कुश्ती  

कुश्ती
कुश्ती
विवरण 'कुश्ती' एक प्रकार का द्वंद्वयुद्ध है, जो बिना किसी शस्र की सहायता के केवल शारीरिक बल के सहारे लड़ा जाता है। पुराणों में इसका उल्लेख मल्लक्रीड़ा के रूप में मिलता है।
शुरुआत कुश्ती का आरंभ संभवत: उस युग में हुआ, जब मनुष्य ने शस्त्रों का उपयोग नहीं जाना था। उस समय इस प्रकार के युद्ध में पशु बल ही प्रधान था। पशु बल पर विजय पाने के लिए मनुष्य ने विविध प्रकार के दाँव पेंचों का प्रयोग सीखा होगा और उससे मल्ल युद्ध अथवा कुश्ती का विकास हुआ होगा।
सदस्य दो (2)
स्थल बड़ा मैदान
श्रेणियाँ फ्लाई वेट, बैंटेम वेट, फेदर वेट, लाइट वेट, वेल्टर वेट, मिडिल वेट, लाइट हेवी वेट, हेवी वेट।
भारतीय पहलवान गामा पहलवान, दारा सिंह, गुरु हनुमान, सतपाल सिंह, सुशील कुमार पहलवान, धीरज ठाकरान
संबंधित लेख 'भीमसेनी', 'हनुमंती', 'जांबवंती', 'जरासंधी, 'फ्री स्टाइल कुश्ती', 'सूमो कुश्ती', 'अमरीकन फ्री स्टाइल मल्लयुद्ध', 'श्विंजेन मल्लयुद्ध' आदि।
अन्य जानकारी मध्य काल भारतीय मल्लयुद्ध पद्धति का मुस्लिम देशों की युद्ध पद्धति के साथ समन्वय हुआ। यह समन्वय विशेष रूप से मुग़ल काल में हुआ। बाबर मध्य एशिया में प्रचलित कुश्ती पद्धति का कुशल और बलशाली पहलवान था। अकबर भी इस कला का अच्छा जानकार था। उसने उच्चकोटि के मल्लों को राजाश्रय प्रदान कर कुश्ती कला को प्रोत्साहित किया।

कुश्ती (अंग्रेज़ी:Kushti) एक प्रकार का द्वंद्वयुद्ध है, जो बिना किसी शस्त्र की सहायता के केवल शारीरिक बल के सहारे लड़ा जाता है। इसमें प्रतिद्वंद्वी को बिना अंगभंग किए या पीड़ा पहुँचाए परास्त किया जाता है। पुराणों में इसका उल्लेख मल्लक्रीड़ा के रूप में मिलता है। इन उल्लेखों से ज्ञात होता है कि इसके प्रति उन दिनों विशेष आकर्षण और आदर था। मध्य काल में मुस्लिम साम्राज्य और संस्कृति के प्रसार के साथ भारतीय मल्लयुद्ध पद्धति का मुस्लिम देशों की युद्ध पद्धति के साथ समन्वय हुआ। यह समन्वय विशेष रूप से मुग़ल काल में हुआ। आधुनिक काल में देशी रजवाड़ों ने कुश्ती कला को संरक्षण प्रदान किया। पटियाला, कोल्हापुर, मैसूर, इंदौर, अजमेर, बड़ौदा, भरतपुर, जयपुर, बनारस, दरभंगा, बर्दवान, तमखुई[1] के राजाओं के अखाड़ों की देशव्यापी ख्याति रही है। वहाँ कुश्ती लड़ने वाले पहलवानों को हर प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त थीं और इन अखाड़ों के नामी पहलवान देश में घूम-घूम कर कुश्ती के दंगलों में भाग लेते और कुश्ती का प्रचार किया करते थे।

