ईमानदारी की क़ीमत -आदित्य चौधरी  

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ईमानदारी की क़ीमत -आदित्य चौधरी


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        एक उदयीमान भ्रष्टाचारी मंत्री, अपने कार्यालय में उदास बैठे हैं... एकाएक अपने निजी सचिव से ठंडी साँस लेकर कहते हैं -
"इस बार भी 15 अगस्त पर झण्डा फहराने के लिए किसी 'बड़ी' जगह से कोई इंविटेशन नहीं आया ना ?"
"नहीं सर ! ऐसी बात नहीं है, कई जगह से इंविटेशन हैं।" सचिव ने कार्ड दिखाए
"अरे ! वो ही होंगे किसी प्राइवेट स्कूल... कहीं कोई किसी का संगीत-कार्यालय पर झण्डा फहराने... या फिर अपने ऑफिस में... असल में बात यह है कि हम मंत्री तो बन गये पर पॉपुलर नहीं हो पाये... सारी दिक़्क़त फ़ेमस होने की है... इसके लिए क्या किया जाये ?... कुछ बताओ यार !" मंत्री जी घिघियाए
"सर, इसके लिए तो सबसे एक्सपिरियंस्ड, हमारे यहाँ बड़े बाबू हैं, वो ही बता सकते हैं... क्या है कि, जो आपसे पहले मंत्री जी थे, उनके सामने भी जो इस तरह की समस्याएँ आती थीं, बड़े बाबू ही उन्हें सॉल्व करते थे। आप कहें तो उन्हें बुला दूँ।"
मंत्री जी- "हाँ ! बुलाओ यार ! ज़रा उन्हीं से पूछें।"
बड़े बाबू आ जाते हैं।
"बड़े बाबू ! आपको तो बहुत एक्सपिरियंस है, आप ये बताइये कि अब हम मंत्री बन गये... और कई साल भी हो गए... पर पॉपुलर नहीं हो पा रहे... ना कहीं हमारा नाम बड़े अख़बारों में छपता है, ना मैगज़ीनों में कोई चर्चा होती है, ना कोई फ़ोटो छपता है... और अब इस बार जैसे 15 अगस्त आ रहा है तो भी झण्डा फहराने के लिए भी अच्छी जगह से कोई निमंत्रण नहीं मिलता... बात क्या है ये पॉपुलर होने का क्या फण्डा है ?... ज़रा बताइए तो ?"
बड़े बाबू जवाब देते हैं-
"देखिए सर ! पॉपुलर होने के बहुत सारे तरीक़े हैं पॉलिटिक्स में लेकिन जो आजकल सबसे ज़्यादा अच्छा माना जाता है और सबसे ज़्यादा हिट भी है, वो है 'स्कॅम पॉपुलरटी' याने 'घोटाला फ़ेम'। अगर आपके ऊपर कोई भ्रष्टाचार का आरोप लग जाये तो लोग जान जाएँगे कि आप भी मंत्री हैं... आपका नाम क्या है... आपके रिश्तेदार कौन-कौन हैं... मतलब ये कि आपको बच्चा-बच्चा जान जाएगा... आपको तो क्या आपकी सात पुश्तों को भी लोग जान जाएँगे... वैसे और भी कई तरीक़े हैं... लेकिन जो मुझे भी सही लगता है वो मैंने आपको बताया है।"
"बात तो बिल्कुल सही है... तो हम कोई घोटाला कैसे कर सकते हैं ?... मतलब कि तरीक़ा क्या है ?... अब यूँ तो छोटे-मोटे 'खेल' तो हम करते ही रहते हैं।" मंत्री जी बोले।
"नहीं-नहीं सर, इससे बात नहीं बनती... छोटे-मोटे 'खेल' से कुछ नहीं होता, कोई बड़ा स्कैम करेंगें आप तभी फ़ेमस हो सकते हैं। लोग आपको रातों-रात जान जाएगें " बड़े बाबू ने समझाया
"तो... लेकिन इससे बदनामी भी तो होगी" मंत्री जी ने शंका ज़ाहिर की।
