प्रयाग  

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प्रयाग
Sangam-Allahabad.jpg
विवरण 'प्रयाग' का आधुनिक नाम इलाहाबाद है। प्रयाग उत्तर प्रदेश का एक प्राचीन तीर्थस्थान है जिसका नाम अश्वमेध आदि अनेक याज्ञ (यज्ञ) अधिक होने से पड़ा था।
राज्य उत्तर प्रदेश
ज़िला इलाहाबाद ज़िला
प्रसिद्धि गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का यहाँ संगम होता है, इसलिए हिन्दुओं के लिए इस शहर का विशेष महत्त्व है।
कब जाएँ कभी भी जा सकते हैं
कैसे पहुँचें विमान, रेल, बस, टैक्सी
हवाई अड्डा इलाहाबाद विमानक्षेत्र, वाराणसी हवाई अड्डा
रेलवे स्टेशन प्रयाग रेलवे स्टेशन, इलाहाबाद सिटी रेलवे स्टेशन, दारागंज रेलवे स्टेशन, इलाहाबाद जंक्शन रेलवे स्टेशन, नैनी जंक्शन रेलवे स्टेशन, सूबेदारगंज रेलवे स्टेशन, बमरौली रेलवे स्टेशन
बस अड्डा लीडर रोड एवं सिविल लाइंस से बसें उपलब्ध
यातायात ऑटो रिक्शा, बस, टैम्पो, साइकिल रिक्शा
क्या देखें संगम, इलाहाबाद क़िला, आनंद भवन, इलाहाबाद संग्रहालय
कहाँ ठहरें होटल, धर्मशाला, अतिथि ग्रह
Map-icon.gif गूगल मानचित्र, इलाहाबाद विमानक्षेत्र
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प्रयाग का आधुनिक नाम इलाहाबाद है। प्रयाग उत्तर प्रदेश का एक प्राचीन तीर्थस्थान है जिसका नाम अश्वमेध आदि अनेक याज्ञ (यज्ञ) अधिक होने से पड़ा था। यह गंगा-यमुना के संगम पर स्थित है तथा यहाँ का स्नान त्रिवेणी स्नान (दोनों नदियों की अलग-अलग तथा एक संयुक्त धारा- तीन धाराओं के कारण अथवा गंगा, यमुना के साथ अन्त:सलिला सरस्वती के कारण 'त्रिवेणी') कहा जाता है। प्रयाग का मुस्लिम शासन में 'इलाहाबाद' नाम कर दिया गया था परंतु 'प्रयाग' नाम आज भी प्रचलित है। यहाँ उत्तर प्रदेश का उच्च न्यायालय और एजी कार्यालय भी है। रामायण में इलाहाबाद, प्रयाग के नाम से वर्णित है। ऐसा माना जाता है कि इस संगम पर भूमिगत रूप से सरस्वती नदी भी आकर मिलती है। इलाहाबाद का उल्लेख भारत के धार्मिक ग्रन्थों में भी मिलता है। वेद, पुराण, रामायण और महाभारत में इस स्थान को प्रयाग कहा गया है। गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का यहाँ संगम होता है, इसलिए हिन्दुओं के लिए इस शहर का विशेष महत्त्व है।

Seealso.jpg इन्हें भी देखें: इलाहाबाद, संगम, कुम्भ मेला, गंगा, यमुना एवं सरस्वती नदी

प्रयाग की व्युत्पत्ति

प्रयाग शब्द की व्युत्पत्ति कई प्रकार से की गयी है। महाभारत में वनपर्व में आया है कि 'सभी जीवों के अधीश ब्रह्मा ने यहाँ प्राचीन काल में यज्ञ किया था और इसी से 'यज् धातु' से प्रयाग बना है।[1]

