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शून्यवाद  

शून्यवाद एक दार्शनिक सिद्धांत है, जो जीवन के एक या अधिक अर्थपूर्ण पहलुओं को नकारता है। इसे मानने वाले 'शून्यवादी' कहे जाते हैं, जो जोर देकर कहते हैं कि नैतिकता स्वाभाविक रूप से मौजूद नहीं होती तथा किसी भी प्रकार के स्थापित किये गए नैतिक मूल्य कृत्रिम रूप से बनाये गये हैं।

अर्थ

'शून्यवाद' (नाइलिज़्म) लैटिन भाषा से लिया गया शब्द है, जिसका अर्थ है- 'कुछ नहीं'। इस शब्द को कई बार आदर्शों की कमी के साथ जोड़कर अस्तित्व की कथित निरर्थकता के कारण हुई निराशा की सामान्य मनोदशा में यह समझाने के लिए प्रयोग में लिया जाता है कि कोई यह समझ कर विकास कर सकता है कि कोई आदर्श, नियम या कानून नहीं हैं। दूसरे आंदोलनों के साथ भविष्यवाद और विध्वंस को टिप्पणीकारों द्वारा विभिन्न समय पर विभिन्न सन्दर्भों में शून्यवादी (नाइलिस्टिक) के रूप में पहचाना गया है।

इतिहास

यद्यपि 'शून्यवाद' शब्द को पहली बार उपन्यासकार इवान टर्जनेव (1818-1883 ई.) के उपन्यास 'फादर्स एंड संस' के द्वारा प्रसिद्धि मिली थी। इसकी शुरुआत फ्रेडरिक हेनरिक जैकोबी (1743-1819 ई.) द्वारा दार्शनिक लेख के रूप में की गयी थी। जैकोबी ने इस शब्द को 'बुद्धिवाद' के लिए और विशेष रूप से इम्मानुअल कांत के 'आलोचनात्मक' दर्शनशास्त्र के बेतुकेपन को ख़त्म करने के लिए प्रयुक्त किया था, जिसके अनुसार सभी प्रकार के बुद्धिवाद[1] शून्यवाद में कम हो जाते हैं और इस प्रकार इससे बचा जाना चाहिए तथा इसे किसी प्रकार की श्रद्धा तथा रहस्योद्घाटन से बदला जाना चाहिए।

ब्रेट डब्ल्यू डेविस लिखते हैं- "शून्यवाद के दार्शनिक विकास के विचार को शुरू करने के लिए आमतौर पर फ्रेडरिक जैकोबी को जिम्मेदार माना जाता है, जिन्होंने एक प्रसिद्ध पात्र में फिशे के आदर्शवाद के शून्यवाद के रूप में बदलने की आलोचना की है। जैकोबी के अनुसार, फिशे की अहं की पूर्णता[2] एक प्रकार के मनोवाद का बढ़ावा देती है, जो पूरी तरह से ईश्वर की श्रेष्ठता को नकारती है। टर्जनेव द्वारा शून्यवाद को प्रसिद्धि दिलाने के बाद, एक नये रूसी राजनीतिक आंदोलन ने शून्यवाद आन्दोलन के रूप में इस शब्द को अपनाया। वे संभवतः खुद को शून्यवादी कहते थे, चूंकि 'कुछ भी नहीं' ने उनकी आँखों में एक सम्मान प्राप्त कर लिया था।

प्रकार

  1. नैतिक शून्यवाद
  2. अस्तित्वपरक शून्यवाद
  3. ज्ञानमीमांसापरक शून्यवाद
  4. आध्यात्मिक शून्यवाद
  5. मीरियोलॉजिकल शून्यवाद
  6. राजनीतिक शून्यवाद


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. आलोचना के रूप में दर्शनशास्त्र
  2. 'केवल मैं' जो 'मैं-नहीं' का स्थान लेता है।

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