मौर्यकाल में दास प्रथा  

  • मेंगस्थनीज़ ने लिखा है कि सभी भारतवासी समान हैं और उनमें कोई दास नहीं है।
  • डायोडोरस ने लिखा है, "क़ानून के अनुसार उनमें से कोई भी किसी भी परिस्थिति में दास नहीं हो सकता।"
  • मेगस्थनीज़ को ही उद्धृत करते हुए स्ट्राबों का कहना है, "भारतीयों में किसी ने अपनी सेवा में दास नहीं रखे।"
  • एक अन्य स्थल पर स्ट्राबो ने कहा, "चूँकि उनके पास दास नहीं हैं, अतः उन्हें बच्चों की अधिक आवश्यकता होती है।

विदेशी शक्तियों के वक्तव्यों का शब्दशः स्वीकार नहीं किया जा सकता। क्योकि कम से कम बुद्ध के काल से ही दासों को उत्पादन के काम में लगाया जाता था और पालि त्रिपिटक में इसके असंख्य उल्लेख हैं। अतः उपर्युक्त विवरणों की व्याख्या विभिन्न प्रकार से की जा सकती है। हो सकता है कि मेगस्थनीज़ को भारत में दासों के प्रति स्वामियों के द्वारा व्यवहार निर्मल और सदभावनापूर्ण लगा हो अथवा यह भी सम्भव है कि उसने किसी विशेष क्षेत्र का ही उल्लेख किया हो। एक स्थान पर तो कौटिल्य ने लिखा है कि न त्वेवार्यस्य दासावः, अर्थात किसी भी परिस्थिति में आर्य के लिए दासता नहीं होगी। इस संदर्भ में मेगस्थनीज़ के कथन का यह अर्थ हो सकता है कि स्वतंत्र लोगों को आजीवन दासता में परिणत करने की सीमाएँ थीं।


मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था में दासों का महत्त्वपूर्ण योगदान था। त्रिपिटक की तुलना में कौटिल्य ने कहीं अधिक विस्तार से दासों का वर्गीकरण किया है। जहाँ त्रिपिटक में दासों के चार प्रकार बताए गए हैं, कौटिल्य ने नौ का उल्लेख किया है।[1] और फिर 'दास कल्प' नामक खण्ड में दिए गए नियम उस तीसरे अध्याय के अंग हैं, जिसमें क़ानूनी मामलों की चर्चा है। इसका अर्थ हुआ कि कौटिल्य ने दास प्रथा की क़ानूनी वैधता को स्वीकार किया था। बौद्ध ग्रंथों एवं कौटिल्य अर्थशास्त्र में उत्पत्ति एवं कार्यों के आधार पर किए गए दासों के वर्गीकरण से स्पष्ट है कि वे सम्पत्ति का एक रूप थे। यह एक रोचक तथ्य है कि इन कृतियों में पाई जाने वाली दास सम्बन्धी परिभाषाएँ एवं व्याख्याएँ उस अंतर की ओर इंगित नहीं करती जो वैदिक काल में दास एवं आर्य में था। सांस्कृतिक एवं नृजातीय विभिन्नताओं को आधार नहीं माना गया है। अब दास प्रथा केवल आर्थिक कारणों से सम्बन्धित थी।

केन्द्रीय राजतांत्रिक व्यवस्था पर आधारित मौर्य साम्राज्य की स्थापना से दास प्रथा में अन्य रूपांतरण भी हुए। अभियान करके ज़बरदस्ती लोगों का अपहरण करने की नीति पर कौटिल्य द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का निर्वचन इसी प्रकार किया जा सकता है। देश की राजनीतिक एकता के पश्चात् इस प्रकार के अभियानों का अर्थ गौण हो गया। किन्तु दूसरी ओर इस राजनीतिक एकीकरण ने एक ऐसी प्रक्रिया को जन्म दिया, जो देश के आर्थिक एकीकरण तथा साम्राज्य के कोने कोने में व्यापार के विकास को न केवल बना रही थी अपितु प्रोत्साहित भी कर रही थी। इस प्रक्रिया के फलस्वरूप नगरों का उदय हुआ और व्यापारियों का प्रभाव बढ़ा। सेट्ठियों के स्वार्थ हित न केवल नगरों में थे अपितु ग्रामीण क्षेत्रों से भी जुड़े थे। वे भू स्वामी थे और कभी कभी तो सम्पूर्ण गाँव उनके अधीन होते थे। इन भूमियों पर उनके दास काम करते थे अथवा उन्हें किराए पर उठा लिया जाता था। यह काफ़ी तर्कसंगत लगता है कि दास श्रम के द्वारा भूमि कर्षण का यह तरीक़ा पर्याप्त सामान्य बात हो गयी थी। मौर्यों ने इसको समाप्त करने का प्रयास नहीं किया। अशोक के काल में कलिंग के युद्ध के पश्चात् सहस्रों बंदियों की प्राप्ति हुई और यह असम्भव नहीं लगता कि उनमें से कुछ तो मगध के बाज़ारों तक पहुँचे हों और कुछ को उन उत्पादक गतिविधियों में लगाया गया हो, जिनके माध्यम से मध्य गंगा घाटी की संस्कृति के तत्वों का प्रसार दूरस्थ कबायली क्षेत्रों में किया गया। कौटिल्य के विवरणों से यह भी स्पष्ट है कि राज्य की भूमि पर कृषि कार्य में, ख़ादानों में, कारखानों में, सुरक्षा प्रबंधों में भी दासों एवं दासियों का प्रयोग किया जाता था।

