के. राधाकृष्णन  

के. राधाकृष्णन
के. राधाकृष्णन
जन्म 29 अगस्त, 1949
जन्म भूमि इरिन्जालाकुडा, केरल
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम
भाषा हिन्दी, अंग्रेज़ी
शिक्षा इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक (1970), पीजीडीएम (1976), डॉक्टरेट की उपाधि
विद्यालय केरल विश्वविद्यालय, आईआईएम, (बैंगलूर), आईआईटी, खड़गपुर
पुरस्कार-उपाधि 'रजत जयंती सम्मान' (2006),'भास्कर पुरस्कार' (2008), 'विक्रम साराभाई मेमोरियल अवार्ड' (2010) आदि।
प्रसिद्धि वैज्ञानिक तथा 'इसरो' के पूर्व अध्यक्ष
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी डॉ. राधाकृष्णन ने शिक्षा के क्षेत्र में भी कई प्रकार से योगदान दिया है। वे 55 से भी अधिक प्रकाशनों के लिए लेखक व सह-लेखक रहे हैं।

के. राधाकृष्णन (अंग्रेज़ी: K.Radhakrishnan, जन्म- 29 अगस्त, 1949, केरल) भारत के शीर्ष वैज्ञानिकों में से एक हैं। वे भारत सरकार के अंतरिक्ष आयोग के अध्यक्ष, अंतरिक्ष विभाग के सचिव और इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) के अध्यक्ष रह चुके हैं। एक तकनीकी-तंत्र विशेषज्ञ, उत्तम वैयक्तिक और अंतर-वैयक्तिक विशेषताओं से युक्त सक्रिय और परिणामोन्मुख प्रबंधक, महत्त्वपूर्ण दृष्टिकोण सहित विदग्ध संस्था-निर्माता, सकारात्मक रवैये सहित एक सक्षम प्रशासक और युवा पीढ़ी में नेतृत्व कौशल प्रदान करने के लिए के. राधाकृष्णन जाने जाते हैं। यह श्रेय पाने वाले वे प्रेरक नेता हैं। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, उपयोग और अंतरिक्ष कार्यक्रम प्रबंधन में 40 वर्षों से भी अधिक विस्तृत उनका लब्धप्रतिष्ठ कैरियर कई उपलब्धियों से सुसज्जित रहा है।

जन्म तथा शिक्षा

डॉ. के. राधाकृष्णन का जन्म 29 अगस्त, 1949 को इरिन्जालाकुडा, केरल में हुआ था। उन्होंने 1970 में केरल विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की था। आईआईएम, बैंगलूर में पीजीडीएम पूरा किया (1976) और आईआईटी, खड़गपुर से इन्होंने 'भारतीय भू-प्रेक्षण प्रणाली के लिए कुछ सामरिक नीतियाँ' शीर्षक वाले शोध प्रबंध पर डॉक्टरेट की उपाधि 2000 में प्राप्त की थी।

महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य

1971 में 'इसरो' के विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, तिरुवनंतपुरम में एक उड्डयनकी इंजीनियर के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत इन्होंने की थी। उन्होंने इसरो में प्रशंसनीय रूप से कई निर्णायक पदों पर कार्य किया, जैसे-

  1. प्रादेशिक सुदूर संवेदन केंद्रों की स्थापना के परियोजना निदेशक (1987-1989)
  2. संपूर्ण इसरो के बजट और आर्थिक विश्लेषण के निदेशक (1987-1997)
  3. राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन प्रणाली-प्रादेशिक सुदूर संवेदन सेवा केंद्र के निदेशक (1989-1997)
  4. दीर्घकालीन विकास के लिए समेकित मिशन के मिशन निदेशक तथा राष्ट्रीय सुदूर संवेदन एजेंसी के उप निदेशक (1997-2000)
  5. राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र के निदेशक (2005-2008)
  6. विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के निदेशक (2007-2009)
  7. समवर्ती उत्तरदायित्वों के साथ सदस्य, अंतरिक्ष आयोग (अक्तूबर, 2008-2009)।

