भारतीय पुरालिपियों का अन्वेषण  

दिल्ली के सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक़ (1351-1388) ने 1356 में टोपरा (अम्बाला ज़िला, हरियाणा) तथा मेरठ से अशोक के दो स्तम्भ बड़ी मेहनत से मंगवाकर दिल्ली में खड़े करवाए थे। ये स्तम्भ कितने परिश्रम और उत्साह से दिल्ली लाए गए थे, इसका विवरण फ़िरोज़ के अपने दरबारी इतिहासकार शम्स-इ-शीराज ने ‘तारीख़-इ-फ़िरोज़शाह’ में दिया है। इनमें से एक स्तम्भ फ़िरोज़शाह के कोटले में और दूसरा ‘कुश्क शिकार’ (शिकार का महल) के पास खड़ा करवाया गया था।

स्तम्भों का उल्लेख

फ़िरोज़ ने इन स्तम्भों पर उत्कीर्ण लेखों को पढ़ने के लिए बहुत से पण्डितों को आमंत्रित किया, किन्तु उस समय कोई ऐसा विद्वान् उसे नहीं मिला जो इन स्तम्भों को पढ़ सके। इससे पता लगता है कि 14वीं शताब्दी के पहले ही हमारे देश से ब्राह्मी लिपि तथा गुप्त लिपि का ज्ञान लुप्त हो गया था। यह ज्ञात होता है कि बादशाह अकबर को भी इन प्राचीन स्तम्भलेखों का अर्थ जानने की बड़ी इच्छा थी, परन्तु उसे भी अपने समय में ऐसा कोई विद्वान् नहीं मिला, जो इन्हें पढ़ सके।

17वीं शताब्दी के कुछ यूरोपीय पर्यटकों ने भी अपने यात्रा-विवरणों में इन स्तम्भों का उल्लेख किया है। टॉम कोरयट (यात्राकालः 1612-1618) ने दिल्ली के अशोक स्तम्भ को "महान एलेक्ज़ेंडर का स्तम्भ" समझ लिया और इस पर उत्कीर्ण ब्राह्मी लिपि लेख को यूनानी लिपि का लेख। अशोक के ब्राह्मी लेखों को यदि ग़ौर से देखें तो, यूरोप का कोई यात्री इन्हें सहज ही यूनानी लेख समझने की ग़लती कर सकता है। कोरयट के भी पहले विलियम फ़िच (यात्राकालः 1608-1611) ने दिल्ली और प्रयाग के अशोक स्तम्भों को देखा था। उसने अपने यात्रा ग्रन्थ में उनका विवरण भी दिया है।

एशियाटिक सोसायटी की स्थापना

18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब अंग्रेज़ों के पैर भारत में जम गए, तो उन्होंने भारतीय संस्कृति के अध्ययन की ओर कुछ ध्यान दिया। संस्कृत भाषा की समृद्धि ने तो यूरोपवासियों को और भी अधिक आकर्षित किया। सर विलियम जोन्स (1746-1794) की प्रेरणा तथा प्रयास से "एशिया के इतिहास, ....पुरातत्त्व कला, विज्ञान, साहित्य आदि के अनुशीलन के लिए" कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में 15 जनवरी, 1784 को एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना हुई। 1788 से इस सोसायटी का ‘एशियाटिक रिसर्चेज’ नाम से एक मुखपत्र भी प्रकाशित होने लग गया था। सोसायटी के माध्यम से बहुत-से यूरोपीय विद्वान् भारतीय पुरातत्त्व का अनुशीलन करने में जुट गए और इसी के साथ भारत की पुरालिपियों का अन्वेषण कार्य भी आरम्भ हो गया।

