भारत में यवन साम्राज्य  

विदेशी आक्रमण बैक्ट्रिया के ग्रीक

उत्तर पश्चिमी से विदेशियों के आक्रमण मौर्योत्तर काल की सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटना थी। इनमें सबसे पहले आक्रांता थे बैक्ट्रिया के ग्रीक, जिन्हें पूर्ववर्ती भारतीय साहित्य में यवन के नाम से सम्बोधित किया गया है। सिकन्दर ने अपने पीछे एक विशाल साम्राज्य छोड़ा था, जिसमें मैसीडोनिया, सीरिया, बैक्ट्रिया, पार्थिया, अफ़ग़ानिस्तान एवं उत्तर पश्चिमी भारत के कुछ भाग सम्मिलित थे। इस साम्राज्य का काफ़ी बड़ा भाग सिकन्दर के बाद सेल्युकस के अधीन रहा। यद्यपि अफ़ग़ानिस्तान एवं भारत के उत्तर पश्चिम के भाग उसे चंद्रगुप्त मौर्य को समर्पित कर देने पड़े थे। सेल्यूकस एवं उसके तुरन्त बाद के अधिकारी कुशल शासक थे किन्तु उनके परवर्ती शासकों के अधीन साम्राज्य का विघटन प्रारम्भ हो गया। लगभग ई. पू. 250 में बैक्ट्रिया के गवर्नर डियोडोटस एवं पार्थिया के गवर्नर औरेक्सस ने अपने आपको स्वतंत्र घोषित कर दिया। बैक्ट्रिया के दूसरे राजा डियोडोटस द्वितीय ने अपने देश सेल्युकस के साम्राज्य से पूर्णतः अलग कर लिया।

डियाडोटस एवं उसका उत्तराधिकारी मध्य एशिया में अपना साम्राज्य सुगठित करने में व्यस्त रहे किन्तु उनके बाद के एक शासक डेमेट्रियस प्रथम (ई. पू. 220--175) ने भारत पर आक्रमण किया। ई. पू. 183 के लगभग उसने पंजाब का एक बड़ा भाग जीत लिया और साकल को अपनी राजधानी बनाया। डेमेट्रियस ने भारतीयों के राजा की उपाधि धारण की और यूनानी तथा खरोष्ठी दोनों लिपियों वाले सिक्के चलाए। किन्तु जब डेमेट्रियस भारत में व्यस्त था, स्वयं बैक्ट्रिया में एक युक्रेटीदस की अध्यक्षता में विद्रोह हो गया और डेमेट्रियस को बैक्ट्रिया से हाथ धोना पड़ा। युक्रेटीदस भी भारत की ओर बढ़ा और कुछ भागों को जीतकर उसने तक्षशिला को अपनी राजधानी बनाया।

युक्रेटीदस के सिक्के बैक्ट्रिया, सीस्तान, काबुल की घाटी, कपिश और गंधार में मिले हैं। सम्भवतः झेलम तक पश्चिमी पंजाब को उसने अपने राज्य में मिला लिया। यद्यपि वह और आगे न बढ़ सका। डेमेट्रियस का अधिकार पूर्वी पंजाब और सिंध पर ही रह गया। भारत में यवन साम्राज्य इस प्रकार दो कुलों में बंट गया -

