नारायण गुरु  

श्री नारायण गुरु

नारायण गुरु (अंग्रेज़ी: Narayana Guru, जन्म- 28 अगस्त, 1855; मृत्यु- 20 सितम्बर, 1928) भारत के महान संत एवं समाज सुधारक थे। कन्याकुमारी में मारुतवन पहाड़ों की एक गुफा में उन्होंने तपस्या की थी। गौतम बुद्ध को गया में पीपल के पेड़ के नीचे बोधि की प्राप्ति हुई थी। नारायण गुरु को उस परम की प्राप्ति गुफा में हुई। समाज सुधारक नारायण गुरु द्वारा स्थापित 'शिवगिरि मठ' पहाड़ी की चोटी पर स्थित है और उनकी समाधि केरल में सबसे प्रसिद्ध स्मारकों में से एक है। नारायण गुरु को श्री नारायण गुरु के नाम से भी जाना जाता है। उनका जन्म एझावा जाति के परिवार में हुआ था। केरल के जाति-ग्रस्त समाज में उन्हें बहुत अन्याय का सामना करना पड़ा। उन्होंने केरल में सुधार आंदोलन का नेतृत्व किया, जातिवाद को खारिज कर दिया और आध्यात्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक समानता के नए मूल्यों को बढ़ावा दिया। नारायण गुरु ने मंदिरों और शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना के माध्यम से अपने स्वयं के प्रयासों से दलितों के आध्यात्मिक और सामाजिक उत्थान की आवश्यकता पर जोर दिया।

जन्म

श्री नारायण गुरु का जन्म केरल के तिरुअनंतपुरम के उत्तर में 12 किलोमीटर दूर एक छोटे से गाँव में सन 1855 में हुआ था। स्वयं पिछड़ी जाति के होने के कारण वे इस समुदाय के दुःख दर्द को समझते थे। इनका घर का नाम 'नानु' था। ये बचपन से ही बहुत नटखट थे। उनके पिता मदन असन एक किसान थे, वे प्रसिद्ध आचार्य (गुरुकुल के) और संस्कृत के विद्वान थे, आयुर्वेद और ज्योतिष के ज्ञाता भी थे। श्री नारायण गुरु की मां एक सरल महिला थीं। अपने माता-पिता की चार संतानों में एकमात्र बालक थे नारायण अथवा 'नानू’।

शिक्षा

नानू एक आम बालक की तरह पले-बढ़े। 5 वर्ष की आयु में उन्हें गांव के स्कूल में प्राथमिक शिक्षा के लिए भर्ती किया गया। वहां उन्होंने संस्कृत भी पढ़ी। प्राथमिक शिक्षा के बाद नानू ने घर पर रहकर खेती और घरेलू कामकाज में हाथ बंटाया। वे प्रतिदिन संस्कृत काव्य पाठ करते थे। वे मंदिर में पूजा और एकांत में ध्यान भी करते थे। 14 वर्ष की आयु में वे 'नानू भक्त’ के नाम से प्रसिद्ध हो गए। 15 वर्ष की आयु में माता के देहान्त के बाद उनके मामा कृष्ण वेदयार (आयुर्वेदाचार्य) ने उनकी देखभाल की। कृष्ण वेदयार को अपने भांजे की अप्रतिम प्रतिभा का जल्दी ही पता लग गया। अत: नानू को उच्च शिक्षा के लिए करूनगपल्ली में एक योग्य अध्यापक रमण पिल्लै असन के पास भेज दिया। रमण पिल्लै एक सवर्ण हिन्दू थे। चूंकि नानू जन्म से अछूत थे, अत: उन्हें अपने गुरु के घर के बाहर रहकर अध्ययन करना पड़ा। नानू एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी सिद्ध हुए और उन्होंने अपने सभी साथियों से आगे निकलकर शिक्षकों के सामने संस्कृत में अपनी विद्वता सिद्ध कर दी। संस्कृत में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात् 1881 में नानू अत्यधिक बीमार पड़ गये और उन्हें वापस घर लौटना पड़ा।[1]