2000-2005 के दौरान महासागर सूचना सेवाओं के लिए भारतीय राष्ट्रीय केंद्र के संस्थापक निदेशक और भारतीय राष्ट्रीय सुनामी चेतावनी प्रणाली के प्रथम परियोजना निदेशक के रूप में के. राधाकृष्णन ने एक निर्धारित कार्यकाल भू-विज्ञान मंत्रालय में बिताया। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई महत्त्वपूर्ण पदों पर भी कार्य किया, जिनमें शामिल हैं-

  1. अंतर-सरकारी समुद्र विज्ञान आयोग के उपाध्यक्ष (2001-2005)
  2. संस्थापक अध्यक्ष, हिंद महासागर वैश्विक महासागरीय प्रेक्षण प्रणाली (2001-2006)
  3. समग्र यूएन-सीओपीयूओएस एसटीएससी के कार्यकारी समूह के अध्यक्ष (2008-2009)

शिक्षावृत्ती तथा सदस्यताएँ

  1. फेलो, भारतीय इंजीनियरिंग राष्ट्रीय अकादमी
  2. सदस्य, अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्षयानिकी अकादमी
  3. फेलो, आंध्र प्रदेश विज्ञान अकादमी
  4. फेलो, भारतीय सुदूर संवेदन सोसायटी
  5. फेलो, भारतीय सिस्टम सोसायटी
  6. फेलो, भारतीय भू-भौतिकी संघ
  7. अध्यक्ष, भारतीय सुदूर संवेदन सोसायटी (2005-2007)
  8. उपाध्यक्ष, भारतीय भू-भौतिकी संघ (2007-2009)
  9. अध्यक्ष, वैज्ञानिक सलाहकार मंडल, बी.एम. बिरला विज्ञान केंद्र, हैदराबाद
  10. द इन्स्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स (इंडिया) के आजीवन सम्मानी सदस्य

धारित पद

1971 में विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र में उड्डयनकी इंजीनियर के रूप में अपने कैरियर की शुरूआत करते हुए के. राधाकृष्णन ने 'इसरो' तथा भू-विज्ञान मंत्रालय में निम्नलिखित निर्णायक पदों को प्रशंसनीय रूप से धारित किया-

  1. अध्यक्ष, अंतरिक्ष आयोग
  2. सचिव, अंतरिक्ष विभाग, भारत सरकार
  3. अध्यक्ष, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो)

सदस्य, अंतरिक्ष आयोग

  • 2007-2009

निदेशक, विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, तिरुवनंतपुरम

  • 2005-2008

निदेशक, राष्ट्रीय सुदूर संवेदन एजेंसी, हैदराबाद

  • 2000-2005

संस्थापक निदेशक, भारतीय राष्ट्रीय महासागर केंद्र सूचना सेवा (इनकॉइस)
भारतीय राष्ट्रीय सुनामी चेतावनी प्रणाली के प्रथम परियोजना निदेशक

  • 1997-2000

मिशन निदेशक, दीर्घकालीन विकास के लिए समेकित मिशन (आईएमएसडी)
उप निदेशक, राष्ट्रीय सुदूर संवेदन एजेंसी (एनआरएसए), हैदराबाद

  • 1989-1997

निदेशक, राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन
प्रणाली-प्रादेशिक सुदूर संवेदन सेवा केंद्र

  • 1987-1989

प्रादेशिक सुदूर संवेदन केंद्रों को स्थापित करने के लिए परियोजना निदेशक

  • 1987-97

निदेशक, संपूर्ण इसरो के लिए बजट और आर्थिक विश्लेषण

अंतर्राष्ट्रीय धारित पद

डॉ. के. राधाकृष्णन अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में सुविख्यात हैं। संस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्होंने नवम्बर, 2002 में हिंद महासागर में वैश्विक महासागरीय प्रेक्षण प्रणाली (आईओजीओओएस) के लिए प्रादेशिक संबंध स्थापित किया और 2002-2006 के दौरान विश्व में अनोखा जीओओएस प्रादेशिक गठबंधन निर्मित करने के लिए उसकी अगुआई की। 2001-2005 के दौरान अंतर्सरकारी समुद्र विज्ञान आयोग (आईओसी) के उपाध्यक्ष के रूप में उन्होंने 131 सदस्य राज्यों सहित समुद्र विज्ञान और सेवाओं पर यू.एन. प्रणाली के अधीन इस शीर्ष निकाय में अपनी छाप छोड़ी और वैश्विक महासागर प्रेक्षण प्रणाली के पुनर्गठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो कि आईओसी के नेतृत्व में सबसे बड़े और अधिक जटिल वैज्ञानिक और तकनीकी कार्यक्रम है। वे बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग पर संयुक्त राष्ट्र समिति के भारतीय प्रतिनिधि हैं और उसके एस एंड टी उप-समिति के समग्र कार्यकारी दल के अध्यक्ष भी हैं।

