मौर्योत्तर काल  

मौर्य साम्राज्य की लड़खड़ाती हुई दीवार ई. पू. 187 में ढह गई और मौर्य साम्राज्य के अंत के साथ ही भारतीय इतिहास की राजनीतिक एकता कुछ समय के लिए खंडित हो गई। अब हिन्दुकुश से लेकर कर्नाटक एवं बंगाल तक एक ही राजवंश का आधिपत्य नहीं रहा। देश के उत्तर पश्चिमी मार्गों से कई विदेशी आक्रांताओं ने आकर अनेक भागों में अपने अपने राज्य स्थापित कर लिए। दक्षिण में स्थानीय शासक वंश स्वतंत्र हो उठे। कुछ समय के लिए मध्य प्रदेश का सिंधु घाटी एवं गोदावरी क्षेत्र से सम्बन्ध टूट गया और मगध के वैभव का स्थान साकल, विदिशा, प्रतिष्ठान, आदि कई नगरों ने ले लिया।

ऐतिहासिक स्रोत

भारतीय धार्मिक एवं धर्मेतर साहित्य, विदेशी साहित्यक ग्रंथों, अभिलेखों, सिक्कों एवं अन्य पुरातात्विक खोजों के आधार पर इस काल के इतिहास की पुनर्रचना में सहायता मिलती है। पुराण एवं स्मृति ग्रंथ इस काल के विषय में जानकारी के स्रोत हैं। इसके अतिरिक्त बौद्ध धार्मिक ग्रंथों से भी तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक स्थिति का पता चलता है। बौद्ध जातक ग्रंथों का रचनाकाल ईसा पूर्व प्रथम शती से लेकर ईस्वी सन् दूसरी या तीसरी शती तक माना जाता है। दिव्यावदान, ललितविस्तर, मंजूश्रीमूलकल्प नामक बौद्ध ग्रंथ भी इस काल के इतिहास पर प्रकाश डालते हैं। 'मिलिन्दपञ्ह' नामक पुस्तक से हमें मिनांडर नामक यूनानी शासक के विषय में जानकारी मिलती है। धर्मेतर साहित्य में पतंजलि के महाभाष्य से हमें पुष्यमित्र शुंग के राज्यकाल की कुछ घटनाओं का पता चलता है। गार्गी संहिता में यवनों के आक्रमण का उल्लेख है। कालिदास कृत "मालविकाग्निमित्र" से भी पुष्यमित्र कालीन यवन आक्रमण के कुछ विवरण मिलते हैं।

सन 80 के लगभग किसी यूनानी नाविक ने "पेरिप्लस आफ़ दि एरिथियन सी" नामक पुस्तक में भारतीय समुद्रों का हाल लिखा था। इस पुस्तक से ईस्वी सन् की पहली शती में भारत की व्यापारिक गतिविधि का पता चलता है। स्ट्राबो के 'भूगोल' एवं प्लिनी कृत 'नेचुरल हिस्ट्री' में उन देशों के विविध पक्षों का वर्णन मिलता है जिनके साथ उस समय भूमध्यसागरीय देशों का व्यापारिक सम्बन्ध था। ये दोनों कृतियाँ ईस्वी सन् की आरम्भिक दो शताब्दियों की हैं। चीन के राजवंशों के प्रारम्भिक इतिहास ग्रंथ भी इस काल के सम्बन्ध में उपयोगी सामग्री प्रदान करने में सहायक हुए हैं।

राजाओं के अभिलेखों में प्रशस्तियाँ और राजाज्ञाएँ प्रमुख हैं। प्रशस्तियों में सबसे अधिक प्रसिद्ध है गौतमी वलश्री का नासिक अभिलेख, जिसमें गौतमीपुत्र शातकर्णी का वर्णन है। रुद्रदामा का गिरनार शिलालेख भी उस समय का प्रसिद्ध अभिलेख है। इस समय का इतिहास लिखने में सिक्के बहुत उपयोगी सिद्ध हुए हैं। भारतीय सिक्कों पर पहले केवल देवताओं के चित्र ही अंकित रहते थे, उनका नाम या तिथि उत्कीर्ण नहीं की जाती थी। जब से उत्तर पश्चिमी भारत पर बैक्ट्रिया के यूनानी राजाओं का शासन प्रारम्भ हुआ, सिक्कों पर राजाओं के नाम व तिथियाँ उत्कीर्ण की जाने लगीं। शक, पल्लव और कुषाण राजाओं ने भी यूनानी राजाओं के अनुरूप ही सिक्के चलाए। भारतीय शक राजाओं और मालव यौधेय आदि गण राज्यों के इतिहास पर उनके सिक्के पर्याप्त प्रकाश डालते हैं। वास्तव में सिक्कों के इतिहास की दृष्टि से यह काल अभूतपूर्व है। सिक्कों की मात्रा से ही नहीं अपितु विविध धातुओं तथा विविध इकाइयों में मिलने वाले सिक्कों से यह संकेत मिलता है कि मुद्रा - प्रणाली किस प्रकार जनजीवन का एक अभिन्न अंग बन गई थी।

विदेशी आक्रमण बैक्ट्रिया के ग्रीक

उत्तर पश्चिमी से विदेशियों के आक्रमण मौर्योत्तर काल की सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटना थी। इनमें सबसे पहले आक्रांता थे बैक्ट्रिया के ग्रीक, जिन्हें पूर्ववर्ती भारतीय साहित्य में यवन के नाम से सम्बोधित किया गया है। सिकन्दर ने अपने पीछे एक विशाल साम्राज्य छोड़ा था, जिसमें मैसीडोनिया, सीरिया, बैक्ट्रिया, पार्थिया, अफ़ग़ानिस्तान एवं उत्तर पश्चिमी भारत के कुछ भाग सम्मिलित थे। इस साम्राज्य का काफ़ी बड़ा भाग सिकन्दर के बाद [सेल्युकस] के अधीन रहा। यद्यपि अफ़ग़ानिस्तान एवं भारत के उत्तर पश्चिम के भाग उसे चंद्रगुप्त मौर्य को समर्पित कर देने पड़े थे। सेल्यूकस एवं उसके तुरन्त बाद के अधिकारी कुशल शासक थे किन्तु उनके परवर्ती शासकों के अधीन साम्राज्य का विघटन प्रारम्भ हो गया। लगभग ई. पू. 250 में बैक्ट्रिया के गवर्नर डियोडोटस एवं पार्थिया के गवर्नर औरेक्सस ने अपने आपको स्वतंत्र घोषित कर दिया। बैक्ट्रिया के दूसरे राजा डियोडोटस द्वितीय ने अपने देश सेल्युकस के साम्राज्य से पूर्णतः अलग कर लिया।

