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मेसोपोटामिया  

मेसोपोटामिया
मेसोपोटामिया
विवरण 'मेसोपोटामिया' विश्व की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यता वाला स्थान है। इसे कांस्ययुगीन सभ्यता का उद्गम स्थल माना जाता है।
सम्मिलित क्षेत्र इराक़, उत्तर-पूर्वी सीरिया, दक्षिण-पूर्वी तुर्की तथा ईरान का क़ुज़ेस्तान प्रांत।
संबंधित लेख हम्मूराबी, हड़प्पा, मोहनजोदाड़ो, चन्हूदड़ों, हड़प्पा समाज और संस्कृति, सिन्धु लिपि
अन्य जानकारी मेसोपोटामिया के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। कुम्हार के चाक का प्रयोग सर्वप्रथम इसी सभ्यता में हुआ।

मेसोपोटामिया (अंग्रेज़ी: Mesopotamia) प्राचीन सभ्यता से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण इलाक़ा है। यह एक कांस्य युगीन सभ्यता थी। यह इलाक़ा दजला[1] और फ़रात[2] नदियों के बीच के क्षेत्र में पड़ता है। इसमें आधुनिक इराक़, उत्तर-पूर्वी सीरिया, दक्षिण-पूर्वी तुर्की तथा ईरान का क़ुज़ेस्तान प्रांत के क्षेत्र सम्मिलित हैं। मेसोपोटामिया का यूनानी अर्थ है- "दो नदियों के बीच"।

कांस्य युगीन सभ्यता

यह कांस्य युगीन सभ्यता का उद्गम स्थल माना जाता है। यहाँ सुमेर, अक्काद सभ्यता, बेबीलोन तथा असीरिया के साम्राज्य अलग-अलग समय में स्थापित हुए थे। मेसोपोटामिया हज़ारों साल तक एक कृषि प्रधान समाज था। उसके बाद ही वह एक आधुनिक राज्य के रूप में उभरा।

इतिहास

चौथी शताब्दी ई. पू. के अंत तक मेसोपोटामिया में राज्यों की स्थापना हो चुकी थी और 'दजला और फ़रात' नदियाँ जहाँ क़रीब आ जाती हैं, वहाँ बेबीलोन नगर बस चुका था। यह एक बड़ा व्यापारिक नगर था, जहाँ बड़ी-बड़ी मंडियाँ और गोदाम थे। बेबीलोन में 1792 ई. पू. में 'हम्मूराबी' नामका एक शासक हुआ था, जिसने 1750 ई. पू. तक शासन किया। बेबीलोन में अपार सम्पदा थी और हम्मूराबी के पास विशाल सेना। हम्मूराबी एक-एक कर आस-पास के राज्य हस्तगत करता गया। अपने आप को वह देवता समझता था और इस बात का उसे बहत गर्व था। उसने अपनी प्रजा के लिये एक क़ानून संहिता बनाई थी, जो इतिहास में 'हम्मूराबी संहिता' के नाम से बहुत प्रसिद्ध है।
हम्मूराबी संहिता

आयात निर्यात

सिन्धु से मेसोपोटामिया को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में सूती वस्त्र, इमारती लकड़ी, मशाले, हाथीदांत एवं पशु-पक्षी रहे होगें। उर, किश, लगश, निष्पुर, टेल अस्मर, टेपे, गावरा, हमा आदि मेसोपोटामिया के नगरों से सिन्धु सभ्यता की लगभग एक दर्जन मुहरें मिली हैं। मेसेपोटामिया से सिन्धु सभ्यता के नगरों द्वारा आयात की जाने वाली वस्तुओं में मोहनजोदाड़ो से प्राप्त हरिताभ रंग का क्लोराइट प्रस्तर का टुकड़ा, जिस पर चटाई की तरह डिजाइन बनी है, उल्लेखनीय है। मेसोपाटामिया और सिन्धु सभ्यता के बीच व्यापारिक सम्बन्धों के विषय में अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर यह ज्ञात होता है कि दिलमुन से सोना, चाँदी, लाजवर्द, माणिक्य के मनके, हाथीदांत, की कंघी, पशु-पक्षी, आभूषण आदि आयात किया जाता था। मेसोपाटामिया में प्राप्त सिंधु सभ्यता से सम्बन्धित अभिलेखों एवं मुहरों पर ‘मेलुहा‘ का ज़िक्र मिलता है। मेसोपोटामिया में प्रवेश हेतु ‘उर‘ उक महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह था। दिलमुन की पहचान फ़ारस की खाड़ी के बहरीन द्वीप से की जाती है। दिलमुन सैंधव व्यापारिक केन्द्रों तथा मेसोपोटामिया के साथ व्यापार का मध्यस्थ बंदरगाह था। भारत में लोथल से फ़ारस की मुहरें प्राप्त हुई हैं। उन्होंने उत्तरी अफ़गानिस्तान में एक वाणिज्य उपनिवेश स्थापित किया था, जिसके सहारे उनका व्यापार मध्य एशिया के साथ चलता था।

