ध्यानमंजरी  

ध्यानमंजरी के लेखक स्वामी अग्रदास थे। अग्रदास सन 1556 ई. में वर्तमान थे और उस समय तक उनकी ख्याति भी दूर-दूर तक व्याप्त हो चुकी थी। अत: 'ध्यानमंजरी' उसी समय की कृति होगी। इसकी प्रकाशित प्रतियों में रचना तिथि के सम्बन्ध में कोई संकेत नहीं मिलता है। 'नागरी प्रचारिणी सभा', काशी में 'अग्रपदावली' नाम से इनकी रचनाएँ सुरक्षित हैं।

प्रकाशन

'ध्यानमंजरी' की एक प्रति सन 1922 ई. में 'वेंकटेश्वर प्रेस' से प्रकाशित हुई, दूसरी प्रति सन 1940 ई. में श्री रघुवीर प्रसाद रिटायर्ड तहसीलदार ने अयोध्या से प्रकाशित की। रेवासा में इसकी एक प्राचीन हस्तलिखित प्रति सुरक्षित कही जाती है, किंतु स्वामी अग्रदास के हाथ से लिखी कोई प्रति उपलब्ध नहीं है। साम्प्रदायिक विद्वानों के मत से यह अग्रदास की प्रामाणिक रचना है। 'रसिक प्रकाश भक्तमाल' में उसका उल्लेख मिलता है।[1]

विषयवस्तु

इस ग्रंथ में राम का ध्यान किस रूप में करना चाहिए, इसकी भूमिका उपस्थित करते हुए लेखक ने सर्वप्रथम मणिकांचन से युक्त अवध का वर्णन किया है। अवध के समीप ही सरयू नदी है, जो कमलकुलों से संकुल है, जिसके जल में स्नान आदि करने मात्र से मुक्ति मिल जाती है। सरयू के तट पर अशोक वन है। वहाँ कल्प वृक्ष के समीप ही एक मणिमण्डप है। मंडप में एक स्वर्ण वेदिका है, जिसके ऊपर रत्न का सिंहासन है। सिंहासन के मध्य में स्थित कमल की कर्णिका के ऊपर 'श्रीरामजी' सुशोभित है, जिनका किरीट मंजुल-मणियों से युक्त है, जिनके कानों में सुन्दर कुण्डल हैं, जिनका सर्वांग मनोरम है। यहीं पर राम के अंग-प्रत्यंग का सुन्दर वर्णन किया गया है और उनके आभूषणों तथा दिव्यायुधों का विस्तृत निरूपण किया गया है। राम का यह सोलह वर्ष का नित्य किशोर रूप परम लावण्य युक्त है। उनके वामपार्श्व में अनेक सुन्दर वस्त्राभूषणों से सुसज्जित जनकुमारी शोमित हो रहीं हैं। उनका भी नख-शिख वर्णन स्वामी अग्रदास ने यहाँ किया है। लक्ष्मण के हाथ में छत्र, भरत के हाथ में चँवर है। शत्रुघ्न और हनुमान भी सेवारत हैं। राम के इसी रूप का ध्यान भक्तों के लिए विधेय है।[1]

कथा में नवीनता

'ध्यानमंजरी' की कथा में कुछ नवीनता मिलती है। राम के षोडशवर्षीय रूप का ध्यान करने को कहा गया है। इस नवीनता की व्याख्या कदाचित् यह कहकर की जा सकती है कि भगवान राम का सीता और हनुमान दोनों से ही निरंतर साहचर्य रहता है।

भाषा-शैली

'ध्यानमंजरी' ब्रजभाषा में रोला छन्द में लिखी गयी है। इसकी भाषा सरल तथा अलंकृत है। कहीं-कहीं विभक्तियों में आधुनिकता मिलती है, जैसे कर्मकारक में यहाँ 'को' अनुसर्ग का ही प्रयोग मिलता है- कौं, कैं, कें, कूं, या कुं का नहीं।

महत्त्व

इस ग्रंथ का महत्त्व 'रामानन्द सम्प्रदाय' में माधुर्यभाव की भक्ति की दृष्टि से विशेष है। स्वामी अग्रदास इस भक्ति के प्रवर्तक कहे जाते हैं और उनकी 'ध्यानमंजरी', 'अष्टयाम' आदि रचनाएँ इस भाव के उपासकों के लिए सन्दर्भ ग्रंथ माने जाते हैं।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 हिन्दी साहित्य कोश, भाग 2 |प्रकाशक: ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |संपादन: डॉ. धीरेंद्र वर्मा |पृष्ठ संख्या: 275 |

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