ब्रज बासी लाल

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ब्रज बासी लाल
ब्रज बासी लाल
पूरा नाम ब्रज बासी लाल
जन्म 2 मई, 1921
जन्म भूमि झांसी, उत्तर प्रदेश
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र भारतीय इतिहास व पुरातत्त्व
मुख्य रचनाएँ 'राम, उनकी ऐतिहासिकता, मंदिर और सेतु: साहित्य, पुरातत्व और अन्य विज्ञान'
पुरस्कार-उपाधि पद्म विभूषण, 2021

पद्म भूषण, 2000

प्रसिद्धि पुरातत्त्वविद्
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी प्रोफेसर ब्रज बासी लाल ने रामायण से जुड़े अयोध्या, भारद्वाज आश्रम, श्रृंगवेरपुर, नंदीग्राम और चित्रकूट जैसे स्थलों की खुदाई करके दुनिया को कई नए तथ्यों की जानकारी दी।
अद्यतन‎

ब्रज बासी लाल (अंग्रेज़ी: Braj Basi Lal, जन्म- 2 मई, 1921) भारत के प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् हैं। उन्होंने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक पुरातात्विक स्थलों का अन्वेषण एवं उत्खनन किया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के पूर्व महानिदेशक रहे बी.बी. लाल को सबसे ज्यादा चर्चा अयोध्या की बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे की नींव में मंदिर मौजूद होने की खोज के लिए मिली थी। बी.बी. लाल की किताब 'राम, उनकी ऐतिहासिकता, मंदिर और सेतु: साहित्य, पुरातत्व और अन्य विज्ञान' को लेकर खासी बहस हुई थी। इसमें विवादित ढांचे के नीचे मंदिर होने की बात कही गई थी। ब्रज बासी लाल को साल 2000 में भारत सरकार ने विज्ञान एवं अभियांत्रिकी क्षेत्र में पद्म भूषण से और 2021 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया था।

परिचय

सन 1921 में उत्तर प्रदेश के झांसी में जन्मे ब्रज बासी लाल ने हस्तिनापुर (उत्तर प्रदेश), शिशुपालगढ़ (उड़ीसा), पुराण किला (दिल्ली), कालीबंगन (राजस्थान) सहित कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों की खुदाई कर इतिहास की बहुत सारी परत दुनिया के सामने खोली हैं। सन 1975-1976 के बाद से ब्रज बासी लाल ने रामायण से जुड़े अयोध्या, भारद्वाज आश्रम, श्रृंगवेरपुरा, नंदीग्राम और चित्रकूट जैसे स्थलों की खुदाई कर अहम तथ्य दुनिया तक पहुंचाये। उनके नाम पर 150 से अधिक शोध लेख दर्ज हैं।[1]

ब्रज बासी लाल की किताब 'राम, उनकी ऐतिहासिकता, मंदिर और सेतु: साहित्य, पुरातत्व और अन्य विज्ञान' को लेकर खासी बहस हुई थी। इसमें विवादित ढांचे के नीचे मंदिर होने की बात कही गई थी। उन्होंने मस्जिद की दीवारों में इस्तेमाल कुछ खम्भों पर हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों को भी दुनिया के सामने रखा। मस्जिद से पहले वहां पर मंदिर मौजूद था और मंदिर के फाउंडेशन पर ही मस्ज़िद बनायी गई थी, इसका पुरातात्विक प्रमाण उन्होंने ही दिया था।

पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने लगभग 67 साल पहले पुराने किले में की गई खोदाई के दौरान सामने आए प्राचीन संरचनात्मक अवशेषों के संरक्षण का फैसला लिया। देश के आजाद होने के बाद यह पहली खुदाई थी जो 1953 में हुई थी। यह खुदाई पुराने किले में पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ का पता लगाने के लिए हुई थी। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर 1969-1973 में भी इस किले में उत्खनन कार्य हुआ था। दोनों बार की खुदाई का कार्य प्रसिद्ध पुरातत्वविद् ब्रज बासी लाल के नेतृत्व में हुआ था।[1]

प्रो. ब्रज बासी लाल द्वारा 1953-1954 और 1969-1973 में उत्खनन के दौरान टेराकोटा खिलौने और चित्रित कटोरे मिले थे। जिनका संबंध 1200 से 800 ईसा पूर्व तक का माना गया था। ताजा खुदाई 2018 में हुई। 2018 की खुदाई में भी पूर्व में हुई खुदाई से मिलते जुलते प्रमाण मिले थे। 2019 में यहां फिर खुदाई की अनुमति दी गई थी, मगर समय पर काम शुरू न हो पाने से इसे बाद में निरस्त कर दिया गया।

शोध पत्र

प्रोफेसर ब्रज बासी लाल ने रामायण से जुड़े अयोध्या, भारद्वाज आश्रम, श्रृंगवेरपुर, नंदीग्राम और चित्रकूट जैसे स्थलों की खुदाई करके दुनिया को कई नए तथ्यों की जानकारी दी। हिंदू धर्म के जिस इतिहास को गायब कर दिया गया था, उन तथ्यों के जरिए उसे पुनः जागृत करने में काफी मदद मिली। उन्होंने इस संबंध में 150 से अधिक शोधपत्र लिखे हैं और इन शोध पत्रों में इन धार्मिक स्थलों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां दी गई हैं। उन्होंने करीब 67 साल पहले दिल्ली के पुराने किले की खुदाई की थी, जिसमें कई प्राचीन अवशेष मिले थे। इन अवशेषों को बाद में संरक्षित किया गया। देश की आजादी के बाद 1953 में यह पहली खुदाई थी। यहां 1969-1973 में फिर से उनकी अगुवाई में उत्खनन कार्य किया गया था।

आलोचना

दरअसल ब्रज बासी लाल पांडवों की भव्य राजधानी इंद्रप्रस्थ के बारे में पता लगाने की कोशिश में जुटे हुए थे। आर्य-द्रविड़ की थ्योरी को खारिज करके उसे झूठा साबित करने वाले प्रोफेसर ब्रज बासी लाल को वामपंथी बुद्धिजीवियों की आलोचना का भी सामना करना पड़ा। लगातार आलोचनाओं के बावजूद वह अपने मत पर कायम रहे और कई पुस्तकों व शोध पत्रों के जरिए हिंदुत्व के इतिहास को नया रूप दिया।


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शोध

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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