देवनागरी लिपि की भूमिका -बाबूराम सक्सेना  

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लेखक- डॉ. बाबूराम सक्सेना

          देवनागरी लिपि का विकास प्राचीन लिपि ब्राह्मी से हुआ। ब्राह्मी लिपि के अभिलेख ईसा पूर्व चतुर्थ शती तक के मिलते हैं। इसके समकालीन एक और लिपि थी जिसको खरोष्ठी कहते हैं। खरोष्ठी दाहिनी ओर से बायीं ओर चलती है जबकि ब्राह्मी बायीं ओर से दायीं ओर। ये दोनों लिपियां भारत की अपनी लिपियां थीं और इनका विकास और उद्गम शुद्ध भारतीय था। कुछ यूरोपीय विद्वानों का मत था कि इनका उद्गम अभारतीय प्रभाव पर आधारित है किंतु इसका प्रतिवाद पं. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने कर दिया था और उनकी उक्ति का खंडन नहीं हो सका। अरबी उर्दू लिपि भी दाहिनी ओर से बायीं ओर चलती है किंतु खरोष्ठी लिपि से इसका कोई संबंध नहीं था। ब्राह्मी और खरोष्ठी के अतिरिक्त सिंधु घाटी में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में पाए गये अभिलेख प्रायः ईसा पूर्व 2700 वर्ष पुराने हैं। इसके अतिरिक्त कुछ अंकन पर्वतों की गुफाओं में पाए गए भारतीय आदिवासिओ के रचित चित्रों में भी मिलता है। ये चित्र 25000 वर्ष पुराने समझे जाते हैं। इस अंकन का भी कोई संबध उल्लिखित ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों से नहीं है।
          ब्राह्मी के दो रूप उत्तरी और दक्खिनी विकसित हो गए थे। उत्तरी रूप में दूसरों के अतिरिक्त देवनागरी और कुटिल लिपि भी विकसित हुई। आज देवनागरी लिपि संस्कृत, हिन्दी, नेपाली, मराठी लिखने के लिए प्रयुक्त की जाती है। इसमें स्वर और व्यंजन स्पष्ट रूप से अंकित होते हैं। स्वरों का एक संक्षिप्त रूप भी होता है जिसको भाषा कहते हैं जब स्वर किसी व्यंजन के उपरांत आता है तो इसे मात्रा रूप में अंकित करते हैं। उदाहणार्थ - हम लिखते हैं ‘ऐसा’ और ‘कैसा’ प्रथम शब्द में ‘ऐ’ स्वर अपने मूल रूप में है दूसरे में अपने मात्रा रूप में। ये मात्राएं व्यंजन से पहले, बाद को, नीेचे और ऊपर लिखी जाती हैं- उकार, ऊकार, ऋकार व्यंजन के नीचे और एकार, ऐकार, ओकार और औकार व्यंजन के ऊपर लगते हैं। आकार की मात्रा व्यंजन के बाद रखी जाती है। अकार की मात्रा व्यंजन के रूप में ही शामिल होती है और इसका प्रयोग अन्य स्वररहित व्यंजन रूप में सन्निहित रहता हैः जैसे- कथा, रस आदि शब्दो में। वर्तमान देवनागरी लिपि में अंकित वर्णों में कुछ व्यंजन संयोग भी सिखाए जाते हैं और ये हैं क्ष (कृ + ष), त्र (त् + र), झ (ज + त्र), इसके अतिरिक्त र के कई रूप हैं जो आज भी प्रचलित देवनागरी लिपि में मिलते हैं। ब्राह्मी में दो व्यंजनो के संयोग में प्रथम व्यंजन ऊपर तथा दूसरा उसके नीचे लिखा जाता था। यह प्रथा देवनागरी मे भी पाई जाती है विशेषकर र के साथ किसी व्यंजन के संयोग मे उदाहरणार्थ धर्म, गर्हा, में रेफ म और ह के ऊपर लिखा जाता है। र का प्राचीन रूप ्र था जो हमें प्रेम आदि में अंकित मिलता है। ट वर्ग व्यंजनों तथा हकार के रके साथ संयोग में र का प्रचलित रूप ^ यह है और ट्र वर्ग और हकर अपने पूरे रूप में अंकित किए जाते हैं जिससे भ्रम होता है रकार स्वररहित रूप में अंकित है।
