बृहदारण्यकोपनिषद अध्याय-3 ब्राह्मण-2  

  • इस ब्राह्मण में जरत्कारू के पुत्र आर्तभाग और ऋषि याज्ञवल्क्य के मध्य हुए शास्त्रार्थ का वर्णन है।

आर्तभाग- "ऋषिवर! ग्रहों और अतिग्रहों की संख्या कितनी है? वे ग्रह और अतिग्रह कौन-कौन से हैं?"
याज्ञवल्क्य-"ग्रह आठ हैं और आठ ही अतिग्रह भी हैं। 'प्राण' ग्रह है और 'अपान' अतिग्रह है,'वाक्शक्ति' ग्रह है और 'नाम' अतिग्रह है,'रसना' ग्रह है और 'रस' अतिग्रह है,'नेत्र' ग्रह है और 'रूप' अतिग्रह है,'श्रोत्र' ग्रह है और 'शब्द' अतिग्रह है,'मन' ग्रह है और 'कामना' अतिग्रह है,'हाथ' ग्रह है और 'कर्म' अतिग्रह है,'त्वचा' ग्रह है और 'स्पर्श' अतिग्रह है। ये आठों ग्रह और आठों अतिग्रह एक-दूसरे के पूरक हैं; क्योंकि 'अपान' से सूंघने का,'नाम' से उच्चारण का,'रस' से स्वाद का कार्य होता है और 'रूप' दोनों द्वारा ही देखा जाता है, 'शब्द' कान द्वारा सुना जाता है, 'कामनाएँ' मन में ही उदित होती हैं,'कर्म' हाथों से ही किये जाते हैं,'स्पर्श' का अनुभव त्वचा ही करती है।"

आर्तभाग- "हे याज्ञवल्क्य! इस सृष्टि में जो कुछ भी है, सभी मृत्यु का ग्रास है। अत: वह कौन-सा देवता है, मृत्यु जिसका भोजन है?"
याज्ञवल्क्य- "अग्नि ही मृत्यु र्है और वह जल का भोजन है। इस तथ्य को जानने वाला मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है।"

आर्तभाग- "मृत्यु के समय क्या प्राण शरीर को छोड़ जाते हैं?"
याज्ञल्क्य- "प्राण शरीर को नहीं छोड़ता।'आत्मतत्त्व' शरीर छोड़ जाता है। शेष प्राण शरीर में रहकर वायु को शरीर में खींचता है। इसी से शरीर फूल जाता है।"

आर्तभाग- "मरने के बाद भी पुरुष को क्या नहीं छोड़ता?"
याज्ञल्क्य- "नाम पुरुष को नहीं छोड़ता। उसका नाम उसके शुभ अशुभ कर्मों के साथ जुड़ा रहता है।"

आर्तभाग- "जैस इस पुरुष की वाणी अग्नि में विलीन हो जाती है और प्राण वायु में, चक्षु आदित्य में, मन चन्द्रमा में, श्रोत्र दिशाओं में, शरीर पृथिवी में, आत्मा आकाश में, लोभ समूह ओषधियों में, केश वनस्पतियों में तथा रक्त व रेतस (वीर्य) जल में विलीन हो जाता है, उस समय वह पुरुष कहाँ निवास करता है?"
याज्ञल्क्य- "हे सौम्य आर्तभाग! तुम मुझे अपना हाथ पकड़ाओ। हम दोनों को ही इस प्रश्न का उत्तर समझना होगा, किंतु इस जनसभा के मध्य नहीं।" कुछ देर के लिए दोनों ने सभा से बाहर एकांत में जाकर चिंतन किया और लौटकर दोनों कर्म के विषय में प्रशंसा करने लगे। याज्ञल्क्य ने कहा- "निश्चित ही पुण्यकृत्यों से पुण्य और पापकृत्यों से पाप कमाया जाता है। मृत्यु के उपरांत मनुष्य अपने इन्हीं कामों में रहता है।"
आर्तभाग चुप होकर अपने स्थान पर जा बैठे।

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