उपलब्धियाँ

देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रमुख के रूप में के. राधाकृष्णन निम्न पर ध्यान केन्द्रित कर अपनी अगुआई में इसरो के आख्यान को आगे बढ़ा रहे हैं-

  1. सामाजिक सेवा और राष्ट्रीय अनिवार्यताओं के लिए अंतरिक्ष उपयोग
  2. संचार, सुदूर संवेदन और नौवहन के लिए सहवर्ती अंतरिक्ष संपत्तियों का निर्माण और संवर्धन
  3. अंतरिक्ष परिवहन प्रणालियों के लिए स्वदेशी क्षमताओं की प्राप्ति
  4. अंतरिक्ष तक कम लागत पहुँच का विकास
  5. चंद्रयान-2 तथा भारतीय मानव अंतरिक्ष उड़ान पहल सहित अंतरिक्ष-विज्ञान अभियान और अंतराग्रहीय अन्वेषणों की जिम्मेदारी।

'इसरो' (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) की अगली पीढ़ी के प्रमोचन यान जीएसएलवी मार्क-III के विकास में उनके शासनाधीन, विश्व के तीसरे बड़े ठोस बूस्टर एस-200 मोटर और एल-110 द्रव कोर मोटर के सफल स्थिर परीक्षण के साथ उल्लेखनीय प्रगति प्राप्त की। जीएसएलवी-डी3 के स्वदेशी निम्न तापीय चरण के असफल उड़ान परीक्षण के बस तीन महीनों के अंदर पीएसएलवी सी-15 द्वारा कार्टोसैट-2बी और चार सह-यात्री उपग्रहों का सफल प्रमोचन, उनके नेतृत्व की समुत्थान-शक्ति और गहराई का गवाह है। उनकी अगुआई में जोखिम-साझेदार के रूप में भारतीय वांतरिक्ष उद्योग का विकास, अंतरिक्ष विज्ञान और प्रोद्योगिकी में सीमावर्ती अनुसंधान गतिविधियों के लिए शिक्षा संस्थानों को प्रोत्साहन, मानवी पूंजी विकास के लिए भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान की स्थापना को प्रोत्साहन मिला है।

निदेशक का पद

उन्होंने विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) के निदेशक के तौर पर प्रथम भारतीय चंद्र मिशन चंद्रयान-1 में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो स्ट्रैप-ऑनमोटरों के नए सेट और नई मिशन परिकल्पना के साथ प्रमोचन-यान पीएसएलवी सी-11 की प्राप्ति तथा चंद्र संघट्टप्रोब के लिए जिम्मेदार है, जो नवम्बर, 2008 के मध्य में चंद्रमा की सतह पर उतरा। उनके नेतृत्व में ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन यान पीएसएलवी के चार और सफल प्रमोचन तथा 20 उपग्रहों (कार्टोसैट-2ए, भारतीय लघु उपग्रह-1, रिसैट-2, ओशनसैट-2 तथा दो प्रमुख विदेशी वाणिज्यिक उपग्रह व 14 विदेशी नैनो-उपग्रह सहित) की ठीक वांछित कक्षाओं में स्थापना हासिल हुई। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर प्रयासों के ज़रिए प्रशंसात्मक रूप से भारतीय मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम को प्रतिपादित किया और अंतरिक्ष आयोग ने परियोजना रिपोर्ट को अनुमोदित किया तथा उच्च स्तरीय राष्ट्रीय समिति ने इसे पृष्ठांकित किया है।

