फ़ारस  

ईरान को सन् 1935 तक फ़ारस नाम से भी जाना जाता था। फ़ारस और भारत का अत्यन्त प्राचीन काल से गहरा सम्बन्ध रहा है। विश्वास किया जाता है कि फ़ारस में जा बसने वाले आर्य उसी मूल वंश के थे, जिससे भारतीय आर्यों का विकास हुआ। अवेस्ता की भाषा संस्कृत से इतनी मिलती-जुलती है कि दोनों एक ही भाषा परिवार की मानी जाती हैं। भारत से फ़ारस का निकट सम्बन्ध छठी शताब्दी ई. पू. में स्थापित हुआ, जब फ़ारस के शहंशाह साइरस (कुरुष अथवा कुरु) (लगभग 555-530 ई. पू.) ने काबुल नदी तथा सिंधु नदी के बीच का प्रदेश जीत लिया, जिसमें अश्वक आदि गणों का निवास था। डेरियस (दारयवुह) (लगभग 522-486 ई. पू.) के राज्यकाल में फ़ारस के साम्राज्य की सीमाओं का और विस्तार हुआ और गंधार तथा उससे और पूर्व में सिंधु नदी तक का प्रदेश उसके अंतर्गत आ गया। गंधार से पूर्व के प्रदेश को ईरानी 'हिन्द' कहते थे और वह फ़ारस के साम्राज्य का बीसवाँ प्रान्त था। गंधार और 'हिन्द' डेरियस के पुत्र एवं उत्तराधिकारी जरेक्सीज (क्षयार्श) (486-465 ई. पू.) के राज्य के अंतर्गत बने रहे। जरेक्सीज ने जब यूनान पर चढ़ाई की, तब उसकी सेना में गंधार और 'हिन्द' के भी सैनिक लड़ने गए थे।

सिकन्दर का अधिकार

फ़ारस और भारत के प्राचीन सम्पर्क के फलस्वरूप उत्तर-पश्चिम भारत में खरोष्ठी लिपि प्रचलित हो गयी तथा भारतीय वास्तुकला पर भी फ़ारसी प्रभाव दृष्टिगत होने लगा। फ़ारस के शहंशाह डेरियस तृतीय (335-330 ई. पू.) को मकदूनिया के राजा सिकन्दर ने 331 ई. में गौगामेल की जिस लड़ाई में हराया, उसमें भारतीय सेनाओं ने भी फ़ारस की सेनाओं के साथ युद्ध किया था। इस युद्ध के बाद ही डेरियस तृतीय की मृत्यु हो गयी, जिसके फलस्वरूप सिकन्दर फ़ारस के साम्राज्य का स्वामी हो गया। इसके बाद ही सिकन्दर ने 327 ई. पू. में पंजाब तथा सिंध पर आक्रमण किया, जिनके ऊपर फ़ारस के साम्राज्य का नियंत्रण शिथिल पड़ गया था और जहाँ पर अनेक छोटे-छोटे राज्य स्थापित हो गए थे। सिकन्दर की मृत्यु के बाद पंजाब ने फ़ारस के साम्राज्य के नियंत्रण से अपने को मुक्त कर लिया, किन्तु फ़ारस और भारत के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध क़ायम रहे।

भारत से मैत्री सम्बन्ध

सम्राट अशोक ने पश्चिम के जिन सुदूरवर्ती राज्यों में धर्म-विजय के लिए बौद्ध भिक्षुओं को भेजा था, वे फ़ारस होकर उन देशों में गए थे। फ़ारस में उस समय मानी धर्म प्रचलित था। बौद्ध भिक्षुओं ने इस मानी धर्म को भी प्रभावित किया। अजन्ता की गुफ़ा संख्या 1 के भित्ति चित्र से प्रकट होता है कि फ़ारस और भारत के बीच मैत्री सम्बन्ध बराबर बना रहा। इस भित्ति चित्र में दिखाया गया है कि फ़ारस के शाह ख़ुसरो द्वितीय के द्वारा लगभग 627 ई. में भेजा गया दूत चालुक्य राजा पुलकेशी द्वितीय (608-42 ई.) को अपना परिचय पत्र प्रस्तुत कर रहा है। सावतीं शताब्दी के मध्य में अरबों ने जब फ़ारस पर अधिकार करके वहाँ पर इस्लाम धर्म का प्रचार किया, जरथ्रुस्त पारसियों का एक दल, जो अपनी ज़मीन और दौलत की अपेक्षा अपने धर्म से अधिक प्रेम करता था, भागकर भारत चला आया और यहाँ पर उन्हें आश्रय प्राप्त हुआ। इन पारसियों के वंशज आज भी वर्तमान में हैं और भारत के सम्मानित एवं समुद्धशाली अल्पसंख्यक वर्ग में उनकी गणना की जाती है।