इतिहास

कुश्ती का आरंभ संभवत: उस युग में हुआ होगा, जब मनुष्य ने शस्त्रों का उपयोग जाना न था। उस समय इस प्रकार के युद्ध में पशु बल ही प्रधान था। पशु बल पर विजय पाने के लिए मनुष्य ने विविध प्रकार के दाँव-पेंचों का प्रयोग सीखा होगा और उससे 'मल्ल युद्ध' अथवा 'कुश्ती' का विकास हुआ होगा। 'रामायण' और 'महाभारत' में कुश्ती की पर्याप्त चर्चा हुई है। रामायण से बाली-सुग्रीव का युद्ध और महाभारत से भीम-दुर्योधन के युद्ध का उल्लेख उदाहरण स्वरूप दिया जा सकता है। इस प्रकार के द्वंद्वयुद्ध की अपनी एक नैतिक संहिता थी, ऐसा इन युद्धों के वर्णन से प्रकट होता है। उसके विरुद्ध आचरण करने वाला निंदनीय माना जाता था। श्रीकृष्ण के संकेत पर भीम द्वारा जरासंध की संधियों के चीरे जाने और दुर्योधन की जाँघ पर प्रहार करने की निंदा लोगों ने की है।[2]

संरक्षण

आधुनिक समय में देशी रजवाड़ों ने कुश्ती कला को संरक्षण प्रदान किया। पटियाला, कोल्हापुर, मैसूर, इंदौर, अजमेर, बड़ौदा, भरतपुर, जयपुर, बनारस, दरभंगा, बर्दवान, तमखुई[3] के राजाओं के अखाड़ों की देशव्यापी ख्याति रही हैं। वहाँ कुश्ती लड़ने वाले पहलवानों को हर प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त थीं और इन अखाड़ों के नामी पहलवान देश में घूम-घूम कर कुश्ती के दंगलों में भाग लेते और कुश्ती का प्रचार किया करते थे। कुछ अन्य लोग भी अच्छे पहलवानों को प्रोत्साहित करते थे।

मल्ल का भोजन

कुश्ती कला में पारंगत होने के लिए मल्ल को चित्तनिरोध, मनोयोग तथा संयम की सतत साधना करनी पड़ती है। भारतीय मल्ल का भोजन काफ़ी पुष्टिकारक होता है। मल्ल को अपनी रसना पर नियंत्रण रखना चाहिए। भारतीय मल्ल अधिकतर दूध, घी, बादाम आदि का सेवन करते हैं। शक्ति वर्धन के लिए कुछ मल्ल मांस के शोरवे का भी प्रयोग करते हैं। आज भी देश के कोने-कोने में, चाहे वह नगर हो या गाँव, अखाड़े पाए जाते हैं। सफल मल्ल बनने के लिए तीन बातों का ध्यान रखना पड़ता है-

  1. नियमित व्यायाम
  2. उचित भोजन तथा
  3. कुश्ती का नियमित अभ्यास एवं विकास

कुश्ती की पद्धतियाँ

भारतीय कुश्ती को निम्न चार पद्धतियों में बाटाँ गया है-

  1. भीमसेनी
  2. हनुमंती
  3. जांबवंती
  4. जरासंधी
भीमसेनी कुश्ती - इस कुश्ती का नाम 'महाभारत' के पाण्डव भीम के नाम पर है। इस कुश्ती में शरीर की शक्ति का विशेष होता महत्त्व है।
हनुमंती कुश्ती - एक रणनीति के आधार पर दुश्मन से उबरने के लिए यह कुश्ती बनाई गई है। हनुमंती कुश्ती में दाँव पेंच और कला की प्रधानता होती है।
जाबवंती कुश्ती - जाबवंती कुश्ती में हाथ-पैर से इस प्रकार प्रयास किया जाता है कि प्रतिस्पर्धी चित्त न कर पाए। इसमें शारीरिक शक्ति और दाँव-पेंच की अपेक्षा शरीर साधना का महत्त्व है।
जरासंधी कुश्ती - इस कुश्ती का नाम राक्षस जरासंध के नाम पर है, इसमें हाथ-पाँव मोड़ने का प्रयास प्रधान है।

