मुग़ल वंश  

मुग़ल राजवंश, जिसे भारत में बाबर ने आरम्भ किया था, जिसने 1526 ई. में लोदी वंश के अन्तिम सुल्तान इब्राहीम लोदी को पानीपत के प्रथम युद्ध में पराजित किया। इस विजय से बाबर का दिल्ली और आगरा पर अधिकार हो गया। 1527 ई. में बाबर ने मेवाड़ के शासक राणा साँगा को खनुआ के युद्ध में पराजित कर राजपूतों के प्रतिरोध का भी अन्त कर दिया। अन्तत: 1528 ई. में उसने घाघरा के युद्ध में अफ़ग़ानों को भी पराजित कर अपना शासन बंगाल और बिहार तक विस्तृत कर लिया। इन विजयों ने बाबर को उत्तरी भारत का सम्राट बना दिया। उसके द्वारा प्रचलित मुग़ल राजवंश ने भारत में 1526 ई. से 1858 ई. तक राज्य किया। मुग़ल राजवंश में जो राजा हुए, उनका विवरण इस प्रकार से है-

बाबर

मुग़ल वंश के शासक
शासक शासन काल
बाबर 1526 - 1530 ई. (4 वर्ष)
हुमायूँ 1530 - 1540 ई. और 1555 - 1556 ई.

(लगभग 11 वर्ष)

अकबर 1556 - 1605 ई. (49 वर्ष)
जहाँगीर 1605 - 1627 ई. (22 वर्ष)
शाहजहाँ 1627 - 1658 ई. (31 वर्ष)
औरंगज़ेब 1658 - 1707 ई. (49 वर्ष)
बहादुरशाह प्रथम 1707 - 1712 ई. (5 वर्ष)
जहाँदारशाह 1712 - 1713 ई. (1 वर्ष)
फ़र्रुख़सियर 1713 - 1719 ई. (6 वर्ष)
रफ़ीउद्दाराजात फ़रवरी 1719 से जून 1719 ई. (4 महीने)
रफ़ीउद्दौला जून 1719 से सितम्बर, 1719 ई. (4 महीने)
नेकसियर 1719 ई. (कुछ दिन)
मुहम्मद इब्राहीम 1719 ई. (कुछ दिन)
मुहम्मदशाह रौशन अख़्तर 1719 - 1748 ई. (29 वर्ष)
अहमदशाह 1748 - 1754 ई. (6 वर्ष)
आलमगीर द्वितीय 1754 - 1759 ई. (5 वर्ष)
शाहआलम द्वितीय 1759 - 1806 ई. (47 वर्ष)
अकबर द्वितीय 1806 - 1837 ई. (31 वर्ष)
बहादुरशाह द्वितीय 1837 - 1858 ई. (21 वर्ष)

14 फ़रवरी, 1483 ई. को फ़रग़ना में 'ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर' का जन्म हुआ। बाबर अपने पिता की ओर से तैमूर का पाँचवा एवं माता की ओर से चंगेज़ ख़ाँ (मंगोल नेता) का चौदहवाँ वंशज था। उसका परिवार तुर्की जाति के 'चग़ताई वंश' के अन्तर्गत आता था। बाबर अपने पिता 'उमर शेख़ मिर्ज़ा' की मृत्यु के बाद 11 वर्ष की आयु में शासक बना। उसने अपना राज्याभिषेक अपनी दादी ‘ऐसान दौलत बेगम’ के सहयोग से करवाया। बाबर ने अपने फ़रग़ना के शासन काल में 1501 ई. में समरकन्द पर अधिकार किया, जो मात्र आठ महीने तक ही उसके क़ब्ज़े में रहा। 1504 ई. में क़ाबुल विजय के उपरांत बाबर ने अपने पूर्वजों द्वारा धारण की गई उपाधि ‘मिर्ज़ा’ का त्याग कर नई उपाधि ‘पादशाह’ धारण की।

