कन्हेरी  

कन्हेरी पश्चिमी भारत के दरी मंदिरों में से एक है। कन्हेरी का यह मंदिर मुम्बई से लगभग 25 मील दूर सालसेट द्वीप पर अवस्थित पर्वत की चट्टान काटकर बनाया गया बौद्धों का चैत्य है।

संक्षिप्त परिचय

कन्हेरी उत्तर कोंकण, महाराष्ट्र में स्थित है। पश्चिम रेलवे के बोरीवली स्टेशन से एक मील पर कृष्णगिरि पहाड़ी में तीन प्राचीन गुहा मंदिर है, जिनका सम्बंध शिवोपासना से जान पड़ता है। एक गुफ़ा में अनेक मूर्तियाँ आज भी देखी जा सकती हैं। बोरीवली स्टेशन से पांच मील पर कन्हेरी है, जो कृष्णगिरि पहाड़ी का एक भाग है। 'कन्हेरी' शब्द कृष्णगिरि का अपभ्रंश है। यहां 9वीं शती ई. की बनी हुई लगभग 109 गुफ़ाएं हैं, पर उल्लेखनीय केवल एक ही है जो काली के चैत्य के अनुरूप बनाई गई है। इस चैत्यशाला में बौद्ध महायान सम्प्रदाय की सुंदर मूर्तिकारी है। गुफ़ा की भित्तियों पर अजंता के समान ही चित्रकारी भी थी, जो अब प्रायः नष्ट हो चुकी है।[1]

चैत्य गृह

कन्हेरी का चैत्य गृह अपनी कई विशिष्टताओं के कारण प्रसिद्ध है। हीनयान संप्रदाय का यह चैत्य मंदिर आंध्र सत्ता के प्राय: अंतिम युगों में दूसरी शती ई. के अंत में निर्मित हुआ था। यह बना प्राय: कार्ले की परंपरा में ही हैं, उसी का सा इसका चैत्य हाल है, उसी के से स्तंभों पर युगल आकृतियाँ इसमें भी बैठाई गई हैं। दोनों में अतंर मात्र इतना है कि कन्हेरी की कला उतनी प्राणवान और शालीन नहीं, जितनी कार्ले की है।[2]

कार्ले की गुफ़ा से इसकी गुफ़ा कुछ छोटी है। लगभग एक तिहाई छोटी यह गुफ़ा अपूर्ण भी रह गई है। इसकी बाहरी दीवारों पर जो महात्मा बुद्ध की मूर्तियाँ बनी हैं, उनसे स्पष्ट है कि इस पर महायान संप्रदाय का भी बाद में प्रभाव पड़ा और हीनयान उपासना के कुछ काल बाद बौद्ध भिक्षुओं का संबंध इससे टूट गया था, जो गुप्त काल आते-आते फिर जुड़ गया। यद्यपि यह नया संबंध महायान उपासना को अपने साथ लिए आया, जो बुद्ध और बोधिसत्वों की मूर्तियों से प्रभावित है। इन मूर्तियों में बुद्ध की एक मूर्ति 25 फुट ऊँची है।

संरचना

कन्हेरी के चैत्य मंदिर की संरचना प्राय: इस प्रकार है-

  • चतुर्दिक फैली वन संपदा के बीच बहती जलधाराएँ, जिनके ऊपर उठती हुई पर्वत की दीवार और उसमें कटी कन्हेरी की गहरी लंबी गुफ़ा।
  • बाहर एक प्रांगण नीची दीवार से घिरा है, जिस पर मूर्तियाँ बनी हैं और जिससे होकर एक सोपान मार्ग चैत्य द्वार तक जाता है।
  • दोनों ओर द्वारपाल निर्मित हैं और चट्टानी दीवार से निकली स्तंभों की परंपरा बनती चली गई है।
  • कुछ स्तंभ अलंकृत भी हैं। स्तंभों की संख्या 34 है और समूची गुफ़ा की लंबाई 86 फुट, चौड़ाई 40 फुट और ऊँचाई 50 फुट है।
  • स्तंभों के ऊपर की नर-नारी-मूर्तियों को कुछ लोगों ने निर्माता दंपति होने का भी अनुमान किया है, जो संभवत: अनुमान मात्र ही है। कोई प्रमाण नहीं, जिससे इनको इस चैत्य का निर्माता माना जाए।
  • कन्हेरी की गणना पश्चिमी भारत के प्रधान बौद्ध दरी मंदिरों में की जाती है और उसका वास्तु अपने द्वार, खिड़कियों तथा मेहराबों के साथ कार्ले की शिल्प परंपरा का अनुकरण करता है।


इन्हें भी देखें: कार्ले चैत्यगृह एवं कन्हेरी गुफ़ाएँ


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 132 |
  2. कन्हेरी (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 26 जनवरी, 2014।

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