नलिनी जयवंत  

नलिनी जयवंत
नलिनी जयवंत
पूरा नाम नलिनी जयवंत
जन्म 18 फ़रवरी, 1926
जन्म भूमि बम्बई, ब्रिटिश भारत
मृत्यु 20 दिसम्बर, 2010
मृत्यु स्थान मुम्बई, भारत
पति/पत्नी वीरेन्द्र देसाई, प्रभु दयाल
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र मुम्बई
मुख्य फ़िल्में 'नास्तिक', 'मिलन', 'दुर्गेश नन्दिनी', 'राही', 'समाधि', 'संग्राम', 'दो राह', 'आँखें', 'काला पानी', 'काफ़िला', 'नौजवान', 'अनोखा प्यार' आदि।
पुरस्कार-उपाधि फ़िल्म 'काली पानी' के लिए सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का पुरस्कार।
प्रसिद्धि हिन्दी फ़िल्मों की अभिनेत्री
नागरिकता भारतीय
संबंधित लेख दिलीप कुमार, देव आनन्द, अशोक कुमार
अन्य जानकारी रमेश सहगल की दो फ़िल्मों 'शिकस्त' और 'रेलवे प्लेटफॉर्म' की भूमिकाओं के लिए नलिनी जयवंत को याद किया जाता है। 'काला पानी' के बाद उन्होंने फ़िल्मों में काम लगभग बंद कर दिया। दो फ़िल्में 'बॉम्बे रेसकोर्स' और 'नास्तिक' इसका अपवाद हैं।

नलिनी जयवंत (अंग्रेज़ी: Nalini Jaywant; जन्म- 18 फ़रवरी, 1926, बम्बई, ब्रिटिश भारत; मृत्यु- 20 दिसम्बर, 2010, मुम्बई, भारत) भारतीय सिनेमा की उन सुन्दर अभिनेत्रियों में से एक थीं, जिन्होंने पचास और साठ के दशक में सिने प्रेमियों के दिलों पर राज किया। फ़िल्म 'काला पानी' का यह गीत 'नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर', इस गीत पर नलिनी जयवंत द्वारा किये गए अभिनय को भला कौन भुला सकता है। नलिनी जयवंत ने अपने फ़िल्मी सफर की शुरुआत वर्ष 1941 में प्रदर्शित फ़िल्म 'राधिका' से की थी। अपने समय के मशहूर अभिनेता अशोक कुमार के साथ उनके प्रेम की अफवाहें भी उड़ी थीं। अभिनेता दिलीप कुमार, देव आनन्द और अशोक कुमार के साथ नलिनी जयवंत ने कई सफल फ़िल्में दी थीं।

परिचय

नलिनी जयवंत का जन्म 18 फ़रवरी, 1926 में ब्रिटिश भारत के बम्बई शहर (वर्तमान मुम्बई) में हुआ था। नलिनी के पिता और अभिनेत्री शोभना समर्थ (नूतन और तनुजा की माँ) की माँ रतन बाई रिश्ते में भाई-बहन थे, इसी नाते नलिनी, शोभना समर्थ की ममेरी बहन लगती थीं। वर्ष 1940 में नलिनी जयवंत ने निर्देशक वीरेन्द्र देसाई से विवाह किया। इस दौरान प्रसिद्ध अभिनेता अशोक कुमार के साथ नलिनी के प्यार की अफवाहें भी उड़ीं। बाद के समय में नलिनी जयवंत ने अभिनेता प्रभु दयाल के साथ दूसरा विवाह कर लिया। प्रभु दयाल के साथ उन्होंने कई फ़िल्मों में भी काम किया।