"नहीं सर ! आपने वो गाना नहीं सुना "जो है नाम वाला वही तो बदनाम है, मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है"... इसमें बदनामी की ऐसी कौन सी बात है ? आपका सब लोग नाम जानेंगे... और फिर देखिए, बदनाम होने का तो ये है कि अगर आप टैम्परेरी बदनाम है तब दिक़्क़त होती है, अगर आप परमानेंट बदनाम है तब कोई प्रॉब्लम नहीं है... जैसे कि मान लीजिए कि आप अचानक कोई छोटा सा भ्रष्टाचार कर देते हैं तो आप भ्रष्टाचारी है लेकिन आप समय-समय पर लगातार सुनियोजित ढ़ंग से और एक पैर्टन बनाके लगातार भ्रष्टाचार करते रहे तो उस पर किसी का ध्यान नहीं जाता... फिर तो ये माना जाता है कि आप एक विकासवादी और प्रगतिवादी व्यक्ति हैं... क्योंकि हमारा सिस्टम ही ऐसा है सर, कि भ्रष्टाचार के बिना कोई भी विकास हो ही नहीं सकता... जब आप बहुत ज़्यादा विकास चाहते हैं तो भ्रष्टाचार, अपने आप साथ में चलता ही रहता है... यथा विकास तथा भ्रष्टाचार... आपको तो एक उदयीमान भ्रष्टाचारी की तरह स्कॅम करके बस स्थापित ही तो होना है... बाक़ी तो मीडिया संभाल लेगा... और आप भी फ़ेमस हो जाएँगे।"
        अब इस भ्रष्टाचार-गर्भित भाषण के बाद मंत्री जी गम्भीर हो गए और इसी गम्भीरता से वे अपनी 'अति' निजी सचिव शीला को निहारने लगे जो अभी-अभी चाय ले कर आई थी। जब शीला मंत्री जी की गम्भीरता से पूरी तरह 'दिख' चुकी तो मुस्कुराकर बाहर चली गई। शीला को जाते हुए देखकर मंत्री जी बोले-
"क्यों बड़े बाबू शीला ने कुछ वेट गेन किया है ना ?..."
"पता नहीं सर ! पिछले एक साल से आपके साथ दौरे पर रहती है... ख़ैर छोड़िए सर ! हम फ़ेमस होने पर बात कर रहे थे।"
"हाँ-हाँ आगे बताइए... मेरा मतलब है कि मीडिया अपने-आप ही हमारे स्कॅम को ले उड़ेगा या कुछ करना पड़ेगा ? जैसे कि मान लो हम घोटाला करें और मीडिया ध्यान ही न दे तो ?... इसका क्या तरीक़ा है।""
"सर ! मीडिया को हैंडिल करने का एक अलग तरीक़ा है, अब क्या है कि हमारे यहाँ से मीडिया के लिए विज्ञापन भी जाते हैं, मीडिया वालों को आप दावत भी देते हैं, आप उन्हें अच्छी तरह से ऑबिलाइज़ भी करते हैं तो मीडिया वाले आपके ख़िलाफ़ क्यों लिखेंगें ? वो तो ये मान के चलते हैं कि आप उनके पक्ष के व्यक्ति हैं। असल में आपको इसके लिए दूसरे तरीके अपनाने पड़ेंगे, आप मीडिया पर ध्यान छोड़ दीजिए, जब आप मीडिया पर ध्यान नहीं देंगे तो मीडिया आप पर ध्यान देगा और आप कोई बड़ा सा घोटाला करेंगे तो मीडिया उसे ख़ूब उछालेगा बस बात बन जाएगी। जब आप मीडिया वालों को बिल्कुल अनदेखा कर देंगे और उन्हें जवाब भी आप उल्टे-सीधे, ग़लत-सलत देंगे तो मीडिया आपको फ्रंटलाइन में रखेगा।"
        "तो पॉपुलर होने का बेस्ट तरीक़ा आपने भ्रष्टाचार बताया... और क्या-क्या तरीके हैं ?"