हुमायूँ

26 दिसम्बर, 1530 ई. को बाबर की मृत्यु के बाद 30 दिसम्बर, 1530 ई. को 23 वर्ष की आयु में हुमायूँ का राज्याभिषेक किया गया। बाबर ने अपनी मृत्यु से पूर्व ही हुमायूँ को गद्दी का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। हुमायूँ को उत्तराधिकार देने के साथ ही साथ बाबर ने विस्तृत साम्राज्य को अपने भाईयों में बाँटने का निर्देश भी दिया था, अतः उसने असकरी को सम्भल, हिन्दाल को मेवात तथा कामरान को पंजाब की सूबेदारी प्रदान की थी। साम्राज्य का इस तरह से किया गया विभाजन हुमायूँ की भयंकर भूलों में से एक था, जिसके कारण उसे अनेक आन्तरिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और कालान्तर में हुमायूँ के भाइयों ने उसका साथ नहीं दिया। वास्तव में अविवेकपूर्णढंग से किया गया साम्राज्य का यह विभाजन, कालान्तर में हुमायूँ के लिए घातक सिद्ध हुआ। यद्यपि उसके सबसे प्रबल शत्रु अफ़ग़ान थे।, किन्तु भाइयों का असहयोग और हुमायूँ की कुछ व्यैक्तिक कमज़ोरियाँ उसकी असफलता का कारण सिद्ध हुईं।

अकबर

हुमायूँ मुश्किल से नौ वर्ष ही शासन कर पाया था कि, 26 जून, 1539 को गंगा किनारे 'चौसा' (शाहबाद ज़िले) में उसे शेरख़ाँ (शेरशाह) के हाथों करारी हार खानी पड़ी। चौसा अपने ऐतिहासिक युद्ध के लिए आज उतना प्रसिद्ध नहीं है, जितना अपने स्वादिष्ट आमों के लिए। चौसा की हार के बाद कन्नौज में हुमायूँ ने फिर भाग्य-परीक्षा की, लेकिन शेरशाह ने 17 मई, 1740 को अपने से कई गुना अधिक सेना को हरा दिया। हुमायूँ इस बार पश्चिम की ओर भागा। कितने ही समय तक वह राजस्थान के रेगिस्तानों में भटकता रहा, पर कहीं से भी उसे कोई सहायता प्राप्त नहीं हुई। इसी भटकते हुए जीवन में उसका परिचय हमीदा बानो बेगम से हुआ। बानू का पिता शेख़ अली अकबर जामी मीर बाबा दोस्त हुमायूँ के छोटे भाई हिन्दाल का गुरु था। हमीदा की सगाई हो चुकी थी, लेकिन चाहे बेतख्त का ही हो, आखिर हुमायूँ बादशाह था। सिंध में पात के मुकाम पर 1541 ई. के अन्त या 1452 ई. के प्रारम्भ में 14 वर्ष की हमीदा का विवाह हुमायूँ से हो गया। अपने पिछले जीवन में यही हमीदा बानू 'मरियम मकानी' के नाम से प्रसिद्ध हुई और अपने बेटे से एक ही साल पहले (29 अगस्त, 1604 ई. में) मरी। उस समय क्या पता था कि, हुमायूँ का भाग्य पलटा खायेगा और हमीदा की कोख से अकबर जैसा एक अद्वितीय पुत्र पैदा होगा।

