वैशाली  

वैशाली
वैशाली, बिहार
विवरण 'वैशाली' बिहार के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। यह अत्यंत प्राचीन नगर है, जिसका महात्मा बुद्ध से निकट का सम्बंध रहा है।
राज्य बिहार
ज़िला वैशाली
प्राचीन नाम 'विशाला', 'वैसाली' (पालि)
संस्थापक राजा विशाल
प्रशासनिक भाषा मैथिली, हिन्दी
विशेष बुद्ध को वैशाली नगर बड़ा ही प्रिय था, यही कारण था कि बौद्ध लोग इस नगर की गणना अपने धार्मिक तीर्थ के रूप में करने लगे थे।
संबंधित लेख बौद्ध धर्म, बुद्ध, बौद्ध धार्मिक स्थल बुद्ध की शिक्षा
अन्य जानकारी वैशाली के कई उपनगरों के नाम पाली साहित्य से प्राप्त होते है, जैसे- 'कुंदनगर', 'कोल्लाग', 'नादिक', 'वाणियगाम', 'हत्थीगाम' आदि।

वैशाली गंगा घाटी का नगर है, जो आज के बिहार एवं बंगाल प्रान्त के बीच सुशोभित है। इस नगर का एक दूसरा नाम 'विशाला' भी था। इसकी स्थापना महातेजस्वी 'विशाल' नामक राजा ने की थी, जो भारतीय परम्परा के अनुसार इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए थे। इसकी पहचान मुजफ्फरपुर ज़िले में स्थित आधुनिक बसाढ़ से की जाती है। वहाँ के एक प्राचीन टीले को स्थानीय जनता अब भी 'राजा विशाल का गढ़' कहती है।

स्थिति तथा इतिहास

प्राचीन नगर 'वैशाली', जिसे पालि में 'वैसाली' कहा जाता है, के भग्नावशेष वर्तमान बसाढ़ नामक स्थान के निकट स्थित हैं जो मुजफ्फरपुर से 20 मील दक्षिण-पश्चिम की ओर है। इसके पास ही 'बखरा' नामक ग्राम बसा हुआ है। इस नगरी का प्राचीन नाम 'विशाला' था, जिसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में है। गौतम बुद्ध के समय में तथा उनसे पूर्व लिच्छवी गणराज्य की राजधानी यहाँ थी। यहाँ वृजियों[1] का संस्थागार था, जो उनका संसद-सदन था। वृजियों की न्यायप्रियता की बुद्ध ने बहुत सराहना की थी।[2]

न्याय व्यवस्था

वैशाली के संस्थागार में सभी राजनीतिक विषयों की चर्चा होती थी। यहाँ अपराधियों के लिए दंड व्यवस्था भी की जाती थी। कथित अपराधी का दंड सिद्ध करने के लिए विनिश्चयमहामात्य, व्यावहारिक, सूत्रधार अष्टकुलिक, सेनापति, उपराज या उपगणपति और अंत में गणपति क्रमिक रूप से विचार करते थे और अपराध प्रमाणित न होने पर कोई भी अधिकारी दोषी को छोड़ सकता था। 'दंड विधान संहिता' को 'प्रवेणिपुस्तक' कहते थे। वैशाली को प्रशासन पद्धति के बारे में यहाँ से प्राप्त मुद्राओं से बहुत कुछ जानकारी होती है। वैशाली के बाहर स्थित 'कूटागारशाला' में तथागत कई बार रहे थे और अपने जीवन का अंतिम वर्ष भी उन्होंने अधिकांशत: वहीं व्यतीत किया था। इसी स्थान पर अशोक ने एक प्रस्तर स्तंभ स्थापित किया था।

चैत्यगृह

वैशाली के चार प्रसिद्ध चैत्य थे-

  1. पूर्व में उदयन
  2. दक्षिण में गौतमक
  3. पश्चिम में सप्ताभ्रक
  4. उत्तर में बहुपुत्रक

अन्य चैत्यों के नाम थे- 'कोरमट्टक' तथा 'चापाल' आदि। बौद्ध किवदंती के अनुसार तथागत ने चापाल चैत्य ही में अपने प्रिय शिष्य आनन्द से कहा था कि- "तीन मास पश्चात् मेरे जीवन का अंत हो जाएगा।" लिच्छवी लोग वीर थे, किंतु आपस की फूट के कारण ही वे मगध के राजा अजातशत्रु की राज्य लिप्सा का शिकार बने।[2]