  • स्कन्दपुराण ने इसे 'प्र' एवं 'याग' से युक्त माना है[2]
  • प्रथम अंश स्कन्दपुराण [3] में भी आया है। अत: प्रयाग का अर्थ है 'यागेभ्य: प्रकृष्ट:', 'यज्ञों से बढ़कर जो है' या 'प्रकृष्टो यागो यत्र', 'जहाँ उत्कृष्ट यज्ञ है।' इसलिए कहा जाता है कि यह सभी यज्ञों से उत्तम है, हरि, हर आदि देवों ने इसे 'प्रयाग' नाम दिया है।
  • मत्स्यपुराण ने 'प्र' उपसर्ग पर बल दिया है और कहा है कि अन्य तीर्थों की तुलना में यह अधिक प्रभावशाली है।
  • ब्रह्मपुराण का कथन है- 'प्रकृष्टता के कारण यह 'प्रयाग' है और प्रधानता के कारण यह 'राज' शब्द अर्थात तीर्थराज से युक्त है।[4]
  • 'प्रयागमंडल', 'प्रयाग' एवं 'वेणी' या त्रिवेणी के अन्तर को प्रकट करना चाहिए, जिनमें आगे का प्रत्येक पूर्व वाले से अपेक्षाकृत छोटा किंतु अधिक पवित्र है।
  • मत्स्यपुराण[5]; पद्मपुराण [6]; कूर्मपुराण [7] का कथन है कि प्रयाग का विस्तार परिधि में पाँच योजन है और ज्यों ही कोई उस भूमिखंड में प्रविष्ट होता है, उसके प्रत्येक पद पर अश्वमेध का फल होता है।
  • त्रिस्थलीसेतु [8] में इसकी व्याख्या यों की गई है- 'यदि ब्रह्ययुप[9] को खूँटी मानकर कोई डेढ़ योजन रस्सी से चारों ओर मापे तो वह पाँच योजन की परिधि वाला स्थल प्रयागमंडल होगा।
  • महाभारत वनपर्व [10] , मत्स्यपुराण [11] आदि ने प्रयाग के क्षेत्रफल की परिभाषा दी है[12] 'प्रयाग का विस्तार प्रतिष्ठान से वासुकि के जलाशय तक है और कम्बल नाग एवं अश्वतर नाग तथा बहुमूलक तक है; यह तीन लोकों में प्रजापति के पवित्र स्थल के रूप में विख्यात है।
  • मत्स्यपुराण [13]ने कहा है कि 'गंगा के पूर्व में समुद्रकूप है, जो प्रतिष्ठान ही है।
  • त्रिस्थलीसेतु ने इसे यों व्याख्यात किया है- पूर्व सीमा प्रतिष्ठान का कूप है, उत्तर में वासुकिह्नद है, पश्चिम में कम्बल एवं अश्वतर हैं और दक्षिण में बहुमूलक है। इन सीमाओं के भीतर प्रयाग तीर्थ है।'
  • मत्स्यपुराण [14] के मत से दोनों नाग यमुना के दक्षिणी किनारे पर हैं, किंतु मुद्रित ग्रंथ में 'विपुले यमुनातटे' पाठ है। किंतु प्रकाशित पद्मपुराण [15] से पता चलता है कि कल्पतरु का पाठान्तर (यमुना-दक्षिणे तटे) ठीक है। वेणी क्षेत्र प्रयाग के अंतर्गत है और विस्तार में 20 धनु है, जैसा कि पद्मपुराण में आया है।[16] यहाँ तीन पवित्र कूप हैं, यथा प्रयाग, प्रतिष्ठानपुर एवं अलर्कपुर में।
  • मत्स्यपुराण एवं अग्निपुराण का कथन है कि यहाँ तीन अग्निकुंड हैं और गंगा उनके मध्य में बहती है। जहाँ भी कहीं पुराणों में स्नान स्थल का वर्णन (विशिष्ट संकेतों को छोड़कर) आया है, उसका तात्पर्य है वेणी-स्थल-स्नान और वेणी का तात्पर्य है दोनों (गंगा एवं यमुना) का संगम।[17]
  • वनपर्व एवं कुछ पुराणों के पर्व के मत गंगा एवं यमुना के बीच की भूमि पृथ्वी के जाँघ है अर्थात् यह पृथ्वी की अत्यन्त समृद्धशाली भूमि है और प्रयाग जघनों की उपस्थ भूमि है।[18]
  • नरसिंहपुराण (63|17) का कथन है कि प्रयाग में विष्णु योगमूर्ति के रूप में हैं।
  • मत्स्यपुराण (111|4-10) में आया है कि कल्प के अन्त में जब रुद्र विश्व का नाश कर देते हैं, उस समय भी प्रयाग का नाश नहीं होता। ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर (शिव) प्रयाग में रहते हैं। प्रतिष्ठान के उत्तर में ब्रह्मा गुप्त रूप में रहते हैं, विष्णु वहाँ वेणीमाधव के रूप में रहते हैं और शिव वहाँ अक्षयवट के रूप में रहते हैं। इसीलिए गंधर्वों के साथ देवगण, सिद्ध लोग एवं बड़े-बड़े ऋषिगण प्रयाग के मंडल को दुष्ट कर्मों से बचाते रहते हैं।[19] इसी से मत्स्यपुराण (104|18) में आया है कि यात्री को देवरक्षित प्रयाग में जाना चाहिए, वहाँ एक मास ठहरना चाहिए, वहाँ संभोग नहीं करना चाहिए, देवों एवं पितरों की पूजा करनी चाहिए और वांछित फल प्राप्त करने चाहिए।
  • प्रयाग की सीमा प्रतिष्ठान (झूँसी) से वासुकि सेतु तक तथा कंबल और अश्वतर नागों तक स्थित है। यह तीनों लोकों में प्रजापति की पुण्यस्थली के नाम से विख्यात है।
  • पद्म पुराण[20] के अनुसार 'वेणी' क्षेत्र प्रयाग की सीमा में 20 धनुष तक की दूरी में विस्तृत है। वहाँ प्रयाग, प्रतिष्ठान (झूँसी) तथा अलर्कपुर (अरैल) नाम के तीन कूप हैं। पुराणों[21] के अनुसार वहाँ तीन अग्निकुण्ड़ भी हैं जिनके मध्य से होकर गंगा बहती है। वनपर्व[22] तथा मत्स्य पुराण[23] में बताया गया है कि प्रयाग में नित्य स्नान को 'वेणी' अर्थात दो नदियों (गंगा और यमुना) का संगम स्नान कहते हैं। वनपर्व[24] तथा अन्य पुराणों में गंगा और यमुना के मध्य की भूमि को पृथ्वी का जघन या कटिप्रदेश कहा गया है। इसका तात्पर्य है पृथ्वी का सबसे अधिक समृद्ध प्रदेश अथवा मध्य भाग।[25]-
    प्रयाग

पौराणिक उल्लेख

प्रयाग का उल्लेख पुराणों में भी अनेकों स्थान पर हुआ है, जहाँ इसके विषय में कई महत्त्वपूर्ण तथ्य दिये हुए हैं[26]-