भारतीय पुरालिपियों का अध्ययन

विलियम जोन्स के सहयोगी चार्ल्स विल्किन्स (1750-1836) प्रथम अंग्रेज़ विद्वान् थे, जिन्होंने संस्कृत भाषा का गहरा अध्ययन किया। विल्किन्स ही पहले व्यक्ति थे, जिन्हें भारतीय पुरालिपियों को पढ़ने में कुछ सफलता मिली थी। 1781 में उन्होंने बंगाल के राजा देवपाल का मुंगेर से प्राप्त दानपत्र पढ़ा। 1785 में उन्होंने बदाल (दीनाजपुर ज़िला, पश्चिम बंगाल) के एक स्तम्भ पर उत्कीर्ण बंगाल के राजा नारायणपाल का लेख भी पढ़ा। पण्डित राधाकान्त शर्मा ने टोपरा से दिल्ली लाए गए अशोक स्तम्भ पर उकेरा हुआ विक्रम संवत 1220 का अजमेर के चौहान राजा आन्नल्लदेव के पुत्र बीसलदेव का लेख पढ़ा। इसी वर्ष जब हरिंग्टन ने बुद्धगया के पास की नागार्जुनी तथा बराबर गुफ़ाओं में पाए गए मौखरि वंश के राजा अनन्तवर्मा के लेखों को पढ़ने की कोशिश की, तो उसे सफलता नहीं मिली। परन्तु 1785-1789 के बीच चार्ल्स विल्किन्स, बड़े परिश्रम के बाद, इन लेखों को पढ़ने में सफल हो गए। इस प्रकार, विल्किन्स ने गुप्त लिपि की लगभग आधी वर्णमाला की पहचान कर ली थी।

1818 में कप्तान ट्रायर ने प्रयाग के अशोक स्तम्भ पर उत्कीर्ण समुद्रगुप्त का लेख पढ़ा। इसके बाद डब्ल्यू. एच. मिल तथा जेम्स प्रिन्सेप ने भी अनेक गुप्तकालीन लेख पढ़े। यह हम बतला ही चुके हैं कि विल्किन्स गुप्त लिपि की लगभग आधी वर्णमाला को खोज चुके थे। प्रिन्सेप, ट्रायर तथा मिल के प्रयासों से अब गुप्त लिपि की पूरी की पूरी वर्णमाला ज्ञात हो गई थी।

लेखों का संग्रह

अब तक गुप्त लिपि से भी पुरानी प्राचीन ब्राह्मी लिपि के अनेक लेखों का संग्रह हो चुका था। परन्तु उस लिपि के अधिक प्राचीन होने से उसे पढ़ पाना उतना आसान काम नहीं था। मज़ेदार बात यह है कि आरम्भ में प्रायः सभी पुराविद ब्राह्मी लिपि की भाषा को संस्कृत मान बैठे थे। लेकिन अन्त में ब्राह्मी लिपि का भी उदघाटन हो ही गया, और इसका श्रेय जेम्स प्रिन्सेप को जाता है।

ब्राह्मी लिपि का अन्वेषण

जेम्स प्रिन्सेप (1799-1840), जोकि 1832-1840 तक कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) की टकसाल के अधिकारी थे, बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी के सेक्रटरी भी थे। हम बतला चुके हैं कि उन्होंने गुप्त लिपि की वर्णमाला को पढ़ने में सहयोग दिया था। गुप्त लिपि के उदघाटन के बाद वे ब्राह्मी लिपि के अन्वेषण में लग गए। ज्ञात होता है कि वे लगातार सात साल तक इस काम में जुटे रहे। उन्होंने भारत के विभिन्न भागों से ब्राह्मी लिपि के लेखों की अनुकृतियाँ मंगवाईं और उनका तुलनात्मक अध्ययन करते रहे और उन्होंने ब्राह्मी लिपि के अक्षरों का गुप्त लिपि के अक्षरों के साथ मिलान करके देखना जारी रखा। अन्त में सांची के प्रसिद्ध स्तूपों से प्राप्त संक्षिप्त लेखों का अध्ययन करने पर उन्हें ब्राह्मी लिपि के उदघाटन की कुंजी मिल गई। यह कुंजी संयोगवश उनके हाथ कैसे लगी, इसका रोचक वर्णन उनके अपने शब्दों में ही पढ़िएः

