बृहदारण्यकोपनिषद अध्याय-1 ब्राह्मण-6  

  • इस संसार में जो कुछ भी है, वह नाम, रूप और कर्म, इन तीनों का ही समुदाय है।
  • इन नामों का उपादान 'वाणी' हैं।
  • समस्त नामों की उत्पत्ति इस वाणी द्वारा ही होती है।
  • समस्त रूपों का उपादान 'चक्षु' है।
  • समस्त सूर्य इस चक्षु से ही उत्पन्न होते हैं।
  • समस्त रूपों को धारण करने से चक्षु ही इन रूपों का प्राण है, 'ब्रह्म' है।
  • समस्त कर्मों का उपादान यह 'आत्मा' है।
  • समस्त कर्म शरीर से ही होते हैं और उसकी प्रेरणा शरीर में स्थित यह आत्मा ही देती है।
  • यह 'आत्मा' ही सब कर्मों का 'ब्रह्म' है।
  • आत्मा द्वारा ही नाम, रूप और कर्म उत्पन्न हुए हैं। अत: ये तीनों अलग होते हुए भी एक आत्मा ही हैं।
  • यह आत्मा सत्य से आच्छादित है।
  • यही अमृत है।
  • प्राण ही अमृत-स्वरूप है।
  • नाम और रूप ही सत्य हैं।
  • अमृत और सत्य से ही प्राण आच्छन्न है, ढका हुआ है, अज्ञात है।


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