इथिओपिया  

इथिओपिया उत्तरपूर्व अफ्रीका का एक स्वतंत्र साम्राज्य है जो अराजकीय स्तर पर अबिसीनिया कहलाता है। स्थिति : 5° उ.अ. से 15° उ.अ.; 35° पू.दे. से 42° पू.दे.; क्षेत्रफल : 3,95,800 वर्गमील;। यह टिग्रे, अम्हारा, गोज्जम, गोंडार, शोआ तथा अन्य स्वतंत्र राज्यों के संयोग से बना है। सन्‌ 1952 ई. में, जब इरिट्रिया राज्य अबिसीनिया का एक स्वायत्त (ऑटोनोमस) प्रांत बन गया, इस साम्राज्य की सीमा पूर्व में लाल सागर तक बढ़ गई। इसके पश्चिम में सूडान, उ.पू. में सोमालीलैंड, द.प. में यूगांडा तथा द. में केनिआ आदि राज्य स्थित हैं। सन्‌ 1935 ई. में इटली ने अबिसीनिया पर आक्रमण कर इसे अंशत: अधीन कर लिया, किंतु सन्‌ 1941 ई. में अंग्रेज सैनिकों की सहायता से पुन: स्वतंत्र हो गया। अदिस आबाबा इसकी राजधानी है, तथा अस्मारा (1,78,537), हरार (42,771), देसी (40,619), दीरे दावा (50,733) आदि अन्य मुख्य नगर हैं।

अबिसीनिया एक विशाल पठारी क्षेत्र है जो अनेक स्थलों पर 13,000 फुट से भी अधिक ऊँचा है। रास दसहन इसका सर्वोच्च शिखर है, जिसकी ऊँचाई 15,153 फुट है। इसके प्राकृतिक निर्माण का संबंध 'ग्रेट रिफ्ट घाटी' तथा उससे उद्गारित लावा से है। ग्रेट रिफ्ट घाटी की मुख्य शाखा, जो रूडोल्फ झील से उत्तरपूर्व में लाल सागर की ओर अग्रसर होती है, अबिसीनिया के पठार को दो भागों में विभक्त करती है : (1) इथिओपिया का बृहत्‌ पठार, जो रिफ्ट घाटी के उत्तरपश्चिम में स्थित तथा जिसके अंतर्गत टिग्रे, अम्हारा, शोआ एवं काफा के प्रांत हैं। (2) हरार का संकीर्ण पठार, जो रिफ्ट घाटी के दक्षिण पूर्व में स्थित है तथा उ.पू. से द.प. को फैला है। ये दोनों क्षेत्र बैसाल्ट एवं ट्रैचाइट नामक पत्थरों के बने हैं जो शोआ प्रांत में 6,000 फुट की मोटाई तक मिलते हैं। अबिसीयिनया के पूर्वोत्त्र भाग तथा इरिट्रिया में कम ऊँचे एवं शुष्क पठार मिलते हैं जो आद्यकल्पिक (आर्कियन) पत्थरों से बने हैं। इनकी ऊँचाई 1,500 से 5,000 फुट तक है।

अबिसीनिया की मुख्य नदी सेतित है जो लास्टा नामक पर्वत से निकलती है तथा आगे चलकर अतबारा के नाम से नील नदी की सहायक हो जाती है। अन्य नदियों में अब्बाई प्रमुख है, जो टाना झील से होकर बहती है और ब्लू नील के नाम से प्रसिद्ध है। पूर्व को और प्रवाहित होनेवाली नदियों में अवास मुख्य है।

इथिओपिया के पठार पर ऊँचाई के अनुसार जलवायु के तीन प्रकार मिलते हैं : (1) कोल्ला, 5,500 फुट की ऊँचाई तक, जहाँ प्रत्येक महीने का औसत ताप 68° फा. से अधिक होता है; (2) वाइनाडेगा, 5,500 से 8,000 फुट तक, जहाँ जाड़े में ठंडी रातें (41° 50° फा.) होती हैं तथा वार्षिक तापांतर 9° फा. से कम होता है। अढ़िस अबाबा (8,000 फुट) की औसत मासिक ताप 58° फा. से 66° फा. तक घटता बढ़ता रहता है; (3) डेगा, 8,000 फुट से ऊपर, जहाँ सदैव सर्दी पड़ती है तथा गर्मी के तीन महीनों (मार्च से मई तक) का औसत ताप 60° फा.° रहता है।