जेम्स प्रिन्सेप के शब्दों में वर्णन

"मैं जब प्लेट नं. 17 (सांची के अभिलेख) के विभिन्न अंशों का संयोजन एवं शिला-मुद्रण कर रहा था, तो मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि इन सभी लेखों के अन्त में सदैव दो अक्षर-संकेत पाए जाते हैं, अर्थात् इन दो संकेतों पर विचार करते हुए मैंने यह भी जाना कि इनकी स्थिति स्वतंत्र है और ये शब्दांश संकेत नहीं हैं। आगे मैंने यह भी सोचा कि ये संकेत किसी मृत्यु-लेख या दान-लेख से सम्बन्धित होने चाहिए; क्योंकि ‘अवा’ के बुद्ध मन्दिरों तथा चैत्यों आदि के लिए मूर्तिदान या प्राकार-निर्माण के समय यह देखने को मिलता है कि दाता अपना नाम एवं दान वहाँ अंकित करवा देता है। इसके बाद मैंने देखा कि इन दो संकेतों वाले शब्द के पहले प्रायः अक्षर देखने को मिलता है, जिसके ‘स’ होने की जानकारी मुझे पहले से थी। केवल एक या दो दिन पहले ही सौराष्ट्र के एक सिक्के का अध्ययन करते समय मैंने यह जाना था कि यह संकेत सम्बन्ध-कारक एकवचन के प्रत्यय का अक्षर है, जोकि पालि में ‘स्स’ है और संस्कृत में ‘स्य’। अतः ‘अमुक का दान’ ही प्रत्येक संक्षिप्त लेख का अर्थ होना चाहिए। ‘आ’ की मात्रा तथा अनुस्वार के बिन्दु को मैं पहले से जानता था, इसीलिए अब मैं सहज ही उपर्युक्त दो संकेतों को ‘दानं’ के रूप में पढ़ सकता था। इस प्रकार मुझे ‘द’ और ‘न’ के दो नए अक्षर संकेत मिल गए। इन दो अक्षरों को खोजने की पहले भी मैंने बहुत कोशिश की थी, किन्तु हमेशा ही असफल रहा था। 1834 से अध्ययन करते चले आने के कारण अब मैं इस प्राचीन अक्षरमाला से इतना अधिक परिचित हो गया था कि प्रस्तुत लेख-संग्रह के शेष सभी लेखों को मैं आसानी से या कुछ परीक्षण के बाद पहचानने लग गया था। चंद मिनटों में ही मैंने सम्पूर्ण वर्णमाला को जान लिया और तदनन्तर इस वर्णमाला की परीक्षा के लिए इससे मैंने दिल्ली-स्तम्भ के लेख को भी पढ़ना आरम्भ कर दिया।" [1] प्रिन्सेप ने अपने उदघाटन की घोषणा 7 जून, 1837 को की। वस्तुतः इसका मुख्य सूत्र कुछ पहले ही उनके हाथ लग गया था, जैसा कि कनिंघम को 23 मई, 1837 को लिखे उनके पत्र से स्पष्ट होता है।

अशोक स्तम्भ के लेखों का अध्ययन

प्रिन्सेप ने आरम्भ में इस वर्णमाला को ‘सांची वर्णमाला’ का नाम दिया था। इस वर्णमाला का ज्ञान हो जाने के बाद उन्होंने अशोक के अन्य स्तम्भलेखों (लाटों पर अंकित लेखों) को भी पढ़ा। उन्होंने दिल्ली और प्रयाग के अशोक स्तम्भों के लेखों को पढ़कर उनका विस्तृत विवेचन प्रकाशित किया। अशोक के गिरनार वाले शिलालेख का अध्ययन करके उन्होंने कुछ यूनानी शासकों के नामों की भी खोज की। चूँकि, इन यूनानी शासकों का काल ज्ञात था, इसीलिए गिरनार के शिलालेख के निर्माता सम्राट अशोक का काल भी सुनिश्चित हो गया। इस प्रकार भारतीय पुरातत्त्वान्वेषण को एक सुदृढ़ तिथिगत आधार भी प्राप्त हो गया।

