कच्छपावतार  

कच्छपावतार अथवा 'कूर्मावतार' भगवान विष्णु के कछुए के रूप में अवतार को कहा जाता है। देवताओं और असुरों द्वारा किये गए समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु ने कच्छप अवतार लेकर मथानी बनाये गए मंदार पर्वत को अपनी पीठ पर सम्भाला था। संसार में एकादशी का उपवास लोक में कच्छपावतार के बाद ही प्रचलित हुआ।[1]

  • 'नरसिंहपुराण' के अनुसार भगवान विष्णु का यह द्वितीय तथा 'भागवतपुराण'[2] के अनुसार यह ग्यारहवा अवतार कहा गया है। 'शतपथ ब्राह्मण'[3], 'महाभारत आदिपर्व'[4] तथा 'पद्मपुराण'[5] में उल्लेख है कि संतति प्रजनन हेतु प्रजापति, कच्छप का रूप धारण कर पानी में संचरण करता है।
  • 'लिंगपुराण'[6] के अनुसार जब पृथ्वी रसातल में जा रही थी, तब विष्णु ने कच्छप रूप में अवतार लिया था। इस कच्छप की पीठ का घेरा एक लाख योजन था।
  • 'पद्मपुराण'[7] में वर्णन हैं कि देवराज इंद्र ने दुर्वासा द्वारा प्रदत्त पारिजातक माला का अपमान किया तो कुपित होकर दुर्वासा ने शाप दिया, "तुम्हारा वैभव नष्ट होगा।" इसके परिणामस्वरूप लक्ष्मी समुद्र में लुप्त हो गई। इसके पश्चात्‌ विष्णु के आदेशानुसार देवताओं तथा दैत्यों ने लक्ष्मी को पुन: प्राप्त करने के लिए मंदार पर्वत की मथानी तथा वासुकी नाग की डोर बनाकर क्षीरसागर का मंथन किया।
  • मंथन करते समय मंदार पर्वत रसातल को जाने लगा तो भगवान विष्णु ने कच्छप के रूप में उसे अपनी पीठ पर धारण किया और देव-दानवों ने समुद्र से अमृत एवं लक्ष्मी सहित 14 रत्नों की प्राप्ति करके पूर्ववत् वैभव संपादित किया।
  • 'कूर्मपुराण' में विष्णु ने अपने कच्छपावतार में ऋषियों से जीवन के चार लक्ष्यों- 'धर्म', 'अर्थ', 'काम' तथा 'मोक्ष' का वर्णन किया था।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. कच्छपावतार (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 22 फ़रवरी, 2014।
  2. भागवतपुराण 1.3.16
  3. शतपथ ब्राह्मण 7.5.1.5-10
  4. महाभारत आदिपर्व 16
  5. पद्मपुराण, उत्तराखंड, 259
  6. लिंगपुराण 94
  7. ब्रह्मखड, 8

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