जहाँगीर

सम्राट जहाँगीर का व्यक्तित्व बड़ा आकर्षक था; किंतु उसका चरित्र बुरी−भली आदतों का अद्भुत मिश्रण था। अपने बचपन में कुसंग के कारण वह अनेक बुराईयों के वशीभूत हो गया था। उनमें कामुकता और मदिरा−पान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। गद्दी पर बैठते ही उसने अपनी अनेक बुरी आदतों को छोड़कर अपने को बहुत कुछ सुधार लिया था; किंतु मदिरा−पान को वह अंत समय तक भी नहीं छोड़ सका था। अतिशय मद्य−सेवन के कारण उसके चरित्र की अनेक अच्छाईयाँ दब गई थीं। मदिरा−पान के संबंध में जहाँगीर ने स्वयं अपने आत्मचरित में लिखा है−'हमने सोलह वर्ष की आयु से मदिरा पीना आरंभ कर दिया था। प्रतिदिन बीस प्याला तथा कभी−कभी इससे भी अधिक पीते थे। इस कारण हमारी ऐसी अवस्था हो गई कि, यदि एक घड़ी भी न पीते तो हाथ काँपने लगते तथा बैठने की शक्ति नहीं रह जाती थी। हमने निरूपाय होकर इसे कम करना आरंभ कर दिया और छह महीने के समय में बीस प्याले से पाँच प्याले तक पहुँचा दिया।

शाहजहाँ

शाहजहाँ का विवाह 20 वर्ष की आयु में नूरजहाँ के भाई आसफ़ ख़ाँ की पुत्री 'आरज़ुमन्द बानो' से सन् 1611 में हुआ था। वही बाद में 'मुमताज़ महल' के नाम से उसकी प्रियतमा बेगम हुई। 20 वर्ष की आयु में ही शाहजहाँ, जहाँगीर शासन का एक शक्तिशाली स्तंभ समझा जाता था। फिर उस विवाह से उसकी शक्ति और भी बढ़ गई थी। नूरजहाँ, आसफ़ ख़ाँ और उनका पिता मिर्ज़ा गियासबेग़ जो जहाँगीर शासन के कर्त्ता-धर्त्ता थे, शाहजहाँ के विश्वसनीय समर्थक हो गये थे। शाहजहाँ के शासन−काल में मुग़ल साम्राज्य की समृद्धि, शान−शौक़त और ख्याति चरम सीमा पर थी। उसके दरबार में देश−विदेश के अनेक प्रतिष्ठित व्यक्ति आते थे। वे शाहजहाँ के वैभव और ठाट−बाट को देख कर चकित रह जाते थे। उसके शासन का अधिकांश समय सुख−शांति से बीता था; उसके राज्य में ख़ुशहाली रही थी। उसके शासन की सब से बड़ी देन उसके द्वारा निर्मित सुंदर, विशाल और भव्य भवन हैं। उसके राजकोष में अपार धन था। सम्राट शाहजहाँ को सब सुविधाएँ प्राप्त थीं।

औरंगज़ेब

सिंहासन पर बैठने के उपरान्त औरंगज़ेब ने बीजापुर के शासक अली आदिलशाह द्वितीय को 1657 ई. की संधि का पालन न करने के कारण दण्ड देने के लिए जयपुर के राजा जयसिंह को 1665 ई. में दक्षिण भेजा। जयसिंह ने बीजापुर के पूर्व शिवाजी के ख़िलाफ़ महत्त्वपूर्ण लड़ाई में सफलता प्राप्त कर 1665 ई. में ‘पुरन्दर की सन्धि’ की। पुरन्दर के बाद जयसिंह ने शिवाजी के सहयोग से बीजापुर पर नवम्बर, 1665 ई. में आक्रमण किया। प्रारम्भिक सफलता से उत्साहित होकर जयसिंह ने कई ग़लत निर्णय लिये, जिस कारण वह बीजापुर पर अधिकार करने में असफल रहा। औरंगज़ेब ने नाराज़ होकर जयसिंह को 1666 ई. में वापस आने का आदेश दिया। रास्ते में ‘बुरहानपुर’ की समीप 11 जुलाई, 1666 ई. को जयसिंह की मृत्यु हो गई। दिसम्बर, 1672 ई. में आदिलशाह की मृत्यु के बाद उसका अल्पव्यस्क पुत्र सिकन्दर आदिलशाह बीजापुर का सम्राट बना। उसके समय में बीजापुर में दो गुट-एक खवास ख़ाँ के नेतृत्व में एवं दूसरा बहलोल ख़ाँ के नेतृत्व में सक्रिय था। दोनों गुटों के आन्तरिक मतभेदों का फ़ायदा उठाकर मुग़ल सूबेदार बहादुर ख़ाँ ने 1676 ई. में बीजापुर पर आक्रमण किया, परन्तु अभियान असफल रहा। 1679 ई. में दिलेर ख़ाँ को दक्कन का सूबेदार बना कर बीजापुर को जीतने का अधिकार सौंपा गया।

