आरियस  

आरियस (256-336 ई.) का जन्म लिबिया में तथा पौरोहित्याभिषेक सिकंदरिया में हुआ था। गिरजे के इतिहास में इनका स्थान अपेक्षाकृत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन्होंने ईसाई विश्वास के एक मूल सिद्धांत का विरोध किया था तथा अपनी धारणाओं के सफल प्रचार द्वारा समस्त ईसाई संसार में अशांति फैला दी थी। 325 ई. में सम्राट् कोंस्तांतीन ने ईसाई धर्मपंडितों की एक महासभा बुलाई जिसमें आरियस की शिक्षा को दोषी ठहराया गया। तीन साल बाद सम्राट् ने आरियस को अपने दरबार में बुलाया तथा सिकंदरिया के बिशप और आरियस के विरोधी, संत अथानासियस को निर्वासित किया। आरियस के मरण के बाद सम्राट् के पुत्र कोंस्तांतियस ने सब कैथोलिक बिशपों को निर्वासित कर दिया, इससे आरियस के अनुयायी कुछ समय तक सर्वोपरि रहे। किंतु अथानासियस के प्रयत्नों के फलस्वरूप वे एक-एक करके कैथोलिक परिवार में लौटे तथा कुस्तुंतुनियां की महासभा (391 ई.) में आरियस के सिद्धांतों का पुन: विरोध हुआ जिससे यूनानी संसार में आरियस का प्रभाव लुप्त हो गया।[1]

आरियस की शिक्षा त्रित्व (ट्रिनिटी) से संबंध रखती है। ईसाई विश्वास के अनुसार एक ही ईश्वर में, एक ही ईश्वरीय तत्व में तीन व्यक्ति हैं-पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा। तीनों समान रूप से अनादि, अनंत, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हैं, वे तत्वत: एक हैं (द्र. 'त्रित्व')। अरियस के अनुसार पिता ने शून्य से पुत्र की सृष्टि की है, अत: पिता और पुत्र तत्वत: एक नहीं हैं। पुत्र न तो अनादि है और न पूर्णत: ईश्वर है, इसलिए ईसा (प्रभु के अवतार) पूर्ण रूप से ईश्वर नहीं हैं।[2]



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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 423 |
  2. सं.ग्रं.-जे.एच. न्यूमन : आरियस ऑव दि फोर्थ सेंचुरी, लंदन, 1888; जे.बी. किर्श : किर्शेंगेसशिस्ते, प्रथम खंड, 1931।

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