फ़िल्मी शुरुआत

नलिनी जयवंत के हिन्दी सिनेमा में प्रवेश की कहानी भी काफ़ी रोचक है। किस्सा यूँ है कि हिन्दी सिनेमा के शुरुआती दौर के निर्माता-निदेशकों में से एक थे- चमनलाल देसाई। वीरेन्द्र देसाई इन्हीं चमनलाल देसाई के पुत्र थे। उनकी एक कंपनी थी 'नेशनल स्टूडियोज़'। एक दिन दोनों पिता-पुत्र फ़िल्म देखने सिनेमाघर पहुँचे। शो के दौरान दोनों की नज़र एक लड़की पर पड़ी, जो तमाम भीड़ में भी अपनी दमक बिखेर रही थी। यह नलिनी जयवंत थीं, जिनकी आयु उस समय बमुश्किल 13-14 बरस की ही थी। दोनों पिता-पुत्र की जोड़ी ने दिल ही दिल में इस लड़की को अपनी अगली फ़िल्म की हिरोइन चुन लिया और ख़्यालों में खो गए। फ़िल्म कब ख़त्म हो गई और कब वह लड़की अपने परिवार के साथ ग़ायब हो गई, इसकी ख़बर तक दोनों को न हुई।[1]

नलिनी जयवंत

एक दिन वीरेन्द्र देसाई अभिनेत्री शोभना समर्थ से मिलने उनके घर पहुँचे तो देखा कि नलिनी वहाँ मौजूद थीं। नलिनी को देखते ही उनकी आँखों में चमक आ गई और बाछें खिल गईं। असल में शोभना समर्थ, जिन्हें बाद में अभिनेत्री नूतन और तनूजा की माँ और काजोल की नानी के रूप में अधिक जाना गया, नलिनी जयवंत के मामा की बेटी थीं। इस बार वीरेन्द्र देसाई ने बिना देर किए नलिनी के सामने फ़िल्म का प्रस्ताव रख दिया। नलिनी के लिए तो यह मन माँगी मुराद पूरी होने जैसा था। डर था तो सिर्फ पिता का, जो फ़िल्मों के सख्त विरोधी थे। लेकिन वीरेन्द्र देसाई ने उन्हें मना लिया। इस मानने के पीछे एक बड़ा कारण था पैसा। उस समय जयवंत परिवार की आर्थिक स्थिति कुछ ठीक नहीं थी। रहने के लिए भी उन्हें अपने एक रिश्तेदार के छोटे-से मकान में आश्रय मिला हुआ था। इस प्रकार नलिनी जयवंत की पहली फ़िल्म थी 'राधिका', जो 1941 में प्रदर्शित हुई। वीरेन्द्र देसाई के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म के अन्य कलाकार थे- हरीश, ज्योति, कन्हैयालाल, भुड़ो आडवानी आदि। फ़िल्म में संगीत अशोक घोष का था। इस फ़िल्म के दस में से सात गीतों में नलिनी जयवंत की आवाज़ थी।

सफलता

फ़िल्म 'राधिका' के बाद इसी वर्ष महबूब ख़ान के निर्देशन में एक फ़िल्म रिलीज़ हुई 'बहन'। इस फ़िल्म में नलिनी के साथ प्रमुख भूमिका में थे शेख मुख्तार। साथ में थीं नन्हीं-सी मीना कुमारी, जो 'बेबी मीना' के नाम से इस फ़िल्म में एक बाल कलाकार थीं। इस फ़िल्म में संगीतकार अनिल बिस्वास ने नलिनी जयवंत से चार गीत गवाए थे। इन चार गीतों में से वजाहत मिर्ज़ा का लिखा हुआ एक गीत था- 'नहीं खाते हैं भैया मेरे पान', जो बहुत लोकप्रिय हुआ। 1941 में ही फिर से वीरेन्द्र देसाई के ही निर्देशन में बनी फ़िल्म 'निर्दोष' आई, जिसमें मुकेश नायक की भूमिका में थे। फ़िल्म में मुकेश की आवाज़ में कुल तीन गीत थे, जिनमें एक सोलो गीत 'दिल ही बुझा हुआ हो तो फस्ले बहार क्या' था और बाकी दो नलिनी जयवंत के साथ युगल गीत थे, जबकि नलिनी के तीन सोलो गीत थे।

