
  5. यह भी अब केन्या में
  6. वर्तमान कोझिकोड़
  7. गोवा के निकट
  8. अंग्रेज़ी 'सर' के समकक्ष
  9. वर्तमान तंजानिया
  10. जो बाद में भारत में पुर्तग़ाली सत्ता का केन्द्र बना
  11. एक धार्मिक सभा
  12. वर्तमान कोच्चि

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