छान्दोग्य उपनिषद अध्याय-8 खण्ड-1 से 6  

छान्दोग्य उपनिषद अध्याय-8 खण्ड-1 से 6
छान्दोग्य उपनिषद का आवरण पृष्ठ
विवरण 'छान्दोग्य उपनिषद' प्राचीनतम दस उपनिषदों में नवम एवं सबसे बृहदाकार है। नाम के अनुसार इस उपनिषद का आधार छन्द है।
अध्याय आठवाँ
कुल खण्ड 15 (पंद्रह)
सम्बंधित वेद सामवेद
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अन्य जानकारी सामवेद की तलवकार शाखा में छान्दोग्य उपनिषद को मान्यता प्राप्त है। इसमें दस अध्याय हैं। इसके अन्तिम आठ अध्याय ही छान्दोग्य उपनिषद में लिये गये हैं।

'छान्दोग्य उपनिषद' के अध्याय आठवें का यह प्रथम से छठवें तक का खण्ड है। इन छह प्रारम्भिक खण्डों में शरीर के भौतिक स्वरूप में 'आत्मा' की स्थिति का वर्णन किया गया है और हृदय तथा आकाश की तुलना की गयी है। यहाँ आत्मा के इस प्रसंग को गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है।

गुरु अपने शिष्यों से कहता है कि मानव-हृदय में अत्यन्त सूक्ष्म रूप से 'ब्रह्म' विद्यमान रहता है। 'स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरूक्त्ँ हृद्ययमिति तस्माद्धदथमहरहर्वा एवंवित्स्वर्ग लोकमेति॥3/3॥' अर्थात् वह आत्मा हृदय में ही स्थित है। 'हृदय' का अर्थ है 'हृदि अयम्'- वह हृदय में है। यही आत्मा की व्युत्पत्ति है। इस प्रकार जो व्यक्ति आत्मतत्त्व को हृदय में जानता है, वह प्रतिदिन स्वर्गलोक में ही गमन करता है।

वास्तव में जितना बड़ा यह आकाश है, उतना ही बड़ा और विस्तृत यह चिदाकाश हृदय भी है। इस हृदय में अत्यन्त सूक्ष्म रूप में 'आत्मा' निवास करता है। यह शरीर समय के साथ-साथ जर्जर होता चला है और एक दिन वृद्ध होकर मृत्यु का ग्रास बन जाता है। इसीलिए शरीर को नश्वर कहा गया है, परन्तु इस शरीर में जो 'आत्मा' विद्यमान है, वह कभी नहीं मरता। वह न तो जर्जर होता है, न वृद्ध होता है और न मरता है।

मनुष्य अज्ञानतावश हृदय में रहने वाले इस 'ब्रह्मरूपी आत्मा' को नहीं जान पाता। इसलिए वह मोह-माया के सांसारिक बन्धनों में बंधा रहता है, परन्तु ज्ञानी व्यक्ति 'आत्मा' को ही 'ब्रह्म' का रूप जानकर ओंकार (प्रणव) तक पहुंच जाता है। ऐसा ज्ञानी व्यक्ति 'ब्रह्मज्ञानी' कहलाता है। जो साधक ब्रह्मचर्य का कठोरता से पालन करते हुए हृदयलोक में स्थित 'ब्रह्म' के सूक्ष्म रूप 'आत्मा' को जान लेते हैं, उन्हें ही ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। सम्पूर्ण लोकों में वे अपनी इच्छाशक्ति से कहीं भी जा सकते हैं।


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छान्दोग्य उपनिषद अध्याय-6

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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छान्दोग्य उपनिषद अध्याय-1

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