डॉ. के. राधाकृष्णन ने सुदूर संवेदी भू-खंड, उपयोग और क्षमता निर्माण के लिए विश्व के प्रमुख संगठनों के बीच जगह बनाने के लिए राष्ट्रीय सुदूर संवेदन एजेंसी को आगे बढ़ाया। उन्होंने गृह मंत्रालय के निकट समन्वय के साथ आपदा-पूर्व, आपदा के दौरान और आपदा के बाद के चरणों में विभिन्न राज्य और केंद्रीय सरकारों को अंतरिक्ष आधारित निविष्टियाँ उपलब्ध कराने वाले एनआरसीए में 24/7आपदा सहायता केंद्र के सफल संस्थापन द्वारा एनआरसीए कोइसरो के आपदा प्रबंधन सहायता कार्यक्रम का प्रधान केंद्र बनाते हुए अगुआई की। उन्होंने एनआरएसए में भावी भू-प्रेक्षण उपग्रहों के लिए परिष्कृत बहु-मिशन भू-खंड की स्थापना हेतु दीर्घकालिक दृष्टिकोण और साथ ही, समर्पित वायुयान-आधारित आपदा निगरानी प्रणाली के साथ कई पहल तैयार किए। अपनी संस्था निर्माण की क्षमता के बलबूते पर उन्होंने 2008 में एनआरएसए का इसरो/डीओएस के अधीन सरकारी संस्था के रूप में संस्थागत पुनर्संरचना को कार्यान्वित किया।

नेतृत्व

90 दशक के उत्तरार्ध में सतत विकास के लिए एकीकृत अभियान (आईएमएसडी) के मिशन निदेशक के रूप में उन्होंने देश के लगभग 85 मिलियन हेक्टेर भूमि के सतत विकास और जल संसाधनों के लिए प्राकृतिक संसाधनों और कार्य योजनाओं के व्यापक स्थानिक डेटाबेस को जनित करने के लिए सभी राज्य सरकारों और इसरो/एनआरएसए से 35 परियोजना निदेशकों और 300 वैज्ञानिकों के प्रयासों की अगुआई की। आईएमएसडी, एक अद्वितीय और संभवतः विश्व में संचालित सबसे बड़ी सुदूर संवेदन उपयोग परियोजना है, जो माइक्रो स्तर पर भूमि और जल संसाधनों के समेकित स्थानिक आयोजना और मानीटरन के लिए आदर्श बन गई।

80 के दशक में राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन प्रणाली-प्रादेशिक सुदूर संवेदन सेवा केंद्र (एनएनआरएमएस-आरआरएसएससी) के निदेशक के रूप में, उन्होंने भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह (आईआरएस) के साथ राष्ट्रीय अनिवार्य आवश्यकताओं के समन्वयन द्वारा देश में एनएनआरएमएस की स्थापना और केंद्रीय और राज्य सरकारों तथा उद्योग में क्षमता निर्माण को सुविधाजनक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। ये आरआरएसएससी सुदूर संवेदन उपयोगों के लिए क्षेत्रीय केंद्रों के रूप में परिपक्व हुए हैं।

संस्थापक निदेशक

'भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र' (इनकोइस) के संस्थापक निदेशक के रूप में दो वर्षों के रिकॉर्ड समय में अवधारणा से लेकर फलीभूत होने तक 'भूमि-विज्ञान मंत्रालय' में विश्व स्तरीय एवं आदर्श वैज्ञानिक संस्था की स्थापना का श्रेय राधाकृष्णन को जाता है। दिसम्बर, 2004 में हिंद महासागर के सुनामी की आपदा के बाद उनके अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप इनकोइस में 'भारतीय राष्ट्रीय सुनामी चेतावनी केंद्र' के लिए राष्ट्रीय परियोजना और प्रणाली डिज़ाइन प्रतिपादित किया गया, जिसे बाद में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया।

1987-1997 के दौरान इसरो मुख्यालय में बजट और आर्थिक विश्लेषण के निदेशक के रूप में उन्होंने संपूर्ण इसरो/डीओएस के लिए वार्षिक बजट के सूत्रीकरण का सर्वेक्षण और साथ ही, 1990-2000 दशक प्रोफ़ाइल एवं आठवीं और नौंवी पंचवर्षीय योजनाओं के साथ कार्यक्रम तत्वों से जुड़े महत्त्वपूर्ण बजट तत्वों की पहचान का दायित्व भी सँभाला। उड्डयनकी सिस्टम इंजीनियर के रूप में उन्होंने जड़त्वीय संवेदकों के विकास और एसएलवी-3, एएसएलवी और पीएसएलवी के लिए उड्डयनकी प्रणालियों के कार्यान्वयन में योगदान दिया।

