रोनाल्ड रॉस  

रोनाल्ड रॉस
रोनाल्ड रॉस
पूरा नाम रोनाल्ड रॉस
जन्म 13 मई, 1857
जन्म भूमि अल्मोड़ा, उत्तराखंड, भारत
मृत्यु 16 सितंबर, 1932
मृत्यु स्थान लंदन
अभिभावक पिता- सर कैम्पबेल रॉस
कर्म-क्षेत्र चिकित्सा अनुसंधान
पुरस्कार-उपाधि नोबेल पुरस्कार (1902)
नागरिकता संयुक्त राजशाही (ब्रिटेन)
अन्य जानकारी रोनाल्ड रॉस को चिकित्सा तथा मलेरिया परजीवी प्लास्मोडियम के जीवन चक्र के अन्वेषण के लिये सन 1902 में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था।
रोनाल्ड रॉस (अंग्रेज़ी: Ronald Ross, जन्म- 13 मई, 1857, अल्मोड़ा, उत्तराखंड; मृत्यु- 16 सितंबर, 1932) ब्रिटिश चिकित्सक तथा 'नोबेल पुरस्कार' विजेता थे। उन्हें 1902 के चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार दिया गया था। उन्हें यह पुरस्कार मलेरिया के परजीवी प्लास्मोडियम के जीवन चक्र की खोज के लिये दिया गया था। रोनाल्ड रॉस का जन्म भारत के उत्तराखण्ड राज्य के कुमांऊँ में अल्मोड़ा जिले के एक गॉंव में हुआ था। रॉस गजब के लेखक भी थे। उन्होंने अपनी जिंदगी के अहम पड़ावों पर कई कविताएं भी लिखी थीं। उन्हें बचपन से ही लिखना बहुत पसंद था। अपनी भावनाओं और संवेदनाओं को शब्द देना उन्हें बखूवी आता था।

परिचय

रोनाल्ड रॉस का जन्म 13 मई, 1857 को भारत में उत्तराखंड के अल्मोड़ा में हुआ था। देश में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम शुरू होने के सिर्फ तीन दिन बाद। वे अंग्रेजी राज की भारतीय सेना के स्कॉटिश अफसर सर कैम्पबेल रॉस की दस संतानों में सबसे बड़े थे। युवा रोनाल्ड की रूचि कवि या लेखक बनने की थी। उन्हें गणित की समस्याएं हल करने में मजा आता था। तब इंडियन मेडिकल सर्विस के अफसरों को बहुत अच्छी तनख्वाह मिलती थी और तरक्की के बहुत मौके थे, इसलिए उनके पिता उन्हें इंडियन मेडिकल सर्विस का अफसर बनते देखना चाहते थे।

शिक्षा

इंग्लैंड में स्कूली शिक्षा के बाद पिता के दबाव में रोनाल्ड रॉस ने लंदन के सेंट बर्थेलोम्यू मेडिकल स्कूल में प्रवेश ले लिया। मेडिकल शिक्षा पूरी होने के बाद वे अनिच्छापूर्वक इंडियन मेडिकल सर्विस की प्रवेश परीक्षा में बैठे और नाकाम हुए। पिता के दबाव में अगले साल वे फिर परीक्षा में बैठे और 24 सफल छात्रों में 17 वें क्रम पर आए। आर्मी मेडिकल स्कूल में चार माह के प्रशिक्षण के बाद वें इंडियन मेडिकल सर्विस में दाखिल हो गए और पिता का सपना पूरा हुआ।

मलेरिया पर शोध

उन्हें कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) या बॉम्बे (वर्तमान मुम्बई) के बजाय कम प्रतिष्ठित मद्रास प्रेसिडेंसी में काम करने का मौका मिला। वहां उनका ज्यादातर काम मलेरिया पीड़ित सैनिकों का इलाज करना था। क्विनाइन से रोगी ठीक तो हो जाते, लेकिन मलेरिया इतनी तेजी से फैलता कि कई रोगियों को इलाज नहीं मिल पाता और वे मर जाते। कारणवश 1888 में वे पुन: भारत छोड़कर इंगलैंड चले गये थे, जहाँ उन्होंने रॉयल कॉलेज के सर्जनों तथा प्रोफेसर ई. क्लेन के अनुसरण में जीवाणु विज्ञान का गहन अध्ययन किया। सन 1889 में फिर भारत लौटने पर सेवा काल के दौरान मलेरिया पर थ्योरी तथा अनुसंधान किये। उनके पास बुखार का जो भी कोई रोगी आता, वे उसका खून का नमूना सुरक्षित कर, घंटों माइक्रोस्कोप के साथ अध्ययन करते थे। फलस्वरूप जिसकी उपलब्धि आज सर्वविदित है।

पुरस्कार व सम्मान

रोनाल्ड रॉस को मलेरिया पर अपने कार्य के लिए 1902 में शरीर क्रिया विज्ञान या चिकित्सा के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके आलावा भी उन्हें अनेकों सम्मान प्राप्त हुए। 1901 में वे रॉयल कॉलेज ऑफ़ सर्जन तथा रॉयल सोसाइटी के फैलो निर्वाचित हुए थे, जिसमें वे 1911 से लेकर 1913 तक उपाध्यक्ष बने। 1902 में सम्राट एडवर्ड सप्तम द्वारा बाथ के मोस्ट ऑनरेबल ऑर्डर नियुक्त किए गए। लुधियाना में, क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज ने रॉस हॉस्टल के रूप में अपने छात्रावास को नाम दिया। वहां के युवा डॉक्टर अक्सर "रॉसीयन" के रूप में खुद को देखते है। रोनाल्ड रॉस की स्मृति में 'सर रोनाल्ड रॉस इंस्टिट्यूट ऑफ़ पैरासीटोलॉजी' की स्थापना उस्मानिया विश्वविद्यालय अंतर्गत हैदराबाद में हुई थी।

मृत्यु

रोनाल्ड रॉस की मृत्यु 16 सितंबर, 1932 को लंदन में हुई।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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