महत्त्वपूर्ण तथ्य

ब्रिटिश संग्रहालय, मेसोपोटामिया
  • मेसोपोटामिया के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। कुम्हार के चाक का प्रयोग सर्वप्रथम इसी सभ्यता में हुआ।
  • सुमेरियन लोगों ने 'क्यूनिफार्म लिपि' विकसित की थी। सबसे पहले एक ब्रिटिश अफसर हेनरी रॉलिन्सन ने इसे इसे पढ़ा था।
  • पाइथोगोरस प्रमेय भी मेसोपोटामिया सभ्यता की ही देन है।
  • इस सभ्यता के लोग खगोलविद्या में भी निपुण थे। इन लोगों ने दिन और रात की लम्बाई की गणना की तथा सूर्य और चन्द्रमा के उदय व अस्त होने के समय की गणना की।
  • यहाँ के खगोलविदों ने एक दिन को 24 घण्टों में बाँटा। उन्होंने आकाश को 12 हिस्सों में बाँटा व प्रत्येक को एक नाम दिया। इन्हें राशियाँ कहा गया। चन्द्र कलैण्डर भी इनके द्वारा बनाया गया।
  • ऐतिहासिक प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि समुद्री मार्ग से सुमेर, बेबीलोन और सिन्धु प्रदेश के बीच गहरे व्यापारी सम्बन्ध थे। भूतकाल में भारत भी वाणिज्य संबंधी कार्यों में बहुत प्रसिद्धि प्राप्त कर चुका था।
  • मिस्र, मेसोपोटामिया और चीन की आरंभिक लिपियां मुख्यत: भाव-चित्रात्मक थीं।
  • लोथल का बंदरगाह महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में से था। इस बन्दरगाह पर मिस्र तथा मेसोपोटामिया से जहाज़ आते जाते थे। मेसोपोटामिया की एक उत्कीर्ण मुद्रा भी लोथल से मिली है। इन प्रमाणों से यह प्रकट होता है कि समुद्री मार्ग से भी सुमेर-बेबीलोन और सिन्धु प्रदेश के बीच गहरे व्यापारी सम्बन्ध थे।
  • इसमें सन्देह नहीं कि हड़प्पा समुदाय की शहरी आबादी में जो आर्थिक विषमता थी, वह लगभग वर्गभेद जैसी थी।[3] व्हीलर की राय है कि हड़प्पा और मेसोपोटामिया के निवासियों के बीच दास व्यापार भी हुआ करता था।[4]
  • यह ज्ञात नहीं है कि अपने दैनिक व्यवहार में सिन्धुजन किस लेखन-सामग्री का इस्तेमाल करते थे। उनके समकालीन मेसोपोटामिया के निवासी एक छोटी कील से गीली मिट्टी के फलकों पर अक्षर उकेरते थे। वे कीलाक्षर लेख पढ़े जा चुके हैं, परन्तु सिन्धु लिपि अभी भी अज्ञेय बनी हुई है।


इन्हें भी देखें: हड़प्पा, मोहनजोदाड़ो, चन्हूदड़ों, हड़प्पा समाज और संस्कृति एवं सिन्धु लिपि


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. टिगरिस
  2. इयुफ़्रेटीस
  3. चाइल्ड : द मोस्ट एनशिएंट ईस्ट, पृष्ठ 175.
  4. व्हीलर : ‘द इंडस सिविलिजेशन’, (सप्लीमेंट वाल्यूम टु केंब्रिज हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया, I), पृष्ठ 94.

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