भारतीय मल्लों की प्रसिद्धि

भारत के कई मल्लों ने विश्व में ख्याति अर्जित की है। भारतीय मल्ल- गूँगा, बुर्द तथा हमीदा ने मल्लयुद्ध के क्षेत्र में काफ़ी प्रसिद्धि प्राप्त की। नवयुवक मल्ल गुँगा ने इमामबख़्श को कुश्ती के लिए ललकारा और पहली बार उसे आसमान दिखला दिया, किंतु बाद की कुश्तियों में इमामबख़्श गूँगा पर विजय प्राप्त कर 'रुस्तम-ए-हिन्द' बना रहा। इधर हमीदा और बुर्द की कई कुश्तियाँ अनिर्णित रहीं, किंतु 1938 ई. में हमीदा ने बुर्द को परास्त कर दिया। इसी समय बंबई (वर्तमान मुम्बई) में एक अंतर्राष्ट्रीय दंगल हुआ, जिसमें रूमानिया, हंगरी, जर्मनी, तुर्की, चीन, फिलिस्तीन आदि देशों के मल्लों ने भाग लिया। इस प्रतियोगिता में जर्मनी के मल्ल क्रैमर ने अजेय गूँगा को परास्त कर भारत को चकित कर दिया, किंतु उसे दरभंगा में पूरणसिंह बड़े से हार माननी पड़ी तथा कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में राजवंशी सिंह भी उस पर सबल पड़े। अंत में इमामबख़्श ने उसे चित्त कर भारतीय मल्लों का गौरव अक्षुण्ण रखा। हमीदा ने किंग कांग को परास्त कर विदेशी मल्लों के हृदय में भारतीय मल्लयुद्ध की श्रेष्ठता का सिक्का जमा दिया।

देश के विभाजन से मल्लयुद्ध के क्षेत्र में भारत की बहुत बड़ी क्षति हुई। उच्च कोटि के प्राय: सभी मल्ल पंजाबी मुसलमान थे, जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान के नागरिक हो गए। इमामबख़्श का पुत्र भोलू 'रुस्तम-ए-पाकिस्तान' के ख़िताब से सम्मानित हुआ था तथा उसके अन्य भाई असलम, अकरम, गोगा आदि भी उच्चकोटि के पहलवान रहे। इस प्रकार गामा परिवार की परंपरा अक्षुण्ण रही। उच्चकोटि के भारतीय पहलवान मंगला राय, केशर सिंह तथा पूरणसिंह कनिष्ठ रहे थे।

कुश्ती का विकास

भारत के बाहर कुश्ती अन्य कई देशों में प्रचलित है, किंतु वहाँ इसका प्राचीनतम प्रचार यूनान में ही ज्ञात होता है। होमर के प्रसिद्ध काव्य 'इलियड'[4] में एजैक्स तथा यूलिसीज के मल्लयुद्ध का विस्तृत वर्णन है। उसमें यूलिसीज द्वारा बाहरी टाँग मारकर एजैक्स को धराशायी कर देने का विवरण है। क्रोटोन निवासी मिलो उस काल का सर्वविख्यात मल्ल था, जिसने लगातार छह ओलंपिक खेलों में सर्वोच्च विजय चिह्न (पदक) प्राप्त किया था। मिलो के संबंध में यह किंवदंती है कि उसने पाइथागोरस के विद्यालय की गिरती हुई छत को अकेले ही संभाल लिया था। यूलिसीज तथा एजैक्स की कुश्ती का विवरण बहुत कुछ बेनीहसन की क़ब्र पर निर्मित भवनों पर अंकित चित्रों से मिलता है। इस आधार पर कुछ विद्वानों का मत है कि मल्लयुद्ध कला यूनानियों ने मिस्रवासियों से ही सीखी, यद्यपि यूनानी परंपरा के अनुसार थीसियस[5] यूनानी मल्लयुद्ध के जन्मदाता तथा विधिनिर्माता माने जाते हैं।