  • भगवान विष्णु को प्रयाग अतिप्रिय है, जहाँ बलराम आये थे।[27] यहाँ यमुना के उत्तरी किनारे पर पुरुरवा की राजधानी थी।[28] यहाँ श्री ललितादेवी का मंदिर भी है।[29] यह श्राद्ध के लिए उपयुक्त स्थान है[30] कहते हैं कि पुरुष रूपी वेद की यह नाक है।[31]
  • एक अन्य प्रसंगानुसार प्रयाग को प्रसिद्ध तथा प्राचीन तीर्थ स्थान बताया गया है, जो गंगा-यमुना के संगम पर स्थित है। इसका क्षेत्रफल 5 योजन है, जहाँ जाने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। रामायण के अनुसार यहाँ के जल से प्राचीन काल में राजाओं का अभिषेक होता था। यहाँ प्रजापति क्षेत्र है, वहाँ स्नान करने वाला स्वर्ग प्राप्त करता है तथा यहाँ मरने वाला व्यक्ति भवजाल से मुक्त हो जाता है। इंद्र इसकी रक्षा करते हैं। भारद्वाज ऋषि का आश्रम यहाँ पर था, जिसके कुछ चिह्न अभी तक वर्तमान में हैं। यहाँ सूर्य पुत्री यमुना सदा रहती हैं। यहाँ सिद्ध, देवता तथा ऋषियों का आवास है।[32] वन जाते समय श्रीरामचंद्र यहाँ से होते हुए गए थे।
  • बौद्ध काल में प्रयाग में बहुत से विहार तथा मठ बने थे। यहाँ का 'अक्षयवट' बहुत प्राचीन काल से प्रसिद्ध है। इस तीर्थ के उत्तर में प्रतिष्ठान के रूप में रक्षक ब्रह्मा, वेणिमाधव के रूप में विष्णु तथा अक्षयवट के रूप में शिव रक्षक एवं पाप निवारक हैं। मत्स्यपुराण के 102 अध्याय से 107 तक इसी तीर्थ का माहात्म्य भरा पड़ा है, जिसके अनुसार यह प्रजापति का क्षेत्र है। यहाँ के वट की रक्षा स्वयं शूलपाणि करते हैं और यहाँ मरने वाला शिवलोक का भागी होता है। कहते हैं, माघ महीने में यहाँ सब तीर्थों का वास रहता है, अत: इस महीने में यहाँ वास करने का बहुत फल लिखा है, पर यहाँ बैलगाड़ी पर सवार होकर नहीं जाना चाहिए। प्रयाग को 'तीर्थराज' कहा गया है, जहाँ त्रिवेणी में स्नान करने का विशेष माहात्म्य है, जिसमें गंगा, यमुना तथा सरस्वती का संगम होता है।[33] यहाँ 60 करोड़ 10,000 पवित्र स्थान है, जिनमें उर्वशीरमण, संध्यावट, कोटितीर्थ आदि प्रधान हैं[34] इससे दक्षिण में ऋणमोचन तीर्थ है, जो ऋण से मुक्ति देता है[35]
  • वाल्मीकि रामायण में प्रयाग का का उल्लेख भारद्वाज के आश्रम के सम्बन्ध में है[36] और इस स्थान पर घोर वन की स्थिति बताई गई है-

'यत्र भागीरथी गंगा यमुना-भिप्रवर्तते जग्मुस्तं देशमुद्दिश्य विगाह्य समुहद्वनम्। प्रयागमभित: पश्च सौमित्रे घूममुनमम्, अग्रेर्भगवत: केतुं मन्ये संनिहितो मुनि:। धन्विनौ तो सुखं गत्वा लंबमाने दिवाकरे, गंगायमुनयो: संधौ प्रापतुर्निलयं मुने:। अवकाशो दिविक्तो यं महानद्यो: समागमे, पुण्यश्चरमणीयश्च वसत्विह भवान् सुखम्'[37] इस वर्णन से सूचित होता है कि प्रयाग में रामायण की कथा के समय घोर जंगल तथा मुनियों के आश्रम थे, कोई जनसंकुल बस्ती नहीं थी।

  • महाभारत में गंगा-यमुना के संगम का उल्लेख तीर्थ रूप में अवश्य है, किंतु उस समय भी यहाँ किसी नगर की स्थिति का आभास नहीं मिलता-

'पवित्रमृषिभिर्जुष्टं पुण्यं पावनमुत्तमम, गंगायमुनयोर्वीर संगमं लोक विश्रुतम्'[38] 'गंगा यमुनोर्मव्ये स्नाति य: संगमेनर:, दशाश्वमेधानाप्नोति कुलं चैव सामुद्धरेत'[39] 'प्रयागे देवयज ने देवानां पृथिवीपते, ऊपुराप्लुत्य गात्राणि तपश्चातस्थरुत्तमम्, गंगायमुनयो चैव संगमे सत्यसंगरा:'[40]

इतिहास

  • बौद्ध साहित्य में भी प्रयाग का किसी बड़े नगर के रूप में वर्णन नहीं मिलता, वरन् बौद्ध काल में वत्सदेश की राजधानी के रूप में कौशांबी अधिक प्रसिद्ध थी। अशोक ने अपना प्रसिद्ध प्रयाग-स्तंभ कौशांबी में ही स्थापित किया था। यद्यपि बाद में शायद मुग़ल बादशाह अकबर के समय में वह प्रयाग ले आया गया था। इसी स्तंभ पर समुद्रगुप्त की प्रसिद्ध प्रयाग-प्रशस्ति अंकित है। कालिदास ने 'रघुवंश' के 13वें सर्ग में गंगा-यमुना के संगम का मनोहारी वर्णन किया है[41] तथा गंगा-यमुना के संगम के स्नान को मुक्तिदायक माना है-