हिन्द पार्थियन

ई. पू. पहली शती के अन्त में पार्थियन नामों वाले कुछ शासक उत्तर पश्चिम भारत पर शासन कर रहे थे, जिन्हें भारतीय स्रोतों में 'पहलव' कहा गया है। पार्थिया ने भी बैक्ट्रिया के साथ ही स्वयं को यूनानी शासन से स्वतंत्र किया था और सेल्यूकस वंशीय शासक एण्टियोकस तृतीय को इसकी स्वतंत्रता को भी मान्यता देनी पड़ी थी।

शक

लगभग ई. पू. 165 में यह क़बीला 'यूची' नामक एक अन्य क़बीले के द्वारा मध्य एशिया से खदेड़ दिया गया था। इसने आगे बढ़ते हुए बैक्ट्रिया, पार्थिया आदि पर आक्रमण किया, फिर और आगे बढ़कर हिन्द—पार्थियन राजाओं से युद्ध किया। भारत में शक राजा अपने आप को क्षत्रप कहते थे। शक शासकों की भारत में दो शाखाएँ हो गई थीं। एक उत्तरी क्षत्रप कहलाते थे जो तक्षशिला एवं मथुरा में थे और दूसरे पश्चिमी क्षत्रप कहलाते थे जो नासिक एवं उज्जैन के थे। पश्चिमी क्षत्रप अधिक प्रसिद्ध थे। इस वंश का अन्तिम राजा रुद्रसिंह तृतीय था। चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने उसे मारकर पश्चिमी क्षत्रपों के राज्य को गुप्त साम्राज्य में मिला लिया।

कुषाण

मौर्योत्तरकालीन विदेशी आक्रमणों की शृंखला में यूची अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। लगभग ई. पू. 165 में इसके पड़ौसी क़बीले हिंग नू ने यूचियों के नेता को मारकर उन्हें पश्चिमी चीन का क्षेत्र छोड़ने पर विवश कर दिया था। इसी क्षेत्र में यह क़बीला दो शाखाओं में विभक्त हो गया -

  1. कनिष्क यूची, जो तिब्बत की ओर चले गए।
  2. ज्येष्ठ यूची जो पश्चिम की ओर बढ़े और उन्होंने बैक्ट्रिया, पार्थिया, आदि के शासकों को पराजित किया।

दक्षिण में मौर्योत्तर राज्य

उत्तरी भारत के समान दक्षिण में भी मौर्य साम्राज्य के अन्त के बाद नए राज्यों का उदय हुआ। ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी के मध्य में कलिंग राज्य अपने राजा खारबेल के नेतृत्व में शक्तिशाली हो गया, इसी समय उत्तर पश्चिम दक्षिण के सातवाहन राज्य का उदय हुआ।

राज्य व्यवस्था एवं प्रशासन

ईसा पूर्व शताब्दी से लेकर ईसा की तृतीय शताब्दी तक का भारत का राजनीतिक इतिहास परस्पर संघर्षरत शासकों एवं विदेशी आक्रांताओं का एक अव्यवस्थापूर्ण चित्र उपस्थित करता है। मौर्योत्तर काल में अधिकतर राज्य छोटे छोटे थे। यद्यपि उत्तर में कुषाणों एवं दक्षिण में सातवाहनों ने काफ़ी विस्तृत प्रदेशों पर राज्य किया, किन्तु फिर भी न तो सातवाहन के और न कुषाणों के राजनीतिक संगठन में ही वह केन्द्रीकरण था जो मौर्य प्रशासन की विशेषता थी। इन दोनों ही राजवंशों के शासकों ने कई छोटे छोटे राजाओं से सामन्ती सम्बन्ध स्थापित किए थे। सातवाहन शासकों के कई अधीनस्थ शासक थे, जैसे इक्ष्वाकु आदि, जिन्होंने सातवाहन शासकों का पतन होने पर अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए। कुषाण शासकों के द्वारा धारण की जाने वाली प्रभावशाली उपाधियाँ इस तथ्य को प्रकट करती हैं कि उनके अधीन कई छोटे राज्य थे जो उन्हें सैनिक सेवाएँ प्रदान करते थे।

देवताओं से तुलना

मौर्योत्तर काल में विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखने के लिए राजतंत्र में दैवी तत्वों को समाविष्ट करने की प्रवृत्ति अपनाई गई। पहले राजाओं से देवताओं की तुलना की जाती थी। अब बात विपरीत दिशा में चल पड़ी और राजाओं की ही तुलना देवताओं से की जाने लगी। एक सातवाहन अभिलेख में पराक्रम आदि की दृष्टि से सातवाहन राजा गौतमीपुत्र शातकर्णी की तुलना कई देवताओं से की गई है। एक विशेष उल्लेखनीय तत्त्व कुषाण राजाओं में देखने को मिलता है। इन्हें देवपुत्र कहा गया है। अशोक को 'देवानाप्रिय' कहा गया है लेकिन कुषाण राजाओं ने ऐसी उपाधि धारण की जिसका प्रचलन केवल चीनियों और रोमन सम्राटों के बीच ही था। चीनी शासकों के अनुरूप कुषाण राजाओं ने देवपुत्र जैसी उपाधियाँ धारण कर लीं।

सम्भवतः रोम का उदाहरण लेकर कुषाण शासकों ने मृत राजाओं की मूर्तियाँ स्थापित करने के लिए मन्दिर बनवाने की प्रथा (देवकुल) भी प्रारम्भ की, किन्तु भारत में यह प्रथा सफल नहीं हुई। तत्कालीन रचनाओं में प्रायः ही राजतंत्र की दैविक उत्पत्ति की ओर संकेत मिलता है, किन्तु राजाओं के इस दैवीकरण ने उनकी सत्ता एवं देश पर उनके नियंत्रण में कोई वृद्धि नहीं की। दूसरी ओर, सातवाहन शासकों ने ब्राह्मणों एवं बौद्ध श्रमणों को राजस्व एवं प्रशासनिक करों से मुक्त भूमि प्रदान करने की प्रथा प्रारम्भ की, जिससे अन्ततः केन्द्रीय सत्ता क्षीण हुई। इसके पूर्ववर्ती साहित्य में भी पुजारियों को भूमि दान दिए जाने का उल्लेख है, किन्तु अभिलेखों में भूमि दान का पहला प्रमाण ई. पू. प्रथम शताब्दी का है।