बहादुरशाह प्रथम

बहादुर शाह प्रथम का जन्म 14 अक्तूबर, सन् 1643 ई. में बुरहानपुर, भारत में हुआ था। बहादुर शाह प्रथम दिल्ली का सातवाँ मुग़ल बादशाह (1707-1712 ई.) था। 'शहज़ादा मुअज्ज़म' कहलाने वाले बहादुरशाह, बादशाह औरंगज़ेब के दूसरे पुत्र थे। अपने पिता के भाई और प्रतिद्वंद्वी शाहशुजा के साथ बड़े भाई के मिल जाने के बाद शहज़ादा मुअज्ज़म ही औरंगज़ेब के संभावी उत्तराधिकारी थे। बहादुर शाह प्रथम को 'शाहआलम प्रथम' या 'आलमशाह प्रथम' के नाम से भी जाना जाता है। बादशाह बहादुर शाह प्रथम के चार पुत्र थे- जहाँदारशाह, अजीमुश्शान, रफ़ीउश्शान और जहानशाह

जहाँदारशाह

प्रमुख मुग़ल शासकों के मक़बरे का स्थान
शासक मक़बरा
बाबर काबुल
हुमायूँ दिल्ली
अकबर सिकन्दरा, आगरा
जहाँगीर शाहदरा, लाहौर
शाहजहाँ आगरा
औरंगज़ेब दौलताबाद

जहाँदारशाह के शासनकाल में प्रशासन की पूरी बागडोर ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ के हाथों में थी। दरबार में अपनी स्थिति मज़बूत बनाने तथा साम्राज्य को बचाने के लिए यह आवश्यक था कि, राजपूत राजाओं तथा मराठों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किया जाय। इसलिए जहाँदारशाह ने राजपूतों की तरफ़ मैत्रीपूर्ण क़दम बढ़ाते हुये, आमेर के जयसिंह को मालवा का सूबेदार नियुक्त किया, तथा 'मिर्जा राजा' की पदवी दी। मारवाड़ के अजीत सिंह को 'महाराजा'की पदवी दी और गुजरात का शासक नियुक्त किया। उसने जजिया कर को भी समाप्त कर दिया। ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ ने चूड़ामन जाट तथा छत्रसाल बुन्देला के साथ भी मेल-मिलाप किया तथा केवल बन्दा बहादुर के विरुद्ध दमन की नीति को जारी रखा।

फ़र्रुख़सियर

सैयद बन्धु अब्दुल्ला ख़ाँ और हुसैन अली ख़ाँ की मदद से फ़र्रुख़सियर 11 जनवरी, 1713 को मुग़ल राजसिंहासन पर बैठा। फ़र्रुख़सियर मुग़ल वंश के अजीमुश्शान का पुत्र था। उसने अब्दुल्ला ख़ाँ को वज़ीर का पद एवं 'कुतुबुलमुल्क' की उपाधि तथा हुसैन अली ख़ाँ को 'अमीर-उल-उमरा' तथा 'मीर बख़्शी' का पद दिया। सिंहासन पर बैठने के बाद फ़र्रुख़सियर ने ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ की हत्या करवा दी और साथ ही उसके पिता असद ख़ाँ को क़ैद कर लिया। इसके काल में मुग़ल सेना ने 17 दिसम्बर, 1715 को सिक्ख नेता बन्दा सिंह को उसके 740 समर्थकों के साथ बन्दी बना लिया।