  • अपने एक संस्मरण में नलिनी जयवंत ने कहा था कि- "मैं जब बमुश्किल छह-सात साल की थी, तभी ऑल इंडिया रेडियो पर नए-नए शुरू हुए बच्चों के प्रोग्राम में भाग लेने लगी थी। इसी कार्यक्रम में हुई संगीत प्रतियोगिता में मैंने गायन के लिए प्रथम पुरस्कार जीता था।"[1]

विवाह तथा तलाक

नलिनी जयवंत अपनी पहली ही फ़िल्म से सितारा घोषित कर दी गई थीं। उस समय नलिनी फ्रॉक और दो चोटी के साथ स्कूल में पढ़ रही थीं। उम्र थी पन्द्रह साल। फ़िल्म 'आंख मिचौली' (1942) की सफलता ने उन्हें आसमान पर बिठा दिया। नलिनी को फ़िल्मों में सफलता तो मिल गई, लेकिन उसी के साथ नलिनी पर फिदा वीरेन्द्र देसाई को उनसे प्यार भी हो गया। शादी भी हो गई। इस मामले को उस दौर के लेखक ने इस तरह बयान किया है- "जब ये हंसती हैं तो मालूम होता है कि जंगल की ताज़गी में जान पड़ गई और नौ-शगुफ्ता कलियाँ फूल बनकर रुखसारों की सूरत में तब्दील हो गई हैं। नलिनी जयवंत ने 'आंख मिचौली' खेलते-खेलते मिस्टर वीरेन्द्र देसाई से 'दिल मिचौली' खेलना शुरू कर दिया और यह खेल अब बाकायदा शादी की कंपनी से फ़िल्माया जाकर ज़िंदगी के पर्दे पर दिखलाया जा रहा है।"[1] लेकिन नलिनी जयवंत का यह वैवाहिक जीवन अधिक दिन तक नहीं चल सका और वीरेन्द्र देसाई से उनका तलाक हो गया। नलिनी ने दूसरा विवाह अपने एक साथी कलाकार प्रभू दयाल से किया।

फ़िल्म 'मुनीमजी' के एक दृश्य में नलिनी जयवंत

धमाकेदार वापसी

1950 के दशक में नलिनी जयवंत ने एक बार फिर धमाके के साथ अशोक कुमार के साथ फ़िल्म 'समाधि' और 'संग्राम' से नई ऊँचाई हासिल की। हालांकि 1948 की फ़िल्म 'अनोखा प्यार' में दिलीप कुमार और नर्गिस के मुकाबले जिस अंदाज़ में उन्होंने काम किया, उसकी ज़बर्दस्त तारीफ हो चुकी थी, लेकिन इन दो फ़िल्मों ने उनके स्टारडम में चार चाँद लगा दिए। फ़िल्म 'समाधि' में "गोरे-गोरे ओ बांके छोरे, कभी मेरी गली आया करो" गीत पर कुलदीप कौर के साथ उनका नाच अब तक याद किया जाता है।

सबसे बड़ी अदाकारा का दर्जा

अशोक कुमार के साथ नलिनी जयवंत की जोड़ी कामयाब तो हुई, वहीं दोनों के रोमांस की चर्चा भी शुरू हो गई। अशोक कुमार ने अपने परिवार से अलग चैम्बूर के यूनियन पार्क इलाके में नलिनी जयवंत के सामने एक बंगला भी ले लिया, जहाँ वे ज़िंदगी के आखि़री दिनों में भी बने रहे और वहीं प्राण त्यागे। इस जोड़ी ने 1952 में 'काफिला', 'नौबहार' और 'सलोनी' फिर 1957 में 'मिस्टर एक्स' और 'शेरू' जैसी फ़िल्में कीं। दिलीप कुमार के साथ, जिन्होंने नलिनी जयवंत को 'सबसे बड़ी अदाकारा' का दर्जा दिया, उन्होंने 'अनोखा प्यार' के अलावा 'शिकस्त' (1953) और देव आनंद के साथ 'राही' (1952), 'मुनीमजी' (1955) और 'काला पानी' (1958) जैसी कामयाब फ़िल्में कीं।