हरार, शोआ, अम्हारा तथा टिग्रे के पठारों पर वर्षा गर्मी में होती है, किंतु इथिओपिया के पठार पर वर्षा प्रत्येक महीने में होती है। अदिस अबाबा की वार्षिक वर्षा 45 इंच है, जिसका अधिकांश जून से अक्टूबर तक होता है। हरार पठार पर वर्षा 20 इंच से 35 इंच तक होती है। कम ऊँचे स्थलों में वर्षा का अभाव है। दक्षिणपूर्व में वर्षा केवल 5 इंच के लगभग होती है। इथिओपिया के पठार के पश्चिमी भाग में सघन वन तथा कही-कहीं सावैना के घास के मैदान मिलते हैं। कम ऊँचे पठारों पर सावैना की वनस्पति तथा नीचे स्थलों में झाड़ियाँ पाई जाती हैं।

इस राज्य में सोना, लोहा, कोयला, प्लैटिनम इत्यादि खनिज विशेष रूप से मिलते हैं। इनके अतिरिक्त बाक्साइट, चाँदी, ताँबा, गंधक भी प्राप्त होते हैं। यहाँ जलविद्युत्‌ की संभावी क्षमता 40,00,000 अश्वसामर्थ्य है।

इथिओपियावासी चौथी शताब्दी से ही ईसाई हैं। ये हेमाइट जाति के बताए जाते हैं। गल्ला लोगों में, जो कृषक एवं चरवाहे हैं, कुछ ईसाई तथा कुछ मुसलमान हैं। इनकी जनसंख्या 85,00,000 है, जो देश की कुल जनसंख्या की दो तिहाई है। इनके अतिरिक्त कुछ सोमाली, डानाकिल तथा हब्शी जातियाँ भी बसी हैं।

यहाँ की मुख्य फसल दुर्रा है, यद्यपि गेहूँ, जौ, मक्का, आलू तथा मिर्च भी होती है। हरार, जिम्मा तथा शीडामों जिलों में उत्कृष्ट कोटि का कहवा उत्पन्न किया जाता है। जगली कहवा अन्य स्थानों में उपजता है। अन्य फसलों में रुई, ईख, खजूर, केला इत्यादि मुख्य है। पशुपालन यहाँ का मुख्य उद्यम हैं।

मसावा तथा असाब, जो इरिट्रिया के स्वायत्त प्रांत के अंतर्गत हैं, अबिसीनिया के मुख्य बंदरगाह हैं। ये अदिस अबाबा एवं अन्य स्थानों से पक्की सड़कों द्वारा संबद्ध हैं। अदिस अबाबा से एक रेलवे लाइन जिबुटी बंदरगाह को जाती है जो फ्रेंच सोमलीलैंड के अंतर्गत है। (न.कि.प्र.सिं.)

इतिहास-प्राचीन यूनानी कवि होमर के काव्य में अबिसीनिया के निवासियों की चर्चा में लिखा है-सब देशों से दूर उनका देश है। देवता उनके राजभोजों में सम्मिलित होते हैं और सूर्य संभवत: उनके देश में अस्त होता है। इब्रानी ग्रंथों में अबिसीनिया को 'हब्सीनिया' कहा गया है।

अबिसीनिया के उत्तरी प्रदेश इथिओपिया के प्राचीन इतिहास के अनुसार उस देश पर 11वीं शताब्दी ई.पू. तक मिस्री सम्राटों का आधिपत्य था। जब तब विद्रोह करके अबिसीनिया स्वतंत्र हो जाता था, किंतु फिर मिस्री सेनाएँ आकर उसे वश में कर लेती थीं। 11वीं शताब्दी ई.पू. में अबिसीनिया पूर्ण स्वाधीन हो गया। नपाता नए स्वाधीन राज्य की राजधानी बना। धीरे-धीरे नया राज्य इतना शक्तिशाली हो गया कि उसने आठवीं शताब्दी ई.पू. के मध्य स्वयं मिस्र को अपने अधीन कर लिया। मिस्र का 55वाँ राजकुल अबिसीनिया का इथिओपी राजकुल ही था। इथिओपी राजकुल का जब 660 ई.पू. में मिस्र से अंत हुआ तब भी अबिसीनिया स्वतंत्र राज्य बना रहा। ईरानी विजेता कंबुजीय ने मिस्र विजय करने के बाद अबिसीनिया पर आक्रमण करने के लिए अपना जहाजी बेड़ा भेजा किंतु वह नष्ट कर दिया गया। इस युद्ध के परिणामस्वरूप राजधानी नपाता से हटाकर मेरो कर दी गई। 24 ई.पू. में रोमी सेना ने अबिसीनिया पर आक्रमण किया और उसके एक भाग पर अधिकार कर लिया, किंतु रोमी सम्राट् ओगुस्तस ने रोमी सेना को वापस बुला लिया। इस काल के अबिसीनिया के राजाओं में नेतेकामने और रानियों में कानदेस के नाम प्रमुख हैं। कुछ अबिसीनिया परंपराओं के अनुसार साम्राज्ञी शेबा अबिसीनिया की ही थी।