रफ़ीउद्दाराजात

रफ़ीउद्दाराजात बहुत ही अल्प समय (28 फ़रवरी से 4 जून, 1719 ई.) तक ही शासन कर सका। सैय्यद बन्धुओं ने फ़र्रुख़सियर के विरुद्ध षड़यन्त्र रचकर 28 अप्रैल, 1719 को गला घोंट कर उसकी हत्या कर दी। मुग़ल साम्राज्य के इतिहास में किसी अमीर द्वारा किसी मुग़ल बादशाह की हत्या का यह पहला उदाहरण था।

रफ़ीउद्दौला

रफ़ीउद्दौला ने 6 जून से 17 सितम्बर, 1719 ई. तक ही शासन किया था। रफ़ीउद्दाराजात की मृत्यु के बाद सैय्यद बन्धुओं ने रफ़ीउद्दौला को दिल्ली में मुग़ल वंश की गद्दी पर बैठाया। यह ग्यारहवाँ मुग़ल बादशाह था। गद्दी पर बैठने के बाद इसने 'शाहजहाँ शानी', 'शाहजहाँ द्वितीय' की उपाधियाँ धारण की थीं।

नेकसियर

नेकसियर औरंगज़ेब का पौत्र और अकबर द्वितीय का पुत्र था। वह उन पाँच कठपुतली बादशाहों में से तीसरा था, जिन्हें सैयद बन्धुओं ने सिंहासनासीन किया था। सैयद बन्धुओं ने उसे 1719 ई. में दिल्ली में मुग़ल गद्दी का अधिकारी बनाया था। वह केवल थोड़े दिनों के लिए ही बादशाह बन पाया।

मुहम्मद इब्राहीम

मुहम्मद इब्राहीम मुग़ल वंश का 13वाँ बादशाह था। यह बहादुरशाह प्रथम (1707 - 1712 ई.) के तीसरे पुत्र रफ़ीउश्शान का पुत्र था। सैयद बन्धुओं ने जिन चार नाममात्र के मुग़ल बादशाहों को गद्दी पर बैठाया था, यह उनमें से एक था। इसे भी कुछ समय बाद ही सैयद बन्धुओं ने गद्दी से उतार दिया, और धोखे से मरवा दिया।

मुहम्मदशाह रौशन अख़्तर

मुहम्मदशाह रौशन अख़्तर ने लम्बे समय 1719 से 1748 ई. तक मुग़ल साम्राज्य पर शासन किया। रफ़ीउद्दौला की मृत्यु के बाद सैय्यद बन्धुओं ने मुहम्मदशाह रौशन अख़्तर को गद्दी पर बैठाया। वह जहानशाह का चौथा बेटा था। इसके काल में बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में मुर्शिद कुली ख़ाँ, अवध में सआदत ख़ाँ तथा दक्कन में निजामुलमुल्क ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली। इसके अतिरिक्त इसके काल में गंगा तथा दोआब क्षेत्र में रोहिला सरदारों ने भी अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली थी। मुहम्मदशाह एक अयोग्य शासक था। वह अपना अधिकांश समय पशुओं की लड़ाई देखने तथा वेश्याओं और मदिरा के बीच गुजारता था।

अहमदशाह

बादशाह अहमदशाह ने मुग़ल साम्राज्य पर 1748 से 1754 ई. तक शासन किया था। अहमदशाह का जन्म एक नर्तकी के गर्भ से हुआ था। मुहम्मदशाह रौशन अख़्तर की मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी के रूप में अहमदशाह गद्दी पर बैठा। उसने अवध के सूबेदार 'सफ़दरजंग' को अपना वज़ीर या प्रधानमंत्री नियुक्त किया। राज्य का कामकाज 'हिजड़ों' तथा 'औरतों' के एक गिरोह के हाथों था, जिसकी मुखिया 'राजमाता उधमबाई' थीं, जो मुहम्मदशाह के साथ विवाह करने से पहले लोगों के सामने नाचने-गाने वाली एक लड़की थी।