जब सातवाहन शासकों ने वैदिक यज्ञों के अधिष्ठाता पुजारियों को भूमि प्रदान की। प्रारम्भ में तो ये दान केवल कर मुक्त ही होते थे किन्तु धीरे धीरे दान की गई भूमि पर राजाओं ने प्रशासनिक नियंत्रण हटाकर इसे दानग्रहीता को ही समर्पित करना प्रारम्भ कर दिया। इस आशय का अभिलेख गौतमीपुत्र शातकर्णी के अभिलेखों में मिलता है। उदाहरणस्वरूप दिए गए ऐसे ग्राम एक प्रकार से राज्य के भीतर ही अर्धस्वतंत्र क्षेत्र बन गए। फलतः ग्रामीण क्षेत्रों से राजा का नियंत्रण धीरे धीरे कम होता गया।

भारतीय यूनानियों तथा उनके विदेशी उत्तराधिकारियों द्वारा शासित क्षेत्रों में मौर्य शासन व्यवस्था के चिह्न दिखाई नहीं देते। शकों तथा पार्थियन शासकों ने संयुक्त शासन का चलन प्रारम्भ किया, जिसमें युवराज सत्ता के उपभोग में राजा का बराबरी का सहयोगी होता था। शक और कुषाण लोग पार्थियनों के माध्यम से अख़ामनी राजवंश की क्षत्रपीय प्रणाली भी इस देश में ले आए। कुषाणों ने प्रान्तों में द्वैध शासकत्व की विचित्र प्रणाली का भी प्रचलन किया।

व्यापार एवं नगर

आर्थिक रूप से इस काल का एक उज्ज्वल पक्ष है वाणिज्य व्यापार का विकास एवं उन्नति। व्यापार की प्रगति के लिए प्रारम्भिक आधार तो मौर्यों ने ही प्रदान किया था, जिन्होंने आन्तरिक यातायात के साधनों एवं मार्गों को काफ़ी विकसित किया था। पाटलिपुत्र को तक्षशिला से जोड़ने वाला मार्ग मौर्यों की ही देन था। स्थल मार्ग से पाटलिपुत्र ताम्रलिप्ति से जुड़ा था, जो बर्मा एवं श्रीलंका के जहाज़ों के लिए प्रमुख बंदरगाह था। दक्षिण भारत के स्थल मार्गों का विकास मौर्यों के पश्चात् हुआ। ये मार्ग नदी घाटियों के साथ साथ या तटीय प्रदेश में या पर्वतीय दर्रों में विकसित किए गए।

इसके अतिरिक्त देश के विभिन्न भाग अब उन व्यापारिक मार्गों से जुड़ गए थे जिनमें से कुछ मध्य एशिया एवं पश्चिम एशिया को जाते थे। एक स्थल मार्ग द्वारा तक्षशिला क़ाबुल से जुड़ गया था। जहाँ से विभिन्न दिशाओं को मार्ग जाते थे। उत्तरवर्ती मार्ग बैक्ट्रिया से होकर कैस्पियन सागर होता हुआ कृष्ण सागर को जाता था। एक मार्ग कंधार से हेरात होकर ईरान जाता था। यहाँ से व्यापारी स्थल मार्ग से पूर्वी भूमध्य सागर तक जाते थे। ईसा की पहली शती में हिप्पालस नामक ग्रीक नाविक ने अरब सागर में चलने वाली मानसून हवाओं की जानकारी दी, जिससे अरब सागर से यात्रा की जा सकती थी और इस प्रकार भारत और पश्चिमी एशिया के बंदरगाहों के बीच कम समय लगता था।

उत्तर पश्चिम भारत की इंडो ग्रीक, कुषाण एवं शक विजयों के द्वारा पश्चिमी एवं मध्य एशिया में घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हुए। मध्य एशिया से यह व्यापारिक मार्ग गुज़रता था जो चीन को रोमन साम्राज्य के पश्चिमी प्रान्तों से जोड़ता था। जिसे 'सिल्क मार्ग' कहा जाता था, क्योंकि चीन से होने वाला रेशम का समस्त व्यापार अधिकतर इसी मार्ग से होता था। इस चीनी रेशम व्यापार में भारतीय व्यापारियों ने मध्यस्थ के रूप में भाग लेना प्रारम्भ किया। इन प्रदेशों से होकर जाने वाले व्यापार में अधिकतर उत्तर पश्चिम के व्यापारी भाग लेते थे। पश्चिमी एवं दक्षिणी भारत के व्यापारी दक्षिण अरब, लाल सागर तथा ऐलेक्ज़ेन्ड्रिया के क्षेत्रों से जुड़े हुए थे।

रोमन साम्राज्य

रोमन साम्राज्य से होने वाले व्यापार का काफ़ी बड़ा भाग इन क्षेत्रों से होकर गुज़रता था। रोमन साम्राज्य के एक सर्वशक्तिमान साम्राज्य के रूप में उदय होने से ई. पू. प्रथम शती से भारतीय व्यापार को काफ़ी प्रोत्साहन मिला, क्योंकि इस साम्राज्य का पूर्वी भाग भारत में निर्मित विलासिता के सामान का बड़ा ग्राहक बन गया। ईस्वी सन् की पहली शती में एक अनाम ग्रीक नाविक ने अपनी पोरिप्लस आफ़ एरिथियन सी नामक रचना में भारत द्वारा रोमन साम्राज्य को निर्यात किए जाने वाले सामान का विवरण दिया है, जिसमें प्रमुख हैं - मोती, हाथीदाँत, इत्यादि।

भारतीय व्यापारी चीन से रेशम ख़रीदकर रोमन व्यापारियों तक पहुँचाते थे और यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण वस्तु थी। रोमन साम्राज्य की मसालों की आवश्यकता केवल भारतीय सामग्री देने से ही पूर्ण नहीं होती थी, इसलिए भारतीय व्यापारी दक्षिण पूर्व एशिया से सम्पर्क बढ़ाने लगे। अपने निर्यात के प्रतिदान में रोम से भारत में अन्य सामान के अतिरिक्त बहुत बड़ी संख्या में सोने चाँदी के सिक्के आते थे। प्लिनी ने प्रतिवर्ष रोम से भारत में चली जाने वाली सोने की भारी मात्रा के लिए दुःख प्रकट किया है।

