तपेदिक  

फेफड़ों में तपेदिक का संक्रमण

तपेदिक (अंग्रेज़ी: Tuberculosis) को 'राजयक्ष्मा' या 'टी.बी.' या 'क्षय रोग' के नाम से भी जाना जाता है। यह बड़ी ख़तरनाक बीमारी है। आम जनता इसके नाम से ही डरती है। तपेदिक एक घातक संक्रामक बीमारी है, जो 'माइक्रोबैक्टीरिया', आमतौर पर 'माइकोबैक्टीरियम तपेदिक' के विभिन्न प्रकारों की वजह से होती है। जिस परिवार में यह रोग हो जाता है, उसकी हालत बड़ी दयनीय हो जाती है। किसी समय यह रोग राजा-महाराजाओं को होता था, क्योंकि वे विलासितापूर्ण जीवन बिताया करते थे। यह बीमारी विलासिता की सबसे बड़ी दुश्मन है, लेकिन आजकल यह रोग आम जनता में भी फैल रहा है। पौष्टिक भोजन की कमी, प्रदूषित वातावरण तथा अत्यधिक वीर्य नष्ट करने से इस रोग के कीटाणु शरीर को दीमक की तरह चाट जाते हैं।

संक्रमण

यह रोग सांस की वायु, खान-पान तथा गहरे मेल-जोल से भी एक से दूसरे व्यक्ति को लग जाता है। दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं की यह एक संक्रामक व्याधि है। इसके जीवाणु चारों ओर वायु में मंडराते रहते हैं और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के शरीर में पहुंच जाते हैं। यह रोग धातुओं की कमी से होता है। जब शरीर की स्वाभाविक क्रियाओं में कोई खामी उत्पन्न हो जाती है तो यह रोग लग जाता है। क्षय रोग आमतौर पर फेफड़ों पर हमला करता है, लेकिन यह शरीर के अन्य भागों को भी प्रभावित कर सकता है। यह हवा के माध्यम से तब फैलता है, जब वे लोग जो सक्रिय टी.बी. संक्रमण से ग्रसित हैं, खांसी, छींक, या किसी अन्य प्रकार से हवा के माध्यम से अपना लार संचारित कर देते हैं। ज्यादातर संक्रमण स्पर्शोन्मुख और भीतरी होते हैं, लेकिन दस में से एक भीतरी संक्रमण, अंततः सक्रिय रोग में बदल जाते हैं, जिनको अगर बिना उपचार किये छोड़ दिया जाये तो ऐसे संक्रमित लोगों में से 50% से अधिक की मृत्यु हो जाती है।[1]

कारण

मनुष्य की पाचन क्रिया के मन्द हो जाने पर भोजन का रस ठीक प्रकार से नहीं बन पाता या जो रस बनता है, वह थोड़ी मात्रा में होता है। फिर वह कफ के रूप में बदलकर रसवाहिनी नाड़ियों में रुक कर फेफड़ों की क्रियाशीलता रोक देता है, जिस कारण व्यक्ति को तपेदिक या क्षय रोग की शिकायत हो जाती है। अधिक मैथुन करने से वीर्य नष्ट हो जाता है। अत: ख़ाली स्थान में वायु क्रुद्ध होकर वीर्य को सुखा देती है और क्षय रोग में बदल देती है।

रोग की पहचान

'माइकोबैक्टीरियम तपेदिक' जीवाणु का स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोग्राफ

इस रोग में पहले श्वास फूलता है, खांसी होती है और धीरे-धीरे अग्नि मंद पड़ जाती है। रोगी की आंखों से नींद गायब हो जाती है। यह रोग वंश परम्परागत भी होता है। जहां धूल अधिक होती है तथा वायु और प्रकाश की कमी होती है, वहां यह रोग बहुत जल्दी आक्रमण करता है। इसके अलावा अधिक मात्रा में शराब तथा मादक पदार्थों का सेवन करने से शरीर दुर्बल होकर तपेदिक का शिकार हो जाता है।

  1. इस रोग में रोगी की पसलियों तथा कंधे में दर्द होता है।
  2. हाथ, पैरों में जलन एवं शरीर में धीमा बुखार-सा बना रहता है।
  3. भोजन करने की इच्छा नहीं होती। खांसी हर समय आती रहती है।
  4. खांसी के साथ रक्त भी आता है। श्वास तथा गले की आवाज फट जाती है।
  5. कुछ रोगियों को पतले दस्त, सिर में भारीपन और शरीर टूटने की भी शिकायत होती है। इससे शरीर दिन-प्रतिदिन कमज़ोर होता चला जाता है।
  6. शारीरिक दुर्बलता, असहिष्णुता, बेचैनी, मानसिक अस्थिरता, पाचन-संस्थान के विकार, वजन घटते जाना, नाड़ी का आधिक तेज चलना, रात में अधिक पसीना आना तथा सदैव बुखार रहना इसके सामन्य लक्षण हैं।