          लिपि सुधार की आवश्यकता को देखकर कई समितियों ने समय समय पर विचार किया था। महात्मा गांधी के निर्देशन पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने 1935 में अपने वार्षिक अधिवेशन में लिपि सुधर समिति नियुक्त की थी। फिर 1948 में आचार्य नरेंद्र देव समिति बनी। 1953 में डॉ. संपूर्णानन्द के निर्देश पर विद्वानों की एक समिति ने सुझाए गए सुधारों के प्रस्तावों पर विचार विमर्श किया था। इसके पूर्व 1948 में भारत सरकार ने हिन्दी आशुलिपि (शार्ट हैंड) और टंकण (टाइप) पर विचार विमर्श के लिए काका कालेलकर जी की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी। देवनागरी लिपि में प्रचलित लेखन प्रणाली इन सब समितियों के आधार पर विकसित हुई है। सिद्धांत यह है- लिपि में एक ध्वनि को अंकित करने के लिए एक ही वर्ण होना चाहिए। इस सिद्धांत पर देवनागरी लिपि ही भारतीय भाषाओं को अंकित करने में सवर्था समर्थ है और विभ्रम की कोई गुंजाइश प्रायः नहीं ही है। इसके विपरी रोमन में भी तथा अरबी (उर्दू) में यह योग्यता नहीं है।
उदाहरणार्थ: रोमन लिपि का कभी ऐ ध्वनि का (कैन) और कभी अ (फादर) को व्यक्त करता है। न वर्ण कभी अ (बट) और कभी उ (पुट) का उच्चारण देन है। इसी प्रकार उर्दू के ते और तोय ‘त’ ध्वनि का द्योतन करते हैं, से, सीन और स्वाद ‘स’ ध्वनि का तथा जाल, जे और जोय ‘ज’ ध्वनि को जतलाते हैं। अरबी लिपि में लिखी जाने वाली उर्दू में स्वरों के अंकन का यथेष्ट और असंदिग्ध प्रबंध नहीं है। हमारी देवनागरी लिपि में ये कोई दोष नहीं है। इसमें जो लिखा जाता है वहीं पढ़ा जाता है। इसी दृष्टि से भारतीय भाषाओं को अंकित करने के लिए देवनागरी लिपि सर्वश्रेष्ठ सर्वथा योग्य है। कोई 15 वर्ष पूर्व भारत सरकार के शिक्षा विभाग ने सभी राज्य सरकारों को सिफारिश भेजी थी कि देवनागरी लिपि को सभी राज्य अपनी अपनी प्रादेशिक लिपि के अतिरिक्त स्वीकार करें किंतु खेद है यह सिफारिश नहीं मानी गई। भाषाओं की विभिन्नता, लिपि भेद से अधिक उपस्थित होती है और लिपि की एकरूपता से भाषाओं की रूप विभिन्नता कम हो जाती है। बंगला गुजराती आदि संस्कृत से विकसित हुई हैं, हिन्दी मराठी ओर पंजाबी की तरह संस्कृत के बहुत से शब्द तत्सम तथा तत्सम रूप में इन सभी भाषाओं में प्रयुक्त होते हैं। यदि लिपि एक ही तो यह शब्द समानता इन सभी भाषाओं को समझने में सुविधा प्रदान करें। यूरोप की अंग्रेज़ी, फ्रेंच, पुर्तग़ाली आदि भाषाएं एक ही रोमन लिपि मे लिखी जाती हैं। इसी कारण इन भाषाओं को बोलने वाले लोग इन सभी को आसानी से पढ़ ओर सीख लेते हैं।
          प्रो. सुनीतिकुमार चटर्जी ने रोमन लिपि की इस प्रयोग की सुविधा को समझकर प्रस्ताव किया था कि एक इंडोरोमन लिपि हिन्दी के लिए स्वीकार की जाए और हिन्दी के वर्णों के लिए 26 वर्णों की रोमन लिपि को विशेष चिन्ह लगाकर उपस्थित किया जाए। उनका यह प्रस्ताव पुस्तक में ही रह गया और किसी ने इसे नहीं माना। लिपि के संबंध मे एक मोह सा जनता को होता है और उसके ऊपर उठना संभव नहीं होता। यदि देवनागरी लिपि जो उद्गम और विकास मे सर्वथा भारतीय है और अन्य भारतीय लिपियों से अधिकतर मिलती जुलतीं हैं, भारतीय भाषाओं की लिपि स्वीकार कर ली जाए तो भारतीय जनता का बड़ा उपकार होगा। तभी देवनागरी लिपि वास्तविक राष्ट्रलिपि होगी।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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स्वतंत्र लेखन वृक्ष
तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन 1983
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सम्मेलन संदर्भ
62. प्रथम और द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन: उद्देश्य एवं उपलब्धियाँ श्री मधुकरराव चौधरी
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