संघर्ष का दौर

रोगमुक्त होने के बाद उन्होंने अपने पैतृक गांव में और आस-पास के क्षेत्रों में छोटे-छोटे विद्यालय खोलने का निर्णय लिया। यहीं से उन्होंने स्थानीय समाज के बालकों, विशेषकर पिछड़े वर्ग के बालकों में ज्ञान और शिक्षा का प्रसार आरम्भ किया। वस्तुत: यह दौर उनके जीवन में कड़े मानसिक संघर्ष का दौर रहा। एक ओर तो उन्हें परिवार के भरण-पोषण की चिंता करनी थी तो दूसरी ओर उनके भीतर आध्यात्मिक उन्नयन और यथार्थ के अनुभव को पाने की तीव्र उत्कंठा हिलोरें मार रही थी। उनके सब कामों पर उन्मुक्त आध्यात्मिक जीवन की तीव्र इच्छा की झलक दिखने लगी थी। अत: चिंतित रिश्तेदारों ने उनकी सोच में बदलाव की दृष्टि से उनके विवाह का निश्चय किया। 28 वर्ष की आयु में श्री नारायण गुरु की इच्छा के विरुद्ध जबर्दस्ती उनका विवाह कर दिया गया।

गृह त्याग

घर का त्याग करके नानू आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में निकल गए। उन्होंने योग शिक्षा ली, मारूतवमलै की गुफाओंमें साधना की, कठोर अनुशासन का व्रत साधा। व्यक्तित्व के विकास और गुण-सम्पन्नता हेतु कर्म और गति का दौर शुरू हुआ। काफी समय बाद श्री नारायण गुरु लोगों के बीच लौटे। वे गांव-गांव घूमे, जो भोजन मिला, उसे खाया; समाज के अंतिम व्यक्ति के साथ रहे, पिछड़े वर्ग से घुले-मिले। सभी लोग उनसे प्रभावित हुए, उनके प्रति श्रद्धा जगी। समाज कार्य में सबसे पहले श्री नारायण गुरु ने तिरुअनंतपुरम से 20 कि.मी. दक्षिण में आरूविपुरम में नेय्यार नदी के तट पर 1888 में शिव मंदिर की स्थापना की और इस मान्यता को ठुकरा दिया कि केवल एक ब्राह्मण ही पुजारी हो सकता है। हिन्दू मंदिरों में जिनका प्रवेश वर्जित था, वे इस मंदिर में निर्बाध आ सकते थे।

आश्रम स्थापना

मंदिर के ही निकट उन्होंने एक आश्रम बनाया तथा एक संगठन बनाकर मंदिर-संपदा और श्रद्धालुओं के कल्याण की व्यवस्था की। यही संगठन बाद में 'श्री नारायण धर्म परिपालन योगम्' (एस.एन.डी.पी.) के नाम से जाना गया, जो श्री नारायण धर्म का प्रसार करने लगा। 1904 में नारायण गुरु ने क्विलोन (आज कोझीकोड) के एक तटीय उपनगर वर्कला में एक शांत, सुरम्य पर्वतीय स्थल शिवगिरि में अपनी सार्वजनिक गतिविधियां केन्द्रित कीं। 1928 में अपनी महासमाधि तक श्री गुरु ने यहीं रहकर साधना की थी। शिवगिरि में नारायण गुरु ने दो मंदिरों और एक मठ की स्थापना की। शिवगिरि आकर ही रबींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी ने श्री नारायण गुरु के दर्शन किए थे।

श्री गुरु ने अलवाय में 1913 में अद्वैत दर्शन के प्रचार-प्रसार के लिए एक अद्वैत आश्रम की स्थापना की। यहां एक संस्कृत विद्यालय स्थापित किया गया। 1920 में त्रिशूर में उनके द्वारा स्थापित कारामुक्कू मंदिर में किसी देवता की प्रतिमा नहीं बल्कि एक दीपक स्थापित किया गया था, जिसका संदेश था- चहुंओर प्रकाश ही प्रकाश हो1922 में मुरुक्कुमपुझा में बनाए गए मंदिर में देव प्रतिमा की जगह 'सत्य, धर्म, प्रेम, दया’ लिखवाया गया था। 1924 में उनके द्वारा स्थापित अंतिम मंदिर कलवनकोड मंदिर में उन्होंने गर्भ गृह में एक दर्पण लगवाया। सामाजिक प्रगति के लिए श्री नारायण गुरु ने तीन उपाय सुझाए थे- 'संगठन, शिक्षा और औद्योगिक विकास'। आज केरल में दिख रहा सामाजिक-आर्थिक-शैक्षणिक विकास का श्रेय श्री नारायण गुरु और उनके द्वारा स्थापित श्री नारायण धर्म परिपालन योगम् संस्था को जाता है।

