बृहदारण्यकोपनिषद अध्याय-3 ब्राह्मण-1  

  • एक बार विदेहराज जनक ने एक महान् यज्ञ किया। उस यज्ञ में कुरु और पांचाल प्रदेशों के बहुत से विद्वान् पधारे।
  • राजा ने यह जानने के लिए कि इनमें सर्वोत्कृष्ट विद्वान् कौन है, अपनी गौशाला से एक सहस्त्र स्वस्थ गौओं के सीगों में लगभग 100 ग्राम स्वर्ण बंधवा दिया और सभी को सम्बोधित करके कहा कि जो भी सर्वाधिक ब्रह्मनिष्ठ है, वह इन गौओं को ले जाये। उन ब्राह्मणों में से किसी का भी साहस नहीं हुआ, तो महर्षि याज्ञवल्क्य ने अपने एक शिष्य सामश्रवा से उन गौओं को हांक ले जाने के लिए कहा।
  • इससे अन्य ब्राह्मण क्रोधित हो उठे और चीखने-चिल्लाने लगे कि यह हमसे सर्वश्रेष्ठ कैसे हे? तब उनके मध्य शास्त्रार्थ हुआ। सबसे पहले यज्ञ के होता अश्वल ने प्रश्न किया और याज्ञवल्क्य ने उसके प्रश्नों का उत्तर दिया-