यूनान की भाँति ही रोम में भी कुश्ती की कला का विकास हुआ था। यूनान और रोम की प्राचीन कुश्ती कला का समन्वय 'ग्रीको' रोमन पद्धति के रूप में हुआ है, ऐसी लोगों की धारणा है, किंतु इस समय यूरोप में जिस ग्रीको रोमन शैली का प्रचार है, वह प्राचीन शैली से सर्वथा भिन्न है। आधुनिक पद्धति का प्रादुर्भाव 1860 ई. के लगभग फ़्राँस में हुआ और यह क्रमश: सारे यूरोप में फैल गई। रूस निवासी हैकन एशिमिड इस पद्धति का सबसे प्रसिद्ध मल्ल हुआ। पेशेवर पहलवान अब इस पद्धति को बहुत कम अपनाते हैं।

रेपचेज नियम

कुश्ती में रेपचेज वो नियम है जिसके तहत अगर कोई खिलाड़ी शुरुआती दौर में हार जाता है और उससे जीतने वाला खिलाड़ी फाइनल तक पहुंचता है तो हारने वाले खिलाड़ी को अपनी ताकत आजमाइश का दूसरा मिलता है। यह शब्द फ्रेंच से लिया गया है जिसका अर्थ 'rescue' अर्थात् बचाव होता है। कुश्ती में यह उस खिलाड़ी के लिए बचाव का एक और मौका होता है जो शुरुआती मुकाबले में हार जाता है। कुश्ती में अन्य खेलों की भांति पहलवानों के बीच मुकाबले का ड्रॉ उनकी रैंकिंग के मुताबिक नहीं होता है। यह आकस्मिक ड्रॉ के तहत तय किया जाता है कि किन दो पहलवानों के बीच मुकाबला होगा। टेनिस में कभी दो टॉप रैंकिंग खिलाड़ी शुरुआती दौर में आपस में नहीं भिड़ते लेकिन कुश्ती में यह संभव है और इसीलिए इस रेपचेज नियम को यहाँ लागू किया जाता है।

फ्री स्टाइल

विश्व ओलंपिक में ग्रीको-रोमन पद्धति में भी कुश्ती होती है। इस पद्धति में कमर के नीचे का भाग पकड़ना वर्जित है। प्रतिद्वंद्वी एक दूसरे का शरीर केवल खुले हाथ से ही पकड़ सकते हैं। हाथ और बाँह का पकड़ना इस नियम के अपवाद हैं। भौंह तथा मुँह के बीच के भाग को छूना निषिद्ध है। गला दबाना, कपड़े पकड़ना, बाल पकड़ना, पाँव से मारना, धक्का देना या अँगुली मरोड़ना वर्जित है। कैंची लगाकर प्रतिद्वंद्वी को दोनों पावों के बीच दबाना वर्जित है। पाँव का प्रयोग किसी भी रूप में नहीं किया जा सकता, न तो लगाने में और न बचाव करने में। इस पद्धति का मल्लयुद्ध 1896 से 1912 तक ओलंपिक के खेलों में होता रहा। 1920 में ऐंटवर्प में जो ओलंपिक खेल आयोजित हुआ, उसमें इस पद्धति के साथ एक नई पद्धति का मल्ल्युद्ध भी सम्मिलित किया गया, जिसे ‘फ्री स्टाइल कहते’ हैं। ओलंपिक खेलों में कोई भी दोनों पद्धतियों में निष्णात मल्ल विरले ही होते हैं। अब तक स्वेडन के आइवर जोहांसन और इस्टोनिया के पालू सालू ही ऐसे पहलवान हैं जिन्हें क्रमश: लास ऐंजेल्स[6] और बर्लिन[7] के ओलंपिक खेलों में दोनों पद्धतियों में एक साथ विश्व विजयी होने का गौरव प्राप्त हुआ है।

कुश्ती की श्रेणियाँ

कुश्ती निम्नलिखित वजन के अनुसार होती हैं तथा इसकी निम्न 8 श्रेणियाँ मानी गई हैं-

  1. फ्लाई वेट 114 1/2 पाउंड तक
  2. बैंटेम वेट 125 1/2 पाउंड तक
  3. फेदर वेट 136 1/2 पाउंड तक
  4. लाइट वेट 147 1/2 पाउंड तक
  5. वेल्टर वेट 160 1/2 पाउंड तक
  6. मिडिल वेट 174 पाउंड तक
  7. लाइट हेवी वेट 191 पाउंड तक
  8. हेवी वेट 191 पाउंड के ऊपर

