कांग चिंगबा

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कांग चिंगबा (अंग्रेज़ी: Kang Chingba) मणिपुर का एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है। यह उत्सव प्रत्येक वर्ष जून-जुलाई महीने में मनाया जाता है। यह पुरी की रथयात्रा के समान है लेकिन रथ निर्माण की शैली पर मैतेई स्थापत्य कला की छाप है। 'कांग' का अर्थ पहिया होता है। भगवान जगन्नाथ को जिस रथ में ले जाया जाता है उसे भी ‘कांग’' कहा जाता है। कांग चिंगबा त्योहार दस दिनों तक पूरे मणिपुर में मनाया जाता है। रथ में भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की काठ की मूर्तियाँ रखकर उनकी शोभा यात्रा निकाली जाती है। इस त्योहार को देखने और शोभा यात्रा में शामिल होने के लिए पूरे मणिपुर से हजारों भक्त इंफाल में आते हैं और विशाल रथ को खींचते हैं। रथ को गोबिंदजी मंदिर से सनथोंग (महल के द्वार) तक लाया जाता है और पुनः उसी मार्ग से मंदिर तक वापस लाया जाता है।[1]

इतिहास

गोबिंदजी मंदिर के अतिरिक्त पूरे मणिपुर में कंग चिंगबा का आयोजन होता है लेकिन परिवार के स्तर पर कंग चिंगबा का आयोजन गोबिंदजी मंदिर के आयोजन के बाद ही किया जा सकता है। कंग चिंगबा के आयोजन का इतिहास बहुत पुराना है। सर्वप्रथम कांग चिंगबा का आयोजन वर्ष 1832 ई. में राजा गंभीर सिंह ने प्रारंभ किया था। पहले सात रंगों का ध्वज ‘कंगलेईपक’ (मणिपुर के सात वंशों का प्रतिनिधित्व करने वाला ध्वज) कांग की छत पर फहराया जाता था, लेकिन अब ध्वज के स्थान पर ‘कांगशी’ (घंटी) का उपयोग किया जाता है। मैतेई समाज और उसकी प्रत्येक मान्यता, अनुष्ठान, त्योहार, संस्कृति और परंपराओं में पृथ्वी की रचना, जीवित प्राणियों की सृष्टि, मानव सभ्यता और प्रकृति आदि आधारभूत तत्व के रूप में मौजूद रहती है।

मणिपुर में पहली बार कंग चिंगबा का आयोजन वर्ष 1832 ई. में मणिपुरी महीने ‘इना’ (मई-जून) की दूसरी तिथि को शनिवार के दिन हुआ था। इसके बाद सात साल तक इस त्योहार का आयोजन नहीं हुआ। पुनः वर्ष 1840 में राजा गंभीर सिंह के निधन के बाद उनके बेटे चंद्रकीर्ति ने इना के दसवें दिन इस त्योहार का आयोजन किया। इससे स्पष्ट होता है कि शुरुआत में त्योहार का कोई दिन निश्चित नहीं था, हालांकि इना महीने में इसका आयोजन किया जाता था। चार साल के विराम के बाद वर्ष 1846 ई. में पुरी में इस उत्सव का आयोजन किया गया। इस प्रकार मणिपुर में जगन्नाथ पंथ का आगमन हुआ और कंग चिंगबा मैतेई हिंदुओं का सबसे बड़ा त्योहार बन गया।[1]

मान्यता

मणिपुर में रथयात्रा के अवसर पर भक्तों द्वारा खींचे गए रथ में ब्राह्मण और शंख, मृदंग तथा झांझ लिए संगीतकारों की एक टीम शामिल होती है। अपने हाथों में चँवर लेकर दो युवा लड़कियां द्वारपाला की भूमिका में रहती हैं। जहां भी रथ रुकता है वहां भक्तगण फल, फूल, अगरबत्ती से भगवान की पूजा करते हैं। आरती के बाद फल वितरित किए जाते हैं। लोगों का मानना है कि रस्सियों को पकड़ने और मूर्तियों के साथ रथ को खींचने का अवसर मिलने से सभी दु:ख और पाप दूर हो जाते हैं। इस विश्वास के साथ सभी क्षेत्रों के लोग रथ को खींचने के लिए दूर-दूर से आते हैं। नौ दिनों तक प्रतिदिन मंडप में जयदेव (भगवान का स्तुति गीत) और ‘खुबाक – ईशै’ का प्रदर्शन होता है। ‘खुबाक’ का अर्थ ताली और ‘ईशै’ का अर्थ संगीत होता है।

प्रसाद

‘जयदेव’ और ‘खुबाक-ईशै’ के बाद प्रसाद के रूप में खिचड़ी का वितरण किया जाता है। कमल के पत्ते पर प्रसाद परोसा जाता है जिसके कारण प्रसाद का स्वाद बढ़ जाता है। प्रसाद के रूप में खिचड़ी परोसने के पीछे एक स्थानीय मान्यता है। ऐसा माना जाता है कि एक बार सुभद्रा को उनके भाइयों ने खाना बनाने के लिए कहा। समुद्री लहरों की आवाज़ से भयभीत होकर सुभद्रा ने जल्दबाजी में चावल और दाल दोनों को एक ही बर्तन में मिला दिया जो खिचड़ी बन गई। इसलिए खिचड़ी कंग उत्सव का एक अभिन्न अंग बन गई। इंगी के बारहवें दिन को हरिशयन कहा जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार इस दिन भगवान विश्राम करते हैं। हरिशयन के दिन उत्सव का समापन होता है। विभिन्न प्रकार के मौसमी फल और फूल जैसे अनान्नास, नाशपाती, बेर, कमल के बीज, कमल के फूल, कमल के पत्ते और सूखे मटर और धान के दानों की माला आदि कंग त्योहार से जुड़े हुए हैं।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 मणिपुर के पर्व–त्योहार (हिंदी) apnimaati.com। अभिगमन तिथि: 02 अक्टूबर, 2021।

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