'समुद्र-पत्न्योर्जलसन्निपात पूतात्मनामत्र किलाभिषेकात्, तत्त्वावबोधेन विनापि भूय: तनुस्त्यजां नास्ति शरीरबंध:'[42]

'उत्साद्याखिलक्षत्रजाति नवनागा: पद्यावस्यां नाम पुर्यामनुगंगाप्रयाग गयायाश्च मागधा गुप्ताश्च भोक्ष्यन्ति'।
  • विष्णुपुराण[43] से सूचित होता है कि इस पुराण के रचनाकाल[44] में प्रयाग की तीर्थ रूप में बहुत मान्यता थी-
'प्रयागे पुष्करे चैव कुरुक्षेत्रे तयार्णवे कृतोपवास: प्राप्नोति तदस्य श्रवणान्नर:'।
  • चीनी यात्री युवानच्वांग ने कन्नौजाधिप महाराज हर्ष का प्रति पांचवें वर्ष प्रयाग के मेले में जाकर सर्वस्व दान कर देने का अपूर्व वर्णन किया है। उत्तरकालीन पुराणों में प्रयाग के जिस 'अक्षयवट' का उल्लेख है, उसे बहुत समय तक संगम के निकट अकबर के क़िले के अंदर स्थित बताया जाता था। यह बात अब गलत सिद्ध हो चुकी है और असली वट वृक्ष किले से कुछ दूर स्थित बताया जाता है। महाभारत में अक्षयवट का गया में होना वर्णित है।[45] संभव है गौतम बुद्ध के गया स्थित संबोधिवृक्ष के समान ही पौराणिक काल में अक्षयवट की कल्पना की गई होगी।
  • कहा जाता है कि अकबर के समय में प्रयाग का नाम 'इलाहाबाद' कर दिया गया था, किंतु जान पड़ता है कि प्रयाग को अकबर के पूर्व भी 'इलाबास' कहा जाता था। एक पौराणिक कथा के अनुसार प्रतिष्ठानपुर अथवा झूसी[46] में चंद्रवंशी राजा पुरु की राजधानी थी। इनके पूर्वज पुरुरवा थे, जो मनु की पुत्री इला और बुध के पुत्र थे।[47] इला के नाम पर ही प्रयाग को 'इलाबास' कहा जाता था। वास्तव में अकबर ने इसी नाम को थोड़ा बदलकर 'इलाहाबाद' कर दिया था।
  • वत्स या कौशांबी का राजा उदयन जो प्राचीन साहित्य में प्रसिद्ध है, चंद्रवंश से ही संबंधित था-इससे भी प्रयाग में चंद्रवंश के राज्य करने की पौराणिक कथा की पुष्टि होती है और इस तथ्य का भी प्रमाण मिल जाता है कि वास्तव में प्रयाग का एक प्राचीन नाम 'इलाबास' भी था, जिसे अकबर ने कुछ बदल दिया था और उसका उद्देश्य प्रयाग नाम को हटाकर 'अल्लहाबाद' या 'इलाहाबाद' नाम प्रचलित करना नहीं था। अकबर ने संगम पर स्थित किसी पूर्वयुगीन क़िले का जीर्णोद्धार करके उसका विस्तार करवाया और उसे वर्तमान सुदृढ़ किले का रूप दिया। इस तथ्य की पुष्टि तुलसीदास के इस वर्णन से भी होती है, जिसमें प्रयाग में एक सुदृढ़ गढ़ का वर्णन है-
'क्षेत्र अगम गढ़ गाढ़ सुहावा, सपनेहु नहि प्रतिपच्छहिं पावा'[48]
  • अकबर के समकालीन इतिहास लेखक बदायूंनी के वृत्तांत से सूचित होता है कि इस मुग़ल सम्राट ने प्रयाग में एक बड़े राजप्रासाद की भी नींव रखी और नगर का नाम 'इलाहाबाद' कर दिया। अकबर ने प्रयाग की स्थिति की महत्ता को समझते हुए उसे अपने साम्राज्य के 12 सूबों में से एक का मुख्य स्थान भी बनाया। इसमें कड़ा और जौनपुर के प्रदेश भी सम्मिलित कर लिए गए थे। कहा जाता है कि मौर्य सम्राट अशोक का कौशांबी स्तंभ इसी समय प्रयाग लाया गया था। अशोक और समुद्रगुप्त के प्रसिद्ध अभिलेखों के अतिरिक्त इस पर जहाँगीर और बीरबल के लेख भी अंकित हैं। बीरबल का लेख उनकी प्रयाग यात्रा का स्मारक है- 'संवत 1632 शाके 1493 मार्गवदी 5 सोमवार गंगादाससुत महाराज बीरबल श्री तीरथ राज प्रयाग की यात्रा सुफल लिखितम्'। खुसरो बाग़ जहाँगीर के समय में बना था। यह बाग़ चौकोर है और इसका क्षेत्रफल 64 एकड़ है। इसमें अनेक मक़बरे हैं। पूर्व की ओर गुंबद वाला मक़बरा जहाँगीर के विद्रोही पुत्र खुसरो का है। इसे 1662 ई. में जहाँगीर ने बग़ावत करने के फलस्वरूप मृत्यु के सज़ा दी थी। इलाहाबाद के चौक में कुछ समय तक वे नीम के पेड़ खड़े थे, जिन पर अंग्रेज़ों ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में लड़ने वाले भारतीय वीरों को फांसी दी थी।[49]