बुद्ध की प्रिय नगरी

'एकपण्ण जातक'[3] के प्रारंभ में वर्णन है कि "वैशाली के चारों ओर तीन भित्तियाँ थीं, जिनके बीच की दूरी एक एक कोस थी और नगरी के तीन ही सिंहद्वार थे, जिनके ऊपर प्रहरियों के लिए स्थान बने हुए थे।" युद्ध के समय वैशाली अति समृद्धिशाली नगरी थी। बौद्ध साहित्य में यहाँ की प्रसिद्ध गणिका आम्रपालिका के विशाल प्रासाद तथा उद्यान का वर्णन है। इसने तथागत से उनके धर्म की दीक्षा ग्रहण कर ली थी। तथागत को वैशाली तथा उसके निवासियों से बहुत प्रेम था। उन्होंने यहाँ के गणप्रमुखों को देवों की उपमा दी थी। अंतिम समय में वैशाली से कुशीनारा आते समय उन्होंने करूणापूर्ण ढंग से कहा था कि- "आनन्द अब तथागत इस सुंदर नगरी का दर्शन न कर सकेगे।"[4]

अन्य महत्त्वपूर्ण स्थल

जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर महावीर भी वैशाली के ही राजकुमार थे। इनके पिता का नाम 'सिद्धार्थ' तथा माता का नाम 'त्रिशला' था। ये लिच्छवी वंश के ही रत्न थे। इनका जन्म स्थान वैशाली का उपनगर 'कुंद' या 'कुंड' था, जिसका अभिज्ञान बसाढ़ के निकट 'वसुकुंड' नामक ग्राम से किया गया है। वैशाली के कई उपनगरों के नाम पाली साहित्य से प्राप्त होते है, जैसे- 'कुंदनगर', 'कोल्लाग', 'नादिक', 'वाणियगाम', 'हत्थीगाम' आदि। 'महावंश' [5]के अनुसार वैशाली के निकट 'बालुकाराम' नामक उद्यान स्थित था। बरवरा ग्राम से एक मील दूर 'कोल्हू' नामक स्थान के पास एक महंत के आश्रम में अशोक का सिंहशीर्ष स्तंभ है, जो प्रायः पचास फुट ऊंचा है; किंतु भूमि के ऊपर यह केवल अठारह फुट ही है। चीनी यात्री युवानच्वांग ने इसका उल्लेख किया है। पास ही 'मर्कटह्रद' नामक तड़ाग है। कहा जाता है कि इसे बंदरों के एक समूह ने बुद्ध के लिए खोदा था। मर्कटह्रद का उल्लेख 'बुद्धचरित'[6] में है। यहाँ उन्होंने 'मार' या 'कामदेव' को बताया था कि वे तीन मास में निर्वाण प्राप्त कर लेंगे। तड़ाग के निकट 'कुताग्र' नामक स्थान है। जहाँ बुद्ध ने 'धर्मचक्र प्रवर्तन' के पांचवे वर्ष में निवास किया था। बसाढ़ के खंडहरों में एक विशाल दुर्ग के ध्वंसावशेष भी स्थित हैं। इसको 'राजा वैशाली का गढ़' कहते है। एक स्तूप के अवशेष भी पाए गए हैं।

प्राचीन ग्रन्थों में

यह नगर एक दूसरे से कुछ अन्तर पर बनी हुई तीन दीवालों से घिरा था। इनमें से एक मिट्टी दूसरी ईंट तथा तीसरी पत्थर की बनी रही होगी। प्राचीन ग्रन्थों में वर्णन मिलता है कि नगर की क़िलेबन्दी यथासंभव इन तीनों कोटि की दीवालों से की जाय ताकि शत्रु के लिये नगर के भीतर पहुँचना असंभव हो सके। संभव है कि यह नगर तीन तरह की खाइयों से घिरा हो जिनका वर्णन कौटिल्य आदि ने किया है; जैसे सूखी खाई, जल तथा कीचड़ से भरी खाई। आशा है कि इस विषय पर वहाँ भविष्य में होने वाली खुदाइयों द्वारा प्रकाश पड़ेगा।

