कुरुविंद  

कुरुविंद या कुरंड (अंग्रेज़ी: Corundum) एक मणिभीय खनिज पत्थर है, जो विश्व के विभिन्न स्थलों में पाया जाता है। भारत में भी कुरुविंद प्राप्य है। सामान्य कुरुविंद में कोई आकर्षक रंग नहीं होता। यह साधारणतया धूसर, भूरा, नीला और काला होता है। कुरुविंद का इंजीनियरी उद्योगों में तथा अपघर्षकों और शणचक्रों के निर्माण में अधिकतर प्रयोग किया जाता है।

प्राप्ति स्थान

यह क़ीमती पत्थर भारत में कई स्थानों पर पाया जाता है। असम की खासी और जयंतियाँ पहाड़ियों में; बिहार के हज़ारीबाग, सिंहभूमि और मानभूम ज़िले; चेन्नई का सेलम ज़िला; मध्य प्रदेश के पोहरा, भंडारा तथा रीवा; उड़ीसा तथा मैसूर प्रदेशों में यह पत्थर मिलता है। मैसूर, चेन्नई और कश्मीर में प्राप्त होने वाला कुरुविंद अधोवर्ती वर्ग का होता है। इस पत्थर की दो विशेषाएँ हैं- यह कठोर और चमकदार होता है।[1]

रंग

सामान्य कुरुविंद में कोई आकर्षक रंग नहीं होता। यह साधारणतया धूसर, भूरा, नीला और काला होता है। कुछ रंगीन कुरुविंद विशिष्ट आकर्षक रंगों के होने के कारण रत्न के रूप में 'माणिक', 'नीलम', 'याकूत' आदि नामों से बिकते हैं। थोड़े अपद्रव्यों के कारण इसमें रंग होता है।

रासायनिक गुण

कुरुविंद अपद्रव्य धातुओं के ऑक्साइड, विशेषत: क्रोमियम और लोहे के ऑक्साइड होते हैं। कुरुविंद की कठोरता 9 है, जबकि हीरे की कठोरता 10 होती है। इसका विशिष्ट गुरुत्व 3.94 से 4.10 होता है। यह ऐल्यूमिनियम का प्राकृतिक ऑक्साइड (Al2 O3) है, जिसके मणिभ षट्कोणीय तथा कभी-कभी बेलन या मृदंग की आकृति के होते हैं।

प्रयोग

कुरुविंद का इंजीनियरी उद्योगों में तथा अपघर्षकों और शणचक्रों के निर्माण में अधिकतर प्रयोग किया जाता है। पारदर्शक कुरुविंद का प्रयोग बहुमूल्य पत्थर की भाँति होता है। आजकल कुरुविंद का स्थान एक नवीन पदार्थ कार्बोरंडम ने ले लिया है, जो भारत में विदेशों से आयात होता है।[1]

कृत्रिम निर्माण विधियाँ

सर्वप्रथम कृत्रिम कुरुविंद का निर्माण 1837 ई. में चूणित और निस्तप्त फ़िटकरी (ऐलम) और पोटेशियम सल्फ़ेट के मिश्रण को ऊँचे ताप पर गरम करके किया गया था। बाद के समय में इसके बनाने की अनेक विधियाँ निकलीं, जिनसे कुरुविंद के अतिरिक्त कृत्रिम माणिक और नीलम भी बनने लगे। इनके निर्माण की चार मुख्य विधियाँ हैं-

  1. ऐल्यूमिना को ऑक्सि-हाइड्रोजन ज्वाला में पिघलाने से कुरुविंद प्राप्त हुआ था। म्वासाँ ने ऐल्यूमिना को विद्युत की भट्ठी में पिघलाकर कुरुविंद प्राप्त किया था। यदि ऐल्यूमिना के साथ थोड़ा क्रोमियम ऑक्साइड मिला दिया जाय तो माणिक भी प्राप्त हो सकता है।
  2. ऐल्यूमिना को यदि द्रावक के साथ पिघलाया जाए तो उससे कुरुविंद बनता है। द्रावक के रूप में अनेक पदार्थों, जैसे- पोटेशियम सल्फ़ेट, पोटेशियम सल्फ़ाइड, पोटेशियम डाइक्रोमेट, सुहागा, लेड ऑक्साइड, पोटेशियम मोलिबडेट, क्रायोलाइट, क्षार ऑक्साइड, सिरका, पोटेशियम टंगस्टेट और कैल्सियम की खरादन और गंधक को निस्तप्त करने से कुरुविंद प्राप्त हुआ था। ऐसे कुरुविंद में अमणिभीय बोरन और मणिभीय ऐल्यूमिनियम बोराइड मिला हुआ था।
  3. (क) क्रायोलाइट और सिलिकेट को एक प्लैटिनम मूषा में गरम करने, (ख) फ़्लोरस्पार और माइक्रसेक्लाइन के गरम करने और (ग) द्रवित पोटाश-अभ्रक को ठंडा करने से कुरुविंद प्राप्त होता है।
  4. ऐल्यूमिनियम लवण के जलीय विलयन को एक बंद नली में 3500 सेंटीग्रेट पर अथवा ऐल्यूमिनियम लवण के जलीय विलयन को यूरिया के साथ एक बंद नली में 1800-1900 सेंटीग्रेट पर गरम करने अथवा ऐल्यूमिनियम फ़्लोराइड को बोरिक अम्ल के साथ ताप पर विच्छेदित करने से भी कुरुविंद बनता है। ऐल्कली सल्फ़ेट के आधिक्य में ऐल्यूमिनियम फ़ॉस्फ़ेट की उच्च ताप पर क्रिया से[2] अथवा क्रायोलाइट को भाप के प्रवाह में श्वेत ताप पर गरम करने से कुरुविंद प्राप्त होता है।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 कुरुविंद (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 27 मार्च, 2014।
  2. ताप 14000 सेंटीग्रेट से ऊँचा नहीं रहना चाहिए

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