बृहदारण्यकोपनिषद अध्याय-3 ब्राह्मण-9  

  • शाकल्य विदग्ध अत्यन्त अभिमानी थे। उन्होंने अंहकार में भरकर याज्ञवल्क्य से प्रश्न पर प्रश्न करने प्रारम्भ कर दिये?'

शाकल्य—'देवगण कितने हैं?'
याज्ञ.—'तीन और तीन सौ, तीन और तीन सहस्त्र, अर्थात् तीन हज़ार तीन सौ छह (3,306)।'
शाकल्य—'देवता कितने हैं?'
याज्ञ.—'तेंतीस (33)।'
शाकल्य ने इसी प्रश्न को बार-बार पांच बार और दोहराया। इस पर याज्ञवल्क्य ने हर बार संख्या घटाते हुए देवताओं की संख्या क्रमश: छह, तीन, दो, डेढ़ और अन्त में एक बतायी। शाकल्य—'फिर वे तीन हज़ार तीन सौ छह देवगण कौन हैं?'
याज्ञ.-'ये देवताओं की विभूतियां हैं। देवगण तो तेंतीस ही हैं।'
शाकल्य-'वे कौन से हैं?'
याज्ञ.-'आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, इन्द्र और प्रजापति।'
शाकल्य-'आठ वसु कौन से है?'
याज्ञ.-'अग्नि, पृथ्वी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्युलोक, चन्द्र और नक्षत्र। जगत् के सम्पूर्ण पदार्थ इनमें समाये हुए हैं। अत: ये वसुगण हैं।' शाकल्य—'ग्यारह रुद्र कौन से हैं?'
याज्ञ.-'पुरुष में स्थित दस इन्द्रियां, एक आत्मा। मृत्यु के समय ये शरीर छोड़ जाते हैं और प्रियजन को रूलाते हैं। अत: ये रुद्र हैं।'
शाकल्य-'बारह आदित्य कौन से है?'
याज्ञ.-'वर्ष के बारह मास ही बारह आदित्य हैं।'
शाकल्य—'इन्द्र और प्रजापति कौन हैं?'
याज्ञ.-'गर्जन करने वाले मेघ 'इन्द्र' हैं और 'यज्ञ' ही 'प्रजापति' है। गर्जनशील मेघ 'विद्युत' है और 'पशु' ही यज्ञ है।'
शाकल्य—'छह देवगण कौन से हैं?'
याज्ञ.-'पृथ्वी, अग्नि, वायु, अन्तरिक्ष, द्यौ और आदित्य।'
शाकल्य—'तीन देव कौन से हैं?'
याज्ञ.-'तीन लोक- पृथ्वीलोक, स्वर्गलोक, पाताललोक। ये तीनों देवता हैं। इन्हीं में सब देवगण वास करते हैं।'
शाकल्य-'दो देवता कौन से हैं?'
याज्ञ.-'अन्न और प्राण ही वे दो देवता हैं।'
शाकल्य-'वह डेढ़ देवता कौन है?'
याज्ञ.-'वायु डेढ़ देवता है; क्योंकि यह बहता है और इसी में सब की वृद्धि है।'
शाकल्य-'एक देव कौन सा है?'
याज्ञ-'प्राण ही एकल देवता है। वही 'ब्रह्म' है, वही तत् (वह) है।'
शाकल्य-'पृथ्वी जिसका शरीर है, अग्नि जिसका लोक है, मन जिसकी ज्योति है और जो समस्त जीवों का आत्मा है, आश्रय-रूप है, ब्रह्मज्ञ है, उस पुरुष को जानते हो?'
याज्ञ.-'जानता हूं। वही इस शरीर में व्याप्त है।'
शाकल्य-'उसका देवता कौन है?'
याज्ञ.-'उसका देवता 'अमृत' है।'
शाकल्य-'काम जिसका शरीर है, हृदय जिसका लोक है, मन ही जिसकी ज्योति है, जो समस्त जीवों का आत्मा है, उसे जानने वाला ब्रह्मज्ञानी कहलाता है। उसे जानते हो?'
याज्ञ-'जानता हूं। वह 'काममय' पुरुष है और उसका देवता 'स्त्रियां' हैं।'
शाकल्य-'रूप ही जिसका शरीर है, नेत्र ही लोक हैं, मन ही ज्योति है, जो सभी का आश्रय-रूप है, उसे जानने वाला सर्वज्ञाता होता है। क्या तुम उसे जानते हो? याज्ञ.-'जानता हूं। वह पुरुष 'आदित्य' है और 'सत्य' ही उसका देवता है।'
शाकल्य-'आकाश जिसका शरीर है, श्रोत्र जिसका लोक, है, मन जिसकी ज्योति है, उस सर्वभूतात्मा को जानने वाला ब्रह्मज्ञानी होता है। उसे जानते हो?'
याज्ञ.-'जानता हूं। वह 'प्रातिश्रुत्क' पुरुष है और 'दिशाएं' उसकी देवता है।'
शाकल्य-'अन्धकार जिसका शरीर है, हृदय जिसका लोक है, मन जिसकी ज्योति है, उस सर्वभूतात्मा को जानने वाला ब्रह्मज्ञानी होता है। उसे जानते हो?'