बड़े बाबू- "सर ! और भी बहुत से तरीक़े हैं लेकिन वो आपको सूट नहीं करते..."
"जैसे कि ..."
"जैसे कि आपकी कोई सी.डी निकल जाय..."
"कैसी सी.डी ?"
"गंदी सी.डी"
"गंदी सी.डी... मतलब कि डर्टी पिक्चर ?"
"जी हाँ।"
"बड़े बाबू ! आपको शीला की ज़रा भी चिन्ता नहीं है..."
"इसीलिए तो कह रहा हूँ सर, कि दूसरे तरीक़े आपको सूट नहीं करते... आपके लिए घोटाला ही ठीक है।"
"पिछले साल हमारे एक दोस्त बलात्कार के मामले में भी काफ़ी फ़ेमस हुए थे..."
"आप देख लीजिए सर, कि आपके लिए क्या ठीक है"
"अब बलात्कार तो हम नहीं कर पायेंगें। तुम्हें क्या लगता है, कर पायेंगें क्या ?" मंत्री जी असमंजस में पड़ गए।
बड़े बाबू मंत्री जी को ग़ौर से देखते हुए कहते हैं "नहीं, सर ! आप बलात्कार नहीं कर पायेंगे। बलात्कार असल में हम लोग कर ही नहीं सकते सर ! ना आप कर पायेंगे और मेरा तो सर ! सवाल ही नहीं उठता क्योंकि मेरी पत्नी ने मुझे साफ़ मना किया हुआ है।... सर ! हम इस बलात्कार वाले मामले को ड्रॉप कर देते हैं और ये जो दूसरा सी.डी. वाला मामला है, इसमें भी काफ़ी रिस्क है... तो अब हम भ्रष्टाचार वाले मामले में ही फ़ोकस करते हैं। एक बड़ा स्कैम ऐसा हो जाए कि आप पॉपुलर हो सकें।"
"तो कुल मिलाकर, बड़े बाबू ! आपका सुझाव ये है कि भ्रष्टाचार ही एक अच्छा और सही रास्ता है... इसी में आगे चलकर पॉपुलर होने का एक सही तरीका भी हमें मिल सकता है... तो फिर, एक बड़ा सा स्कैम तैयार कीजिए अब... बस, ये हमारा आदेश है।"
बड़े बाबू- "सर ! बड़ा सा स्कैम तब होता है, जब मंत्रालय बड़ा हो और उसका बजट भी बड़ा हो। आपके मंत्रालय में इतना बड़ा बजट नहीं है कि कोई बड़ा-सा स्कैम हो सके और छोटे-छोटे बजट के स्कैम जो हैं उनकी कोई ख़ास अहमियत नहीं होती।"
"तो फिर ?..."
"फिर क्या सर ! पन्द्रह अगस्त पर झंडा फहरा कर ये प्रतिज्ञा कीजिए कि जब तक आपको बड़ा घोटाला करने लायक़ मंत्रालय नहीं मिल जाता आप चैन की नींद नहीं सोएँगे..."
        आइए अब इनसे दूर चलें...
इस बार चर्चा करें कि 'बेईमानी को हटाने से ईमानदारी लागू होगी' या फिर 'ईमानदारी लागू करने से बेईमानी हट जाएगी'... क्या सही है क्या ग़लत ?-
किसी भी राज्य, देश में क़ानून व्यवस्था लागू करने के प्रयास समय-समय पर होते रहते हैं। हमारे देश ने कई शासन देखे, राजशाही के बाद अब प्रजातंत्र भी देख रहे हैं, आख़िर कोई ना कोई तो वजह होगी, कोई ना कोई तो उपाय होगा, कोई ना कोई पद्धति होगी जिससे भ्रष्टाचार को कम किया जाये।
अनेक उपाय बताये जाते हैं, अनेक क़ानून बनाये जाते है लेकिन कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आता। भ्रष्टाचार बढ़ रहा है और बढ़ता ही जा रहा है। जैसे-जैसे देश की आबादी बढ़ रही है, वैसे-वैसे देश में भ्रष्टाचार भी बढ़ता जा रहा है। आख़िर करना क्या चाहिए ?
