अस्तित्ववाद  

अस्तित्ववाद (एक्ज़िस्टेंशियलिज्म) एक नवीन यूरोपीय दर्शन या विचारधारा का हिंदी पर्याय। वस्तुत: यह एक सुसंगत दर्शन न होकर कई विचारधाराओं का सामान्य नाम है, जो व्यक्ति के 'अस्तित्व' को प्रधानता देती है। उसके अनुसार कांट के बाद सब आदर्शवादी और भौतिकवादी दार्शनिक सैद्धांतिक रूप से प्रमेयों की चर्चा करते रहे हैं, उनका विषय मनुष्य का 'सार' (मानवता) रहा है, परंतु मानव का यथार्थ 'अस्तित्व' नहीं। 'एक्ज़िस्टेंस प्रिसीड्स एशेंस'-इस साररूप गुण सामान्य से पहले जन्म-सत्य की भांति अस्तित्ववाद मृत्यु को प्रधान मानकर , मनुष्य को अपने जीवन की दिशा का निदर्शन निर्णायक मानता है। व्यक्ति की यह चुनने की शक्ति, सार्थक क्षणों में से निर्णय करने की संकल्प-विकल्प-शक्ति ही मनुष्य की स्वतंत्रता की शर्त है। अन्यथा मौत तो अंत है ही। मनुष्य निरंतर अंत की ओर गिर रह है, मनुष्य विवश, असमर्थ, असहाय और प्रवाहपतित की भांति है। इस अवस्था का भान प्राचीन संतों ने भी बार बार कराया था। संत अगस्तिन, ड्यूस स्काट्स, पास्कल आदि सबने इसकी चर्चा की है। परंतु अस्तित्ववाद निराशामय नियतिवाद नहीं है। वह 'मानवी अवस्थिति' की इस चुनौती को स्वीकार करके चलता है। डेन तत्वज्ञ सरेन कीर्केगार्द[1] ने अपने ग्रंथ 'भांति की भावना', 'भय और कंप' आदि में इसकी चर्चा की। 20वीं शताब्दी के आरंभ से अब तक यास्पर्स और हाइडेगर में, जर्मनी में, शेस्तोव और बेदोयेव में, रूस में, उनाम्युनो में, स्पेन में, फ्रांस में गात्वार, ग्रेनिए ज्याँ पाल सार्त्र, केमुअ, व्यवोई, आँर्द्र, मालरो आदि में अस्तित्वादी दर्शन के लक्षण दिखाई देते हैं, यद्यपि इनमें से कई लेखक अपने को अस्तित्वादी नहीं मानते।

दस्ताएव्स्की और फ्रांज़ काफ़्का के उपन्यासों में भी अस्तित्ववादी दर्शन के लक्षण मिलते हैं। अब अस्तित्ववादी दार्शनिकों लेखकों में भी दो दल हो गए हैं एक ईश्वरवादी है और दूसरा अनीश्वरवादी। ईश्वरवादी या ईसाई अस्तित्ववादियों में गैब्रिएल मार्सल, कीर्केगार्द, यास्पर्स, एलेन आदि हैं। निरीश्वरवादियों में सार्त्र, कैमुअ आदि अन्य लेखक। यूरोप में अस्तित्ववाद का महत्व गत दो महायुद्धों की विभीषिका के बाद अधिक उभरकर सामने आया।[2]

अस्तित्ववाद को मार्क्सवादियों और रोमन कैथोलिकों दोनों से घोर विरोध मिला है। मानव जीवन की क्षुद्रता पर जोर देने के कारण मार्क्सवादी इसे जंतुवादी और निराशवादी दर्शन कहते हैं। कैथोलिक तो इसे स्पष्टत: अनुत्तरदायी दर्शन मानते हैं। अस्तित्ववाद का कुछ क्षीण प्रभाव आधुनिक भारतीय साहित्य पर भी परिलक्षित होने लगा हैं। विशुद्ध अस्तित्ववाद की परिणति निराशावाद और शून्यवाद में हो रही है। वह एक संकरा व्यक्तिवादी दर्शन है, ऐसा उसपर आरोप है।[3]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1813-55
  2. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 310 |
  3. सं.ग्रं.-ई. मोनिएर: इंट्रोडक्शन ऑव एविज़स्टेंशियलिज्म (1947); एच. ई. रीड : एक्ज़िस्टेंशियलिज्म, मार्किसजम ऐंड अनाकिज्म (1947); एल.जे. ब्लकहम : ऐक्ज़िस्टेंशियलिस्ट थिंकर्स (1947); जे.पी.सर्की : ऐक्ज़िस्टेंशियलिज्म ऐंड ह्मूमैनिज्म।

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