प्रतिद्वंद्वी को विधानत: यह अधिकार है कि वह चाहे तो अपने भार से एक भार ऊपर से कुश्ती लड़े। अपने निश्चय की सूचना भार लेने के पूर्व ही संबद्ध अधिकारी को दे देना प्रतिद्वंद्वी के लिए आवश्यक है। नाम के पुकारे जाने पर दोनों प्रतिद्वंद्वी अपने-अपने कोने में आकर खड़े हो जाते हैं। एक के पाँव में लाल तथा दूसरे के पाँव में हरा फीता बँधा रहता है। निर्णायक[8] बीच में खड़ा होकर दोनों को बुलाता है और उनके जूते, नाखून आदि का निरीक्षण करने के पश्चात् दोनों प्रतिद्वंद्वी अपने-अपने कोने में वापस चले जाते हैं। निर्णायक सदैव डाक्टर हुआ करते हैं। उनके पास लाल, हरे तथा सफ़ेद तीन-तीन लैंप, एक-एक स्टॉप वाच[9], घंटा, लाल हरे रंग के पट्टे, फेंकने वाला लाल हरे रंग का बिंब[10] होता है।[2]

शांबो

ओलंपिक खेल में एक तीसरे प्रकार की कुश्ती को भी मान्यता प्राप्त है। उसे 'शांबो' कहते हैं। यह कुश्ती एक विशेष प्रकार का मोटे कपड़े वाला जैकेट पहनकर लड़ी जाती है और जैकेट को पकड़कर ही दाँव-पेंच मारा जाता है। उसमें बदन को नहीं छुआ जा सकता। इसमें ग्रीको रोमन अथवा फ्री स्टाइल की भाँति कंधों का लगाना अनिवार्य नहीं है।

दैशिक शैलियाँ

अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त कुश्ती की उपर्युक्त शैलियों के अतिरिक्त कुछ अन्य दैशिक शैलियाँ भी हैं, जिनमें 'कंबरलैंड तथा वेस्टमोरलैंड कुश्ती' उल्लेखनीय हैं।

रेफरी होल्ड

इस कुश्ती का प्रचलन उत्तरी इंग्लैंड तथा दक्षिणी स्कॉटलैंड में है। मल्लयुद्ध प्रारंभ होने से पूर्व प्रतिद्वंद्वी सीने से सीना मिलाकर, एक दूसरे से इस प्रकार लिपट जाते हैं कि एक मल्ल की बाईं भुजा दूसरे मल्ल की दाहिनी भुजा के ऊपर तथा एक की ठुड्डी दूसरे के दाहिने कंधे पर पड़ती है। इसके पश्चात् वे अपने हाथों को एक-दूसरे की पीठ पर रखकर बंद कर लेते हैं। इस अवस्था को 'रेफरी होल्ड'[11] कहते हैं और वह सावधान होने की अवस्था समझी जाती है। जिस मल्ल के हाथों की पकड़ शिथिल होकर छूट जाती है, उसकी पराजय मानी जाती है।

डॉग फाल

इस पद्धति की कुश्ती में जय-पराजय का निर्णय बड़ी सरलता से हो जाता है। निर्णय में दो मतों की संभावना अत्यल्प है। जिस प्रतिद्वंद्वी का, पावों के अतिरिक्त, कोई भी अंग भूमि से छू जाता है, उसकी पराजय मानी जाती है। जब दोनों प्रतिद्वंद्वी साथ ही भूमि पर गिरते हैं तो भूमि को पहले स्पर्श करने वाला प्रतिद्वंद्वी पराजित माना जाता हैं। जब दोनों सीधे गिरकर भूमि को साथ ही स्पर्श करते हैं तो कुश्ती बराबर मानी जाती है। इसको 'डॉग फाल'[12] कहते हैं। ऐसी अवस्था में प्रतिद्वंद्वियों में पुन: कुश्ती कराई जाती है। दाँव लगाने या अन्य किसी अवस्था में भी पाँव के अतिरिक्त किसी अंग से भूमि छू जाने पर प्रतिद्वंद्वी की हार हो जाती है। इस कुश्ती में भुजाओं में बँध जाने के कारण पाँवों का मुक्त प्रयोग किया जाता है। यद्यपि प्रतिद्वंद्वी को पाँव से सीधे आघात करना वर्जित है, तथापि इस पद्धति के कलाकार पाँव संबंधी दाँव-पेंचों में बड़े कुशल होते हैं।

