तैत्तिरीयोपनिषद भृगुवल्ली अनुवाक-9  

व्यवस्थापन (वार्ता | योगदान) द्वारा परिवर्तित 19:15, 13 अक्टूबर 2011 का अवतरण (Text replace - "Category:उपनिषद" to "Category:उपनिषदCategory:संस्कृत साहित्य")

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

  • अन्न की पैदावार बढ़ायें।
  • पृथ्वी ही अन्न है और अन्न का उत्पादन बढ़ाना ही संकल्प होना चाहिए।
  • आकाश अन्न का आधार है, इसीलिए वह उसका उपभोक्ता है।
  • पृथ्वी में आकाश और आकाश में पृथ्वी स्थित है।
  • इस प्रकार अन्न में ही अन्न अधिष्ठित है।
  • जो साधक इस रहस्य को जान लेता है, वह यश का भागी होता है।
  • उसे समस्त सुख-वैभव सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं।


पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध



टीका टिप्पणी और संदर्भ

बाहरी कड़ियाँ

संबंधित लेख

तैत्तिरीयोपनिषद ब्रह्मानन्दवल्ली

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः