कब्बन पार्क, बैंगलुरू  

कब्बन पार्क, बैंगलुरू
कुब्बन पार्क
विवरण 'कुब्बन पार्क' बैंगलुरू स्थित प्रसिद्ध पर्यटन स्थान है। पार्क में 68 प्रकार की विदेशी वनस्पति और करीब 96 प्रजाति पाई जाती हैं। यहां कुल 6000 पेड़-पौधे हैं।
राज्य कर्नाटक
शहर बैंगलुरू
स्थापना 1870
विशेष पार्क में अट्टारा कचरी हाईकोर्ट, संग्रहालय और सेशाद्री मेमोरियल हॉल भी है। पार्क में घूमने के लिए समय की कोई पाबंदी नहीं है और यह लोगों के लिए हमेशा खुला रहता है।
अन्य जानकारी इस पार्क का नामकरण मार्क कब्बन, जो कि ब्रिटिश काल में तत्कालीन मैसूर राज्य में सबसे लम्बे समय तक आयुक्त के तौर पर सेवा प्रदान करने वाले एक अधिकारी थे, उनके नाम पर किया गया है।

कब्बन पार्क (अंग्रेज़ी: Cubbon Park) कर्नाटक की राजधानी बेंगळूरू का प्रसिद्ध पर्यटन स्थान है। यह पार्क मूल रूप से 1870 ई. में बनवाया गया था। यह बेंगळूरू का प्रमुख लैंडमार्क होने के साथ-साथ शहर के प्रशासनिक क्षेत्र में आता है। एम.जी. मार्ग और कस्तुरबा मार्ग से यहां असानी से पहुंचा जा सकता है। पहले यह पार्क सिर्फ 100 एकड़ में फैला था। बाद में इसे करीब 300 एकड़ में फैला दिया गया। यहाँ वनस्पति और जीव-जंतुओं का बेहतरीन संकलन देखने को मिलता है।[1]

निर्माण तथा नामकरण

कब्बन पार्क 1870 में बना था। इसका नामकरण मार्क कब्बन, जो कि ब्रिटिश काल में तत्कालीन मैसूर राज्य में सबसे लम्बे समय तक आयुक्त के तौर पर सेवा प्रदान करने वाले एक अधिकारी थे, उनके नाम पर किया गया है। उसका निवास स्थान एक शानदार यूरोपियन बंगला था, जिसका नाम 'बालाब्रूई' था तथा जिसका अर्थ है- 'नदी तट पर स्थित फार्म'; क्योंकि यह उन्हें आइरिश सागर में 'आइल ऑफ मैन' में अपने गृह नगर की याद दिलाता था। बाद में इसमें सुप्रसिद्ध मेहमान, जैसे- महात्मा गांधी, इंदिरा गांधी और एम. विश्वेश्वरैया रहे। यहीं पर रवींद्रनाथ टैगोर ने पीसी महलनोबोइस का पाठ किया था।[2]

वर्ष 1985 में इंटैक के के.एन. आयंगर ने 823 विशिष्ट भवनों को सूचीबद्ध किया था। इन्टैक ने जब इनकी संख्या की दुबारा गणना की तो सह-संयोजक मीरा अय्यर के अनुसार यह संख्या 354 विरासत भवनों तक सिमट गई। इनकी एक पौत्री कैमिली गोनसाल्वज ने हाऊस ऑफ लार्ड्स में अपनी यादों को ताजा किया और इसका वर्णन एक शानदार औपनिवेशिक बंगले के तौर पर किया, जिसमें दक्षिण अफ़्रीका से लाये गए अवाकाडो और चकोतरे के वृक्षों की कतारों, मैसूर के तत्कालीन महाराजा द्वारा भेंट किए गए दो एलसेशियन कुत्ते और रोमियो जूलियट बॉलकानी थी, जिसमें इनके मालिक, जो उनके दादा-दादी थे, एक साथ बैठा करते थे। यह कई अन्य ऐतिहासिक भवनों जैसे कैश फार्मेसी की ही तरह समाप्त हो गया, जिनमें आजकल भीड़भाड़ वाले मिनी वाणिज्यिक शापिंग परिसर चलाए जाते हैं और इन्हें अब पूरी तरह से भुला दिया गया है। कुछ कालर्टन हाउस जैसे भवन बच गए हैं।

विशेषताएँ

पहले कब्बन पार्क को 'मेडे पार्क' के नाम से जाना जाता था। तत्कालीन शासक को श्रद्धांजली देने के लिए जब सिल्वर जुबली मनाया गया तो इस पार्क का नाम बदलकर 'चारमाराजेन्द्र पार्क' रखा गया। पार्क में घने बांस के पेड़ और दूसरे खूबसूरत पौधों के बीच एक बड़ा-सा दायरा है, जिसे कर्नाटक सरकार के बागवानी विभाग द्वारा नियंत्रिण किया जाता है। पार्क में सुबह टहलने वालों, प्रकृतिवादी और शांत वातावरण में प्रकृति का अध्ययन करने वालों को देख सकते हैं। पार्क में 68 प्रकार की विदेशी वनस्पति और करीब 96 प्रजाति पाई जाती हैं। यहां कुल 6000 पेड़-पौधे हैं। पार्क में अट्टारा कचरी हाई कोर्ट, म्यूजियम और सेशाद्री मेमोरियल हॉल भी है। पार्क में घूमने के लिए समय की कोई पाबंदी नहीं है और यह लोगों के लिए हमेशा खुला रहता है। हलांकि पार्क की सड़कें सुबह 5 बजे से 8 बजे तक बंद रहती हैं।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 कब्बन पार्क, बेंगळूरू (हिंदी) नेटिव प्लेनेट। अभिगमन तिथि: 18 दिसम्बर, 2016।
  2. 'विरासत', जुलाई-सितम्बर 2016, भारतीय सांस्कृतिक निधि की पत्रिका, पृ.सं. 60

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