सूमो कुश्ती

सूमो कुश्ती

'सूमो' जापानियों का राष्ट्रीय व्यायाम है। इसका प्रयोग जापानी युवक अपने शरीर को शक्तिशाली एवं संगठित बनाने के लिए करते हैं। प्रथम सूमो कुश्ती, जिसका लिखित विवरण उपलब्ध है, ईसा से 23 वर्ष पूर्व हुई थी। विजयी व्यक्ति का नाम सुकुने था। सुकुने आज तक जापानी मल्लों का आराध्य देवता माना जाता है।

श्विंजेन मल्लयुद्ध

श्विंजेन मल्लयुद्ध[13] स्विट्जरलैंड का राष्ट्रीय खेल है और बोलचाल की भाषा में इस स्विस मल्लयुद्ध को 'फ्रेंच स्नजजम सुइस युद्ध' के रूप में जाना जाता है। जो मल्ल भूमि को पहले स्पर्श कर लेता है, उसकी पराजय पहले ही हो जाती है।

अमरीकन फ्री स्टाइल कुश्ती

अमरीकन फ्री स्टाइल मल्लयुद्ध

18वीं शताब्दी के अंतिम चरण के पूर्व अमरीका में त्यौहारों के अवसर पर स्थानीय मल्लों की कुश्तियाँ होती थीं। सन 1780 ई. के लगभग 'हारवर्ड विश्वविद्यालय' में इसका प्रचार आरंभ हुआ। वहाँ नए छात्रों तथा पुराने स्नातकों के बीच मल्ल-युद्ध होने की परंपरा चल पड़ी। अमरीकन फ्री स्टाइल कुश्ती अत्यंत निर्दयता से लड़ी जाती है। इस पद्वति की तुलना प्राचीन पान क्रोशन पद्धति से की जा सकती है।

भारतीय पहलवान

भारत के पहलवानों ने 1920 में पहली बार पेरिस में हुए ओलंपिक खेलों में भाग लिया। उसमें भाग लेने वाले पहलवान थे महाराष्ट्र के नावले और बड़ौदा के शिंदे। 1936 के बर्लिन ओलंपिक में करम रसूल (पंजाब), अनवर रशीद (उत्तर प्रदेश) और ए. थोरेट (महाराष्ट्र) सम्मिलित हुए थे। 1948 से भारतीय पहलवान नियमित रूप से ओलंपिक में भाग ले रहे हैं। उस वर्ष लंदन में ओलंपिक हुआ था। उसमें के. डी. यादव को छोटे वज़न (फ्लाई वेट) में छठा स्थान मिला था। 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में इन्हीं यादव को 57 किलो वेट में तीसरा और 62 किलो वेट में के. डी. मंगावे, महाराष्ट्र को चौथा स्थान प्राप्त हुआ था। इसके बाद से तो प्रत्येक ओलंपिक में भारतीय पहलवान बराबर सफलता प्राप्त कर रहे हैं। इसी प्रकार भारतीय पहलवान विश्व कुश्ती प्रतियोगिता, एशियाई खेल और राष्ट्रमंडलीय खेल में भी भाग लेते हैं और सफलता प्राप्त करते हैं।[2] भारत सरकार ने 'नेताजी सुभाष राष्ट्रीय खेल प्रतिष्ठान' (पटियाला) शांबो में आधुनिक विश्व मान्य पद्धतियों द्वारा पहलवानों को प्रशिक्षित करने की व्यवस्था की, ताकि वे विश्व की विभिन्न प्रतियोगिताओं में अधिकाधिक सफलता प्राप्त कर सकें। साथ ही सफल पहलवानों को सम्मानित करने के लिए 'अर्जुन पुरस्कार' की व्यवस्था की गई है। अब तक यह पुरस्कार निम्नलिखित पहलवानों को दिया गया है-

  1. मलुआ (दिल्ली)
  2. उदयचंद (सेना)
  3. विशंभर सिंह (रेलवे)
  4. मुख्तियार सिंह (सेना)
  5. गनपत अंदेलकर (महाराष्ट्र)
  6. चंदगीराम (हरियाणा)
  7. भीम सिंह (सेना)
  8. प्रेमनाथ (दिल्ली)
  9. जगरूप सिंह (हरियाणा)
  10. सुदेश कुमार (दिल्ली)

गामा पहलवान

शायद ही कोई ऐसा भारतीय खेल-प्रेमी हो, जिसने 'रुस्तम-ए-ज़मां' पहलवान का नाम न सुना हो। गामा पहलवान भारत में एक किंवदंती बन चुके हैं। शारीरिक ताक़त के लिए जिस प्रकार आजकल दारा सिंह की मिसाल दी जाती है, इसी प्रकार कुछ समय पहले तक 'गामा पहलवान' का नाम लिया जाता था। 19 साल के गामा ने तत्कालीन भारत विजेता 'पहलवान रहीमबख़्श सुल्तानीवाला' को चुनौती दे डाली थी। रहीमबख़्श गुजराँवाला, पंजाब का रहने वाला कश्मीरी, 'बट' जाति का ही था। कहते है रहीमबख़्श की लम्बाई 7 फीट थी। गामा में शक्ति और फुर्ती अद्वितीय थी, लेकिन गामा की लम्बाई 5 फुट 7 इंच थी। रहीमबख़्श अपनी प्रौढ़ा अवस्था में पहुँच चुका था और अपनी पहलवानी के अंतिम समय की कुश्तियाँ लड़ रहा था। रहीमबख़्श की उम्र का अधिक होना गामा के पक्ष में जाता था। 1927 तक गामा को किसी ने चुनौती नहीं दी। 1928 में गामा का मुक़ाबला पटियाला में ज़िबेस्को से हुआ। 42 सेकेण्ड में गामा ने ज़िबेस्को को धूल चटा दी और दक्षिण एशिया के महान् पहलवान की उपाधि धारण की। 1929 के फ़रवरी के महीने में गामा ने 'जेसी पीटरसन' को डेढ़ मिनट में पछाड़ दिया। इसके बाद 1952 में अपने पहलवानी जीवन से अवकाश लेने तक गामा को किसी ने चुनौती नहीं दी। गामा अपने पहलवानी जीवन में अजेय रहे, जो किसी भी पहलवान के लिए आज भी असम्भव है। यह गुण गामा को विश्व का महानतम पहलवान के दर्जे में ले आता है।