संगम स्थल

मानचित्र में गंगा और यमुना का संगम, इलाहाबाद

संगम का धार्मिक महत्त्व भी बहुत है। गंगा-यमुना के संगम स्थल प्रयाग को पुराणों[50] में 'तीर्थराज' ( तीर्थों का राजा ) नाम से अभिहित किया गया है। इस संगम के सम्बन्ध में ॠग्वेद[51] में कहा गया है कि जहाँ कृष्ण (काले) और श्वेत (स्वच्छ) जल वाली दो सरिताओं का संगम है वहाँ स्नान करने से मनुष्य स्वर्गारोहण करता है। पुराणोक्ति यह हैं कि प्रजापति ने आहुति की तीन वेदियाँ बनायी थीं- कुरुक्षेत्र, प्रयाग और गया। इनमें प्रयाग मध्यम वेदी है। माना जाता है कि यहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती (पाताल से आने वाली) तीन सरिताओं का संगम हुआ है। पर सरस्वती का कोई बाह्य अस्तित्व दृष्टिगत नहीं होता। पुराणों[52] के अनुसार जो प्रयाग का दर्शन करके उसका नामोच्चारण करता है तथा वहाँ की मिट्टी का अपने शरीर पर आलेप करता है वह पापमुक्त हो जाता है। वहाँ स्नान करने वाला स्वर्ग को प्राप्त होता है तथा देह त्याग करने वाला पुन: संसार में उत्पन्न नहीं होता। यह केशव को प्रिय (इष्ट) है। इसे त्रिवेणी कहते हैं।

तीर्थराज प्रयाग

तीर्थराज प्रयाग धार्मिक एवं सांस्कृतिक रूप से अति-महत्त्वपूर्ण है। इसने हमारी भारतीय सभ्यता को संभाल कर रखा है। यह आत्मज्ञान और ज्ञान प्राप्ति का उत्तम स्थान है। यह मानव प्रेम की शिक्षा देता है। ऐसा माना जाता है कि ब्रह्म देव ने ब्रह्माण्ड के निर्माण से पूर्व पर्यावरण को शुद्ध करने के लिए यज्ञ यहीं किया इसीलिए इसका नाम प्रयाग पड़ा। प्रयाग का अर्थ होता है 'शुद्धिकरण का स्थान'। ब्रिटिश शासन के दौरान प्रयाग में प्रांतीय कार्यालय, उच्च न्यायलय स्थापित किये गये। उन दिनों प्रयाग सामाजिक, बौद्धिक और राजनितिक गतिविधियों का केंद्र था। प्रयाग का स्वतंत्रता की लड़ाई में भी विशेष योगदान रहा है। प्रयाग की भूमि अमरों की भूमि है। प्रयाग का अत्यधिक धार्मिक महत्व है और तीर्थ के राजा के रूप में जाना जाता है, तीन पवित्र नदियों प्रयाग के संगम पर स्थित होने की वजह से इसमें छह घाट हैं। दो घाट गंगा के तट पर, दो यमुना के तट पर और दो घाट संगम तट पर बने हुए हैं। संगम के पश्चिम में धिर्त्य-कुलिया और मधु-कुलिया स्थित हैं। इससे आगे निरंजन तीर्थ और औदित्य तीर्थ स्थित हैं। शिशिर मोचन और परशुराम तीर्थ किले के नीचे हैं। सरस्वती नदी का स्थान इसे ही माना जाता हैं। गौघाट का अपना विशेष महत्व है। बहुत से लोग इस स्थान पर स्नान करने के बाद गौ दान करते हैं। इससे कुछ आगे कपिल-तीर्थ है जो कि सम्राट कपिल के द्वारा निर्मित किया गया था। यही पर इन्देश्वर शिव, तारकेश्वर कुन्ड, और तारकेश्वर शिव मंदिर भी हैं। दशमेश घाट के पश्चिम में लक्ष्मी-तीर्थ है इसके दक्षिण में महादेवी-तीर्थ है और पास में उर्वशी-तीर्थ एवं उर्वशी कुन्ड हैं। ऐसी मान्यता है कि अप्सरा उर्वशी यहाँ स्नान करती थी। त्रिवेणी के उस पर अग्निकर है, सोमेश्वर-महादेव और सोम तीर्थ भी यही हैं।[53]

कल्पवास

कल्पवास के दौरान रहने का स्थान

प्रयाग में कल्पवास का अत्यधिक महत्व है। यह माघ के माह में और अधिक महत्व रखता है और यह पौष माह के 11वें दिन से माघ माह के 12वें दिन तक रहता है। कल्पवास को धैर्य, अहिंसा और भक्ति के लिए जाना जाता है और भोजन एक दिन में एक बार ही किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो कल्पवास की प्रतिज्ञा करता है वह अगले जन्म में राजा के रूप में जन्म लेता है।