मंगलयान की सफलता

5 नवम्बर, 2013 को भारत ने अपने पहले मंगल ग्रह परिक्रमा अभियान (एमओएम) के लिए ध्रुवीय रॉकेट को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सफलतापूर्वक प्रक्षेपित करके इतिहास रच दिया। इस मंगल मिशन को कामयाबी के साथ अंजाम देकर इन्होंने भारतीय प्रतिष्ठा को मंगलमय कर दिया। यह महत्त्वाकांक्षी परियोजना न केवल देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम का एक बड़ा कदम है, बल्कि अंतरिक्ष पर प्रभुत्व की वैश्विक दौड़ में ऊँची छलांग है। इसका असर पूरी दुनिया में महसूस किया गया और यह भी साबित हो गया कि आर्यभट का भारत अब अंतरिक्ष का एशियाई अगुआ बनने को भी तैयार है। यह कहा जाता है कि मिसाइल मैन अब्दुल कलाम और मून मैन जी. माधवन नायर के बाद मार्स मैन बनने की राधाकृष्णन की महत्त्वाकांक्षा ही थी, जिस कारण भीतरी अंतरिक्ष अभियानों के लिए उपयुक्त समझे जाने वाले प्रक्षेपण यान जीएसएलवी के पूरी तरह तैयार न होने के बावजूद पीएसएलवी के जरिये इस मंगल मिशन को अंजाम दिया गया।[1]

विभिन्न दायित्वों का निर्वाह

इस अवधि में उन्होंने कई संयुक्त राष्ट्र के संविभागों का दायित्व सँभाला। 2001-2005 के दौरान, समुद्र-विज्ञान के शीर्ष संयुक्त राष्ट्र निकाय, अंतर-सरकारी समुद्रविज्ञान आयोग (आईओसी) के उपाध्यक्ष के रूप में, उन्होंने वैश्विक महासागर प्रेक्षण प्रणाली के पुनर्गठन में निर्णायक भूमिका निभाई, जोकिआईओसी की अगुआई में सबसे बड़ा और बहुत ही जटिल वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी कार्यक्रम है। संस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्होंने नवम्बर, 2002 में वैश्विक महासागर प्रेक्षण प्रणाली के लिए हिंद महासागर में प्रादेशिक गठबंधन स्थापित किया और 2002-2006 के दौरान उसका नेतृत्व किया, जो विश्व का श्रेष्ठ जीओओएस प्रादेशिक गठबंधन बना। वे अंतर्राष्ट्रीय आर्गोप्रोफ़ाइलिंग फ़्लोट परियोजना के लिए क्षेत्रीय समन्वयक (हिंद महासागर) थे और 2001-2005 के दौरान 8 देशों द्वारा 400 बेड़ों के प्रेक्षण व्यूह को क्रियान्वित किया। 2006 से वे बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग पर संयुक्त राष्ट्र समिति (यूएन-काप्यूस) के साथ भारतीय प्रतिनिधि-मंडल के सदस्य, भारतीय प्रतिनिधि-मंडल के नेता (2008-2009) और उसकी एसएंडटी उपसमिति के समग्र कार्यकारी दल के अध्यक्ष रूप में निकट से जुड़े हैं। 2007 में उन्होंने 58वें अंतर्राष्ट्रीय खगोल विज्ञानीय सम्मलेन के स्थानीय संगठन के लिए संचालन समिति के अध्यक्ष के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