दारा सिंह

दारा सिंह अपने ज़माने के विश्व प्रसिद्ध फ्रीस्टाइल पहलवान और प्रसिद्ध अभिनेता थे। दारा सिंह ने खेल और मनोरंजन की दुनिया में समान रुप से नाम कमाया और अपने काम का लोहा मनवाया। यही वजह है कि उन्हें अभिनेता और पहलवान दोनों तौर पर जाना जाता है। उन्होंने 1959 में पूर्व विश्व चैम्पियन जार्ज गार्डीयांका को पराजित करके कॉमनवेल्थ की विश्व चैम्पियनशिप जीती थी। बाद में वे अमरीका के विश्व चैम्पियन लाऊ थेज को पराजित कर फ्रीस्टाइल कुश्ती के विश्व चैम्पियन बन गये। साठ के दशक में पूरे भारत में उनकी फ्री स्टाइल कुश्तियों का बोलबाला रहा। दारा सिंह को पहलवानी का शौक़ बचपन से ही था। बचपन अपने फार्म पर काम करते-करते गुजर गया, जिसके बाद ऊंचे क़द मजबूत काठी को देखते हुए उन्हें कुश्ती लड़ने की प्रेरणा मिलती रही। दारा सिंह ने अपने घर से ही कुश्ती की शुरूआत की थी। भारत की आज़ादी के दौरान 1947 में दारा सिंह सिंगापुर पहुंचे। वहां रहते हुए उन्होंने 'भारतीय स्टाइल' की कुश्ती में मलेशियाई चैंपियन त्रिलोक सिंह को पराजित कर कुआलालंपुर में मलेशियाई कुश्ती चैम्पियनशिप जीती। उसके बाद उनका विजयी रथ अन्य देशों की ओर चल पड़ा और एक पेशेवर पहलवान के रूप में सभी देशों में अपनी कामयाबी का झंडा गाड़कर वे 1952 में भारत लौट आए। क़रीब पांच साल तक फ्री स्टाइल रेसलिंग में दुनिया भर (पूर्वी एशियाई देशों) के पहलवानों को चित्त करने के बाद दारा सिंह भारत आकर सन 1954 में भारतीय कुश्ती चैंपियन (राष्ट्रीय चैंपियन) बने। दारा सिंह ने उन सभी देशों का एक-एक करके दौरा किया जहां फ्रीस्टाइल कुश्तियां लड़ी जाती थीं। इन्हें भी देखें: गुरु हनुमान एवं सतपाल सिंह

समाचार

18 दिसंबर, 2017 सोमवार

राष्ट्रमंडल कुश्ती चैंपियनशिप में भारत ने जीते 30 में से 29 स्वर्ण

भारतीय पहलवानों ने दक्षिण अफ़्रीका के जोहानसबर्ग में आयोजित राष्ट्रमंडल कुश्ती चैंपियनशिप में कमाल का प्रदर्शन करते हुए 30 में से कुल 29 स्वर्ण पदक अपने नाम किये। भारत ने टूर्नामेंट में 29 स्वर्ण के अलावा 24 रजत और 6 कांस्य सहित कुल 59 पदक जीते। प्रतियोगिता के पहले दिन शनिवार को भारत ने 10 स्वर्ण पदक जीते थे। चैंपियनशिप में भारतीय पहलवानों का ग्रीको रोमन स्टाइल कुश्ती में प्रदर्शन एकतरफा रहा जहाँ उन्होंने दांव पर लगे सभी 10 वजन श्रेणियों के स्वर्ण पदक जीते थे। ओलंपिक में दो बार के पदकधारी सुशील कुमार ने राष्ट्रमंडल कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर शानदार वापसी की है। अंतरराष्ट्रीय कुश्ती में तीन साल के बाद वापसी कर रहे सुशील ने 74 किग्रा फ्रीस्टाइल वर्ग में न्यूजीलैंड के आकाश खुल्लर को चित कर सोने का तमगा हासिल किया। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल (2014) में स्वर्ण जीतने के बाद यह उनका पहला पदक था। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल (2014) में स्वर्ण जीतने के बाद यह उनका पहला पदक था। रियो ओलिंपिक में कांस्य पदक विजेता साक्षी मलिक ने भी कॉमनवेल्‍थ कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक अपने नाम किया। साक्षी ने न्यूजीलैंड की तायला तुअहिने फोर्ड को महिलाओं के फ्रीस्टाइल प्रतियोगिता के 62 किग्रा वर्ग के एकतरफा फाइनल मुकाबले में 13-2 से करारी शिकस्त देकर स्वर्ण जीता।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. गोरखपुर
  2. 2.0 2.1 2.2 कुश्ती (हिन्दी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 10अगस्त, 2015।
  3. गोरखपुर
  4. XXIII700
  5. Theseus
  6. (1932 ई.)
  7. (1936 ई.)
  8. Referee
  9. विराम घड़ी
  10. disc
  11. Referee hold
  12. Dog fall
  13. Schwingen

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