देश के भिन्न भिन्न प्रदेश भिन्न भिन्न वस्तुओं के लिए प्रसिद्ध थे। कश्मीर, कोसल, विदर्भ और कलिंग हीरों के लिए विख्यात थे। मगध वृक्षों के रेशों से बने वस्त्रों के लिए बंगाल मलमल के लिए प्रसिद्ध था। कश्मीर और उज्जयिनी से लाई गई अनेक वस्तुएँ भड़ोंच के बंदरगाह से पश्चिमी देशों को भेजी जाती थीं। सोपारा और कल्याण भी पश्चिमी तट पर प्रसिद्ध नगर थे। प्रतिष्ठान नगर भी व्यापार का केन्द्र था। तक्षशिला में पश्चिमी देशों से बहुत—सी वस्तुएँ लाई जाती थीं।

आर्थिक व्यवस्था और सिक्के

ई. पू. और ईसा की शती के प्रारम्भ में व्यापार के विकास के साथ ही मुद्रा व्यवस्था का विकास जुड़ा था। रोम से आने वाला सोना अधिकतर सर्राफ़ के काम आता था और सम्भवतः बड़े स्तर के व्यापारिक लेन देन में भी इसका प्रयोग होता था। किन्तु भारत में भी मुद्रा विकास के संकेतों में कमी नहीं है। उत्तर में इंडोग्रीक शासकों ने सोने के सिक्के चलाए। कुषाण शासकों ने भी बहुत बड़ी मात्रा में सोने के सिक्कों का प्रयोग किया। सम्भवतः सोने और चाँदी के ये सिक्के दैनिक जीवन में प्रयुक्त नहीं होते थे। इसलिए दैनिक जीवन में व्यापारिक उपयोग के लिए कुषाण शासकों ने ताँबे के सिक्के भी प्रचलित किए। यह इस बात का प्रमाण है कि दैनिक जीवन में भी मुद्रा का चलन हो गया था।

इसके अतिरिक्त भारतीय मुद्रा की कलात्मकता पर विदेशों विजेताओं का बहुत ही प्रभाव पड़ा। बैक्ट्रियाई शासकों के द्वारा ज़ारी किए गए सिक्कों में शासक की आकृति और नाम ख़ुदा होता था। इन आकृतियों एवं चिह्नों, जैसे देवताओं के चित्रों में कलात्मकता का वह स्तर है जो भारतीय सिक्कों ने अब तक प्राप्त नहीं किया था। मौर्य काल के अन्त तक सिक्कों पर केवल कोई चिह्न अंकित होता था। उन पर चिह्न कोई भी हो किन्तु शासकों के नाम आदि नहीं होते थे। प्रारम्भिक सिक्कों में प्रदर्शित पौराणिक कथाएँ ग्रीक हैं एवं सिक्कों पर खुदी आकृतियाँ ग्रीक स्रोतों से ली जाने लगीं और खरोष्ठी तथा ग्रीक दोनों लिपियों में लिखी जाने लगी। मुद्राओं की यह कलात्मकता एवं विनिमय में नियमित रूप से मुद्रा का प्रयोग वास्तव में इस युग की एक बड़ी देन है। मुद्रा व्यवस्था एवं व्यापार की ही प्रगति के परिणामस्वरूप देश में कई नगरों का विकास हुआ और साथ ही साथ कारीगरी एवं शिल्प का भी विकास हुआ। विवेच्य काल में अर्थात ईसा की प्रथम तीन शताब्दियों के दौरान सम्पूर्ण भारत, विशेषकर गंगा घाटी, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि क्षेत्रों में जो उत्खनन हुए हैं, उनसे यह पता चलता है कि यह नगरों के प्रतिष्ठान का काल है। इस प्रकार के अवशेष मध्य एशिया में भी मिलते हैं। शहरीकरण के साक्ष्यों की दृष्टि से यह एक अभूतपूर्व काल था।

कारीगरी एवं शिल्प का विकास

ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के 'महावस्तु' नामक एक बौद्ध ग्रंथ के अनुसार राजगृह नगरी में लगभग 36 विभिन्न प्रकार के शिल्पी रहते थे। 'मिलिन्दपन्ह' में जिन 75 विभिन्न व्यवसायों का उल्लेख है, उनमें से 60 विभिन्न प्रकार के शिल्पों से सम्बन्धित हैं। उद्योगों के विकास ने उनमें विशिष्टीकरण को भी प्रोत्साहन दिया, जिससे तकनीकी कौशल का भी विकास हुआ। मिलिन्दपन्ह में उल्लिखित व्यवसायों में से 8 सोना, चाँदी, ताँबा, टिन, सीसा, पीतल, लोहा आदि धातुओं से सम्बन्धित हैं। चीनी रेशम के आयात से देश में रेशम उद्योगों को प्रोत्साहन मिला। इस प्रकार मौर्योत्तर काल में उत्पादन के विभिन्न क्षेत्रों में तकनीकी विकास भी हुआ।

  • व्यापारिक प्रगति ने उत्पादन एवं वितरण की व्यवस्था को भी भली भाँति संगठित करने की आवश्यकता उत्पन्न कर दी।
  • विभिन्न शिल्पकारों ने एकत्र होकर शिल्पी श्रेणियों का संगठन किया। व्यापारियों ने भी अपनी श्रेणियाँ संगठित कीं। श्रेणियों का उल्लेख मथुरा क्षेत्र एवं पश्चिमी दक्कन के क्षेत्र के अभिलेखों से प्राप्त होता है।
  • पश्चिमी दक्कन में गोवर्धन नामक नगर शिल्पी श्रेणियों का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। ये श्रेणियाँ कभी कभी धरोहर रखने एवं महाजन का भी कार्य करती थीं।
  • दूसरी शताब्दी में सातवाहन वंश के एक खेल में इस बात का उल्लेख है कि बौद्ध धर्म के सामान्य उपासकों ने कुम्हारों, जुलाहों आदि के पास धन जमा कराया था ताकि वे भिक्षुओं के लिए अन्न, वस्त्र आदि आवश्यकता की चीज़े जुटा दें।
  • इसी समय के मथुरा क्षेत्र के एक लेख में इस बात का उल्लेख आया है कि एक प्रमुख ने आटा पीसने वाले कारीगरों के पास धन जमा कराया था ताकि वे उसके मासिक ब्याज से लगभग 700 ब्राह्मणों के निर्वाह की व्यवस्था कर दें। स्पष्टतः श्रेणियाँ इस जमा किए धन का उपयोग उत्पादन बढ़ाने के लिए करती होंगी और बिक्री से प्राप्त धन से वे पूँजी पर ब्याज देती होंगी।

