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इतिहास सामान्य ज्ञान 60  

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1. पुस्तक "अनहैप्पी इण्डिया" के लेखक कौन थे?

बाल गंगाधर तिलक
लाला लाजपत राय
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद
जवाहरलाल नेहरू
लाला लाजपत राय
'लाला लाजपत राय' को भारत के महान् क्रांतिकारियों में गिना जाता है। आजीवन ब्रिटिश राजशक्ति का सामना करने वाले लाला लाजपत राय 'पंजाब केसरी' भी कहे जाते हैं। वे उच्च कोटि के राजनीतिक नेता ही नहीं थे, अपितु ओजस्वी लेखक और प्रभावशाली वक्ता भी थे। 'बंगाल की खाड़ी' में हज़ारों मील दूर मांडले जेल में लाला लाजपत राय का किसी से भी किसी प्रकार का कोई संबंध या संपर्क नहीं था। अपने इस समय का उपयोग उन्होंने लेखन कार्य में किया। लालाजी ने भगवान श्रीकृष्ण, अशोक, शिवाजी, स्वामी दयानंद सरस्वती, गुरुदत्त, मत्सीनी और गैरीबाल्डी की संक्षिप्त जीवनियाँ भी लिखी। 'नेशनल एजुकेशन', 'अनहैप्पी इंडिया' और 'द स्टोरी ऑफ़ माई डिपोर्डेशन' उनकी अन्य महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं। उन्होंने 'पंजाबी', 'वंदे मातरम्‌' (उर्दू) में और 'द पीपुल' इन तीन समाचार पत्रों की स्थापना करके इनके माध्यम से देश में 'स्वराज' का प्रचार किया।ध्यान देंअधिक जानकारी के लिए देखें:-लाला लाजपत राय

2. गुप्तकालीन प्रशासन में नगर के मुख्य अधिकारी को क्या कहा जाता था?

भोक्ता
नगरश्रेष्ठि
पुरपाल
गौल्मिक
गुप्त प्रशासन राजतंत्रात्मक व्यवस्था पर चलता था। राजपद वंशानुगत सिद्धान्त पर आधारित था। राजा अपने बड़े पुत्र को युवराज घोषित करता था। कुशल प्रशासन के लिए विशाल गुप्त साम्राज्य कई प्रान्तों में बंटा था। प्रान्तों को 'देश', 'भुक्ति' अथवा 'अवनी' कहा जाता था। जो सम्राट द्वारा स्वयं शासित होता था, उसकी सबसे बड़ी प्रशासनिक ईकाई 'देश' या 'राष्ट्र' कहलाती थी। 'भुक्ति' का विभाजन जनपदों में किया गया था। जनपदों को 'विषय' कहा जाता था, जिसका प्रधान अधिकारी 'विषयपति' होता था। नगरों का प्रशासन नगर महापालिकाओं द्वारा चलाया जाता था। पुरपाल नगर का मुख्य अधिकारी होता था। वह कुमारामात्य के श्रेणी का अधिकारी होता था। जूनागढ़ के लेख से ज्ञात होता है कि गिरनार नगर का पुरपाल चक्रपालित था।ध्यान देंअधिक जानकारी के लिए देखें:-गुप्तकालीन प्रशासन, गुप्त साम्राज्य

3. निम्न में से किस क्रांतिकारी ने 'राणा प्रताप', 'सम्राट चन्द्रगुप्त' और 'भारत दुर्दशा' नामक नाटकों में अभिनय किया था?