प्रिन्सेप की मृत्यु

केवल 41 वर्ष की अल्पायु में 22 अप्रैल, 1940 में प्रिन्सेप की मृत्यु हो गई। मिस्र की हाइरोग्लिफ़िक लिपि के अन्वेषण शाँपोल्यों और मेसोपोटामिया की कीलाक्षर लिपि के उदघाटन-कर्ता रॉलिन्सन की तरह भारत की ब्राह्मी लिपि के उदघाटन-कर्ता जेम्स प्रिन्सेप का नाम हमेशा ही गौरव और कृतज्ञता के साथ स्मरण किया जाएगा।

व्यापक अध्ययन

प्रिन्सेप की इस महान् खोज से भारतीय पुरातत्त्व में एक नये अध्याय का आरम्भ हुआ। उसके बाद भारत के प्राचीनतम अभिलेखों को भी पढ़ना सम्भव हो गया और भारतीय इतिहास तथा पुरातत्त्व की प्रायः प्रत्येक शाखा को सुदृढ़ आधार प्राप्त हो गया। इसके बाद भारतीय इतिहास से सम्बन्धित हर नई खोज का समकालीन लेखों के आधार पर अधिक व्यापक अध्ययन सम्भव हो गया। प्रिन्सेप के बाद फ़र्ग्युसन, कनिंघम, एडवर्ड टॉमस, वाल्टेयर इलियट, स्टीवेन्सन, डा. भाऊ दाजी, राजेन्द्रलाल मित्र जैसे अनेक चोटी के पुरालिपिविदों ने भारतीय लिपियों के अध्ययन तथा अन्वेषण को आगे बढ़ाया।

सिन्धु लिपि

सिन्धु सभ्यता के काल को सामान्यतः हम 2600 ई. पू. से 1700 ई. पू. तक मान सकते हैं। यद्यपि सिंधु लिपि अब तक पढ़ी नहीं गई है। किन्तु उसका अस्तित्व ही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि मिस्र, मेसोपोटामिया, चीन आदि की तरह भारत में एक समकालीन सभ्यता तथा लिपि विद्यमान थी। इसीलिए उन पुराविदों की धारणाओं का अपने आप खण्डन हो जाता है, जो मात्र इस आधार पर बैठे थे कि ब्राह्मी लिपि का निर्माण निश्चय ही किसी विदेशी लिपि के आधार पर हुआ होगा। अभी तो हम निश्चित रूप से यह भी नहीं बतला सकते कि सिन्धु सभ्यता आर्य सभ्यता थी या आर्येत्तर सभ्यता। जितने विद्वान् इसे द्रविड़ या आर्येत्तर सभ्यता मानते हैं, लगभग उतने ही विद्वान् इसे आर्य सभ्यता मानने के पक्ष में हैं। और, थोड़ी देर के लिए इसे स्वीकार कर भी लिया जाए कि सिन्धु सभ्यता आर्येत्तर थी, तब भी इस परिकल्पना के लिए पर्याप्त गुजांइश है कि आर्यों ने 1500 ई. पू. के आस-पास अपनी आर्यभाषा के लिए सिन्धु लिपि के आधार पर किसी ‘प्राक्-ब्राह्मी’ लिपि को जन्म दिया होगा।

दूसरी ओर, ई. पू. तीसरी शताब्दी के अशोक (272-232 ई. पू.) के दर्जनों शिलालेख एवं स्तम्भलेख भारत में लेखन की प्राचीनता के ठोस प्रमाण हैं। सिन्धु लिपि के बाद और अशोक के ब्राह्मी लेखों के पहले, भारत में लेखन के अस्तित्व के बारे में किस प्रकार के ठोस प्रमाण मिल सकते हैं।

अशोक से पहले के लेख

ब्राह्मी लिपि के दो-तीन ऐसे लेख उपलब्ध हैं, जिन्हें कुछ पुराविद अशोक से पहले के मानते हैं। महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचंद ओझा (ओझाजी) (1863-1940) को 1932 में अजमेर ज़िले के बड़ली गाँव से एक स्तम्भलेख का टुकड़ा मिला था, जिस पर अंकित अस्पष्ट ब्राह्मी लेख को उन्होंने "वीराय भगवत....चतुरासिति वस" पढ़ा था। इस लेख में ‘वी’ अक्षर को उन्होंने अशोक की ब्राह्मी से कुछ पहले का समझा और इस लेख को जैन तीर्थंकर महावीर के निर्वाण के 84 वर्ष बाद का, अर्थात् (527-84=) 443 ई. पू. का माना। ओझाजी के इस मत को कुछ विद्वानों ने स्वीकार किया, तो बहुतों ने उसे अस्वीकार भी किया है।