पुराने समय में जो व्यवस्थाएँ थीं, उन्हें देखें तो, जो पद्धतियाँ हमें मिलती हैं, उनमें केवल दो पद्धतियाँ ऐसी हैं, जिन्हें लागू किया जा सकता है। 'कंफ्यूशस' और 'अरस्तू' कहते हैं कि बेईमानी को हटाओ तो ईमानदारी अपने आप आयेगी। बेईमान को दंडित करो। अपराधी को सज़ा दो। इससे न्याय व्यवस्था लागू होगी। अनुशासन लागू होगा। लेकिन क्या ऐसा हुआ ? भारतीय ग्रंथों में भी इसी प्रकार की व्यवस्था की गईं हैं, चाहे वह चाणक्य हो या कोई अन्य।
लेकिन चीन के दार्शनिक लाओत्से का कहना भिन्न है। वे कहते हैं कि ईमानदारी को लागू करो तो बेईमानी अपने आप हट जाएगी। इसका क्या अर्थ है ? कैसे होगी ईमानदारी लागू ?
        इतने लम्बे समय में हमने ये तो देखा कि बेईमानी को हटाने का प्रयास तो पूरे ज़ोर-शोर से किया जाता रहा है, वो चाहे यूरोप में हो चाहे भारत में। बेईमानी को हटाना और ईमानदारी का अपने आप आ जाना, एक नियम बन गया। सभी इसी नियम पर चलते रहे क्योंकि दुनिया ने विकास करने के लिए, विकसित होने के लिए, आगे बढ़ने के लिए, प्रगति करने के लिए ज़रूरी माना अरस्तू और कंफ्यूशस की पद्धति को। इस पद्धति में बेईमानों को दण्डित किया गया, चोरों को दण्डित किया गया और एक भय पैदा किया गया, यदि तुम बेईमानी करोगे तो दण्डित किये जाओगे, तुम्हें कठोर दण्ड दिया जायेगा, जेल में डाल दिया जायेगा, तुम्हें जुर्माना भरना पड़ेगा, इस तरह की पद्धति चलन में रही है।
इसके साथ ही ईमानदारी एक उपदेश की वस्तु हो गयी। जहाँ भी उपदेश दिया जा रहा है, ईमानदारी का दिया जा रहा है और मनुष्य का सहज स्वभाव होता है कि उपदेश हमेशा ऊब पैदा करता है। हज़ारों साल से वही एक से उपदेश चले आ रहे हैं लेकिन उनका कितना असर होता है, हम सभी जानते हैं। ईमानदारी को अँग्रेज़ी में एक कहावत बना कर समझाया गया कि 'Honesty is the best policy' याने ईमानदारी एक सबसे अच्छी नीति है। ईमानदारी को पॉलिसी बनाया गया। यदि आप योजनाबद्ध तरीक़े से ईमानदार हैं तो यह आपके लिए लाभकारी रहेगी। इससे हुआ क्या ?... कुछ नहीं।
        ये कोई अच्छा समाधान नहीं था।
        असल में होना क्या चाहिए ? बेईमानी हटाओ, बेईमानी को रोको, झूठ मत बोलो, भ्रष्टाचार बंद करो, भ्रष्टाचार मत करो, इससे कानों में दिन और रात जो चीज़ गूँजने लगती है, वो है, 'बेईमानी और भ्रष्टाचार'। दिन और रात अख़बारों में और पत्रिकाओं में पढ़ने को भ्रष्टाचार के क़िस्से आते हैं। प्रमुख समाचार होते हैं, ब्रेकिंग न्यूज़ होती है कि फ़लाँ ने भ्रष्टाचार कर दिया, फलाँ स्कैम हो गया, फ़लाँ घोटाला हो गया... दिमाग़ में यही सब चलता रहता है। इसमें कमाल की बात ये है, कि जो लोग ये घोटाला करते हैं, उनकी जीवन-शैली को बड़े विस्तार से बताया जाता है, कि उन पर कितने करोड़ की सम्पत्ति मिली, कितना अधिक उन्हें