  1. डेमेट्रियस
  2. युक्रेटीदस के वंश।
  • सबसे प्रसिद्ध यवन शासक मीनान्डर था (ई. पू. 160--120), जो बौद्ध साहित्य में 'मिलिन्द' के नाम से प्रसिद्ध है। यह सम्भवतः डेमेट्रियस के कुल का था। पेरिप्लस में लिखा है कि मीनान्डर के सिक्के भड़ोच के बाज़ारों में खूब चलते थे। स्वात की घाटी में एक मंजूषा मिली है जिस पर मीनान्डर का नाम ख़ुदा है। इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि मीनान्डर के राज्य में अफ़ग़ानिस्तान का कुछ भाग और उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रदेश सम्मिलित थे।
  • स्ट्राबो ने लिखा है कि यूनानियों ने गंगा नदी और पाटलिपुत्र तक आक्रमण किए।
  • पतंजलि के महाभाष्य में उल्लेख आया है कि यूनानियों ने अवध में साकेत और राजस्थान में चित्तौड़ के निकट माध्यमिका का घेरा डाला।
  • गार्गी संहिता के 'युगपुराण' अध्याय से ज्ञात होता है कि दुष्ट, वीर यवनों ने साकेत, पंचाल (गंगा - यमुना दोआब) और मथुरा को जीतकर पाटलिपुत्र तक धावा मारा, किन्तु घरेलू युद्धों के कारण वे तुरन्त लौट आए।
  • कुछ इतिहासकारों का मत है कि ये वर्णन मीनान्डर के भारतीय आक्रमणों से सम्बद्ध है। हाल ही में कौशांबी (इलाहाबाद) के पास रेह से प्राप्त एक संक्षिप्त अभिलेख में इस बात की पुष्टि होती है। इस अभिलेख में मीनान्डर का स्पष्ट उल्लेख है।
  • पुरातात्विक साक्ष्यों से भी इस बात के संकेत मिले हैं कि गंगा घाटी में ई. पू. दूसरी शती के मध्य में काफ़ी विध्वंस हुआ। पुष्यमित्र शुंग के राज्यकाल का प्रारम्भ लगभग ई. पू. 187 में हुआ था और मीनान्डर का समय इससे बहुत बाद में है। मीनान्डर के सिक्के काबुल से मथुरा और [बुंदेलखंड]] तक मिले हैं। बौद्ध ग्रंथ मिलिन्दपन्ह में मीनान्डर के बौद्ध भिक्षु नागसेन के साथ वाद - विवाद के उपरान्त बौद्ध धर्म का अनुयायी बनने की कथा है। इसकी राजधानी साकल शिक्षा का प्रसिद्ध केन्द्र थी और वैभव एवं ऐश्वर्य में यह पाटलिपुत्र की समता करती थी। यह व्यापार का एक बड़ा केन्द्र भी थी। भारत में यवन राज्य दीर्घकालीन न हो सका, क्योंकि राजनीतिक एवं भौगोलिक कारणों से मध्य एशिया में क़बीलों का आना प्रारम्भ हो गया। चीनी सम्राट 'शी हुआंग ती' द्वारा वहाँ विशाल दीवार बना देने एवं उस क्षेत्र में चरागाह सूख जाने के कारण कई क़बीले वहाँ से पश्चिम की ओर चल पड़े। उनके दबाव के कारण 'सीथियन' जिन्हें भारतीय स्रोतों में 'शकों' का नाम दिया गया है, अपना स्थान छोड़कर आगे बढ़ते हुए बैक्ट्रिया में आए और उस पर अपना अधिकार स्थापित किया। किन्तु यूची क़बीला अब भी उनके पीछे था, अतः और आगे बढ़ते हुए उन्होंने पहले पार्थिया और भारत के इंडो ग्रीक राज्यों पर आक्रमण किया और वहाँ अपना अधिकार स्थापित किया।

यूनानी सम्पर्क का भारत पर प्रभाव

प्रायः यह कहा जाता है कि भारत पर यूनानी सभ्यता का प्रभाव जमाने का जो कार्य सिकन्दर नहीं कर सका था वह भारत में इंडो ग्रीक साम्राज्य स्थापित होने से पूर्ण हो गया। इस पक्ष पर और साथ ही तथाकथित गंधार शैली पर ग्रीक प्रभाव के विषय में विद्वानों के भिन्न भिन्न मत हैं।

  • बी. ए. स्मिथ एवं डब्लयू. टार्न जैसे इतिहासकारों ने भारत पर यूनानी प्रभाव का नगण्य माना है। उनके अनुसार देश के अंदरूनी भागों पर डेमेट्रियस, यूक्रेटाइड्स, मीनान्डर, आदि के आक्रमण अल्पकालिक थे और उन्होंने भारत की मूल संस्कृति पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ा। उनके अनुसार भारतीय, सिकन्दर, मीनान्डर आदि से, विजेताओं के रूप में प्रभावित थे। वे इन्हें संस्कृति का दूत नहीं समझते थे। यद्यपि ये विजेता उनके लिए भय के पात्र अवश्य थे, किन्तु उनके लिए वे अनुकरणीय कदापि नहीं थे। इनके अनुसार यवन शासकों के सिक्कों पर जहाँ एक ओर ग्रीक कथाएँ अंकित हैं वही दूसरी ओर बढ़ती हुई संख्या में भारतीय कथाओं की संख्या यह प्रदर्शित करती है कि यूनानी भाषा भारत के लोगों की समझ में नहीं आती थी।
  • किन्तु वुडकाक जैसे इतिहासकारों का कथन है कि ग्रीक विजेताओं में कई क्षेत्रों में भारत पर अपनी छाप छोड़ी थी। उनके अनुसार मुस्लिम आक्रमणों से पूर्व के अन्य सभी आक्रांताओं की भाँति यद्यपि कालक्रम से यवन भी भारतीय जनसंख्या में समाविष्ट हो गए, किन्तु ईस्वी सन् के प्रारम्भिक काल में भारत पर उनका पर्याप्त प्रभुत्व था। उन्हें 'सर्वज्ञ यवन' (महाभारत) कहकर सम्मानित किया जाता था। यूनानी चिकित्सकों को अत्यन्त ज्ञानी कहकर उनका आदर किया जाता था। व्यूह रचना के विशेषज्ञ एवं युद्ध मशीनों के डिज़ाइन बनाने वालों के रूप में यवन इंजीनियरों का पूरे भारत में सम्मान था। इसके अतिरिक्त विज्ञान के क्षेत्र में भारतीयों ने मुक्त रूप से यवनों से शिक्षा ग्रहण की थी। भारतीयों का ध्यान ज्योतिष शास्त्र ने विशेष रूप से आकर्षित किया था। उन्होंने यूनानियों से ही कलैंडर प्राप्त किया। सप्ताह का सात दिनों में विभाजन एवं विभिन्न ग्रहों के नाम भी उनसे ही लिए। फलित ज्योतिष का कुछ ज्ञान भारतीयों को पहले से ही था किन्तु नक्षत्रों को देखकर भविष्य बताने की कला भारतीयों ने यूनानियों से ही सीखी। गार्गी संहिता में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है कि ज्योतिष के क्षेत्र में भारत यूनान का ऋणी है। उसमें लिखा है कि यद्यपि यवन बर्बर हैं किन्तु ज्योतिष के मूल निर्माता होने के कारण वे वंदनीय है।
  • वराहमिहिर ने भी लिखा है कि यद्यपि यूनानी म्लेच्छ हैं किन्तु वे ज्योतिष के विद्वान् हैं और इसलिय प्राचीन ऋषियों की भाँति पूज्य हैं।