अपने उत्पादन में वृद्धि के लिए श्रेणियों ने अपने कारीगरों के अतिरिक्त बाहर से भी कारीगर बुलाने की ओर ध्यान दिया होगा। इस पद्धति से कारीगरों को मौर्य काल की अपेक्षा, जबकि वे राज्य के नियंत्रण में कार्य करते थे, अधिक स्वतंत्रता प्राप्त हुई होगी। सम्भवतः अपने धन के कारण मौर्योत्तर प्रशासनिक व्यवस्था में व्यापारी एवं शिल्पकारों की श्रेणियों का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान था। कई नगरों में उन्होंने अपने सिक्के तक प्रचलित किए थे, जो सामान्यतः शासकों का कार्य था।

मौर्योत्तर राज्य व्यवस्था की एक उल्लेखनीय बात यह है कि ई. पू. दूसरी तथा पहली शताब्दी में उत्तर भारत में कम से कम एक दर्जन ऐसे नगर थे जो लगभग स्वशासी संगठनों की तरह काम करते थे। इन नगरों के व्यापारियों के संघ सिक्के जारी करते थे। भारतीय यूनानी युग से पहले के पाँच सिक्कों में निगम शब्द का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। जो तक्षशिला में उत्खनन से प्राप्त हुए हैं। गंधिकों, जिसका शब्दार्थ गंधविक्रता है किन्तु वास्तविक अर्थ व्यापारी है, के संघ के सिक्के कौशाम्बी के आसपास के क्षेत्र में भी पाए गए हैं। त्रिपुरा, महिष्मति, विदिशा, एरण, माध्यमिका, वाराणसी, आदि नगरों के नामों का उल्लेख भी उनकी ताम्र मुद्राओं में हुआ है। ईस्वी सन् की दो शताब्दियों के दौरान जब सातवाहनों तथा कुषाणों ने अपने राज्य स्थापित किए तब इन नगरों का स्वायत्त स्वरूप समाप्त हो गया। किन्तु शासकों को व्यापारियों के निगमों का, जिन्हें निगम सभा कहा जाता था, ध्यान रखना पड़ता था।

श्रेणियों की सदस्यता कारीगरों आदि को समाज में प्रतिष्ठा का स्थान एवं सुरक्षा प्रदान करती थी। प्रत्येक श्रेणी का अपना तमगा, पताका एवं मुहर होती थी। अपने विज्ञापन का सर्वोत्तम ढंग था धार्मिक आधार पर उदारतापूर्वक धनदान। अत्तार, जुलाहे, स्वर्णकार आदि सभी की श्रेणियों के द्वारा बौद्ध भिक्षुओं को गुफ़ाओं स्तंभों आदि के दान का उल्लेख प्राप्त होता है।

समाज और धर्म

इस समय में भी कारीगर आदि अधिकतर शूद्र वर्ण से ही आते थे किन्तु उनके धन एवं प्रतिष्ठा में अब वृद्धि हो गई थी। मौर्य काल में समस्त आर्थिक कार्यवाहियों पर राज्य का नियंत्रण था, किन्तु इस साम्राज्य के पतन के साथ ही वह नियंत्रण भी समाप्त हो गया और शिल्पियों आदि को कुछ वैयक्तिक स्वतंत्रता प्राप्त हो गई। वैश्यों एवं शूद्रों के बीच का अन्तर इस प्रकार कुछ कम हो गया किन्तु फिर भी मनु ने शूद्रों के लिए बड़े कठोर नियम रखे। मनु के अनुसार शूद्रों का कार्य तीन उच्चतर वर्णों की सेवा करना था। अतः उन पर आक्रमण करने के अपराध की सज़ाएँ शूद्रों के लिए बहुत ही कठोर थीं। शूद्र वर्ग में इस कठोरता के कारण बहुत ही असंतोष था। इसमें आश्चर्य नहीं की वर्ण व्यवस्था को मान्यता न देने वाले विदेशी शासकों के अधीन जो शूद्र थे वे ब्राह्मणों के विरुद्ध हो गए थे। मनुस्मृति में शूद्रों की बैरभावपूर्ण कार्यवाहियों के विरुद्ध कई सुरक्षा उपायों का उल्लेख है। मनु की प्रतिक्रिया वास्तव में उस काल की परिस्थितियों में घोर ब्राह्मण कट्टरता की प्रतिक्रिया है।

इस काल में वर्ण पर आधारित परम्परागत समाज व्यवस्था को विदेशियों के आक्रमण से भी ख़तरा उत्पन्न हो गया था। भारत में यवन, शक, कुषाण आदि विदेशी शासकों की उपस्थिति, जिनके पास राजनीतिक एवं आर्थिक शक्ति थी, वर्णव्यवस्था के लिए संकट उत्पन्न कर रही थीं। ब्राह्मण उन्हें म्लच्छ कहकर उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते थे। उनके साथ समझौता करना ही था। इस कारण स्मृतिकारों ने उन्हें कौशल से निम्न कोटि के क्षत्रिय की उपाधि प्रदान कर दी। इस प्रकार प्रत्यक्षतः धर्म ने विदेशियों एवं अनार्यों के आर्यीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