इस नगर के केन्द्रीय भाग में वहाँ के शासक लिच्छवी लोग रहते थे। हुएन-सांग ने इस हिस्से को 'पैलेससिटी' (अर्थात वह भाग जहाँ पर राजमहल वर्तमान था) कहा है। इसका घेरा एक मील के लगभग था। अधिक सावधानी बरतने के लिये इसे भी सुरक्षा के साधनों से युक्त कर दिया गया था। इसके भीतर कुछ चुने हुए लोग ही प्रवेश कर पाते थे। शेष जनता को इसके बाहर बसाया गया था। हुएन-सांग के अनुसार पूरे नगर का घेरा 14 मील के लगभग था। इस स्थान पर उल्लेखनीय है कि नगर के विभाजन की यह प्रथा हड़प्पा की परम्परा का स्मरण दिलाती है, जो गंगा घाटी में प्रचलित थी। वहाँ भी विशिष्ट जनता दुर्ग वाले हिस्से में तथा साधारण जनता लघु नगर में आबाद की गई थी।

शासन व्यवस्था

लिच्छवियों का शासन प्रजातंत्रात्मक आदर्शों पर आधारित था। कड़े से कड़े मसलों का निर्णय वे अपने सभागृह में बहुमत द्वारा करते थे। अवस्था की दृष्टि से वे कोई भेद भाव नहीं मानते थे। सबके राजनीतिक अधिकार एवं प्रभाव बराबर ही थे। इसकी खिल्ली उड़ाते हुय ललितविस्तर नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि लिच्छवि लोग अपने से ज्येष्ठ, वृद्ध या पद में उच्च व्यक्ति के प्रति भी कोई आदर या शिष्टाचार नहीं दिखाते थे। सबके सब अपने को राजा समझते थे। वे गौतम बुद्ध के बड़े ही भक्त थे। बौद्ध ग्रन्थों में वर्णन मिलता है कि इस नगर में आम्रपाली नामक एक वेश्या रहती थी, जो पुर के शोभा थी। साधारण वेश्याओं की तुलना में उसका स्थान ऊँचा था। बुद्ध के उपदेशों सें वह अत्यन्त प्रभावित थी।

नागरिकों का चरित्र

लिच्छवि उद्योगी एवं पुरुषार्थी समझे जाते थे। मगध नरेश अजातशत्रु तक को उनके विनाश की तैयारी में लोहे के चने चबाने पड़े थे। वे बड़े ही अतिथिपरायण थे। जब नगर में कोई भी नवागन्तुक आता था, तो उसका दिल खोल कर वे स्वागत करते थे। उत्सव एवं समारोह में वे ख़ूब भाग लेते थे। आभूषण एवं अच्छे वस्त्रों के वे शौक़ीन थे। घोड़े, हाथी या पालकी पर वे सज-धज कर आरूढ़ हो राजमार्गों पर निकलते थे। वे अपने सदाचार सम्बन्धी नियमों का पालन बड़ी ही कड़ाई के साथ करते थे। उनके समय में वैशाली में बौद्ध धर्म का प्रभाव काफ़ी फैल गया था। वहाँ के भिक्षुसंघ के नैतिक आदर्शों से वे प्रभावित रहे होंगे। वे व्यभिचार को सबसे बड़ा अपराध समझते थे। इस जुर्म में पकड़े हुये व्यक्ति को प्राणदण्ड तक दिया जाता था। इससे छूट केवल उन्हीं पुरुषों या महिलाओं को दी जाती थी, जो प्रायश्चित्त स्वरूप है कि उनके समय में यह नगर सुन्दर राजमार्गों, महलों, उद्यान सरोवर तथा मठ आदि से सुशोभित था।

लिच्छवियों में दोष

बुद्ध के परिनिर्वाण के पश्चात् लिच्छवी द्वारा वैशाली में बनवाया गया अस्थि स्तूप

लिच्छवियों में दोष यह था कि उनमें जातिगत भावना परले दर्जे की थी। उन्होंने एक सरोवर बना रखा था, जिसमें नहाने का अधिकार एकमात्र लिच्छवि वंशज को ही था। उनका इतना आतंक था कि इसके जल को और कोई छ तक नहीं सकता था। यह सरोवर ऊपर से एक लोहे की जाली से ढका था, जिससे पशु पक्षी उसके पानी को दूषित नहीं कर सकते थे। बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर-निकाय के वर्णन से ऐसा लगता है कि कुछ लिच्छवि नवयुवक उद्दंड भी थे। वे कोठे अटारियों के ऊपर से नीचे सड़कों पर चलने वाली सुन्दरियों के ऊपर कभी-कभी धूल या गन्दा पदार्थ फेंक देते थे। इस प्रकार के दुर्व्यवहारों के कारण महिलाओं का घर से बाहर निकलना अत्यन्त दुष्कर हो जाता था। इस बात का स्पष्टीकरण यहाँ आवश्यक है कि इस तरह के नवयुवकों की संख्या अत्यल्प थी। अधिकांश लिच्छवि उदारचरित, शिष्ट एवं गुणसंम्पन्न थे।