समाज में महत्त्व मिलता था, किस तरह वो विदेशों में यात्राएँ करते थे, कैसे वो ऐशो-आराम की ज़िंदगी बसर कर रहे थे। उसके बाद कुछ दिन जेल जाते हैं, जेल के बाद फिर ज़मानत पर बाहर आ जाते हैं, उनकी सम्पत्ति का एक छोटा सा हिस्सा ज़ब्त कर लिया जाता है। क्योंकि अभी तक किसी भ्रष्टाचारी की सम्पत्ति को पूरी तरह से ज़ब्त करने का और उसे बिल्कुल कंगाल बना देने का, कंगाल से अर्थ है कि उसे बिल्कुल एक आम निम्न मध्यवर्गीय का जीवन बिताने पर मजबूर कर देने के कोई उदाहरण सामने नहीं आया है।
घोटाले होते रहते है, लोग मौज लेते रहते हैं। ये सब हुआ कि बेईमानी हटाओ और भ्रष्टाचार हटाओ की रट लगाने से। कोई प्रयास ऐसा नहीं हुआ कि भ्रष्टाचार की जगह ये कहा गया हो कि सदाचार को लाओ, ये कहा गया हो कि ईमानदारी को लाओ और अगर ये कहा भी गया है तो केवल कहा गया है, उसके लिए प्रयास कुछ नहीं किया गया।
        क्या सभी नेता, क्या सभी अधिकारी भ्रष्ट हैं, ऐसा नहीं है। अनेक नेता ऐसे थे, और आज भी हैं, जो भ्रष्ट नहीं हैं। अनेक अधिकारी ऐसे हैं जो भ्रष्ट नहीं हैं और उन्हें भ्रष्टाचार की जो मौज भरी ज़िंदगी है, उससे मोह भी नहीं रखते है। तो क्या इन ईमानदार नेताओं, इन ईमानदार अधिकारियों, इन ईमानदार व्यापारियों या समाज के और दूसरे तबके के लोगों को इस बात के लिए सम्मानित नहीं किया जाना चाहिए।
बहुत से लोग ऐसे हैं जो नियमित टॅक्स देते हैं। सामान्य रूप से भारत में ये माना जाता है कि जो लोग भारत में नौकरी कर रहे हैं, उनका टॅक्स सीधा का सीधा दिया जाता है क्योंकि नौकरी की आमदनी एक नम्बर की आमदनी होती है। सीधे के सीधे टॅक्स उसमें से कट जाता है वे लोग तो बहुत सारा टॅक्स दे रहे हैं लेकिन जो और व्यापार कर रहे हैं या दूसरे तरीके से धर्नाजन कर रहे हैं, उनसे टॅक्स ले पाने का कोई बहुत प्रभावशाली तरीक़ा किसी सरकार ने अभी तक लागू नहीं किया है।
        तो फिर होना क्या चाहिए ? टॅक्स से सरकार चलती है और देश को चलाती है। कोई भी देश सुदृढ़ अर्थव्यवस्था से ही चल पाता है और इस अर्थव्यवस्था से ही यानी उसकी सुदृढ़ आर्थिक स्थिति से ही उसकी सारी व्यवस्थाऐं हो पाती हैं। किसी देश की रक्षा के लिए जितना आवश्यक उन देशवासियों का देशभक्त होना है, उतना ही आवश्यक है उस देश के पास अच्छी आर्थिक व्यवस्था, अच्छे अर्थ का इंतजाम होना और संसाधनों का सुदृढ़ और मजबूत होना। टॅक्स से ही सरकार धर्नाजन करती है।
        टॅक्स देने वाले, और टॅक्स चोरी करने वालों में फ़र्क़ किया जाना चाहिए। लेकिन क्या ? टॅक्स न देने वालों के लिए तमाम सरकारी योजनाएँ हैं, उनके यहाँ रेड की जाती है, उन पर जुर्माने किए जाते हैं। उनको जेल की सज़ा दी जाती है, लेकिन जो नियमित टॅक्स देते हैं, उनको सरकार क्या सुविधाएँ देती है? उनका क्या सम्मान होता है?
