एक्वाइनस संत तोमस  

एक्वाइनस, संत तोमस का जन्म रोकासेका में सन्‌ 1225 में हुआ था। इनके पिता नेपल्स राज्य में एक्वाइनों के काउंट थे और माँ थियोदोरा सिसली के पुराने नारसन शासकों के वंश की थीं। सन्‌ 1253 में तोमस ने अपने परिवार की इच्छा के विरुद्ध संत दोमिनिक मठ में प्रवेश किया। सन्‌ 1244 में वे दोमिनिकी व्यवस्था के अध्यक्ष जोहानस त्यूतोनिकस के साथ अल्बर्तस माग्नस के निरीक्षण में शिक्षा प्राप्त करने कोलोन गए। सन्‌ 1252 में उन्होंने पेरिस से डिग्री प्राप्त की, फिर वह वर्षो अध्यापन कार्य करते रहे। सन्‌ 1273 में लियों की कौंसिल में सम्मिलित होने के लिए जाते समय मार्ग में उन्हें अस्वस्थता के कारण फ़ोसानोवा के एक मठ में रुकना पड़ा जहाँ 7 मार्च, सन्‌ 1274 को उनका देहांत हो गया। देहांत के लगभग एक शताब्दी बाद तक दोमिनिकी और सिस्तर्की मठों में तोमस के अवशेष प्राप्त करने के लिए द्वंद्व चलता रहा। अंतत: निर्णय दोमिनिकी मठ के पक्ष में हुआ। सन्‌ 1567 में पंचम पीयस ने तोमस को पंचम चर्च का 'डाक्टर' घोषित किया।

तोमस द्वारा लिखित ग्रंथों में मुख्य हैं, सम्मा थियोलाजिका, सम्मा कोंत्रा जेंतील्स तथा अरस्तू के 'पांलिटिक्स' पर टिप्पणी।

तोमस के दर्शन की मुख्य विशेषता सामंजस्य है। ईश्वर और प्रकृति के क्षेत्र इतने व्यापक हैं कि वे अपने में असीम अस्तित्व की अनगिनत विभिन्नताएँ समेट लेते हैं। समस्त ज्ञान एक इकाई है जिसके निम्नतम स्तर पर विशिष्ट विषयों से संबंधित विभिन्न विज्ञान हैं, उनके ऊपर बौद्धिक दर्शन है जो सार्वभौम सिद्धांत प्रतिपादित करता है। बुद्धि से ऊपर ईसाई धर्मशास्त्र है जो ज्ञान की परिपूर्णता होते हुए भी श्रुत (इलहाम) पर आश्रित है। श्रुत यद्यपि बुद्धि से परे हैं, तथापि वह बुद्धिविरोधी नहीं; श्रद्धा बुद्धि की परिपूर्णता है।

सृष्टि की व्यवस्था में समस्त ब्रह्मांड एक इकाई है जिसके उच्चतम स्तर पर ईश्वर तथा निम्नतम पर जीव है। प्रत्येक जीव अपने स्वभाव की प्रेरणा से अपना हित खोजता है। उच्चतर स्तरवाला निम्न स्तरवालों पर शासन करता है। प्रकृति की भाँति मानव समाज भी उद्देश्यों और प्रयोजनों की व्यवस्था है जिसमें उच्चस्तर निम्नतर को निर्देशित करता है। समाज सद्गुणी जीवन की प्राप्ति के लिए सेवाओं का आदान प्रदान है जिसमें प्रत्येक अपना उपयुक्त कार्य करता है। सामान्य हित की माँग है कि समाज में उसी प्रकार एक शासक वर्ग हो जिस प्रकार प्रकृति में। परंतु मनुष्य शरीर और आत्मा दोनों होने के कारण दुहरी व्यवस्था से संबद्ध है, प्राकृतिक तथा दैवी। प्राकृतिक व्यवस्था का सदस्य होने के नाते वह लौकिक संप्रभु के अधीन है जो उसे जीवन के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक साधन प्रदान करता है, दैवी व्यवस्था का सदस्य होने के कारण वह पोप के अधीन है क्योंकि पारमार्थिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक साधन पोप के नियंत्रण में हैं। समाज में मनुष्य का लक्ष्य है सद्गुणी जीवन, परंतु सद्गुणी जीवन पारमार्थिक लक्ष्य से निर्धारित होता है, इसलिए समाज का उद्देश्य मनुष्य को केवल सद्गुणी जीवन प्रदान करना ही नहीं वरन्‌ उसे भगवत्‌कृपा से भी लाभान्वित कराना है। इस उद्देश्य की पूर्ति दैवी शासनव्यवस्था करती है जिसका अध्यक्ष पोप है। दूसरा उद्देश्य पहले से अधिक महत्वपूर्ण होने के कारण शासक पोप की सत्ता स्वीकार करे। परंतु यह तर्क शासक के कर्त्तव्यों का निषेध नहीं करता। शासक का कर्तव्य है कि वह शांति और सुव्यवस्था द्वारा मानवीय सुख की नींव डाले और सद्गुणी जीवन की प्राप्ति में उपस्थित होनेवाली संभावित बाधाओं को दूर करे। चर्च राज्यविरोधी नहीं, उसकी परिपूर्णता है।