धार्मिक मान्यता

गंगा यमुना और सरस्वती के त्रिवेणीसंगम को 'ओंकार' नाम से अभिहित किया गया है। 'ओंकार' का 'ओम' परब्रह्म परमेश्वर की ओर रहस्यात्मक संकेत करता है। यही सर्वसुखप्रदायिनी त्रिवेणी का भी सूचक है। ओंकार का आकार सरस्वती का प्रतीक, उकार यमुना का प्रतीक तथा मकार गंगा का प्रतीक है। तीनों क्रमश: प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा संकर्षण (हरि के व्यूह) को उद्भूत करने वाली है। इस प्रकार इन तीनों का संगम त्रिवेणी नाम से विख्यात है।[54] नरसिंहपुराण[55] में विष्णु को प्रयाग में योगमूर्ति के रूप में स्थित बताया गया है। मत्स्य पुराण[56] के अनुसार रुद्र द्वारा एक कल्प के उपरान्त प्रलय करने पर भी प्रयाग नष्ट नहीं होता। उस समय प्रतिष्ठान के उत्तरी भाग में ब्रह्मा छद्म वेश में, विष्णु वेणी माधव रूप में तथा शिव वट वृक्ष के रूप में आवास करते हैं और सभी देव, गंधर्व, सिद्ध तथा ऋषि पापशक्तियों से प्रयाग मण्डल की रक्षा करते हैं। इसीलिए मत्स्य पुराण[57] में तीर्थयात्री को प्रयाग जाकर एक मास निवास करने तथा संयमपूर्वक देवताओं और पितरों की पूजा करके अभीष्ट फल प्राप्त करने का विधान है।

शिरोमुंडन

इसी प्रकार क्षौर कर्म (शिरोमुंडन) भी प्रयाग में सम्पन्न होने पर पाप मुक्ति हेतु माना गया है। बच्चों और विधवाओं के क्षौर कर्म का विधान तो है ही, यहाँ तक कि सधवा पत्नियों के क्षौर कर्म का भी विधान 'त्रिस्थली सेतु' के अनुसार मिलता है। वहाँ बताया गया है कि सधवा स्त्रियों को अपने केशों की सुन्दर वेणी बनाकर, सभी प्रकार के केशविन्यास सम्बन्धी व्यंजनों से सजाकर पति की आज्ञा से (वेणी के अग्र भाग का) क्षौर कर्म कराना चाहिए। तत्पश्चात कटी हुई वेणी को अंजली में लेकर उसके बराबर स्वर्ण या चाँदी की वेणी भी लेकर जुड़े हाथ से संगम स्थल पर बहा देना चाहिए और कहना चाहिए कि सभी पाप नष्ट हो जायें और हमारा सौभाग्य उत्तरोत्तर वृद्धि पर रहे। नारी के लिए एक मात्र प्रयाग में ही क्षौर कर्म कराने का विधान है।

प्रयाग में आत्महत्या करने का सामान्य सिद्धान्त के अनुसार निषेध है। कुछ अपवादों के लिए ही इसको प्रोत्साहन दिया जाता हैं ब्राह्मण के हत्यारे, सुरापान करने वाले, ब्राह्मण का धन चुराने वाले, असाध्य रोगी, शरीर की शुद्धि में असमर्थ, वृद्धि जो रोगी भी हो, रोग से मुक्त न हो सका हो, ये सभी प्रयाग में आत्मघात कर सकते हैं।[58] गृहस्थ जो संसार के जीवन से मुक्त होना चाहता हो वह भी त्रिवेणी संगम पर जाकर वट वृक्ष के नीचे आत्मघात कर सकता है। पत्नी के लिए पति के साथ सहमरण या अनुमरण का विधान है, पर गर्भिणी के लिए यह विधान नहीं है।[59] प्रयाग में आत्मघात करने वाले को पुराणों के अनुसार मोक्ष की प्राप्ति होती है।[60] के अनुसार योगी गंगा-यमुना के संगम पर आत्महत्या करके स्वर्ग प्राप्त करता है और पुन: नरक नहीं देख सकता। प्रयाग में वैश्यों और शूद्रों के लिए आत्महत्या विवशता की स्थिति में यदा-कदा ही मान्य थी। किन्तु ब्राह्मणों और क्षत्रियों के द्वारा आत्म-अग्न्याहुति दिया जाना एक विशेष विधान के अनुसार उचित था। अत: जो ऐसा करना चाहें तो ग्रहण के दिन यह कार्य सम्पन्न करते थे, या किसी व्यक्ति को मूल्य देकर डूबने के लिए क्रय कर लेते थे।[61] सामान्य धारणा यह थी कि इस धार्मिक आत्मघात से मनुष्य जन्म और मरण के बन्धन से मुक्ति पा जाता है और उसे स्थायी अमरत्व (मोक्ष) अथवा निर्वाण की प्राप्ति होती है। इस धारणा का विस्तार यहाँ तक हुआ कि अहिंसावादी जैन धर्मावलम्बी भी इस धार्मिक आत्मघात को प्रोत्साहन देने लगे। कुछ पुराणों के अनुसार तीर्थयात्रा आरम्भ करके रास्ते में ही व्यक्ति यदि व्यक्ति प्रयाग का नाम स्मरण कर ले तो ब्रह्मलोक को पहुँच जाता है और वहाँ सन्न्यासियों, सिद्धों तथा मुनियों के बीच रहता है।

कुम्भ मेला

कुम्भ मेला, प्रयाग (इलाहाबाद)