भारत और अबिसीनिया का संबंध लगभग ढाई हजार वर्ष पुराना है। कल्याण, धेनुकाकट, सुपारा आदि भारत के पश्चिमी तट के बंदरगाहों से तिजारती जहाज सुपारी, हड़, चावल, वैदूर्य, केसल, अगर, चोयाकस्तूरी, ईगुंर, शंख और सूती कपड़ा लेकर अबिसीनिया जाते थे। 'कथाकोश' नामक ग्रंथ के अनुसार भारत में कपड़ा रंगने के लिए जिस कृमिराज का प्रयोग होता था वह अबिसीनिया से ही जाता था। एक लेख के अनुसार अबिसीनिया की पर्वतकंदराओं में दूसरी शताब्दी ई.पू. में सैकड़ों दिगंबर जैन साधु रहा करते थे। ईसा की तीसरी शताब्दी में ईसाई धर्म अबिसीनिया पहुँचा और विगत 1,600 वर्षों में वह वहाँ का राजधर्म रहा है। सन्‌ 615 ई. में अबिसीनिया के सम्राट् नजाशी ने सैकड़ों मुसलमान अरब शरणार्थियों को अपने देश में आश्रय दिया।

सन्‌ 525 ई. में अबिसीनिया के राजा अल असबाहा ने अरब के यमन प्रांत पर अधिकार कर लिया। लगभग 50 वर्षों तक यमन अबिसीनिया के आधिपत्य में रहा। छठी सदी ई. से 19वीं सदी ई. तक इबिसीनिया अनेक छोटी-छोटी रियासतों में बँट गया। इन रियासतों की आए दिन की लड़ाइयों ने अबिसीनिया को एक निर्बल राष्ट्र बना दिया। 19वीं शताब्दी में अबिसीनिया को अपने संरक्षण में लेने के लिए यूरोपीय शक्तियों में प्रतिस्पर्धा होने लगी। इटली ने सेनाएँ भेजकर अबिसीनिया को अपने अधिकार में लेना चाहा, किंतु अडोवा के मैदान में अबिसीनिया के हाथों इटली की सेनाओं को गहरी हार खाकर पीछे हटना पड़ा। 40 वर्ष बाद अक्टूबर, सन्‌ 1935 में मुसोलिनी की सेनाओं ने अबिसीनिया पर आक्रमण किया और कई महीनों के युद्ध के बाद मई, सन्‌ 1936 में उसे इतालवी साम्राज्य का अंग बना लिया।[1]

अपने देश की स्वतंत्रता के इस अपहरण पर राष्ट्रसंघ से अपील करते हुए अबिसीनिया के सम्राट् हेल सिलासी के शब्द थे : ईश्वर के राज्य को छोड़कर संसार का कोई राज्य किसी दूसरे राज्य से ऊँचा नहीं। अगर कोई शक्तिशाली राष्ट्र किसी शक्तिहीन देश को सैनिक बल से दबाकर जीवित रह सकता है तो विश्वास मानिए, निर्बल देशों की अंतिम घड़ी आ पहुँची। आप स्वतंत्रता के साथ मेरे देश के इस अपहरण पर अना निर्णय दें। ईश्वर और इतिहास आपके निर्णय को याद रखेगा।

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान अप्रैल, 1941 में सम्राट् हेल सिलासी ने फिर बंधनमुक्त अबिसीनिया की राजधानी अदीस में प्रवेश किया। उसके बाद से वैधानिक दृष्टि से अबिसीनिया में अनेक शासन सुधार हुए हैं। जनता को वयस्क मताधिकार प्राप्त है। पार्लियामेंट में 'चेंबरऑव डेपुटीज़' (लोकसभा) और उच्चा सभा, ये दो सदन हैं। मंत्रिमंडल के हाथों में सत्ता है। अबिसीनिया संयुक्त राष्ट्रसंघ का सदस्य है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में वह पंचशील का समर्थक है।[2]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 525-26 |
  2. सं.ग्रं.-जे.एच. ब्रेस्टेड : ए हिस्ट्री ऑव ईजिप्ट फ्ऱाम दो अर्लिएस्ट टाइम्स टु द पर्शियन कांक्वेस्ट; रिकार्डस ऑव ईजिप्ट; ए हिस्ट्री ऑव ईजिप्ट; जी.ए. रोज़नर : आर्केयालाजिकल सर्वे ऑव नूबिया; ग्रिफ़िथ : एक्सवेशंस इन नूबिया; ई.सी. लुई : हिस्ट्री ऑव सिविलिज़ेशंस; सर आर्थर वीगल : ए हिस्ट्री ऑव द फ़ैराओज़; ए.बी. विल्ड : माडर्न अबिसीनिया (1901); सर ई.डब्ल्यू. बज़ : ए हिस्ट्री ऑव इथियोपिया; इथियोपियन दूतावास द्वारा प्रसारित हैंडआउट्स।

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