गोपीनाथ शर्मा

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गोपीनाथ शर्मा
गोपीनाथ शर्मा
पूरा नाम डॉ. गोपीनाथ शर्मा
कर्म भूमि राजस्थान, भारत
भाषा राजस्थानी, हिन्दी
शिक्षा एम.ए. (इतिहास)
पुरस्कार-उपाधि 'कुम्भा पुरस्कार', 'कविराज श्यामलदास पुरस्कार', 'नाहर सम्मान पुरस्कार' आदि।
प्रसिद्धि इतिहासकार
विशेष योगदान 1953-1954 में भारत के राज्यों के पुनर्गठन के बारे में वार्ताएं चल रही थीं। राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहन लाल सुखाड़िया की पैनी दृष्टि ने डॉ. गोपीनाथ की योग्यता को पहिचान लिया था, अत: यह कार्य राज्य सरकार ने डॉ. शर्मा को दिया।
नागरिकता भारतीय
संबंधित लेख राजस्थान का इतिहास, मेवाड़ का इतिहास, मेवाड़ की जातिगत सामाजिक व्यवस्था
अन्य जानकारी स्वतंत्रता प्राप्ति तक आते-आते गोपीनाथजी की ख्याति इतिहासविद के रूप में हो चुकी थी। इस विद्वत्ता के कारण 'राजस्थान विश्वविद्यालय' ने इन्हें 1954 में 'बोर्ड ऑफ स्टडीज इन हिस्ट्री एण्ड आर्कोलोजी' में सदस्य नियुक्त किया।
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची

गोपीनाथ शर्मा (अंग्रेज़ी: Gopinath Sharma) राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार हैं। इन्होंने इतिहास से सम्बंधित 25 ग्रंथों की रचना की है। इनके सौ से भी अधिक लेख भारत की प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके हैं। संसार के बड़े-बड़े विद्वानों ने मेवाड़ के इतिहास, संस्कृति, सामाजिक जीवन, कला आदि का मार्गदर्शन इनके लेखों से प्राप्त किया। इनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिये गोपीनाथ शर्मा को कई संस्थाओं ने सम्मानित है। इन्हें 'कुम्भा पुरस्कार', 'कविराज श्यामलदास पुरस्कार', 'नाहर सम्मान पुरस्कार' आदि मिल चुके हैं।

शिक्षा

गोपीनाथ शर्मा ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण करने के बाद निश्चय किया कि वे एम.ए. की परीक्षा इतिहास में देंगे। उस समय 'आगरा विश्वविद्यालय' से स्वयंपाठी के रूप में परीक्षा देने की व्यवस्था थी। इतिहास की पुस्तकें उन्होंने 'इम्पीरियल लाइब्रेरी कलकत्ता' के सदस्य बनकर प्राप्त कर लीं। ये पुस्तकें उन्हें एक माह के लिये ही मिलती थी। सन 1937 में उन्होंने एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली।[1]

व्यावसायिक शुरुआत

एम.ए. करते ही गोपीनाथ शर्मा को 'लम्बरदार हाईस्कूल', जो उस समय कृषि महाविद्यालय के पुराने भवन में था, के उप प्रधानाध्यापक पद पर नियुक्ति मिल गई। यहां उन्होंने दो वर्ष काम किया। उस समय मेवाड़ राज्य के शिक्षामंत्री रतिलाल अंतानी का पुत्र विनोद अंतानी एम.बी. कॉलेज में अध्यापन कार्य कर रहा था। उसके विदेश चले जाने पर उस रिक्त पद पर 40 रुपये मूल वेतन व 35 रुपये भत्ते के मासिक वेतन पर उनकी एम.बी. कॉलेज में नियुक्ति हो गई। उस समय एक रोचक घटना घटी। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल की सिफारिश पर चण्डीप्रसाद को इतिहास के प्राध्यापक के रूप में चयनित किया गया। परिणामस्वरूप गोपीनाथ को लिपिक का कार्य करना पड़ा। उन्हें केवल एक कालांश इतिहास पढ़ाने का अवसर मिलता था। बाद में कुछ समय बीतने के बाद निदेशक महोदय ने चण्डीप्रसाद से उनके प्रमाणपत्र मांगे। पहले तो उसने आनाकानी की, बाद में दबाव डालने पर उसने स्पष्ट बताया कि उसने इतिहास संबंधित कोई परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की है। यह पूछे जाने पर कि 'वह इतिहास का अध्यापन कैसे करता था', उसने बताया कि 'वह गोपीनाथ से पढ़कर पढ़ाता था। वे यह जानते थे कि मेरे यहां रहने पर गोपीनाथ कभी प्राध्यापक नहीं बन सकते, फिर भी उन्होंने मुझे पढ़ाया। वे भले और उदार प्राणी हैं और वे ही इस पद के लिये योग्य व्यक्ति है।' बाद में गोपीनाथ को प्राध्यापक के पद पर स्थायी तौर पर 100 रुपये के मासिक वेतन पर नियुक्ति मिल गई।

इतिहासविद

स्वतंत्रता प्राप्ति तक आते-आते गोपीनाथजी की ख्याति इतिहासविद के रूप में हो चुकी थी। उनकी इस विद्वत्ता के कारण 'राजस्थान विश्वविद्यालय' ने इन्हें सन 1954 में 'बोर्ड ऑफ स्टडीज इन हिस्ट्री एण्ड आर्कोलोजी' में सदस्य नियुक्त किया, उनकी इस बोर्ड में 1955 तक सदस्यता रही। इसके अतिरिक्त वे भाषा, सामाजिक ज्ञान, अनुवाद, कला संकाय तथा एकेडेमिक कांउंसिल के भी सदस्य रहे।[1]

