विश्वावसु संवत्सर  

विश्वावसु हिन्दू धर्म में मान्य संवत्सरों में से एक है। यह 60 संवत्सरों में उनतालीसवाँ है। इस संवत्सर के आने पर विश्व में अन्न महंगा रहता है, रोग और चोरों की वृद्धि हो जाती है, स्त्री-पुरुषों में वैर की भावना रहती है और राजा लोभी होता है। इस संवत्सर का स्वामी इन्द्र को कहा गया है।

  • विश्वावसु संवत्सर में जन्म लेने वाला शिशु स्त्री और पुत्रों से युक्त, सदाचारी, मीठा खाने वाला तथा सर्वगुण सम्पन्न होगा।
  • ब्रह्माजी ने सृष्टि का आरम्भ चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से किया था, अतः नव संवत का प्रारम्भ भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है।
  • हिन्दू परंपरा में समस्त शुभ कार्यों के आरम्भ में संकल्प करते समय उस समय के संवत्सर का उच्चारण किया जाता है।
  • संवत्सर 60 हैं। जब 60 संवत पूरे हो जाते हैं तो फिर पहले से संवत्सर का प्रारंभ हो जाता है।


पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध

टीका टिप्पणी और संदर्भ

संबंधित लेख

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"https://bharatdiscovery.org/bharatkosh/w/index.php?title=विश्वावसु_संवत्सर&oldid=620712" से लिया गया