शासन के इस नैतिक उद्देश्य के कारण शासन सत्ता नियंत्रित है। इसका प्रयोग विधानानुसार हो। ज्ञान और सृष्टि के स्तरों के अनुकूल विधान के चार स्तर हैं: शाश्वत, प्राकृतिक, दैवी, मानवीय। शाश्वत नियम ईश्वर की बुद्धि है जिससे सृष्टि संचालित होती है। मानवीय बुद्धि इसे पूर्णरूपेण नहीं जान सकती। फिर भी, अपनी प्राकृतिक क्षमता के अनुकूल मनुष्य ईश्वरीय ज्ञान में भाग लेता है। प्राकृतिक विधान जीवों में दैवी बुद्धि का प्रतिबिंब है तथा अच्छाई की खोज और बुराई से बचाव की स्वाभाविक प्रेरणा में परिलक्षित होता है। दैवी विधान श्रुत (इलहामी) है जिसे मनुष्य ईश्वर की कृपा से जानता है। मानवीय विधान मनुष्य के जीवन को व्यवस्थित करनेवाली प्राकृतिक विधान की वह व्युत्पत्ति है जो प्राकृतिक विधान को मानवीय जीवन की विशिष्ट परिस्थितियों में लागू करती है।[1]

सरकार का आदर्श रूप ऐसा राजतंत्र है जिसमें कुलीनतंत्र तथा जनतंत्र के विशिष्ट लक्षणों का सम्मिश्रण हो। लोग शासन के प्रतिआज्ञाकारी हों, परंतु अत्याचारी शासन का विरोध करने का अधिकार भी उन्हें है। दासप्रथा यद्यपि प्राकृतिक नहीं वरन्‌ मानवीय बुद्धि द्वारा जीवन की सुविधाओं के लिए संस्थापित की गई है, फिर भी वह प्राकृतिक विधान के विरुद्ध नहीं है। परंतु सभी प्रकृति से समान हैं, इसलिए स्वामी दास के प्राकृतिक अधिकार नहीं छीन सकता। संपत्ति का स्वामित्त्व निजी और उपभोग सामूहिक हो। दरिद्रता अवांछनीय है क्योंकि वह अपराधों के लिए अवसर प्रदान करती है। वैयक्तिक और सामाजिक हित के लिए ऐसी शिक्षा अनिवार्य है जिसके द्वारा मनुष्य की सभी प्रवृत्तियों का संतुलित विकास हो सके। संततिनिग्रह प्रकृतिविरुद्ध है, इसलिए अनैतिक है। विवाहविच्छेद अनुचित है, क्योंकि ईसा ने इसका निषेध किया है।[2]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 2 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 215 |
  2. सं.ग्रं.- कार्लाइल, आर. डब्ल्यू और कार्लाइल, ए.जे. : ए हिस्ट्री ऑव द मेडीवल पोलिटिकल थियरी इन द वेस्ट, लंदन, 1924; ग्रेबमन, मार्टिन (अनु.बी. माइकेल): टामस एक्वाइनस- हिज़प र्सनैलिटी ऐंड थॉट, न्यूयार्क, 1928; जिल्साँ, ई. (अनु.एल.के.शूक): द क्रिश्चियन किलासफी ऑव सेंट टामस एक्वाइनस, लंदन, 1957; जिल्साँ, ई. : रीजन ऐंड रेविलीशन इन द मिडिल एजेज़, लंदन, 1954; मैक्इलवेन, सी. एच. : द ग्रोथ ऑव पोलिटिकल थाट इन द वेस्ट, लंदन, 1951; मर्फ़ी, ई. एफ. : सेंट टामसज़ पोलिटिकल डाक्ट्रिन ऐंड डिमाक्रेसी, वाशिंगटन, 1921; सेबाइन, जी.एच. : ए हिस्ट्री ऑव पोलिटिकल थियरी, लंदन, 1951; हर्नशाँ, एफ.जे.सी. (सं.) : द सोशल ऐंड पोलिटिकल आइडियाज़ ऑव सम ग्रेट मेडीवल थिंकर्स, लंदन, 1923

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