शोध कार्य

अध्यापन कार्य करते हुए गोपीनाथ शर्मा की इतिहास में शोध करने की इच्छा हुई। आजीविका की दृष्टि से उन्हें अब कोई चिन्ता नहीं थी। डॉ. आशीर्वाद लाल श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में 'मेवाड़ एण्ड मुग़ल एम्परर्स' विषय पर शोध प्रारम्भ किया। इसमें उन्होंने महाराणा सांगा से लेकर राजसिंह तक के इतिहास के उन पक्षों को विद्वानों के समक्ष लाकर रखा, जो पहले कभी नहीं आये थे। 1951 में उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि से विभूषित किया गया। शोध अमूल्य था, अत: राजस्थान विश्वविद्यालय ने इसके प्रकाशन के लिये 1500 रुपये का अनुदान देकर इसे प्रकाशित करवाया। पुस्तक के प्रकाशन के पश्चात् इस शोधग्रंथ की न केवल इतिहासविदों, समालोचकों और विद्वानों ने प्रशंसा की अपितु उस समय की पत्र-पत्रिकाओं ने भी इस ग्रंथ की भूरि-भूरि प्रशंसा की। 'मेवाड़ एण्ड मुग़ल एम्परर्स’ इस शोध ग्रंथ ने डॉ. गोपीनाथ शर्मा को इतिहास के क्षेत्र में प्रसिद्ध इतिहासकारों की पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया। इसी प्रसिद्धि के कारण जोधपुर में इतिहास के अध्यक्ष श्री हेमराज जी के सेवानिवृत्त होने पर गोपीनाथ शर्मा को पदोन्नत कर जोधपुर स्थानान्तारित किया गया। यह पदोन्नति प्रारंभ में अस्थायी तौर पर की गई थी। बाद में 'राजस्थान लोकसेवा आयोग' के माध्यम से चयनित होकर स्थायी रूप से पोस्ट-ग्रेजुएट प्रोफेसर के रूप में आपने कार्य भार संभाला।

राज्य पुरर्गठन में योगदान

सन 1953-1954 में भारत के राज्यों के पुनर्गठन के बारे में वार्ताएं चल रही थीं। कौन-सा भूभाग किस प्रदेश का अंग बने, इसका मानचित्रों पर रेखांकन किया जा रहा था। गुजरात ने डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर ज़िले का दक्षिणी भाग, सिरोही, आबू तथा जालौर को अपने राज्य में मिलाने दावा प्रस्तुत किया। गुजरात राज्य ने इस कार्य को सम्पादित करने के लिए डॉ. मजूमदार जैसे इतिहासविद को आमंत्रित करके उन्हें कार्य सौंपा। राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया की पैनी दृष्टि ने डॉ. गोपीनाथ की योग्यता को पहिचान लिया था, अत: यह कार्य राज्य सरकार ने डॉ. शर्मा को दिया। डॉ. शर्मा की कार्य कुशलता और लगन को देखकर पुनर्गठन का कार्य पूर्ण होते ही राजस्थान सरकार ने उन्हें 'भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में राजस्थान का योगदान' के तथ्यों को संकलित करने के लिये अनुंसधान अधिकारी नियुक्त किया। यह भी मात्र तथ्यों को इकट्ठा करने का कार्य नहीं था। स्वतंत्रता के पूर्व विभिन्न रियासतों में आन्दोलन का स्वरूप एक-सा नहीं था। कहीं-कहीं आन्दोलन ने इसका उग्र रूप धारण कर लिया था। ऐसे विविधतापूर्ण आन्दोलन के विषय को व्यवस्थित व क्रमबद्ध करने का कार्य सरल नहीं था। पर डॉ. शर्मा ने अथक परिश्रम कर इस कार्य को भी समयावधि में पूर्ण कर दिखाया।[1]

लेखन कार्य

डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने इतिहास से सम्बंधित 25 ग्रंथों की रचना की। महाराणा फ़तहसिंह के 'बहिडे' नामक पुस्तकों का सम्पादन किया, 100 से अधिक लेख भारत की प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में छपे। लगभग 25 शोधकर्त्ता आपके मार्गदर्शन में 'डाक्टरेट’ कर चुके हैं। विभिन्न विश्वविद्यालयों से सम्बन्धित शोध छात्र-छात्राएं भी आपसे मार्गदर्शन लेते रहे। संसार के बड़े-बड़े विद्वानों ने मेवाड़ के इतिहास, संस्कृति, सामाजिक जीवन, कला आदि का मार्गदर्शन प्राप्त किया।

पुरस्कार व सम्मान

उत्कृष्ट सेवाओं के लिये डॉ. गोपीनाथ शर्मा का कई संस्थाओं ने सम्मान किया। इन्हें 'कुम्भा पुरस्कार', 'कविराज श्यामलदास पुरस्कार', 'नाहर सम्मान पुरस्कार' आदि से सम्मानित किया गया। सन 1982 में 'भारत सरकार' के दिल्ली मंत्रालय के डायरेक्टर जनरल, एन.सी.सी. द्वारा पदक प्रदान किया गया।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 गोपीनाथ शर्मा (हिन्दी) राजस्थान स्टडीज। अभिगमन तिथि: 16 अगस्त, 2015।

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