फ़ारसी युवकों का भारत आगमन

भारत पर जिन मुसलमानों ने विजय प्राप्त कीं, उनमें अधिकांश तुर्क तथा सुन्नी थे। उधर फ़ारस के लोग तथा वहाँ के शाह शिया मतावलम्बी थे। इसलिए मुसलमान शासन-काल में फ़ारस और भारत के सम्बन्धसूत्र शिथिल पड़ गये। फिर भी फ़ारस के साहसी मुसलमान अक्सर दौलत की खोज में भारत आते रहते थे और उन्हें अक्सर यहाँ पर आने पर अमीर बना दिया जाता था। इस प्रकार का एक ईरानी अमीर युसुफ़ आदिलशाह था, जिसने बीजापुर का आदिलशाही वंश (1490-1673 ई.) चलाया। प्रसिद्ध मुसलमान इतिहासकार फ़रिश्ता भी फ़ारस का रहने वाला था। उसने भारत में मुसलमानी राज्य शक्ति के उत्थान और पतन का इतिहास लिखा है। दिल्ली के सुल्तान के दरबार में फ़ारसी भाषा का प्रयोग होता था और मुग़ल दरबार में भी इसी भाषा का प्रयोग जारी रहा। सारे भारत में मुसलमान शासकों के दरबारों में फ़ारसी भाषा, फ़ारसी पहनावे और फ़ारसी शिष्टाचार का प्रचलन था।

नादिरशाह

दूसरे मुग़ल बादशाह हुमायूँ को फ़ारस के शाह ताहमस्य के दरबार में शरण मिली थी और उसी की फ़ौजी सहायता से उसने दुबारा दिल्ली का तख़्त प्राप्त किया। 1649 ई. में फ़ारस ने कंदहार छीन लिया और शाहजहाँ तथा औरंगज़ेब द्वारा उस पर दुबारा अधिकार कर लेने के सारे प्रयत्नों को विफल कर दिया। फ़ारस ने भारत को सबसे ज़बरदस्त चोट 1738 ई. में पहुँचाई, जब फ़ारस के शासक नादिरशाह ने भारत पर चढ़ाई की, दिल्ली को निर्दयतापूर्वक लूटा तथा तख़्तेताऊस, कोहिनूर हीरा और बहुत सी दौलत लेकर फ़ारस लौट गया। 1747 ई. में नादिरशाह की मृत्यु के बाद ही अफ़ग़ानिस्तान में अहमदशाह दुर्रानी की राज्य शक्ति के उदय से फ़ारस और भारत के बीच नवस्थापित राजनीतिक सम्बन्ध फिर भंग हो गया। परन्तु, नादिरशाह के हमले से भारत को जो क्षति पहुँची, उससे वह फिर उबर नहीं पाया। नादिरशाह के हमले ने मुग़ल साम्राज्य को जर्जर कर दिया। 1761 ई. में पानीपत की तीसरी लड़ाई में मुग़लों तथा मराठों की पराजय तथा उसके बाद ही भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का उदय, नादिरशाह के क्रूर हमले का ही परिणाम था।

नाम परिवर्तन

उन्नीसवी शताब्दी में फ़ारस को लेकर ब्रिटेन और रूस में काफ़ी प्रतिद्वन्द्विता चली। दोनों ही फ़ारस को अपने संरक्षण में लेना चाहते थे। फलत: भारत और फ़ारस का राजनीतिक सम्बन्ध ब्रिटेन और रूस की कूटनीतिक चालों से सम्बद्ध हो गया। 1907 ई. में ब्रिटेन और रूस में समझौता हो गया, जिसके द्वारा दोनों ने फ़ारस की अखण्डता बनाये रखने की प्रतिज्ञा की। इसके साथ ही वे इस बात पर भी सहमत हो गए कि उत्तरी फ़ारस को रूसी प्रभाव क्षेत्र में तथा दक्षिण पूर्वी फ़ारस को ब्रिटिश प्रभाव क्षेत्र में माना जाएगा। रूस ने यह स्वीकार कर लिया कि फ़ारस की खाड़ी में इंग्लैण्ड का विशेष स्वार्थ है। इस प्रकार यूरोप के दो सभ्य देशों ने एक स्वतंत्र देश का आपस में जिस नीति से बंटवारा कर लेने का निर्णय लिया, वह उनकी सभ्यता के वास्वतिक चेहरे को बेनक़ाब करने वाला था। 1934 ई. से फ़ारस का नाम सरकारी तौर से बदलकर ईरान कर दिया गया है। ईरान अब शक्तिशाली आधुनिक राष्ट्र बन गया है। भारतीय गणराज्य से उसका मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

भट्टाचार्य, सच्चिदानन्द भारतीय इतिहास कोश, द्वितीय संस्करण - 1989 (हिन्दी), भारत डिस्कवरी पुस्तकालय: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, 254।

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