आत्मवाद  

आत्मवाद 1-आत्मवाद क्या है? दार्शनिक विवेचन का उद्देश्य तत्व का ज्ञान प्राप्त करना है। सत्य ज्ञान में संदेह का अंश नहीं होता । पर क्या ऐसे ज्ञान की संभावना भी है। देकार्त ने व्यापक संदेह से आरंभ किया, परंतु शीघ्र ही उसे रुकना पड़ा। स्वयं संदेह के अस्तित्व में संदेह नहीं कर सका। संदेह चेतना है, इसलिए चेतना असंदिग्ध तथ्य है। चेतना में चेतन और विषय, ज्ञाता औ ज्ञेय, का संपर्क होता है। कुछ लोग कहते और इसका हमें अधिकार नहीं। इसके विपरीत, द्रव्यवाद ज्ञान के साथ ज्ञाता और ज्ञेय को भी तत्व का पद देता है।

द्रव्यवादियों में ज्ञाता और ज्ञान विषय की स्थिति के संबंध में तीव्र मतभेद हे। प्रकृतिवादियों के विचारानुसार यहाँ सत्ता केवल प्रकृति की है, चेतना और चेतन इसके विकास में प्रकट हो जाते हैं। आत्मवाद के अनुसार सारी सत्ता अभौतिक है, प्राकृत पदार्थ चेतनावस्थाएँ ही हैं।जो विचारक बाह्म जगत्‌ की सत्ता को स्वीकार करते हैं, उनमें भी कुछ कहते हैं कि स्व-इतर स्व में प्रविष्ट नहीं हो सकता, ज्ञाता का ज्ञान उसका अपनी अवस्थाओं तक ही सीमित रहता है। दोनों दशाओं में चेतन की प्राथमिकता आत्मवाद की मौलिक धारणा है।

2. आत्मवाद और प्रकृतिवाद दृष्टिकोणों का भेद

  1. प्रकृतिवाद के लिए मौलिक सत्ता मौलिक दृष्ट वस्तुओं की है, आत्मवाद दृष्ट के साथ, बल्कि इससे अधिक, अदृष्ट को महत्व देता है। 'चेतना है', 'मैं हूं'-यह तथ्य दृष्ट आकार नहीं रखते, परंतु चेतना और चेतन की सत्ता में संदेह नहीं हो सकता। इनके साथ ही 'सत्य' की सत्ता भी असंदिग्ध है।
  2. प्रकृतिवाद के लिए इंद्रिजन्य ज्ञान सत्य ज्ञान का नमूना है, अन्य सब ज्ञान इसी पर आधारित होते हैं। आत्मवाद बुद्धि को इंद्रियों से बहुत ऊँचा पद देता है। इंद्रियाँ से बहुत ऊँचा पद देता है इंद्रियाँ तो प्रकटनों के क्षेत्र से परे देख नहीं सकतीं , सत्ता का ज्ञान बुद्धि की क्रिया है।
  3. प्रकृतिवाद तथ्यों की दुनिया में रहता है, इसके लिए 'मूल्य' का कोई अस्तित्व नहीं। आत्मवाद 'मूल्य' का विशेष महत्व देता है। प्रकृतिवाद घटनाओं के रंग रूप की बात बताता है, आत्मवाद उनके मूल्य की जाँंच करता हैं।
  4. प्रकृतिवाद के अनुसार जो कुछ जगत्‌ में हो रहा है, प्राकृत नियम के अनुसार हो रहा है, आत्मवाद रचना में 'प्रयोजन' को देखता है। यंत्रवाद प्रकृतिवाद का मान्य सिद्धांत हैं, अपितु इसके अंत की ओर देखता है।
  5. प्रकतिवाद के लिए मानव जीवन कालक्रम मात्र है आत्मवाद के लिए जीवन का उद्देश्य कालक्रम में नहीं, अपितु इसके बाहर, इसके ऊपर है। जीवन की सफलता इसकी 'लंबाई और चौड़ाई' में ही नहीं, अपितु इसकी 'गहराई' में भी है।

3. आत्मवाद के रूप-प्राचीन यूनान में पोर्मनाइदीस ने पहले पहल दार्शनिक विवेचन में 'द्रव्य' और 'आभास' , 'सत्‌' और 'असत्‌' के भेद में प्रवेश किया। इसके साथ ही बुद्धि और इंद्रियों के भेद ने भी महत्व प्राप्त किया। अफ़लातून ने इन भेदों की नींव पर अपने दर्शन का निर्माण किया। अफ़लातून से पहले, कुछ विचारक एकरस सत्‌ में विश्वास करते थे, कुछ प्रवाह में ही सत्ता का रूप देखते थे। अफ़लातून ने इन दोनों विचारधाओं को मिलाने का यत्न किया और कहा कि दृष्ट जगतृ के पदार्थो की स्थिति तो आभास या छायामात्र है, वास्तविक सत्‌ प्रत्ययों की दुनिया है। हम कोई निर्दोष सीधी रेखा नहीं खींच सकते, इसपर भी रेखागणित का अस्तित्व तो है ही। संसार में पूर्ण न्याय विद्यमान नहीं, इसपर भी नीति में न्याय के प्रत्यय पर विचार हो सकता हे।