वर्णसंकरता

यद्यपि मनु कट्टर ब्राह्मणवादी थे किन्तु उनकी स्मृति में जिन लगभग 60 वर्ण संकरों का उल्लेख है, उससे स्पष्ट होता है कि वह पर्याप्त यथार्थवादी भी थे। विदेशी लोगों के आगमन से जो एक सामाजिक तनाव उत्पन्न हुआ उसका एक प्रायोगिक समाधान वर्णसंकर की परिकल्पना में ही दृष्टिगोचर होता है। सामाजिक तनाव का एक पक्ष वह भी था जो पुराणों में कलियुग के चित्रण में झलकता है। हाल के अध्ययनों में इन वर्णनों को ईसा की आरम्भिक तीन चार शताब्दियों में रखा गया है। इस तनावपूर्ण स्थिति का मुख्य अंग मुख्य उत्पादक वर्गों, यथा वैश्यों एवं शूद्रों, द्वारा विरोध की भावना को प्रकट करना था। मनु ने तो यहाँ तक कहा है कि जब तक इन लोगों को डंडे के बल से दबाया नहीं जाएगा, काल चलेगा ही नहीं। ऐसा प्रतीत होता है कि विद्रोह का एक महत्त्वपूर्ण रूप राजकरों का न देना था। स्पष्टतः इससे समाज में एक तनाव की स्थिति हो गई होगी। हो सकता है कि इस स्थिति से निबटने के लिए ही राजाओं ने भूमिदान की प्रथा को प्रोत्साहन दिया क्योंकि कालान्तर में इसके माध्यम सेकर एकत्र का उत्तरदायित्व स्थानीय बिचौलियों का हो गया, जिन्हें पुलिस अधिकार भी प्राप्त थे।

जहाँ तक विदेशियों के एकीकरण का सवाल है, वर्णसंकर की परिकल्पना के अतिरिक्त धर्म का भी आश्रय लिया गया। विभिन्न धर्मों में एक प्रकार की होड़ हो गई, कि वे किस प्रकार इन विदेशी शासकों का समर्थन प्राप्त करते हैं। पारम्परिक ब्राह्मण धर्म का रूपान्तरण हो रहा था। भक्ति भावना के पुट का उदय इस काल में विशेष रूप से हुआ। वैष्णव, शैव एवं सभी धर्मों ने अपने द्वार विदेशियों के लिए भी खोल दिए। मनुस्मृति में कहा गया है कि पवित्र धार्मिक संस्कारों तथा ब्राह्मणों की अवहेलना करने के कारण ही यवन, शक, वैष्णव धर्म ने इन जनजातियों को ब्राह्मणधर्मी सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत समाविष्ट एवं समायोजित करने के लिए एक प्रबल साधन प्रदान किया।

ई. पू. तथा ईस्वी सन् की प्रारम्भिक शताब्दियों में विदेशी जातियों ने वैष्णव एवं शैव देवताओं को समर्थन दिया। बेसनगर का अभिलेख यवन राजदूत, हेलियोडोरस का वर्णन भागवत के रूप में करता है। जिसने भगवान वसुदेव को गरूड़ध्वज प्रदान किया था। महाक्षत्रप शोडास के समय एक अन्य अभिलेख में भगवत वसुदेव के मन्दिर के प्रवेश द्वार तथा वेदिकाओं के निर्माण का उल्लेख है। कुषाण राजा भी वैष्णव शैव प्रभाव से अछूते नहीं थे। उनमें से एक ने भगवान का नाम धारण किया था। हुविष्क की एक सुवर्ण मुद्रा पर एक देवता अपने हाथ में चक्र और दूसरे में ऊर्ध्वलिंग लिए चित्रित किया गया है, जिससे अनुमान किया गया है कि यह समन्वित देवता हरिहर की प्रतिमा का पूर्णरूप है। विदेशी शासकों के द्वारा बौद्ध धर्म अपनाए जाने से भी उनका भारतीय व्यवस्था में समावेश आसान हो गया क्योंकि इससे जाति, वर्ण आदि से सम्बद्ध कोई समस्या उठने की सम्भावना नहीं है। बहुत से विदेशी शासकों ने बौद्ध धर्म को प्रश्रय दिया। इंडोग्रीक शासकों ने अपने सिक्कों पर बौद्ध चिह्न अंकित किए और कुषाणों ने भी बौद्ध प्रतिष्ठान को बहुत दान दिया, विशेषकर कनिष्क का बौद्ध धर्म के प्रति योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उसके समय में कई बौद्ध धर्म प्रचारक विदेशों में भेजे गए और बौद्ध धर्म विभिन्न देशों के सम्पर्क में आ गया।

देश के भीतर बौद्ध धर्म को सम्पन्न व्यापारी वर्गों के द्वारा समर्थन प्राप्त हुआ। इस समय के अनेक विहार आदि व्यापारियों के अनुदान के ही परिणाम हैं। व्यापार के माध्यम से बौद्ध धर्म पश्चिमी एवं मध्य एशिया भी पहुँचा। देश के अधिकतर विहार व्यापारिक मार्गों या पश्चिमी तट के पर्वतीय दर्रों पर स्थित थे। बड़े बड़े अनुदानों के परिणामस्वरूप बौद्ध विहार धन के भंडार हो गए थे। भिक्षु भिक्षुणियों ने भी बौद्ध विहारों को दान दिया था। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वे अब इस प्रारम्भिक बौद्ध नीति को नहीं मानते थे कि भिक्षु एवं भिक्षुणी को अपनी समस्त इहलौकिक वस्तुओं का परित्याग कर देना चाहिए। अतः बौद्ध धर्म के स्वरूप में परिवर्तन अनिवार्य हो गया था।

महायान बौद्ध धर्म का उदय

बुद्ध की मृत्यु के तुरन्त बाद ही उनकी शिक्षाओं के तात्पर्य के सम्बन्ध में वाद विवाद प्रारम्भ हो गया था और कई परिषदों द्वारा उस विवाद को सुलझाने की असफल चेष्टा की गई। कनिष्क के समय तक आते आते बौद्ध धर्म की 18 विभिन्न शाखाएँ विद्यामान थीं। परम्परा के अनुसार कनिष्क के समय में चौथी बौद्ध संगीति में बौद्ध धर्म औपचारिक रूप से हीनयान एवं महायान नामक दो शाखाओं में बँट गया। इस काल की यह विशेषता थी कि ज्ञानमार्ग अथवा कर्ममार्ग की अपेक्षा भक्तिमार्ग अधिक लोकप्रिय हो रहा था। बौद्ध धर्म में महायान सम्प्रदाय का उदय इस प्रवृत्ति का द्योतक है। हीनयान सम्प्रदाय में वृद्ध मानव के पथप्रदर्शक मात्र थे, अब वे देवता माने जाने लगे।