नुस्खे

  1. बेल की सूखी गिरी 100 ग्राम की मात्रा में लेकर आधा किलो पानी में पकाएं। जब पानी 25 ग्राम रह जाए तो उसमें मिश्री डालकर खाएं। इसका कुछ दिनों तक लगातार सेवन करें।
  2. बकरी के दूध में लहसुन की दो कलियां नित्य औटाकर पिएं।
  3. प्रतिदिन दो अण्डे, 10 ग्राम मक्खन, शहद तथा पौष्टिक फल खाने से रोग के कीटाणु नष्ट होने लगते हैं। धीरे-धीरे तपेदिक चली जाती है।
  4. दो कलियां लहसुन तथा चार बादाम- दोनों की चटनी बनाकर 10 ग्राम शुद्ध शहद के साथ प्रतिदिन सेवन करना चाहिए।
  5. पीपल के पत्तों को जलाकर चूर्ण बना लें। प्रतिदिन रात को सोते समय 10 ग्राम चूर्ण फांककर 250 ग्राम दूध पीना चाहिए।
  6. पीपल के पेड़ की गुलड़ियों को सुखा-पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से 10 ग्राम चूर्ण दूध के साथ नित्य सेवन करें। दिनभर में एक किलो बकरी का दूध थोड़ा-थोड़ा करके पिएं। कुछ दिनों में क्षय रोग छूमंतर हो जाएगा।
  7. दो पके केलों के बीच में जरा-सा खाने वाला चूना रखकर चार माह तक नित्य सेवन करें।
  8. अनारदाना, पीपल, पीपरामूल, धनिया, काली मिर्च, बंसलोचन, दालचीनी तथा तेजपात, सबको 10-10 ग्राम की मात्रा में लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। 4 ग्राम चूर्ण दिन में भोजन के बाद शहद के साथ कुछ महीनों तक सेवन करें।
  9. प्रतिदिन एक सेब का मुरब्बा दोपहर को भोजन के बाद खाना चाहिए।
  10. प्रतिदिन 100 ग्राम अंगूर का रस गुनगुना करके सेवन करें।
  11. चार दाने मुनक्का (बीज निकालकर), 2 ग्राम पीपल तथा 10 ग्राम खांड़-तीनों की चटनी पीसकर सुबह-शाम खाने से दमा, खांसी, श्वास तथा राजयक्ष्मा नष्ट हो जाता है।
  12. केले के सफेद तने का रस 20 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन दो बार पीने से तपेदिक पूरी तरह चली जाती है।
  13. 25 ग्राम कच्चा नारियल पीसकर शहद के साथ खाएं। यह यक्ष्मा के कीटाणुओं को मारता है।
  14. कच्ची लौकी का सफेद गूदा 100 ग्राम लेकर उसमें पिसी हुई मिश्री मिलाकर सेवन करें।
  15. गाय के दूध में 10 ग्राम घी तथा दो पीपल डालकर दूध को औटाकर नित्य कुछ माह सेवन करना चाहिए।
  16. मक्खन में चार काली मिर्च तथा एक लाल इलायची का चूर्ण मिलाकर नित्य खाएं।
  17. यक्ष्मा के कीटाणुओं को नष्ट करने के लिए कच्चे प्याज का रस चार चम्मच की मात्रा में प्रतिदिन सेवन करना चाहिए।
  18. पपीते का रस 50 ग्राम, मौसमी का रस 20 ग्राम तथा अंगूर का रस 20 ग्राम-तीनों को गरम करके पिएं।[1]

क्या खाएं क्या नहीं

तपेदिक रोग में हल्के, ताजे तथा सरलता से पचने वाले पदार्थ रोगी को खिलाए जाने चाहिए। यदि मांसाहारी हैं तो बकरे की कलेजी या फोतों का रस बनाकर सेवन करना चाहिए। अण्डा भी इस रोग में विशेष लाभदायक है। कच्चा अंडा दूध में उबालकर रोगी को खिलाया जा सकता है। बकरी का दूध, घी, मक्खन, रोटी, दाल आदि इस रोग के मुख्य पदार्थ हैं। सब्जियों में लहसुन का छौंक ज़रूर लगाना चाहिए। फलों में सेब, मौसमी, अनार, अंगूर, पपीता, अमरूद और केला बहुत लाभकारी सिद्ध होती है। इसके अतिरिक्त बासी तथा अलाभकारी पदार्थ न खाएं। सड़े-गले और बासी फल, बहुत गरम पदार्थ, भांग, गांजा, शराब, धूम्रपान आदि त्याग देना चाहिए। बर्फ तथा गरिष्ठ मिठाईयां खाने से बचना चाहिए। सब्जियों में बैंगन, करेला, घुइयां, मेथी, भिण्डी आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। तिल, सरसों का तेल तथा पान-सुपारी भी टी.बी. के रोगी के लिए हानिकारक हैं।



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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 तपेदिक (टीबी) (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 17 मई, 2014।

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