छान्दोग्य उपनिषद अध्याय-7 खण्ड-16 से 26  

छान्दोग्य उपनिषद अध्याय-7 खण्ड-16 से 26
छान्दोग्य उपनिषद का आवरण पृष्ठ
विवरण 'छान्दोग्य उपनिषद' प्राचीनतम दस उपनिषदों में नवम एवं सबसे बृहदाकार है। नाम के अनुसार इस उपनिषद का आधार छन्द है।
अध्याय सातवाँ
कुल खण्ड 26 (छब्बीस)
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अन्य जानकारी सामवेद की तलवकार शाखा में छान्दोग्य उपनिषद को मान्यता प्राप्त है। इसमें दस अध्याय हैं। इसके अन्तिम आठ अध्याय ही छान्दोग्य उपनिषद में लिये गये हैं।

छान्दोग्य उपनिषद के अध्याय सातवें का यह सोलहवें से छब्बीसवें तक का खण्ड है। इन खण्डों में 'सत्य' से 'आत्मा' तक व्याप्त 'ब्रह्म' के विविध स्वरूपों का उल्लेख किया गया है।

सनत्कुमार नारद को समझाते हुए कहते हैं कि "सत्य' को जानने के लिए विज्ञान और विज्ञान को मानने के लिए बुद्धि-विशेष का उपयोग करना चाहिए। बुद्धि के लिए श्रद्धा का होना अनिवार्य है। श्रद्धा द्वारा ही बुद्धि किसी विषय का मनन कर पाती है। श्रद्धा के साथ निष्ठा का होना भी अनिवार्य है; क्योंकि निष्ठा के बिना श्रद्धा का जन्म नहीं होता। इसी प्रकार निष्ठा के लिए कृति का सामने होना आवश्यक है। ऐसी कृति सुख अथवा हर्ष प्रदान करने वाली होनी चाहिए। तभी कोई साधक उस पर निष्ठापूर्वक श्रद्धा रखकर व अपनी बुद्धि-विशेष से मनन करके, वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर 'सत्य' की खोज कर पाता है।

'भूमा' क्या है?

भारतीय दर्शन में 'भूमा' शब्द का विशेष उल्लेख मिलता है। इस 'भूमा' शब्द का अर्थ है- विशाल, विस्तृत, विराट, अनन्त, असीम, विराट, अनन्त, असीम, विराट पुरुष, धरती, प्राणी और ऐश्वर्य। इस 'भूमा' की खोज ही भारतीय तत्त्व-दर्शन का आधार है। यह 'भूमा' अनन्त आनन्द की प्रदाता है। सांसारिक प्राणी इसी 'भूमा' का संसर्ग पाना चाहता है। यह 'भूमा' ही 'ब्रह्म' का स्वरूप है। इसे ही अमृत, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सर्वोत्तम कहा गया है। यही 'आत्मा' है। इसे जान लेने के उपरान्त मनुष्य समस्त सांसारिक भोगों से मुक्त होकर शुद्ध रूप से अपने अन्त:करण में विद्यमान 'परब्रह्म' को प्राप्त कर लेता है।


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छान्दोग्य उपनिषद अध्याय-5

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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