मौर्यों से सम्बन्ध

गुप्त काल में लिच्छवी वंश की कन्या कुमारदेवी का विवाह चंद्रगुप्त प्रथम से हुआ था। इसी राजकुमारी के गर्भ से प्रतापी समुद्रगुप्त पैदा हुआ। कुमारदेवी के नाम का उल्लेख समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में हुआ है। राजनीतिक दृष्टि से यह विवाह संबन्ध महत्त्व से भरा हुआ था। इसके फलस्वरूप सम्पूर्ण लिच्छविराज्य गुप्त-राज्य में मिल गया। लगता है कि कुमारदेवी लिच्छवि-राज्य की एक मात्र वारिस रह गई थी। इस विवाह के स्मारक-रूप में चन्द्रगुप्त और कुमारदेवी दोनों के ही नाम पर सिक्के चलाये गये। ये सिक्के एक ही तरह के हैं। इन पर दोनों के नाम और चित्र तथा लिच्छवियों का उल्लेख मिलता है। वैशाली का नगर अब गुप्तों को प्राप्त हो गया। उन्होंने इसे तीरभुक्ति (तिरहुत प्रान्त) की राजधानी बना दी। वहाँ गुप्प वंशीय राजकुमार राज्यपाल की हैसियत से नियुक्त किये गये थे। इसकी पुष्टि पुरातत्त्वीय साक्ष्यों से भरपूर हो जाती है।

आनन्द स्तूप, वैशाली

धार्मिक तीर्थ

बुद्ध को यह स्थान बड़ा ही प्रिय था, अत: बौद्ध लोग इस नगर की गणना अपने धार्मिक तीर्थ के रूप में करने लगे थे। लगता है कि अशोक बौद्ध तीर्थों का पर्यटन करता हुआ इस नगर में भी आया था, जिसके शीर्ष स्थान पर एक सिंह-प्रतिमा मिलती है। यह लाट चुनार के बालूदार पत्थर की बनी है। चीनी यात्रियों ने भी इस नगर का वर्णन किया है। फाहियान लिखता है कि "इसके उत्तर की दिशा में एक उद्यान था, जिसमें एक दुमंज़िला भवन बना हुआ था। लिच्छवियों ने गौतम बुद्ध के विश्राम की सुविधा के लिए इसे बनवा रखा था।" उसने इस नगर में तीन स्तूपों के वर्तमान होने का उल्लेख किया है। ये उन स्थानों पर बने हुये थे, जो गौतम बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित थे। हुयेनसांग लिखता है कि इस नगर के आस-पास की ज़मीन बहुत ही उपजाऊ थी। उसमें केले, आम तथा तरह-तरह के फल-फूल पैदा होते थे। चीनी यात्री का यह कथन प्रामाणिक है। आज भी मुजफ्फरपुर ज़िले में, जहाँ वैशाली का नगर स्थित था, लीची, केले और आम की फ़सल बहुत अच्छी होती है। हुयेनसांग लिखता है कि "लिच्छवि बड़े ही ईमानदार, सुशिक्षित तथा धर्मपरायण थे। अपनी जबान की रक्षा के लिये वे प्राणों की बाज़ी लगा देते थे। उसने अशोक निर्मित स्तम्भ का उल्लेख किया है। उसने भी वहाँ कई स्तूपों के होने का उल्लेख किया है, जिनमें बुद्ध तथा उनके प्रिय शिष्यों की अस्थियाँ गाड़ी गई थीं। जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी का जन्म इसी नगरी में हुआ था। अत: वे लोग इस पुरी को 'महावीर-जननी' कहते थे। वैशाली के नागरिक उनकी मृत्यु तिथि के अवसर पर रात्रि को दीपक जलाते थे।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. लिच्छवियों की एक शाखा
  2. 2.0 2.1 ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 882 |
  3. काॅवेल, सं.149
  4. बुद्धचरित 25,34
  5. महावंश 4,150,4,63
  6. बुद्धचरित 23,63

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