अश्वल-'हे मुनिवर! जब यह सारा विश्व मृत्यु के अधीन है, तब केवल यजमान ही किस प्रकार मृत्यु के बन्धन का अतिक्रमण कर सकता है?'
याज्ञवल्क्य— होता नामक ऋत्विक वाक् (वाणी) और अग्नि है। वह इन दोनों शक्तियों के द्वारा मृत्यु को पार कर सकता है। वही मुक्ति और अतिमुक्ति है। इसका भाव यही है कि जो 'होता' वाणी द्वारा उद्भूत मन्त्रों और यज्ञ की अग्नि के द्वारा परम 'ब्रह्म' का ध्यान करते हुए 'नाद-ध्वनि' उत्पन्न करता है, वह उस 'नाद-ध्वनि' (नाद-ब्रह्म) द्वारा मृत्यु को भी जीत लता है। 'होता' यज्ञ का पुरोहित होता है, वह यज्ञ में वाणी द्वासरा अक्षर-ब्रह्म की ही साधना करता है। उसकी साधना करने वाला सिद्ध पुरोहित मृत्यु को भी अपने वश में करने वाला होता है। ऋषि का संकेत उसी ओर है। अश्वल—'हे मुनिवर! समस्त दृश्य जगत् दिन और रात्रि के अधीन है। इसका अतिक्रमण कैसे किया जा सकता है, अर्थात् इस पर विजय का उपाय क्या है?'
याज्ञवल्क्य—'ऋत्विक नेत्र और सूर्य के माध्यम से मुक्त हो सकता है, अर्थात् रात और दिन पर विजय पा सकता है। अध्वर्यु ही यज्ञ का चक्षु है। अत: नेत्र ही आदित्य है और वही अध्वर्यु है। मुक्ति और अतिमुक्ति भी वही है।' इसका अर्थ यह है कि अध्वर्यु ऋत्विक का कार्य विधिवत मन्त्रोच्चार करते हुए यज्ञ में आहुति देना होता है। दूसरे, 'चक्षु' का तात्पर्य भौतिक चक्षुओं से न होकर मन की आंखों से है। एक योगी मन की इन्हीं आंखों से 'इड़ा' (चन्द्र) और पिंगला (सूर्य) नाड़ियों का भेदन करके सुषुम्ना में लीन होकर जीवन्मुक्त हो जाता है। उसे रात का अन्धकार और दिन का प्रकाश एक समान ही प्रतीत होता है। यह एक योगिक प्रक्रिया है।
अश्वल—'हे मुनिवर! सब कुछ 'कृष्ण पक्ष' और 'शुक्ल पक्ष' के अधीन है। फिर यजमान किस प्रकार इनसे मुक्त हो सकता है?'
याज्ञवल्क्य—'ऋत्विज्, उद्गाता, वायु और प्राण के माध्यम से मुक्त हो सकता है। उद्गाता को यज्ञ का प्राण कहा गया है तथा यह प्राण ही वायु और उद्गाता है। यही मुक्त और अतिमुक्ति का स्वरूप हैं।' यहाँ इन दोनों पक्षों का तात्पर्य स्वर-विज्ञान पर आधारित है। प्राणायाम में प्राणवायु की गति को सिद्ध करके मन को शान्त किया जाता है। उसके द्वारा मृत्यु की गति भी रोकी जा सकती है। जो योगी प्राणायाम के अभ्यास से श्वास को जीत लेता है, उसके समस्त भौतिक विकार नष्ट हो जाते हैं। इन विकारों का नष्ट होना ही मृत्यु पर विजय पाना है।
अश्वल—'हे ऋषिवर! यह जो अन्तरिक्ष है, निरालम्ब, अर्थात् आधारहीन प्रतीत होता है। फिर यजमान कैसे स्वर्गरोहण करता है?'
याज्ञवल्क्य—'ऋत्विज, ब्रह्मा और चन्द्रमा के द्वारा स्वर्गारोहण करता है। मन ही चन्द्रमा है। मन ही यज्ञ का ब्रह्मा है। मृक्ति, अतिमुक्ति भी वही है।'यहाँ मन और मन में उठे विचारों की अत्यन्त तीव्र और अनन्त गति की ओर संकेत है। मन और मन के विचारों को घनीभूत करके कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है। उसे किसी आधार की आवश्यकता नहीं होती। अश्वल—'होता ऋत्विक आज यज्ञ में कितनी ऋचाओं का उपयोग करेगा?'
याज्ञवल्क्य-'तीन ऋचाओं का।'
अश्वल-'उन ऋचाओं के नाम क्या है?'
याज्ञवल्क्य-'पहली पुरोनुवाक्या (यज्ञ से पहले), दूसरी याज्मा (यज्ञ के समय उच्चरित) और तीसरी शस्या (यज्ञ के बाद की स्तुतियां) है।'
अश्वल-'इनसे किसे जीता जाता है?'
याज्ञवल्क्य-'समस्त प्राणि समुदाय को।'
अश्वल-'आज यज्ञ में कितनी आहुतियां डाली जायेगी?'
याज्ञवल्क्य-'तीन।'
अश्वल-'तीन कौन-कौन सी?'
याज्ञवल्क्य-'पहली वह, जो होम करने पर प्रज्ज्वलित होती है। दूसरी वह, जो होम करने पर शब्द करती है और तीसरी वह, जो होम करने पर पृथ्वी में समा जाती है। इनसे यज्ञमान 'देवलोक', 'पितृलोक' और 'मृत्युलोक' को जीत लेता है।
अश्वल-'हे मुनिवर! आज उद्गाता इस यज्ञ में कितने स्तोत्रों का गायन करेगा?'
याज्ञवल्क्य-'तीन स्तोत्रों का। वे तीन स्तोत्र हैं- पुरोनुवाक्या, याज्या और शस्या।'
अश्वल-'इनमें से कौन मनुष्य के शरीर में रहने वाले हैं?'
याज्ञवल्क्य-'पुरोनुवाक्या से पृथ्वी लोक पर, याज्या से अन्तरिक्ष लोक पर और शस्या से द्युलोक पर विजय प्राप्त की जा सकती है।'
याज्ञवल्क्य के उत्तर सुनकर अश्वल चुप हो गये और ब्रह्मऋषि की श्रेष्ठता स्वीकार करके पीछे हट गये। तब ऋषि ने दूसरे ब्राह्मणों की ओर दृष्टिपात किया कि अब वे प्रश्न पूछ सकते हैं।


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