पिपरहवा लेख

पिपरावा (बस्ती ज़िला, उत्तर प्रदेश) के स्तूप से पत्थर का एक ऐसा पात्र मिला है, जिस पर ब्राह्मी लिपि में लेख उत्कीर्ण है। इस पात्र के भीतर अस्थिधातु भी मिले हैं, जो सम्भवतः भगवान बुद्ध के हैं। पात्र पर खुदे लेख से पता चलता है कि शाक्य क़बीले के लोगों ने इस स्तूप के भीतर इन धातुओं को स्थापित किया था। भगवान बुद्ध का निर्वाण 483 ई. पू. में हुआ था। अतः माना जा सकता है कि बुद्ध के निर्वाण के कुछ वर्षों बाद ही उनके शाक्य स्वजनों ने उनकी अस्थियों की इस स्तूप में स्थापना की थी। ब्यूह्लर भी पिपरावा लेख को अशोक से पहले का मानते हैं। परन्तु इधर कुछ पुरालिपिविद इस मत को अस्वीकार करने लग गए हैं।

ब्राह्मी लिपि का प्रचार

सोहगौरा (गोरखपुर ज़िला, उत्तर प्रदेश) से एक ऐसा ताम्रपत्र मिला है, जिस पर ब्राह्मी लिपि की चार पंक्तियाँ अंकित हैं। इसके ऊपरी भाग में कुछ ऐसे चिह्न या प्रतीक हैं, जो चन्द्रगुप्त मौर्य (324-300 ई. पू.) के सिक्कों पर भी मिलते हैं। इसीलिए अब बहुत से विद्वान् इस ताम्रपत्र को चन्द्रगुप्त का ही स्वीकार करते हैं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि यह ई. पू. चौथी शताब्दी के उत्तरार्ध का ब्राह्मी लेख है। कुछ विद्वान् इसे ही ब्राह्मी का प्राचीनतम उपलब्ध लेख मानते हैं। महास्थान से भी लगभग इसी काल का एक ब्राह्मी लेख मिला है। अन्य दो-तीन प्रमाणों से यह सिद्ध हो जाता है कि ई. पू. चौथी शताब्दी में भी उत्तर भारत में ब्राह्मी लिपि का प्रचार था।

लिप्यंतर

सवतियान महमतन ससने मनवसिति क-
डा सिलिमाते वसगमे व एते दवे कोठगलनि
तिघवनि माथुल चचु मोदाम भलकन छ-
ल कयियति अतियायिकाय. नो गहितवय

अर्थात् श्रावस्ती के महापात्रों का मानवशीति कैम्प से आदेश हैः श्रीमान वंशग्राम में ये दो तिमंजिले कोष्ठागार हैं। ये माथुर, चंचु, मोदाम, भल्लक (नामक गाँवों में) विपत्तिकाल में काम में लाए जाएँ। (अन्यथा) नहीं लिए जाएँ।

