अंतर्विवाह  

अंतर्विवाह के अनुसार एक विशिष्ट वर्ग के व्यक्तियों को उसी वर्ग के अंदर रहने वाले व्यक्तियों में से ही वधू को चुनना पड़ता है। वे उस वर्ग से बाहर के किसी व्यक्ति के साथ विवाह नहीं कर सकते। दूसरे प्रकार के (बहिर्विवाह) नियमों के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को एक विशिष्ट समूह से बाहर के व्यक्तियों के साथ ही, विवाह करना पड़ता है। इन्हें वृत्तों के उदाहरण से भली भाँति समझा जा सकता है। प्रत्येक समाज में एक विशाल बाहरी वृत्त होता है। इस वृत्त से बाहर किसी व्यक्ति के साथ वैवाहिक संबंध वर्जित होता है, किंतु इस बड़े वृत्त के भीतर अनेक छोटे छोटे समूहों के अनेक वृत्त होते हैं, प्रत्येक व्यक्ति को इस छोटे वृत्त के समूह के बाहर, किंतु बड़े वृत्त के भीतर ही विद्यमान किसी अन्य समूह के व्यक्ति के साथ विवाह करना पड़ता है। हिंदू समाज में इस प्रकार का विशाल वृत्त जाति का है और छोटे वृत्त विभिन्न गोत्रों के हैं। सामान्य रूप से इस शताब्दी के आरंभ तक प्रत्येक हिंदू को अपनी जाति के भीतर, किंतु गोत्र से बाहर विवाह करना पड़ता था। वह अपनी जाति से बाहर और गोत्र के भीतर विवाह नहीं कर सकता था।

इतिहास

वधू के चुनाव के लिए निश्चित किए जाने वाले अंतर्विवाही समूह नस्ल (रेस) जनजाति (ट्राइब), जाति, वर्ण आदि कई प्रकार के होते हैं। अधिकांश वन्य एवं सभ्य जातियों में अपनी नस्ल या प्रजाति से बाहर विवाह करना वर्जित होता है। कैलिफोर्निया के रेड इंडियन गौरवपूर्ण यूरोपियन नस्ल के पुरुष के साथ विवाह करने वाली रेड इंडियन स्त्री का वध कर देते थे। संयुक्त राज्य अमरीका के अनेक दक्षिणी राज्यों में नीग्रो के साथ श्वेतांग यूरोपियनों के विवाह को निषिद्ध ठहराने वाले क़ानून बने हुए हैं। रोमन लोगों के बर्बर जातियों के साथ वैवाहिक निषेध के नियम का प्रधान कारण अपनी नस्ल की उत्कृष्टता और श्रेष्ठता का अहंकार तथा अपने से भिन्न जाति के प्रति घृणा और तिरस्कार की भावना है। इसी प्रकार अपनी जनजाति से बाहर भी विवाह निषिद्ध होता है। बिहार के ओरांवों के बारे में यह कहा जाता है कि यदि इनमें कोई अपनी जनजाति से बाहर विवाह कर ले तो उसे जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता है और उसे जब तक जाति में वापस नहीं लिया जाता जब तक वह अपनी भिन्न जातीय पत्नी का परित्याग न कर दे। प्राय: सभी धर्म भिन्न धर्म वालों से विवाह का निषेध करते हैं। यहूदी धर्म में ऐसे विवाह वर्जित थे। मध्ययुग में ईसाइयों और यहूदियों के विवाह क़ानून द्वारा निषिद्ध थे। क़ुरान शरीफ़ में स्पष्ट रूप से यह कहा गया है कि इस्लाम न स्वीकार करने वाले, नाना देवी-देवताओं की पूजा करने वाले व्यक्तियों के साथ विवाह वर्जित हैं। प्राचीन हिंदू समाज में अनुलोम (उच्च वर्ण के पुरुष के साथ उच्च वर्ण की स्त्री का विवाह) विवाहों का प्रचलन होते हुए भी ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि अपने वर्णां में ही विवाह करते थे। बाद में इन वर्णों में विभिन्न जातियों का विकास हुआ और अपनी जातियों में ही विवाह के नियम का कठोरतापूर्वक पालन किया जाने लगा।

पश्चिमी देशों में जातिभेद की कठोर व्यवस्था न होने पर भी सामाजिक वर्ग-कुलीन वर्ग, नगरवासी (बुर्जुआ) व्यापारी वर्ग, किसान और मज़दूर प्राय: अपने वर्गों में ही विवाह करते हैं। राजा राजवंशीय वर्ग में ही विवाह कर सकते हैं। राजवंश से भिन्न सामान्य वर्ग की स्त्रियों से यदि विवाह हो तो उस स्त्री को तथा उसकी संतान को राजकीय पद और उत्तराधिकार नहीं प्राप्त होते। ब्रिटिश सम्राट् एडवर्ड अष्टम ने अपनी राजगद्दी इसीलिए छोड़ी थी कि उसने राजकीय वर्ग से बाहर की एक साधारण स्त्री सिंपसन से विवाह किया था और यह ब्रिटिश परंपरा के अनुसार रानी नहीं बन सकती थी।

अंतर्विवाह के नियम

जातिय अंतर्विवाह

इस नियम के अंतर्गत एक व्यक्ति को अपनी जाति के अंतर्गत ही विवाह करने की छूट है। कोई व्यक्ति अपनी जाति के बाहर विवाह नहीं कर सकता। इस नियम को नहीं मानने वाले व्यक्ति को जाति पंचायत के द्वारा सामाजिक एवं आर्थिक रूप से कठोर दंड दिया जाता है। दंड के फलस्वरूप व्यक्ति के साथ जातिगत सहयोग और सुरक्षा के हर दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं और उसे जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता है।

उपजातिय अंतर्विवाह

प्रत्येक जाति अनेक उपजाति में विभक्त होती है जिनमें तुलनात्मक श्रेष्ठता को लेकर अंतर्विरोध होता है। ऐसे प्रत्येक समूह धीरे-धीरे अंतर्विवाही बन जाते है। जैसे ब्राह्मण जाति के अंतर्गत ही सारस्वत, गौड़, कान्यकुब्ज जैसी उपजातियाँ हैं जो अंतर्विवाही हैं।


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