शिक्षा क्षेत्र में योगदान

डॉ. राधाकृष्णन ने शिक्षा के क्षेत्र में कई प्रकार से योगदान दिया है। वे 55 से अधिक प्रकाशनों के लिए लेखक/सह-लेखक रहे हैं, जिनमें स्पेस फ़ोरम, करेंटसाइन्स, जर्नल ऑफ़ एयरोस्पेस साइन्सस एंड टेक्नॉलोजीस, एक्टाएस्ट्रोनॉटिका, जर्नल ऑफ़ जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ़ इंडिया, जर्नल ऑफ़ रूरल टेक्नॉलोजी आदि सहित 12 मानक संदर्भित पत्रिकाएँ शामिल हैं। उन्होंने इंडियन इन्स्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट, बैंगलूर के 35वें दीक्षांत अभिभाषण (2010), इंडियन स्टैटिस्टिकल इन्स्टिट्यूट कलकत्ता में प्रौद्योगिकी सेमिनार"स्टैटिस्टिक्स डे ऑफ़ इंडिया" (2010), आईआईएससी एलम्नी एसोसिएशन में प्रथम आमंत्रित भाषण (2010), इंटरनेशनल इन्स्टिट्यूट ऑफ़ इन्फ़र्मेशन टेक्नॉलोजी, हैदराबाद में 9वां दीक्षांत अभिभाषण (2010), इंडियन एयरोस्पेस सोसाइटी में सुब्रतोमुखर्जी स्मारक व्याख्यान (2008), और एयरोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ़ इंडिया का एआरडीबी प्रोफ़ेसर सतीश धवन स्मारक भाषण (2007) सहित कई प्रतिष्ठित व्याख्यान/पुरस्कार भाषण भी दिए हैं।

पुरस्कार और सम्मान

  1. डॉ. राधाकृष्णन आईआईटी, खड़गपुर (2010) और आईआईएम, बैंगलूर (2010) के "विशिष्ट पूर्व छात्र पुरस्कार"
  2. भारतीय विज्ञान कांग्रेस के विक्रम साराभाई मेमोरियल अवार्ड (2010)
  3. पझसिराजा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा अति विशिष्ट राजकीय पुरस्कार - "शास्त्र रत्न" (2010)
  4. अंतर्राष्ट्रीय अन्तरिक्षयानिकी अकादमी का सामाजिक विज्ञान पुरस्कार (2009)
  5. आंध्र प्रदेश विज्ञान अकादमी का डॉ. वाई. नायुडम्मा मेमोरियल पुरस्कार (2009)
  6. भारतीय सुदूर संवेदन सोसाइटी का भास्कर पुरस्कार (2008)
  7. भू-विज्ञान मंत्रालय द्वारा रजत जयंती सम्मान (2006)
  8. इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वासविक औद्योगिक अनुसंधान पुरस्कार (2005)
  9. भारतीय भू-भौतिकी संघ का के. आर. रामनाथन स्मारक स्वर्ण पदक (2003) सहित कई पुरस्कार

डॉ. राधाकृष्णन को श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय, तिरुपति, राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय, कोटा; जीआईटीएएम विश्वविद्यालय, विशाखापट्टनम, तुमकूर विश्वविद्यालय और एस.आर.एम. विश्वविद्यालय चेन्नई से 2010 में मानद डॉक्टरेट से सम्मानित किया गया है। केआईआईटी विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर ने उन्हें दिसम्बर, 2010 में मानद डाक्टरेट उपाधि प्रदान करने के लिए आमंत्रित किया।

सदस्य

के. राधाकृष्णन 'भारतीय राष्ट्रीय इंजीनियरिंग अकादमी' (एफएनएई) के मानद सदस्य; 'इंस्टीटयूट ऑफ़ इंजीनियर्स' के आजीवन मानद सदस्य; 'द इंस्टीटयूट ऑफ़ इलेक्ट्रिकल एंड टेलीकम्यूनिकेशन इंजीनियर्स', भारत के मानद सदस्य; 'अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्षयानिकी अकादमी' के सदस्य; 'आन्ध्र प्रदेश विज्ञान अकादमी' के मानद सदस्य, 'भारतीय सुदूर संवेदन सोसाइटी' के मानद सदस्य; 'भारतीय भू-भौतिकी संघ' के मानद सदस्य हैं। वे 2007-2009 के दौरान 'भारतीय सुदूर संवेदन सोसाइटी' के अध्यक्ष थे और 2007-2009 के दौरान 'भारतीय भू-भौतिकी संघ' के उपाध्यक्ष थे।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. आभार- दैनिक जागरण 'झंकार', दिनांक 22 दिसम्बर 2013

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