पाणिनि

पाणिनि का समय सामान्यतः ई.पू. पाँचवीं शताब्दी माना जाता है और पाणिनि की ‘अष्टाध्यायी’ में हमें उस समय लेखन का प्रचार होने के बारे में पर्याप्त जानकारी मिलती हैं। गोल्डस्टुकर तो यहाँ तक कहते हैं कि पाणिनि के समय में हस्तलिपियों के रूप में वैदिक साहित्य उपलब्ध था। सम्भव है कि पाणिनि के समय में हस्तलिखित ग्रन्थों से अध्ययन-अध्यापन करने का रिवाज न रहा हो और केवल कथन-श्रवण परम्परा के अनुसार ही विद्याध्ययन का सिलसिला प्राचीन काल से चला आता रहा हो। परन्तु पाणिनि कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि उनके समय में लेखन का अस्तित्व था। अष्टाध्यायी में ‘ग्रन्थ’, ‘लिपि’ (या ‘लिबि’), ‘लिपिकार’ और ‘यवनानी’ (यवनों की लिपि) जैसे शब्दों का उल्लेख मिलता है। लिखने वाले के लिए ही अष्टाध्यायी में ‘लिपिकर’ ‘लिबिकर’ शब्द का प्रयोग हुआ है। उस समय लेखन के लिए ‘लिपि’ या ‘लिबि’ शब्द प्रचलित था। कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में भी वर्णमाला के लिए ‘लिपि’ और अंकों के लिए ‘संख्यान’ शब्द मिलते हैं। हख़ामनी सम्राट दारयवुश (521-485 ई.पू.) के बेहिस्तुन लेख में ‘उत्कीर्ण लेख’ के लिए ‘दिपि’ शब्द का प्रयोग देखने को मिलता है। अशोक ने अपने लेखों के लिए सदैव, ‘धम्मलिपि’ या ‘धम्मदिपि’ शब्द का प्रयोग किया है। इसीलिए यह स्पष्ट है कि पाणिनि का ‘लिपि’ शब्द लेखन का ही द्योतक है।

पाणिनि के उल्लेख

पाणिनि के उल्लेखों से यह भी पता चलता है कि उनके समय में चौपायों के कानों पर निशान के रूप में चिह्न बनाए जाते थे। इन चिह्नों में ‘अष्ट’ तथा ‘पंच’ के चिह्न निस्संदेह अंक 8 तथा 5 के द्योतक थे। पाणिनि ने ‘यवनानी’ शब्द का जो उल्लेख किया है उसका अर्थ कात्यायन और पतंजलि ने ‘यवनाल्लिप्याम्’ अर्थात् ‘यवनों की लिपि’ किया है। कीथ, वेबेर आदि विद्वानों का मत है कि यहाँ ‘यवनानी’ का अर्थ ग्रीक अर्थात् यूनानी (आयोनियन) लिपि से है। इससे ज्ञात होता है कि पाणिनि यूनानी लिपि से भी परिचित थे।

ई.पू. पाँचवीं शताब्दी से पहले के वैदिक साहित्य में भी लेखन के अस्तित्व के बारे में बहुत से साहित्यिक प्रमाण मिलते हैं। पं. गौरीशंकर ओझा ने गम्भीर अनुशीलन के बाद अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘भारतीय प्राचीन लिपिमाला’ में इन सभी उल्लेखों को प्रस्तुत किया है। जो विद्वान, विशेषतः विदेशी विद्वान् यह मानते थे कि तीसरी शताब्दी ई.पू. के पहले भारत में लेखन का प्रचार नहीं था और ब्राह्मी लिपि का निर्माण विदेशी लिपि के आधार पर हुआ है, उनके मतों का सप्रमाण खण्डन करने के लिए ही ओझाजी ने प्राचीन भारतीय वाङ्मय से खोज-खोजकर लिपि, अक्षर तथा लेखन के अस्तित्व के बारे में अनेक उल्लेख प्रस्तुत किए थे। विशेष बात यह है कि ओझाजी के ग्रन्थ का दूसरा संस्करण 1918 में प्रकाशित हुआ था और तब तक सिन्धु लिपि का उदघाटन नहीं हुआ था। इसीलिए भी भारतीय लिपि की मौलिकता सिद्ध करने के लिए ओझाजी को बड़ा परिश्रम करना पड़ा था। लेकिन अब तो प्रायः सभी विद्वान् यह स्वीकार करते हैं कि भले ही चौथी शताब्दी ई.पू. के पहले के निर्विवाद ब्राह्मी लेख न मिले हों, किन्तु ई. पू. सातवीं-आठवीं शताब्दी में भी भारत में ब्राह्मी लिपि का अस्तित्व था।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. जर्नल ऑफ़ द एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल, खण्ड 6, भाग-1, पृष्ठ-460-1

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