जन्मकुंडली  

जन्मकुंडली

जन्मकुंडली या नेटाल चार्ट किसी व्यक्ति के जन्म के समय, ग्रह, सूर्य, चंद्रमा और तारों की स्थिति दर्शाने वाला एक व्यक्तिगत ज्योतिष चार्ट है। इस का अध्ययन करके, एक ज्योतिषी उस व्यक्ति के मूल व्यक्तित्व, जीवन आदि में प्रमुख घटनाओं की भविष्यवाणी करता है। भविष्य की भविष्यवाणी की सटीकता जन्म चार्ट की सटीकता पर निर्भर करता है। एक जन्म कुंडली क्षमता, जीवन परिस्थितियों और एक व्यक्ति के अनुभवों से पता चलता है कि एक मानचित्र की तरह है। यह एक व्यक्ति और जीवन में आगे यात्रा की अंतरात्मा के लिए एक विस्तृत जानकारी देता है।

कुंडली

'कुंडली' वह चक्र है, जिसके द्वारा किसी इष्ट काल में राशि चक्र की स्थिति का ज्ञान होता है। राशिचक्र क्रांतिचक्र से संबद्ध है, जिसकी स्थिति अक्षांशों की भिन्नता के कारण विभिन्न देशों में एक सी नहीं है। अतएव राशिचक्र की स्थिति जानने के लिये स्थानीय समय तथा अपने स्थान में होने वाले राशियों के उदय की स्थिति (स्वोदय) का ज्ञान आवश्यक है। घड़ियाँ किसी एक निश्चित याम्योत्तर के मध्यम सूर्य के समय को बतलाती है। इससे सारणियों की, जो पंचांगों में दी रहती हैं, सहायता से हमें स्थानीय स्पष्टकाल ज्ञात करना होता है। स्थानीय स्पष्टकाल को इष्टकाल कहते हैं। इष्टकाल में जो राशि पूर्व क्षितिज में होती है उसे लग्न कहते हैं। तात्कालिक स्पष्ट सूर्य के ज्ञान से एवं स्थानीय राशियों के उदयकाल के ज्ञान से लग्न जाना जाता है। इस प्रकार राशिचक्र की स्थिति ज्ञात हो जाती है। भारतीय प्रणाली में लग्न भी निरयण लिया जाता है। पाश्चात्य प्रणाली में लग्न सायन लिया जाता है। इसके अतिरिक्त वे लोग राशिचक्र शिरोबिंदु (दशम लग्न) को भी ज्ञात करते हैं। भारतीय प्रणाली में लग्न जिस राशि में होता है उसे ऊपर की ओर लिखकर शेष राशियों को वामावर्त से लिख देते हैं। लग्न को प्रथम भाव तथा उसके बाद की राशि को दूसरे भाव इत्यादि के रूप में कल्पित करते हैं। भावों की संख्या उनकी कुंडली में स्थिति से ज्ञात होती है। राशियों का अंकों द्वारा तथा ग्रहों को उनके आद्यक्षरों से व्यक्त कर देते हैं। इस प्रकर का राशिचक्र कुंडली कहलाता है। भारतीय पद्धति में जो सात ग्रह माने जाते हैं, वे हैं सूर्य, चंद्र, मंगल, आदि। इसके अतिरिक्त दो तमो ग्रह भी हैं, जिन्हें राहु तथा केतु कहते हैं। राहु को सदा क्रांतिवृत्त तथा चंद्रकक्षा के आरोहपात पर तथा केतु का अवरोहपात पर स्थित मानते हैं। ये जिस भाव, या जिस भाव के स्वामी, के साथ स्थित हों उनके अनुसार इनका फल बदल जाता है। स्वभावत: तमोग्रह होने के कारण इनका फल अशुभ होता है।

राशि चिह्न
मेष 1
वृष 2
मिथुन 3
कर्क 4
सिंह 5
कन्या 6
तुला 7
वृश्चिक 8
धनु 9
मकर 10
कुंभ 11
मीन 12
ग्रह चिह्न
बुध 1
शुक्र 2
पृथ्वी 3
मंगल 4
गुरु 5
शनि 6
वारुणी 7
वरुण 8
यम 9

भावों की स्थिति अंकों से व्यक्त की जाती है। स्पष्ट लग्न को पूर्वबिंदु (वृत्त को आधा करने वाली रेखा के बाएँ छोर पर) लिखकर, वहाँ से वृत्त चतुर्थांश के तुल्य तीन भाग करके भावों को लिखते हैं। ग्रह जिन राशियों में हो उन राशियों में लिख देते हैं। इस प्रकार कुंडली बन जाती है, जिसे अंग्रेज़ी में हॉरोस्कोप (horoscope) कहते हैं। यूरोप में, भारतीय सात ग्रहों के अतिरिक्त, वारुणी, वरुण तथा यम के प्रभाव का भी अध्ययन करते हैं।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. कुंडली (हिन्दी) भारतकोश। अभिगमन तिथि: 3 फ़रवरी, 2015।

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