मौर्य साम्राज्य में जिस विस्तृत नौकरशाही के प्रमाण उपलब्ध हैं, उसको बनाए रखने के लिए राज्य को पर्याप्त धन की आवश्यकता होती होगी। चूँकि यह भी स्पष्ट है कि अधिकारियों को वेतन नक़द दिया जाता था, अतः यह अत्यन्त आवश्यक था कि राज्य प्रत्येक सम्भव स्रोत से धनार्जन करें। एक ओर जहाँ विकासशील कृषि एवं व्यापार के क्षेत्र से राज्य की आय बढ़ाना स्वाभाविक था, वहाँ दूसरी ओर हम यह भी देखते हैं कि जुआघरों, मद्यपान की दुकानों, वेश्याघरों, आदि को भी आय का स्रोत बनाने में हिचक महसूस नहीं की गयी। वेश्याघरों के पनपने में तो राज्यों ने पूँजी निवेश भी किया। गणिकाओं के प्रशिक्षण ओर उन्हें ललित कलाओं में निपुण बनाने में राज्य का जो व्यय होता था, उसके कारण वे गणिकाएँ पूर्ण रूप से राज्य के नियंत्रण में थी। उनकी आमदनी एवं सम्पत्ति पर राज्य का अधिकार था। उनकी मुक्ति तभी सम्भव थी, जब कि उन पर किए खर्च का 24 गुना धन दिया जाए। इस प्रावधान की पूर्ति लगभग असम्भव ही थी। अतः वे गणिकाएँ दासी तुल्य ही थीं। हालाँकि उनको सभी प्रकार के कामों में नहीं लगाया जा सकता था। उच्च सामाजिक वर्ग की सेवा करने वाली गणिका के अतिरिक्त, राज्य के पास वेश्याओं का ऐसा समूह भी था जो बंधकी—पोषकों के अधीन था और जिनके माध्यम से राज्य को काफ़ी आय होती थी। घरों में भी दास अनेक कार्य करते थे।

दास प्रथा से सम्बन्धित कौटिल्य के विवरण का एक महत्त्वपूर्ण अंग आहितकों का वर्णन है। कौटिल्य ने आजीवन दासों एवं किसी काल विशेष के लिए समझौते द्वारा उत्पन्न दासों में अंतर रखा है। दास प्रथा पर आधारित अन्य पुरातन समाजों की भाँति भारत में भी दासों के व्यक्तित्व एवं उसके श्रम का निपटारा करने में स्वामी को असीमित अधिकार प्राप्त थे। एक दास के रूप में जो व्यक्ति किसी अन्य की सम्पत्ति था, वह सभ्य समाज का सदस्य नहीं हो सकता था। उपर्युक्त अभिधारणा तो पूर्ण दासों के लिए ही सही उतरती है, किन्तु दूसरी ओर ऐसे लोग थे, जो अस्थायी रूप से बंधक एवं आश्रित थे। इनको कौटिल्य ने 'आहितक' कहा है। ये लोग एक निश्चित काल के लिए ही सेवा करने के उत्तरदायी होते थे और यह अवधि बीत जाने के बाद एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के अधिकारी थे। कर्मकांडीय अशौच कृत्यों को करने के लिए उन पर कोई दबाव डालने पर प्रतिबंध था। उसे बेचा नहीं जा सकता था और न उसे धारक बनाया जा सकता था। स्वामी की इच्छा के बिना समय पर आने पर वह स्वतंत्र हो जाता था। अर्थशास्त्र के अनुसार सही अर्थों में तो केवल बर्बर, म्लेच्छा ही, जो वर्ण से बाहर थे, तथा अनार्य (यहाँ पर आर्यों में शूद्र सम्मिलत हैं) समाज के सदस्य स्थायी रूप से दास बनाए जा सकते थे। यह निर्धारित करना कठिन है कि इस नियम का पालन वास्तविकता में कितना होता था, किन्तु बंधक रखने की सीमाओं को सीमित करने के प्रयास तथा समुदाय में स्वतंत्र सदस्यों को दास रूप में परिणत करने की सम्भावनाओं को कम करना प्राचीन युग के अनेक समाजों की विशेषता है। कुल मिलाकर अर्थशास्त्र के विवेचन से स्पष्ट होता है कि राज्य किसी प्रकार से दासों के स्तर को नियंत्रित और दास प्रथा की समस्याओं का स्पष्टीकरण करने के लिए इच्छुक था।



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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. उदर—दास, दण्ड—प्रणीत, गृहे—जात, ध्वजाहत, दायागत, लब्ध, क्रीत, आत्म—विक्रिय एवं आहितक।

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