12 साल बाद यहाँ कुम्भ के मेले का आयोजन होता है। कुम्भ के मेले में 2 करोड़ की भीड़ इकट्ठा होने का अनुमान किया जाता है जो सम्भवत: विश्व में सबसे बड़ा जमावड़ा है। कुम्भ मेला 2013 का प्रयाग में गंगा के किनारे पूरे 144 वर्ष के बाद महाकुंभ मेले का आयोजन हो रहा है। चूँकि कुंभ का मेला प्रत्येक 12 वर्ष में आता है इसलिए प्रत्येक 12 कुंभ पूरा होने के उपरांत एक महाकुंभ का आयोजन होता है जो 144 वर्ष के बाद आता है और वो प्रयाग में ही संपन्न होता है। इस महाकुंभ का आयोजन सन् 2013 (विक्रम संवत- 2069) में 14 जनवरी से 10 मार्च के बीच प्रयाग में संपन्न होने वाला है। ऐसे में गंगा स्नान का महत्व और बढ़ जाता है। हिंदुओं के सभी तीर्थ नदियों पर बसे हैं। गंगा नदी हिंदुओं के लिए देवी और माता समान है। इसीलिए हिंदुओं के लिए गंगा स्नान का बहुत महत्व है। गंगा जीवन और मृत्यु दोनों से जुडी़ हुई है इसके बिना हिंदू संस्कार अधूरे हैं। गंगाजल अमृत समान है।