महायान शाखा की प्रमुख विशेषता थी बोधिसत्व की धारणा, जिसने अन्य प्राणियों के कल्याण के लिए कई बार जन्म लिया है और जो भविष्य में भी प्राणियों के त्राण के लिए आएगा। बुद्ध का यह रूप मैत्रेय बुद्ध के नाम से विख्यात हुआ। समय के साथ साथ बोधिसत्वों की एक शृंखला विकसित हो गई। हीनयान में प्रत्येक के सामने व्यक्तिगत निर्वाण प्राप्ति के लिए अर्हत पद प्राप्त करने का आदर्श था। महायान सम्प्रदाय ने प्रत्येक व्यक्ति के सामने बोधिसत्व का आदर्श रखा। बुद्ध को एक धार्मिक उपदेशक के रूप में न देखकर एक परित्राता भगवान के रूप में देखा जाने लगा और उनकी मूर्तियों की उपासना प्रारम्भ हो गई। बुद्ध के जीवन चिह्नों की उपासना पूर्ववत चलती रही किन्तु अब उसका स्थान 'मूर्ति पूजा' लेने लगी। बुद्ध को एक भगवान के रूप में देखा जाने लगा, जिनसे उनके उपासक दया की आशा कर सकते थे। इस प्रकार महायान बौद्ध धर्म में भक्ति की धारणा का विकास हुआ। बुद्ध के दिव्य गुणों पर ज़ोर देने के लिए इस काल में उनकी जीवन कथा फिर से लिखी गई। इस उद्देश्य से लिखी प्रारम्भिक पुस्तकों में महावस्तु, ललितविस्तर और अश्वघोष कृत बुद्ध चरित्र का उल्लेख करना अनुचित न होगा।

जैन धर्म

बौद्ध धर्म की भाँति ही जैन धर्म में भी परिवर्तन आया। ईसा की प्रथम शताब्दी के आसपास जैन धर्म में भी विभाजन हो गया। रूढ़िवादी जैन दिगम्बर एवं उदारवादी श्वेताम्बर कहलाए। बौद्ध धर्म की भाँति ही जैन धर्म में भी मूर्तिपूजा का विकास हुआ।

ये प्रचलित धर्म बौद्ध एवं जैन वैदिक धर्म के विरुद्ध थे जिसमें पशु बलि आदि सम्मिलित थी और याज्ञिक अनुष्ठान थे। लोग भक्ति पर आधारित मूर्तिपूजक सम्प्रदाय की ओर आकृष्ट होने लगे। बौद्ध धर्म तथा अन्य शास्त्र विरोधी धार्मिक सम्प्रदायों के भीषण प्रहारों ने वैदिक प्रथाओं तथा ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा एवं प्रभुत्व को काफ़ी आघात पहुँचाया। ब्राह्मण लोग, जिनकी स्थिति यज्ञों के लिए माँग में कमी हो जाने के कारण ब्राह्मणो स्थिति गिर रही थी, अतः वे जीविका के कुछ अन्य साधनों का सहारा लेने के लिए बाध्य हो गए।

दूसरी ओर, नए आर्थिक एवं राजनीतिक तत्वों से उत्पन्न स्थिति से निबटने के लिए तथा ब्राह्मणधर्मी सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ब्राह्मणों ने अनेक लोकप्रिय उपासना विधियों को अपना लिया। वैदिक देवताओं के स्थान पर नवीन देववर्ग का उदय हुआ, जिनमें ब्रह्मा विष्णु महेश की त्रिमूर्ति बहुत ही विख्यात है। ब्रह्मा का स्रष्टा, विष्णु का भर्त्ता एवं शिव का संहारकर्त्ता का है। धीरे धीरे शिव एवं विष्णु अधिक प्रचलित देवता हो गए एवं उनके अनुयायी शैव एवं वैष्णव कहे जाने लगे। इस नवोदित ब्राह्मण धर्म में भी वैदिक धर्म के कर्मकाण्डों के स्थान पर भक्ति का प्राधान्य दिया गया।

कला

इस काल में कला का आधार मुख्यतः बौद्ध धर्म ही रहा। धनी व्यापारियों की विभिन्न श्रेणियों एवं शासकों द्वारा इसे बहुत प्रोत्साहन दिया गया। इस समय के कला स्मारक, स्तूप, गुहा मन्दिर (जिन्हें चैत्य कहा जाता है) एवं संघाराम अथवा विहार है। पर्वतों में खोदी गई गुफ़ाएँ मन्दिरों एवं भिक्षुओं के निवास स्थान के रूप में प्रयुक्त होती थीं। पश्चिम दक्कन में सातवाहन एवं उनके उत्तरवर्ती राजाओं ने बहुत सी बड़ी बड़ी गुफ़ाएँ खुदवाईं।

इनमें से प्राचीनतम हैं- कार्ले की गुफ़ाएँ जिनका सौंदर्य बहुत विकसित है। इन गुफ़ाओं के आकार में धीरे धीरे वृद्धि होती गई जैसा कि अजन्ता एवं एलोरा की गुफ़ाओं से प्रतीत होता है, जिनमें से कुछ गुफ़ाएँ इस काल की भी हैं। मूर्तिकला का प्रयोग बड़े बड़े बौद्ध स्तूपों के तोरणों एवं बाड़ों के बनाने में भी हुआ है जैसा कि भरहुत एवं साँची में देखने को मिलता है। दक्कन में अमरावती में भी ईसा की दूसरी शती के लगभग मूर्तिकला का विकास हुआ। नागार्जुनकोण्ड में भी इसी काल के अवशेष मिले हैं। स्तूप के निकट कुछ शिलाखंण्ड मिले हैं, जिन पर बुद्ध के जीवन के कुछ दृश्य दिखाए गए हैं।

मथुरा शैली

जैन धर्म के अनुयायियों ने मथुरा में मूर्तिकला की एक शैली को प्रश्रय दिया, जहाँ शिल्पियों ने महावीर की एक मूर्ति बनाई। यह कला शैली, जो मथुरा शैली के नाम से प्रसिद्ध है, ई. पू. पहली शताब्दी के अन्त में प्रारम्भ हुई। कालान्तर में कुषाण शासकों का प्रश्रय पाकर यह फली फूली। प्रायः ऐसा कहा जाता है कि कुषाणों के संरक्षण के फलस्वरूप बौद्ध धर्म का विकास हुआ। यद्यपि यह असत्य नहीं है किन्तु एकपक्षीय अवश्य है। केवल मथुरा से ही ऐसे सैकड़ों अवशेष मूर्तियाँ, आयागपट्ट, आदि मिले हैं, जो कुषाण संरक्षण में बने और जैन धर्म के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं।