महापुरुष कथन

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है- "मैंने विश्व के विभिन्न स्थानों की यात्रा की है। इन यात्रा के दौरान मुझे अनेक संतों और विद्वानों के दर्शन करने का अवसर मिला है। लेकिन मैं यह स्पष्ट रूप से स्वीकार करता हूँ कि मुझे अभी तक कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो केरल के स्वामी श्री नारायण गुरु से आध्यात्मिक रूप से अधिक महान हो अथवा आध्यात्मिक उपलब्धियों में उन के समकक्ष भी हो।" गुरुदेव टैगोर और स्वामी श्री नारायण गुरु की भेंट 1922 में हुई थी।

रोम्यारोला जब भारत आए तो वे भी नारायण गुरु से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। रोम्यारोलां ने लिखा है- "श्री नारायण गुरु के उपदेश आचार्य शंकर के दर्शन से प्रभावित थे। यह कहा जा सकता है कि वे कर्मशील, धार्मिक तथा बौद्धिक ज्ञानी थे। उन्हें ‘स्व’ का ज्ञान था। उन्हें सामाजिक आवश्यकता की जानकारी और लोगों की नब्ज की पहचान थी। उन्होंंने दक्षिण भारत के दबे हुए लोगों को उठाने में महान योगदान दिया।"

गांधीजी ने उन्हें सदैव श्रद्धेय श्री नारायण गुरु के नाम से ही जाना और अपने हरिजनोद्धार की गतिविधि से उनके दृष्टिकोण को स्वीकार किया है। मूलूर पद्मनाभ पणिक्कर इनको बचपन से ही जानते थे। वे कहते थे कि उन्हें बचपन से ही दूसरों की सहायता करना अच्छा लगता था।[2]

जीवन दर्शन

श्री नारायण गुरु का जीवन दर्शन मुख्यतः तीन भागों में देखा जा सकता है-

  1. एक ऐसा भक्त जो संसार के दैनिक झगड़ों से दूर, शांतिप्रद स्थानों पर, जंगलों में, पर्वतों की कन्दराओं में, सुनसान धीमी बहती नदी के तट पर अथवा इसी प्रकार के निर्जन स्थानों पर सत्य को ढूँढ़ता रहता है।
  2. जब मनुष्य एक तपस्वी हो जाता है, एक वास्तविक योगी बन जाता है। 'कर्मण्येवाधिकारर्स्ते मा फलेषूकदाचन'-जब वह गीता के इस सूत्र को अपना धर्म मान लेता है।
  3. जब वह वास्तविक रूप से कर्म में विश्वास रखते हुए संसार के मोह माया से हटकर एक ज्ञानी बन जाता है। लेकिन उसे समाज की आवश्यकता अथवा समाज की गतिविधि का भी ज्ञान रहता है। यह एक धर्म प्राण बौद्धिक का रूप है।

श्री नारायण गुरु की रचनाओं में मनुष्य के इन तीनों रूपों की झलक है। उनके काव्य में भक्ति भाव की प्रधानता है ही, साथ में मनुष्य की आंतरिक हृदय की दिव्य ज्योति की भी सुगंध है। ‘अनुभूमि दशकम’‘अद्वैत दीपिका’ तथा ‘स्वानुभूति गीति’ में इसी दिव्य ज्योति का आभास मिलता है। ‘कुंडलिनी पटटू’ नाम की काव्य रचना में पातंजलि ऋषि के योग साधना के छह सोपानों की चर्चा की गई है। उनकी अन्य रचनाएँ हैं- दर्शन माला, आत्मोपदेश शतकम, दैव दशकम, आदि। श्री नारायण गुरु आचार्य शंकर के अद्वैतवाद में विश्वास रखते थे, लेकिन एक अंतर के साथ। आचार्य शंकर ने अद्वैत दर्शन को विश्व में भारत के एक विशेष आध्यात्मिक योगदान के रूप में प्रस्तुत किया। इस प्रकार उन्होंने देश में अपने मत अवलंबियों का एक बौद्धिक वर्ग बना दिया। श्री नारायण गुरु ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया, लेकिन इसे मूलतः दीन, हीन, संत्रस्त, तथा पीड़ित जन साधारण के हित को ध्यान में रख कर।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. नारायण गुरु (हिंदी) dasfiraj.wordpress.com। अभिगमन तिथि: 25 फरवरी, 2020।
  2. दक्षिण भारत के संत (9) स्वामी श्री नारायण गुरु (हिंदी) pravakta.com। अभिगमन तिथि: 25 फरवरी, 2020।

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