"गीता 6:2": अवतरणों में अंतर
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'''यं | '''यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।'''<br /> | ||
'''न ह्रासंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ।।2।।''' | '''न ह्रासंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ।।2।।''' | ||
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हे < | हे [[अर्जुन]]<ref>[[महाभारत]] के मुख्य पात्र है। वे [[पाण्डु]] एवं [[कुन्ती]] के तीसरे पुत्र थे। सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर के रूप में वे प्रसिद्ध थे। [[द्रोणाचार्य]] के सबसे प्रिय शिष्य भी वही थे। [[द्रौपदी]] को [[स्वयंवर]] में भी उन्होंने ही जीता था।</ref> ! जिसको सन्न्यास ऐसा कहते हैं, उसी को तू योग जान। क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता ।।2।। | ||
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पाण्डव = हे अर्जुन: यम् = जिसको; | पाण्डव = हे अर्जुन: यम् = जिसको; सन्न्यासम् = सन्न्यास; इति = ऐसा; प्राहु: = कहते हैं; तम् = उसी को(तूं); योगम् =योग; विद्वि = ज्ञान; हि = क्योंकि; असंन्यस्त = संकल्पों को न त्यागने वाला; कश्वन = कोई भी पुरुष; भवति = योगी; | ||
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13:53, 2 मई 2015 के समय का अवतरण
गीता अध्याय-6 श्लोक-2 / Gita Chapter-6 Verse-2
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टीका टिप्पणी और संदर्भसंबंधित लेख |
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