रेल, बस, हवाई जहाज़, सिनेमा, आदि की टिकिट खिड़की पर किसी टॅक्स भरने वाले को कोई सुविधा नहीं मिलती। गैस कनॅक्शन, ड्राइविंग लाइसेन्स, हथियार लाइसेन्स, स्कूल-कॉलेज दाख़िला, पासपोर्ट बनवाना, आदि में भी टॅक्स भरने वाले को कोई वरीयता नहीं मिलती। चुनाव में मतदान, संसद भवन का पास, किसी पर्यटन स्थल का टिकिट, आदि में भी कोई सुविधा नहीं। ज़रा सोचिए कि कोई आयकर देकर कौन सी विशेष सुविधा या सम्मान पा रहा है। यदि ऐसा किया जाय तो लोगों को आयकर देने में ज़्यादा अच्छा लगेगा। हमारे देश के प्रजातांत्रिक ढांचे को नुक़सान पहुंचाए, बिना सावधानी पूर्वक, इस तरह के नियम बनाए जा सकते हैं।
        अब ज़रा सरकारी कार्यालयों को देखें तो पता चलता है कि वहाँ, रिश्वत लेने-देने वालों को सज़ा दी जाती है लेकिन उसका क्या जो रिश्वत नहीं लेता ? ऐसे कर्मचारियों के लिए क्या पारितोषक है ? सामान्यत: यह माना जाता है कि योग्य और सामान्य कर्मचारियों में 80-20 का अनुपात होता है। अर्थात् 10 में से 8 कर्मचारी ऐसे होते हैं जो कम काम करते हैं और कम योग्य होते हैं। यह नियम सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में न्यूनाधिक, समान ही है। जो अधिक कर्मठ, क्रियाशील, रचनात्मक हैं उन्हें क्या विशेष सुविधा है ? कुछ भी नहीं...। एक समय के बाद सभी को प्रोन्नति मिल जाती है, चाहे उसने पूरा समय कार्यालय में मक्खी मारते ही बिताया हो...।
        पुलिस विभाग में जो अधिकारी और कर्मचारी पूरी तरह मुस्तैद हैं, स्वास्थ्य भी अच्छा रखते हैं और जनता से व्यवहार भी अच्छा रखते हैं उन्हें क्या विशेष लाभ दिया जाता है ? यदि उन्हें पुरस्कृत किया जाय, सम्मानित किया जाय, तो बात बन सकती है। मोटी-मोटी तोंद वाले दारोग़ा भी जब ये देखेंगे कि उनका स्वस्थ साथी उनसे अधिक तनख्वाह पा रहा है तो उनकी तोंद भी पिचकेगी...।

        प्रत्येक क्षेत्र में अब इस बात की ज़रूरत है कि ईमानदारी, कर्मठता, योग्यता, सत्यनिष्ठा जैसे गुणों को सम्मानित और पुरस्कृत किया जाय न कि बेईमानी, अकर्मण्यता, अयोग्यता, निष्ठाहीनता का रोना रोया जाय।

इस सप्ताह इतना ही... अगले सप्ताह कुछ और...
-आदित्य चौधरी
संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक


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