आलमगीर द्वितीय

आलमगीर द्वितीय के शासन काल में साम्राज्य की सैनिक और वित्तीय स्थिति पूर्णतः अस्त-व्यस्त हो चुकी थी। भूख से मरते सैनिकों के दंगे और उपद्रव आलमगीर द्वितीय के शासन काल में दिन-प्रतिदिन की घटना थी। वज़ीर ग़ाज़ीउद्दीन की मनमानी से भी आलमगीर अपने को मुक्त करना चाहता था। जब उसने ग़ाज़ीउद्दीन के नियंत्रण से अपने को मुक्त करने का प्रयास किया, तो 1759 ई. में वज़ीर ने उसकी भी हत्या करवा दी। उसकी लाश को लाल क़िले के पीछे यमुना नदी में फेंक दिया गया।

शाहआलम द्वितीय

शाहआलम द्वितीय ने अपने तख़्त के लिए अब्दाली को सबसे ज़्यादा ख़तरनाक समझा। इसलिए उसने अब्दाली के पंजे से बचने के लिए मराठों को अपना संरक्षक बना लिया। लेकिन 1761 ई. में पानीपत की तीसरी लड़ाई में अब्दाली ने मराठों को हरा दिया। उसने शाहआलम द्वितीय को दिल्ली के तख़्त पर बने रहने दिया। यद्यपि बाद में उसकी इच्छा हुई कि वह उसे हटाकर स्वयं दिल्ली का तख़्त हस्तगत कर ले, तथापि उसकी यह योजना पूरी नहीं हुई। किन्तु, अब्दाली की इस विफलता से बादशाह शाहआलम द्वितीय को कोई लाभ प्राप्त नहीं पहुँचा। 1764 ई. में उसने अपनी शक्ति बढ़ाने का दूसरा प्रयास किया और बंगाल से अंग्रेज़ों को निकाल बाहर करने के लिए अवध के नवाब शुजाउद्दौला और बंगाल के भगोड़े नवाब मीर क़ासिम से सन्धि कर ली, परन्तु अंग्रेज़ों ने बक्सर की लड़ाई (1764 ई.) में शाही सेना को हरा दिया और बादशाह शाहआलम द्वितीय ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से इलाहाबाद की सन्धि कर ली।

अकबर द्वितीय

कबर द्वितीय मुग़ल वंश का 18वाँ बादशाह था। वह शाहआलम द्वितीय का पुत्र था और उसने 1806-37 ई. तक राज किया। उसके समय तक भारत का अधिकांश राज अंग्रेज़ों के हाथों में चला गया था और 1803 ई. में दिल्ली पर भी उनका क़ब्ज़ा हो गया। बादशाह शाहआलम द्वितीय (1769-1806 ई.) अपने जीवन के अन्तिम दिनों में ईस्ट इंडिया कम्पनी की पेंशन पर जीवन यापन करता था। उसका पुत्र बादशाह अकबर द्वितीय ईस्ट इंडिया कम्पनी की कृपा के सहारे नाम मात्र का ही बादशाह था।

बहादुरशाह द्वितीय

बहादुरशाह द्वितीय, अकबर द्वितीय और लालबाई के दूसरे पुत्र थे। अपने शासनकाल के अधिकांश समय उनके पास वास्तविक सत्ता नहीं रही और वह अंग्रेज़ों पर आश्रित रहे। 1857 ई. में स्वतंत्रता संग्राम शुरू होने के समय बहादुरशाह द्वितीय 82 वर्ष के बूढे थे, और स्वयं निर्णय लेने की क्षमता को खो चुके थे। विद्रोहियों ने उनको आज़ाद हिन्दुस्तान का बादशाह बनाया। इस कारण अंग्रेज़ उनसे कुपित हो गये और उन्होंने उनसे शत्रुवत् व्यवहार किया। सितम्बर 1857 ई. में अंग्रेज़ों ने दुबारा दिल्ली पर क़ब्ज़ा जमा लिया और बहादुरशाह द्वितीय को गिरफ़्तार करके उन पर मुक़दमा चलाया गया तथा उन्हें रंगून (अब यांगून) निर्वासित कर दिया गया।