गांधार शैली

ई. पू. प्रथम शताब्दी के मध्य से उत्तर पश्चिम में गंधार में कला की एक और शैला का विकास हुआ, जिसे गांधार शैली कहते हैं। इस शैली को ग्रीक बौद्ध शैली भी कहा जाता है। इसका सर्वाधिक विकास कुषाण काल में हुआ। इस काल की विषयवस्तु बौद्ध परम्परा से ली गई थी, किन्तु निर्माण का ढंग यूनानी था। गांधार शैली की प्रारम्भिक बौद्ध मूर्तियों में बुद्ध का मुख ग्रीक देवता अपोलो से मिलता जुलता है। मूर्तियों का परिवेश रोमन 'टोगा' जैसा है। ईस्वी सन् की तीसरी शती में गांधार कला के उदाहरण 'हद्दा' और 'जौलियन' में मिले हैं। ये कला की दृष्टि से बहुत उत्कृष्ट हैं। यही कला हद्दा से 'बामियान' और वहाँ से 'चीनी तुर्किस्तान' और चीन पहुँची। गांधार कला के अंतर्गत मूर्तियों में शरीर की आकृति को सर्वथा यथार्थ दिखाने का प्रयत्न किया गया है। मथुरा शैली में शरीर को यथार्थ दिखलाने का प्रयत्न नहीं किया गया है, अपितु मुखाकृति में आध्यात्मिक सुख और शान्ति व्यक्त की गई है। दूसरे शब्दों में गांधार कला यथार्थवादी थी और मथुरा की आदर्शवादी।

जहाँ तक ब्राह्मण धर्म का सवाल है, उसके भी अवशेष कुछ कम नहीं। मथुरा, लखनऊ, बनारस (भारत कला भवन) आदि अनेकों संग्रहालयों में इस काल के विष्णु, शिव, स्कन्द कार्तिकेय के निरूपणों के उदाहरण प्राप्य हैं। कृष्ण लीला के कुछ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं सुन्दर निरूपण इसी काल में मथुरा शैली में मिलते हैं।

चित्रकला

चित्रकला के सबसे अधिक प्राचीन उदाहरण अजन्ता की गुफ़ा संख्या 9 वे 10 में मिलते हैं। गुफ़ा संख्या 9 में सोलह उपासकों को स्तूप की ओर बढ़ते हुए दिखाया गया है। गुफ़ा संख्या 10 में जातक कथाएँ अंकित हैं। इसमें उपासकों को बोधिवृक्ष और स्तूप की पूजा करते हुए दिखाया गया है। इस काल की अधिकतर कलाकृतियाँ बौद्ध धर्म से सम्बन्धित हैं और इनमें से अधिकतर धनी व्यापारियों की बनवाई हुई हैं।

मौर्योत्तरकालीन साहित्य

  • मौर्योत्तर काल में साहित्य के भी विभिन्न रूपों का विकास हुआ। एक सातवाहन शासक द्वारा 'हाल' छदमनाम से लिखी गई "गाथा सप्तशती" प्राकृत भाषा की बहुत सुन्दर काव्य रचना है, यद्यपि इस काल में साहित्य रचना में संस्कृत भाषा का प्रचलन अधिक था।
  • ई. पू. दूसरी शती के मध्य में पतंजलि ने अपना "महाभाष्य" लिखा जो उनके पूर्ववर्ती वैयाकरण पाणिनी की प्रसिद्ध रचना 'अष्टाध्यायी' की टीका है।
  • चिकित्सा शास्त्र पर भी मौलिक ग्रंथ लिख गए, जिनमें सबसे प्रसिद्ध चरक कृत संहिता है। चरक कुषाण शासक कनिष्क का समकालीन था। इस क्षेत्र में एक अन्य प्रसिद्ध व्यक्ति सुश्रुत है।
  • चिकित्सा शास्त्र एवं ज्योतिष शास्त्र में भारत ने पश्चिमी जगत् से सम्पर्क द्वारा बहुत लाभ उठाया।
  • कुछ विद्वानों के अनुसार भरत का "नाट्य शास्त्र" और वात्स्यायन का "कामसूत्र" भी इसी काल की रचनाएँ हैं।
  • भारत की सर्वप्रसिद्ध स्मृति 'मनुस्मृति' ई. पू. दूसरी शती से ईसा की दूसरी शती के मध्य लिखी गई। इसी समय में ब्राह्मणों ने महाकाव्यों में भी संशोधन किए।
  • संस्कृत काव्य की प्रारम्भिक शैली की महत्त्वपूर्ण कृति अश्वघोष का 'बुद्धचरित' है। अश्वघोष कनिष्क का समकालीन था। इसी का एक अन्य छंदबद्ध काव्य 'सौन्दरानन्द' है, जो बुद्ध के सौतेले भाई आनन्द के बौद्ध में धर्म दीक्षित होने के प्रसंग पर आधारित है। अश्वघोष के नाटकों के कुछ भाग मध्य एशिया के एक विहार में प्राप्त हुए थे।
  • सम्भवतः सबसे पहले सम्पूर्ण नाटक रचने का श्रेय भास को है। इनमें से सर्वप्रसिद्ध हैं "स्वप्नवासवदत्तम", जो राजा उदयन एवं वासवदत्ता की कथा पर आधारित है। ये काव्य राजदरबार के लिए लिखे गए थे। किन्तु अब सामान्यतः संस्कृत भाषा की क्लिष्टता में वृद्धि हो रही थी। यह केवल ब्राह्मणों की भाषा न रहकर शासकवर्ग की भाषा बन रही थी। राजकीय अभिलेखों की भाषा भी अब आडंबरपूर्ण होती जा रही थी।
  • मौर्यों एवं सातवाहनों द्वारा प्रयुक्त सामान्य प्राकृत भाषा का स्थान अब संस्कृत ले रही थी।
  • रुद्रदामा का गिरनार अभिलेख संस्कृत काव्य का अनूठा उदाहरण है।
  • कुषाण साम्राज्य के सुई विहार के अभिलेख में भी संस्कृत का प्रयोग हुआ है।


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