याज्ञ.-'जानता हूं। वह 'छायामय' पुरुष है और 'मृत्यु' उसका देवता है।'
शाकल्य-'रूप जिसका शरीर है, चक्षु देखने की शक्ति है, मन ज्योति है, सर्वभूतों में स्थित आत्मा है, उसे जानने पर 'सर्वज्ञ' की संज्ञा प्राप्त होती है। उसे जानते हो?'
याज्ञ.-'जानता हूं। वह वही पुरुष है, जो दर्पण में दिखाई देता है। उसका देवता 'प्राण' है।'
शाकल्य-'वीर्य जिसका शरीर है, हृदय लोक है और मन ज्योति है। उस सर्वभूताश्रय पुरुष को जानने वाला सर्वज्ञाता होता है। उसे जानते हो?'
याज्ञ.-'जानता हूं। वह 'पुत्र' रूप में पुरुष है। 'प्रजापति' उसका देवता है।'
शाकल्य-'आप कुरु और पांचालप्रदेश के ब्राह्मणों का तिरस्कार करके स्वयं को ब्रह्मवेत्ता कहते हैं। क्या यह उचित है?'
याज्ञ.-'मुझे देवताओं की प्रतिष्ठा के अनुसार दिशाओं का ज्ञान है।'
शाकल्य-'फिर बताइये कि पूर्व में आप किस देवता से युक्त हैं और वह किसमें स्थित है?'
याज्ञ.-'वहां मैं आदित्य देवता के साथ युक्त हूं और वह आदित्य 'चक्षु' में तथा चक्षु 'रूप' में स्थित है। वह रूप 'हृदय' में स्थित है; क्योंकि हृदय के द्वारा ही पुरुष को रूपों का ज्ञान होता है।'
शाकल्य-'हे याज्ञवल्क्य! आप सत्य कहते हैं। दक्षिण दिशा में आप किस देवता से युक्त हैं और वह देवता किसमें स्थित है?'
याज्ञ.-'यम देवता से और यम 'श्रद्धा' में स्थित है और श्रद्धा 'हृदय' में स्थित है; क्योंकि हृदय के द्वारा ही पुरुष श्रद्धा को जानता है।'
शाकल्य-'सत्य है। पश्चिम दिशा में आप किस देवता से युक्त हैं और वह देवता किसमें स्थित है?'
याज्ञ.-'वरुण देवता से युक्त हूं और वरुण देवता 'जल' में तथा जल 'वीर्य' में स्थित है। यह वीर्य 'हृदय' में स्थित है; क्योंकि पिता की इच्छानुसार ही पुत्र का जन्म होता है।'
शाकल्य-'ठीक है। उत्तर दिशा में आप किस देवता से संयुक्त हैं और वह देवता किसमें स्थित है?'
याज्ञ.-'सोम देवता से और सोम 'दीक्षा' में, दीक्षा 'सत्य' में और सत्य 'हृदय' में स्थित है; क्योंकि व्यक्ति हृदय से ही सत्य को जान पाता है।'
शाकल्य-'आप ध्रुव दिशा में किस देवता से युक्त हैं और वह किसमें स्थित है?'
याज्ञ.-'अग्निदेव से और अग्निदेव 'वाक्' (वाणी) में, वाक् 'हृदय' में स्थित है; क्योंकि हृदय से ही वाणी उत्पन्न होती है।'
शाकल्य-'यह हृदय किसमें स्थित है?'
याज्ञ.-'अरे प्रेत! तू हृदय को हमसे पृथक् मानता है? मूर्ख! हृदयहीन शरीर को तो कुत्ते और पक्षी नोंच-नोंचकर खा जाते हैं।'
शाकल्य-'आप क्रोधित न हों। यह बतायें कि यह शरीर और हृदय (आत्मा) किसमें प्रतिष्ठित हैं?'
याज्ञ.-'ये प्राण में स्थित हैं। प्राण 'अपान' में, अपान 'व्यान' में, व्यान 'उदान' में, उदान 'समान' में स्थित है। यह 'आत्मा' नेति-नेति कहा जाता है। इसे न तो ग्रहण किया जा सकता है, न विनष्ट किया जा सकता हैं यह संग-रहित, अव्यवव्थित और अहिंसित है। इसके आठ शरीर, आठ देवता और आठ पुरुष हैं। यह व्यष्टि-रूप होकर, इन पुरुषों को अपने हृदय में रखकर सभी उपाधि-रूप धर्मों का अतिक्रमण किये रहता है। उपनिषद द्वारा ज्ञात उस पुरुष के बारे में आप मुझे बतायें, अन्यथा आपका मस्तक गिर जायेगा।'
शाकल्य उस पुरुष के विषय में कुछ नहीं बता सकां इसलिए उसका मस्तक गिर गया, अर्थात् वह भरी सभा में अपमानित हो गया। फिर किसी का भी साहस याज्ञवल्क्य से प्रश्न करने का नहीं हुआ।



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