कुंभ में गंगा स्नान, पूजन का महत्व

अनेक पर्वों और उत्सवों का गंगा से सीधा संबंध है मकर संक्रांति, कुंभ मेला और गंगा दशहरा के समय गंगा में स्नान, पूजन, दान एवं दर्शन करना महत्त्वपूर्ण माना गया है। गंगाजी के अनेक भक्ति ग्रंथ लिखे गए हैं जिनमें श्रीगंगासहस्रनामस्तोत्रम एवं गंगा आरती बहुत लोकप्रिय हैं। गंगा पूजन एवं स्नान से रिद्धि-सिद्धि, यश-सम्मान की प्राप्ति होती है तथा समस्त पापों का क्षय होता है। मान्यता है कि गंगा पूजन से मांगलिक दोष से ग्रसित जातकों को विशेष लाभ प्राप्त होता है। गंगा स्नान करने से अशुभ ग्रहों का प्रभाव समाप्त होता है। अमावस्या के दिन गंगा स्नान और पितरों के निमित तर्पण व पिंडदान करने से सदगती प्राप्त होती है और यही शास्त्रीय विधान भी है। हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि कुंभ स्थल के पवित्र जल में स्नान करने से मनुष्य के सारे पाप-कष्ट धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। गंगाजी में स्नान करने से सात्विकता और पुण्यलाभ प्राप्त होता है।[62]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. गंगायमुनयोर्वीर संगमं लोकविश्रुतम्। यत्रायजत भूतात्मा पूर्वमेव पितामह:। प्रयागमिति विख्यातं ब्रस्माद भरतसत्तम।। वनपर्व (87|18-19); तथा 'सर्वेषु लोकेषु प्रयागं बुध:। पूज्यते तीर्थराजस्तु सत्यमेव युधिष्ठिर।। -मत्स्यपुराण (109|15)।
  2. प्रकृष्टं सर्वयागेभ्य: प्रयागमिति गीयते। दृष्ट्वा प्रकृष्टयागेभ्य: पुष्टेभ्यो दक्षिणादिभि:। प्रयागमिति तन्नाम कृतं हरिहरादिभि:।। -त्रिस्थलीसेतु, पृष्ठ 13।
  3. काशी. 7|49
  4. प्रभावात्सर्वतीर्थेभ्य: प्रभवत्यधिकं विभो। मत्स्यपुराण (110|11)। प्रकृष्टत्वात्प्रयागोसौ प्राषान्याद्राजशब्दवान्। ब्रह्मपुराण (त्रिस्थलीसेतु, पृष्ठ 13)।
  5. पंचयोजनविस्तीर्ण प्रयागस्य तु मंडलम्। प्रविष्टमात्रे तदभूमावश्वमेध: पदे पदे।। मत्स्यपुराण (108|9-10, 111|8)
  6. पद्मपुराण (1|45|8)
  7. कूर्मपुराण (2|35|4) में आया है- पंचयोजनविस्तीर्ण ब्रह्मण: परमेष्ठिन:। प्रयागं प्रथितं तीर्थ यस्य माहात्म्यमीरितम्।।
  8. त्रिस्थलीसेतु (पृष्ठ 15)
  9. ब्रह्मा के यज्ञस्तम्भ
  10. वनपर्व (104|5
  11. मत्स्यपुराण, 106|30)
  12. आ प्रयागं प्रतिष्ठानाद्यत्पुरा वासुकेर्ह्नदात्। कम्बलाश्वतरौ नागौ नागश्च बहुमूलक:। एतत् प्रजापते: क्षेत्रं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्। मत्स्यपुराण (104|5); पद्मपुराण (1|39|69-70, 41|4-5) में भी यही बात कही गयी है। वनपर्व (85|76-77) में आया है- 'प्रयागं सप्रतिष्ठानं कम्बलाश्वतरावुभौ। तीर्थ भोगवती चैव वेदिरेषा प्रजापते:।। तत्र वेदाश्च यज्ञाश्च मूर्तिमन्तो युधिष्ठिर।' अग्निपुराण (111|5) में भी आया है- 'प्रयागं... प्रजापते:' (यहाँ 'वेदी प्रोक्ता' पढ़ा गया)।
  13. मत्स्यपुराण(106|30)
  14. (कल्पतरु, तीर्थ, पृष्ठ 143)
  15. पद्मपुराण (1|43|27)
  16. माघ: सितासिते विप्र राजसूयै: समो भवेत्। धनुर्विंशतिविस्तीर्णे सितनीलाम्बुसंगमे।। इति पाद्मोक्ते:। पद्मपुराण, त्रिस्थलीसेतु (पृष्ठ 75)। सितासित (श्वेत एवं नील) का अर्थ है वेणी। 'धनु' का माप बराबर होता है चार हाथों या 96 अंगुलों के।
  17. तत्र त्रीण्यग्निकुंडानि येषां मध्येन जाह्नवी। वनपर्व (85|73); त्रीणि चाप्यग्निकुंडानि येषां मध्ये तु जाह्नवी। मत्स्यपुराण (110|4), अग्निपुराण (111|12) एवं पद्मपुराण (1|39|67 एवं 1|49|4)। मत्स्यपुराण (104|13) एवं कूर्मपुराण (1|36|28-29) ने 'पंच कुंडानि' पढ़ा है।
  18. गंगायमुनयोर्मध्यं पृथिव्या जघनं स्मृतम्। प्रयागं जघनस्थानमृपस्थमृषयो विदु:।। वनपर्व (85|75 पद्मपुराण 1|39|69 एवं 1|43|19); अग्निपुराण (111|4); कूर्मपुराण (1|37|12) एवं मत्स्यपुराण (106|19)। भावना यह है कि तीर्थ स्थल पृथ्वी के बच्चों के समान है।
  19. प्रयागं निवसन्त्येते ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा:। उत्तरेण प्रतिष्ठानाच्दद्मना ब्रह्म तिष्ठति।। वेणीमाधवरूपी तु भगवांस्तत्र तिष्ठति। महेश्वरी वटो भूत्वा तिष्ठते परमेश्वर:।। ततो देवा: सगंधर्वा: सिद्धाश्च परमर्षय:। रक्षन्ति मंडल नित्य पापकर्मनिवारणात्।। मत्स्यपुराण (111|4-10) और कूर्मपुराण (1|36|23-26), पद्मपुराण (आदिखंड 41|6-10)।
  20. पद्म पुराण (1.43-26
  21. मत्स्य (110.4) और अग्नि (111.12
  22. वनपर्व (85.81 और 85
  23. मत्स्य0 (104.16-17
  24. वनपर्व (85.75
  25. धर्मशास्त्र का इतिहास |लेखक: डॉक्टर पांडुरंग वामन काणे |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 1326 |
  26. पौराणिक कोश |लेखक: राणा प्रसाद शर्मा |प्रकाशक: ज्ञानमंडल लिमिटेड, वाराणसी |पृष्ठ संख्या: 336 |
  27. (भागवतपुराण 7.14.30; 10.90.28 (3); 12.1.37; 10.79.10; मत्स्यपुराण 22.8)
  28. ब्रह्मांडपुराण 3.13.100; 66.21; 4.44.98; वायुपुराण 91.50
  29. मत्स्यपुराण 13.26
  30. वायुपुराण 77.92
  31. वायुपुराण 104.76; 106.69
  32. मत्स्यपुराण 104 पूरा
  33. मत्स्यपुराण अ. 109-110
  34. मत्स्यपुराण अ. 106
  35. मत्स्यपुराण 111.112; 180.56; 192.11; 193.19
  36. ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |पृष्ठ संख्या: 585 |
  37. वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकांड 54,2-5-8-22.
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  39. महाभारत वनपर्व 84, 35.
  40. महाभारत वनपर्व 95, 4-5.
  41. श्लोक 54 से 57 तक
  42. रघुवंश 13, 58.
  43. विष्णुपुराण 5,8,29
  44. स्थूल रूप से गुप्त काल
  45. महाभारत वनपर्व 84, 83
  46. जो प्रयाग के निकट गंगा के उस पार है
  47. वाल्मीकि रामायण उत्तर-89
  48. रामचरितमानस, अयोध्या कांड
  49. ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |पृष्ठ संख्या: 585 |
  50. मत्स्य 109.15; स्कन्द, काशी0 7.45; पद्म 6.23.27-34 तथा अन्य
  51. ऋग्वेद खिल सूक्त (10.75
  52. मत्स्य (104.12), कूर्म (1.36.27) तथा अग्नि (111.6-7) आदि
  53. तीर्थराज प्रयाग (हिंदी) (एच.टी.एम.एल) कुम्भ मेला (आधिकारिक वेबसाइट)। अभिगमन तिथि: 8 जनवरी, 2013।
  54. त्रिस्थलीसेतु, पृष्ठ 8
  55. नरसिंहपुराण(64.17
  56. मत्स्य पुराण(111.4-10
  57. मत्स्य पुराण(10.4.18
  58. आदिपुराण और अत्रिस्मृति
  59. नारदीय, पूर्वाद्ध, 7.52-53
  60. कूर्म0 (1.36.16-39
  61. अलबरूनी का भारत, भाग 2, पृ0 170
  62. गंगा स्नान पर्व का महत्व (हिंदी) (एच.टी.एम.एल) वेब दुनिया हिंदी। अभिगमन तिथि: 8 जनवरी, 2013।

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