पुरस्कार

फ़िल्म 'काला पानी' में किशोरी बाई वाली भूमिका के लिए तो नलिनी जयवंत को सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का पुरस्कार भी मिला। निदेशक रमेश सहगल की दो फ़िल्मों 'शिकस्त' और 'रेलवे प्लेटफॉर्म' (1955) की भूमिकाओं के लिए भी नलिनी जयवंत को याद किया जाता है। 'काला पानी' के बाद उन्होंने फ़िल्मों में काम लगभग बंद कर दिया। दो फ़िल्में 'बॉम्बे रेसकोर्स' (1965) और 'नास्तिक' (1983) इसका अपवाद हैं। ये दोनों फ़िल्में भी रिश्तों के दबाव में ही कीं। 'नास्तिक' में उन्होंने अमिताभ बच्चन की माँ की भूमिका निभाई थी।[1]

प्रमुख फ़िल्में

नलिनी जयवंत की प्रमुख फ़िल्में
फ़िल्म वर्ष फ़िल्म वर्ष फ़िल्म वर्ष
नास्तिक 1983 बोम्बे रेसकोर्स 1965 गर्ल्स हॉस्टल 1963
तूफ़ान में प्यार कहाँ 1963 जिन्दगी और हम 1962 अमर रहे ये प्यार 1961
मुक्ति 1960 माँ के आँसु 1959 काला पानी 1958
मिलन 1958 शेरू 1957 नीलमणि 1957
मिस बॉम्बे 1957 कितना बदल गया इंसान 1957 हम सब चोर हैं 1956
देर्गेश नन्दिनी 1956 आवाज़ 1956 इंसाफ़ 1956
आन बान 1956 रेलवे प्लेटफ़ार्म 1955 मुनीमजी 1955
राजकन्या 1955 बाप बेटी 1954 नाज़ 1954
लकीरें 1954 महबूब 1954 शिकस्त 1953
राही 1953 सलोनी 1952 काफ़िला 1952
नौबहार 1952 दो राह 1952 नौजवान 1951
एक नज़र 1951 नन्दकिशोरी 1951 संग्राम 1950
समाधि 1950 आँखें 1950 अनोखा प्यार 1948
गुंजन 1948 आँख मिचोली 1942 राधिका 1941
निर्दोष 1941 बहन 1941

निधन

नलिनी जयवंत कभी-कभी घर की ज़रूरत की चीज़ें ख़रीदने बाज़ार जाती थीं। अशोक कुमार से भी एक अरसे तक जीवंत संपर्क बना रहा, लेकिन बाद में कुछ ऐसा हुआ, जिसके बारे में किसी को कोई ख़बर नहीं। नलिनी जयवंत ने ख़ुद को घर में ही कैद कर लिया। घर के सामने ही रह रहे अशोक कुमार तक से आखि़र में मिलना छोड़ दिया। 20 दिसम्बर, 2010 को नलिनी जयवंत का देहांत हो गया। मोहल्ले के लोगों को उनके देहांत की ख़बर तब हुई, जब एक चौकीदार ने एक व्यक्ति को उस घर से शव को गाड़ी में ले जाते देखा। बाद में संदीप जयवंत नामक व्यक्ति का बयान आया कि वह नलिनी जी का भतीजा है और उसने नलिनी जी की ही इच्छा के अनुसार चुपचाप उनका दाह-संस्कार कर दिया है।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 1.4 जीवन के सफर में राही मिलते हैं बिछड़ जाने को (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 20 सितम्बर, 2013।

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