भगत सिंह
सुभाष चन्द्र बोस
करतार सिंह सराभा
रामप्रसाद बिस्मिल
भगत सिंह
'अमर शहीद सरदार भगत सिंह' का नाम विश्व में 20वीं शताब्दी के अमर शहीदों में बहुत ऊँचा है। भगत सिंह ने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है। गाँधीजी के 'असहयोग आंदोलन' से प्रभावित होकर 1921 में भगत सिंह ने स्कूल छोड़ दिया था। आंदोलन से प्रभावित छात्रों के लिए लाला लाजपतराय ने लाहौर में 'नेशनल कॉलेज' की स्थापना की थी। इसी कॉलेज में भगत सिंह ने भी प्रवेश लिया। 'पंजाब नेशनल कॉलेज' में उनकी देश भक्ति की भावना फलने-फूलने लगी थी। इसी कॉलेज में यशपाल, भगवतीचरण, सुखदेव, तीर्थराम, झण्डा सिंह आदि क्रांतिकारियों से उनका संपर्क हुआ। कॉलेज में एक 'नेशनल नाटक क्लब' भी था। इसी क्लब के माध्यम से भगत सिंह ने देशभक्तिपूर्ण नाटकों में अभिनय भी किया। ये नाटक थे- 'राणा प्रताप', 'सम्राट चन्द्रगुप्त' और 'भारत दुर्दशा'।ध्यान देंअधिक जानकारी के लिए देखें:-भगत सिंह

4. कुषाण शासक कनिष्क के निर्माण कार्यों का निरीक्षक अभियन्ता अधिकारी कौन था?

अग्रमस
विम तक्षम
अगेसिलोस
मोअस
कनिष्क का सिक्का
'कुषाण वंश' का प्रमुख प्रतापी सम्राट कनिष्क 'भारतीय इतिहास' में अपनी विजय, धार्मिक प्रवृत्ति, साहित्य तथा कला का प्रेमी होने के नाते विशेष स्थान रखता है। कुमारलात की 'कल्पनामंड' नामक टीका के अनुसार इसने भारत विजय के पश्चात् मध्य एशिया में ख़ोतान जीता और वहीं पर राज्य करने लगा। कल्हण ने भी अपनी 'राजतरंगिणी' में कनिष्क और हुविष्क द्वारा कश्मीर पर राज्य तथा वहाँ अपने नाम पर नगर बसाने का उल्लेख किया है। इनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि सम्राट कनिष्क का राज्य कश्मीर से उत्तरी सिंध तथा पेशावर से सारनाथ के आगे तक फैला था। कुषाण राजा कनिष्क के निर्माण कार्यों का निरीक्षक अभियन्ता एक यवन अधिकारी 'अगेसिलोस' था।ध्यान देंअधिक जानकारी के लिए देखें:-कनिष्क, अगेसिलोस

5. इतिहास में दूसरी जैन सभा कहाँ पर आयोजित हुई थी?

वल्लभीपुर
पाटलिपुत्र
कश्मीर
वैशाली
'वल्लभीपुर' या 'बल्लभीपुर' प्राचीन भारत का नगर, जो पाँचवीं से आठवीं शताब्दी तक मैत्रक वंश की राजधानी रहा था। यह पश्चिमी भारत के सौराष्ट्र में और बाद में गुजरात राज्य के भावनगर बंदरगाह के पश्चिमोत्तर में 'खम्भात की खाड़ी' के मुहाने पर स्थित था। माना जाता है कि वल्लभीपुर की स्थापना लगभग 470 ई. में मैत्रक वंश के संस्थापक सेनापति भट्टारक ने की थी। वल्लभीपुर ज्ञान का महत्त्वपूर्ण केन्द्र था और यहाँ कई बौद्ध मठ भी थे। एक जैन परम्परा के अनुसार पाँचवीं या छठी शताब्दी में दूसरी जैन परिषद यहीं आयोजित की गई थी। इसी परिषद में जैन ग्रन्थों ने वर्तमान स्वरूप ग्रहण किया था। यह नगर अब लुप्त हो चुका है, लेकिन 'वल' नामक गाँव से इसकी पहचान की गई है, जहाँ मैत्रकों के ताँबे के अभिलेख और मुद्राएँ पाई गई हैं।ध्यान देंअधिक जानकारी के लिए देखें:-वल्लभीपुर

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