मुग़ल साम्राज्य के पतन के कारण

मुग़ल साम्राज्य, जिसने अपनी विशेषताओं से सम्पूर्ण मध्ययुगीन भारत को प्रभावित किया, उसका पतन न तो अचानक हुआ और न ही किसी एक कारक ने इसके पतन में अपनी भूमिका निभायी। मुग़ल साम्राज्य के पतन के लिए ज़िम्मेदार महत्त्वपूर्ण कारण इस प्रकार हैं-

  1. मुग़ल साम्राज्य का पतन औरंगज़ेब के व्यक्तित्व एवं कार्य नीतियों के कारण हुआ। इसके अन्तर्गत उसकी धार्मिक नीति, दक्कन नीति एवं राजपूत नीति का महत्त्वपूर्ण योगदान है।
  2. अयोग्य उत्तराधिकारियों ने भी मुग़लों के पतन में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। इसकी महत्त्वपूर्ण कड़ी में बहादुरशाह प्रथम, जहाँदारशाह से लेकर बहादुरशाह ज़फ़र तक शामिल हैं।
  3. मुग़लकालीन कुलीन वर्ग अपनी योग्यताओं के अभाव के कारण एक बड़े साम्राज्य पर से अपना प्रभाव खोता जा रहा था। इनकी युद्ध के प्रति घृणा व राजा को ग़लत सलाह, निरन्तर चापलूसी से ग्रस्त रहना आदि कारकों ने उसके पतन में भूमिका निभायी।
  4. दरबार में व्याप्त गुटबन्दी ने भी मुग़ल शासन के पतन में भूमिका निभायी। सैयद बन्धु, ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ व निज़ामुलमुल्क, ग़ाज़ीउद्दीन फ़िरोज़ जंग जैसे लोग पतन के महत्त्वपूर्ण अभिनेता के रूप में सामने आये।
  5. मुग़ल काल के दौरान उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम नहीं था। औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद तो यह लगभग विस्मृति के गर्त में चला गया। 1748 - 1749 ई. के बीच निर्ममतापूर्वक एक ही वर्ष में क़रीब 4 बादशाहों का कत्ल कर दिया गया।
  6. दक्कन के शिवाजी का जननायक के रूप में उभरना भी मुग़ल साम्राज्य के पतन का एक कारण बना।
  7. मुग़ल साम्राज्य में महत्त्वपूर्ण भूमिका के निर्वाह के बाद भी मनसबदारी व्यवस्था दोषमुक्त न रही। मुग़ल साम्राज्य के पतन में इसका भी योगदान रहा।
  8. औरंगज़ेब की दक्कन नीति की असफलता के कारण हुए निरन्तर युद्धों ने मुग़ल साम्राज्य को आन्तरिक रूप से खोखला कर दिया। आर्थिक कमज़ोरी भी पतन का एक कारण थी।
  9. नादिरशाह एवं अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणों ने तो जैसे मुग़ल साम्राज्य के ताबूत में अंतिम कील ठोकने का कार्य किया।
  10. मुग़ल साम्राज्य की विशालता के साथ ही औरंगज़ेब के बाद कुशल शासकों का अभाव भी पतन का एक कारण बना।
  11. मुग़ल काल के दौरान यूरोपीय कम्पनियों जैसे अंग्रेज़, डेन, डच, फ्राँसीसी आदि का प्रवेश भारत में हो चुका था। अन्ततः अंग्रेजों ने भारत में सर्वोच्चता स्थापित करते हुए मुग़ल सम्राट को अन्तिम रूप से भारत से बाहर खदेड़ दिया।


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