सिक्के बनाने की कला

सिक्के बनाने की कला में भारतीयों ने यूनानियों से बहुत कुछ सीखा। यूनानियों से सम्पर्क होने से पहले भारतीय आहत मुद्राएँ काम में लाते थे। उन पर कोई मुद्रा लेख नहीं होता था। यवनों ने यहाँ पर ऐसे सिक्कों का प्रचलन किया जिन पर एक ओर राजा की आकृति और दूसरी ओर किसी देवता की मूर्ति या कुछ अन्य चिह्न बनाए गए। भारतीय शासकों ने इसी प्रणाली को अपनाया। कनिष्क ने भी बैक्ट्रिया के यूनानी राजाओं और रोम के सिक्कों के अनुरूप अपने सिक्के बनवाए। गंधार और मथुरा की बुद्धबोधिसत्वों की मूर्तियों पर यूनानी और रोमन कला का प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है।

धर्म और दर्शन

धर्म और दर्शन के क्षेत्र में यूनान भारत का ऋणी हुआ। कई यूनानी राजाओं ने भारतीय धर्म को अपनाया। तक्षशिला के एक यवन राजा एण्टियालकिडास ने हेलियोडोरस नामक अपना राजदूत काशीपुत्र भागभाद्र के पास भेजा था। हेलियोडोरस अपने को 'भागवत' कहता था और उसने देवों के देव वसुदेव के उपलक्ष्य में बेसनगर में 'गरुड़ध्वज' की स्थापना की। मीनान्डर स्वयं बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया। सम्भवतः तपस्या और योग कि क्रियाएँ यूनानियों ने भारतीयों से सीखी।

यवन प्रभाव के सन्दर्भ में एक मनोरंजक मत जर्मनी के प्राच्याविदों का है कि पारम्परिक संस्कृत सुखांत नाटकों पर एथेंस के नाटकों का प्रभाव था, जो कि इंडो ग्रीक राजाओं के दरबारों एवं नगरों में अभिनीत होते थे। इसके प्रमाण के रूप में किसी अन्य साक्ष्य के अभाव में यह एक बहुत स्पष्ट साक्ष्य माना जाता है कि संस्कृत नाटकों में पटाक्षेप के लिए 'यवनिका' शब्द का प्रयोग होता है, किन्तु यह एक इतना हल्का साक्ष्य है कि इसके आधार पर संस्कृत नाटकों पर यूनानी प्रभाव सिद्ध नहीं किया जा सकता। निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि पारस्परिक सम्पर्क से भारतीय एवं यवनों ने परस्पर बहुत कुछ ग्रहण किया।

हिन्द पार्थियन

ई. पू. पहली शती के अन्त में पर्थियन नामों वाले कुछ शासक उत्तर पश्चिम भारत पर शासन कर रहे थे, जिन्हें भारतीय स्रोतों में 'पहलव' कहा गया है। पार्थिया ने भी बैक्ट्रिया के साथ ही स्वयं को यूनानी शासन से स्वतंत्र किया था और सेल्यूकस वंशीय शासक एण्टियोकस तृतीय को इसकी स्वतंत्रता को भी मान्यता देनी पड़ी थी।

अंत्तिकिन

अंत्तिकिन एक यवन राजा है जिसका उल्लेख अशोक के शिलालेख (संख्या तेरह) में किया गया है।


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