अफ़लातून (प्लेटो) ने अंतिम सत्ता को परलोक में रखा था, आधुनिक आत्मवादी इसे पूथ्वी पर ले आए। इनमें जार्ज बर्कले, फीखटे और हेगल के नाम प्रसिद्ध हैं। बर्कले से पहले जान लाक ने प्रधान और अप्रधान गुणों में भेद किया था ओर अप्रधान गुणों को मान की स्थिति दी थी। कर्बले ने दोनों प्रकार के गुणों के भेद को मिटाकर प्रकृति के स्वतंत्र अस्तित्व को अस्वीकार कर दिया। उसके अनुसार सारी सत्ता चेतन आत्माओं और उनके बोधों की है। इन बोधों में उपलब्ध परमात्मा की क्रिया का फल है। फीख़टे ने एक डग ओर भरा ओर कहा कि हम ही अपनी मानसिक क्रियाके लिए बाह्म जगत्‌ की रचना कर लेते हैं। यह विचार 'मानवीआत्मवाद' (सब्जेक्टिव आईडियलिज्म) कहलाता है। 'वस्तुगत आत्मवाद' (ऑब्जेक्टिव आईडियालिज्म') के अनुसार हम जगत्‌ को नहीं बनाते, बाह्म जगत्‌ हमें बनाता है। सारी सत्ता व्यापक चेतना की है। चेतना का जितना भाग किसी विशेष क्षेत्र में अपने आपको सीमित कर लेता है, उसे जीवात्मा कहते हैं। आधुनिक आत्मवादियों में सबसे प्रमुख नाम हेगल का है। उसका सिद्धांत 'निरपेक्ष आत्मवाद' के नाम से प्रसिद्ध है। हेगल के विचार में कुर्सी के प्रत्यय का अस्तित्व उतना ही असंदिग्ध है जितना कुर्सी का हैं; उसके लिए 'विचारयुक्त' और 'वास्तविक' अभिन्न हैं। स्पीनोज़ा की तरह हेगल ने भी एक ही मूल तत्व को माना, परंतु जहाँ स्पीनोज़ा ने इसे द्रव्य (सब्स्टेंस) के रूप में देखा, वहाँ हेगल ने इसे मन (सब्जेक्ट) के रूप में देखा। हेगल का निरपेक्ष चेतनारूप है। निरपेक्ष अपने आपको तीन मंजिलों में अभिव्यक्त करता है। पहली मंजिल में वह जड़ (नेचर) का रूप धारण करता है, दूसरी मंजिल में जीवन प्रकट होता है और अंत में, मनुष्य के रूप में, अत्मचेतन प्रकट होता है। इस प्रगति में 'विरोध' महत्वपूर्ण भाग लेता है। प्रत्येक वस्तु में उसके विरोध का अंश विद्यमान होता है, विरोधी अंशों का 'समन्वय' सारी उन्नति का तत्व है।

4. एकवाद और अनेकवाद-संख्या की दृष्टि से आत्म एकवाद और अनेकवाद में विभक्त होता है। हेगल एकवादी है। लाइबनित्स के अनुसार सारी सत्ता चित्‌-बिंदुओं से बनी है। प्रत्येक प्रकृत पदार्थ असंख्य चित्‌-बिंदुओं का समूह है जिन्हें एक दूसरे का पता नहीं। मनुष्य में एक केंद्रीय चित्‌-बिंदु भी विद्यमान है जिसे जीवात्मा कहते हैं। परमात्मा समग्र का केंद्रीय चित्‌-बिंदु है।

'वैयक्तिक आत्मवाद' (पर्सनल आईडियलिज्म) प्रत्येक जीव को नित्य और स्वाधीन तत्व का पद देता है।

5. कांट का अध्यात्मवाद-कांट ने तत्वज्ञान के स्थान में ज्ञानमीमांसा को अपने विवेचन का विषय बनाया। उससे पहले प्रमुख प्रश्न यह था - अनुभव हमें क्या बताता है? कांट ने पूछा-'अनुभव बनता कैसे है? उसके विचार में अनुभव की सामग्री बाहर से प्राप्त होती है, सामग्री को विशेष आकृति देना मन की क्रिया है। अनुभव की बनावट में ही चेतन की प्राथमिकता प्रकट होती है।[1]

तत्वज्ञान में कांट वस्तुवादी था, ज्ञानमीमांसा में अध्यात्मवादी था।[2]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 364-65 |
  2. सं.ग्रं.-प्लेटा : संवाद; बर्कले : मानव ज्ञान के नियम ; हेगल : आत्मा का तत्वज्ञान।

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